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Apr 1, 2026

व्यंग्यः हम मूर्खों के सिरमौर

 - गिरीश पंकज

मूर्ख दिवस के दिन सर्वाधिक खुशी होती है नेता छदामीराम को और अपनेराम को यानी मुझको। सुबह से ही हम दोनों प्रसन्न होकर सब को चित करने में लगे रहते हैं । एक तो पहली अप्रैल और उस पर अपना जन्मदिन । लोग भी खूब मजा लेते हैं । उन्हें फोन - पर - फोन करते हैं।  वाट्सएप के जरिए संदेश देते हैं । लगभग सब यही लिखते हैं, "बधाई हो, आज आपका जन्मदिन है।"

लोगों को अनजाने में ही एक ऐसा दिन मिल गया, जिस दिन वह अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। "आज आपका दिन है", कहकर लोग यही व्यक्त करना चाहते हैं कि बनाए जाओ हमको उल्लू । हम तो मूरख है ही जनम के। आज आपका ही दिन है।

छदामीराम रोज की तरह एक अप्रैल को भी बहुत खुश रहते हैं । वह अपने भाग्य को सराहते हैं कि  धुप्पल में ही वह मनुष्य योनि में आ गए। थैंक्स गॉड!! अगर लोमड़ी का शरीर मिलता, तो जंगल में ही भटकते रहते । बचे-खुचे मांस को खाकर गुजारा करना पड़ता ; लेकिन मनुष्य-योनि में क्या आए, अब तो आनंद - ही - आनंद है। परमानन्द कहना सही होगा।

छदामीराम ने सीधे-साधे लोगों को ठगने की जो कला बाप-दादाओं से सीखी, वह निरंतर काम आ रही है । हर बार चुनाव में खड़े होते हैं और जीत जाते हैं। हाथ जोड़ना,  लोगों के पैर छूना,  पैसे बाँटना, दारू बँटवाना आदि-आदि सुकर्मों  के सहारे वह हमेशा चुनाव जीते हैं। विनम्र भाव कुछ ऐसा दिखाते हैं कि ससुरी विनम्रता भी लाज के मारे जल-जल हो जाती है। वैसे छदामीराम की विनम्रता मतदान के दिन तक ही रहती है।  उसके बाद तो वे गधे के सिर से सींग की तरह,  भ्रष्ट अफसर के जीवन से नैतिकता की तरह, गरीब के घर से खुशहाली की तरह, भुखमरे के चेहरे से लाली की तरह गायब हो जाते हैं। उसके बाद लोग बस एक ही विज्ञापन दोहराते हैं: छदामीराम को …। ढूँढते ही रह जाओगे।

मोबाइल जब भी लगाओ, वह नहीं उठाते । उनका पीए उठाएगा और अक्सर दो - तीन बातें कहेगा। जैसे, "साहब बाथरूम में है । निकलते ही बात कराता हूँ ।" या फिर कहेगा,  "कार्यक्रम में बैठे हैं। लौटके आएँगे तो बात कराता हूँ ।" कभी कहेगा,  "वो तो आराम फरमा रहे हैं ।" … कभी कहेगा, "साहब बीमार  पड़े हुए हैं।"

जब भी फोन करो, छदामीराम से बात नहीं होती।  कोई न कोई बहाना हाजिर।  जिन लोगों के नंबर फीड है, और जिनसे उनकी लेन-देन की  सेटिंग है,  उनसे तो वे लपककर बात करते हैं। घंटी बजी और जैसे ही नाम दिखा, उपायीराम, तो फौरन बात शुरू कर देते हैं,

"और सुनाओ उपायीराम, जयश्रीराम!

कैसा चल रहा है तुम्हारा काम ?

बहुत दिन से रात को

हमने  नहीं टकराया आपसे में जाम।

कब आ रहे हो प्यारे,

तुम हमारे द्वारे?"

मोबाइल में जिनके नाम सेव हैं, अकसर उनसे बढ़िया बात करते हैं;  लेकिन जिनके नाम सेव नहीं है, उनसे बात करते हुए  महोदय लगभग गुर्राते हैं । पहले तो पीए ही गुर्राता है; लेकिन जब सामने वाला अधिक गुर्राने लगता है, तो पीए मोबाइल छदामीराम को दे देता है । फिर छदमीराम गुर्राते हैं; लेकिन मूर्ख दिवस के दिन छदामीराम गुर्राना भूलकर मिमियाना शुरू कर देते हैं। जितने भी फोन आते हैं, उन सबसे बात करके 'थैंक यू …थैंक यू'  कहते हैं; क्योंकि इनकी अंतरात्मा कहती है- "बेटे, चुनाव के समय और जन्मदिन के दिन तो मनुष्य जैसा बन जाना ठीक रहता है।"

छदामीराम अपनी आत्मा का कहना अकसर मान लेते हैं। जब कोई व्यक्ति कुछ काम करवाने के एवज में उनको रिश्वत की रकम भेंट करता है, तब भी छदामीराम सीधे अपनी आत्मा से ही बातचीत करते हैं।  सामने से मिल रही राशि के बारे में आत्मा  से पूछते हैं कि फलाना इतने लाख दे रहा है । क्या इस काम के एवज में इतनी रकम उचित है?

जब आत्मा कह देती है, "हाँ रे, ठीक है । ले ले", तो छदामीराम रिश्वत को बड़े ही श्रद्धा- भाव के साथ ग्रहण करते हैं।  लेकिन जब कभी अगर आत्मा ने कहा, "नहीं, यह रकम तुम्हारे स्टैंडर्ड के अनुरूप नहीं है", तो छदामीराम साफ इनकार कर देते हैं। जब तक उन्हें मनमाफिक रकम नहीं मिल जाती, वे रिश्वत ग्रहण ही नहीं करते। पर्याप्त दहेज न मिलने के कारण उन्होंने तो पाणिग्रहण से भी इंकार कर दिया था। जीवन  में कुछ सिद्धांत तो होने ही चाहिए साहेब।  तो ऐसे हैं हमारे  छदामीराम।

मूर्ख दिवस पर उनको लख-लख बधाइयाँ।

आप तो  दे ही चुके होंगे न। उस दिन अपने पर ही एक कुण्डलिया लिख मारी। देखें,

मूर्खों के सिरमौर हम, है इसमें  ही सन्न।

लगा रहे सब चून ही, हो कर के परसन्न।

हो कर के परसन्न, समझते हम चालाकी।

कैसे निबटे कोय,  निकालें सबकी झाँकी।

कह पंकज कविराय, करना है खुद पे गौर।

कब तक आखिर हम रहें, मूर्खों के सिरमौर।

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