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Jun 1, 2026

व्यंग्यः शासक हाथी और शोषित कुत्ता

  - डॉ. जेन्नी शबनम

एक कहावत है- ''हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार’’। इसका अर्थ है आलोचना, निन्दा, द्वेष या बुराई की परवाह किए बिना अच्छे कार्य करते रहना या सही राह पर चलते रहना। इसका सन्देश अत्यन्त सकारात्मक है, जो हर किसी के लिए उचित, सार्थक एवं अनुकरणीय है। हम सभी के जीवन में ऐसा होता है जब आप सही हों फिर भी आपकी अत्यधिक आलोचना होती है। अक्सर आलोचना से घबराकर या डरकर कुछ लोग निष्क्रिय हो जाते हैं या चुप बैठ जाते हैं। कुछ लोग अनुचित राह पकड़ लेते हैं और ‘हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार’ कहावत को चरितार्थ करते हैं। वे बिना किसी परवाह के अनुचित कार्य करते रहेंगे, न अपने सम्मान की चिन्ता न दूसरे की असुविधा की फ़िक्र। बस अपना हित साधना है, पूरी दुनिया जाए भाड़ में।   

वर्तमान परिपेक्ष्य में देखें तो राजनीतिक परिस्थितियों पर यह कहावत नकारात्मक रूप से सटीक बैठती है। कुछ नेता स्वयं को हाथी मानकर अति मनमानी करते हैं, अति निर्लज्जता से सारे ग़लत काम करते हैं, असंवेदनशीलता की सारी हदें लाँघ जाते हैं, बेशर्मी से दाँव-पेंच लगाकर बाज़ी चलते हैं। उन्हें न अपनी आलोचना की फ़िक्र है, न अपने कुकृत्यों पर शर्मिन्दगी। पद, पैसा और लालच के सामने उन्हें किसी चीज़ की परवाह नहीं। 

इस सन्दर्भ में सोचें, तो हम आम जनता कुत्ते की तरह हैं, जो हर अनुचित पर लगातार भौंक रहे हैं और सदियों से भौंकते जा रहे हैं। न किसी को हमारी परवाह है, न कोई हमारी बात सुनता है; फिर भी हम भौंकते रहते हैं। ज़िन्दाबाद-मुर्दाबाद करते रहते हैं। हमारे अधिनायक, बादशाह, शासक, नेता, आका, सत्ताधीश बिगड़ैल हाथी की तरह सत्ता हथियाने के लिए भाग रहे हैं और हम जैसे भौंकते कुत्तों को रौंदते जा रहे हैं। वे हाथी हैं, अपने हाथी होने पर उन्हें घमण्ड है और इस अभिमान में पाँव के नीचे आने वाले कुत्तों को रौंदना उनका कर्त्तव्य; क्योंकि ऐसे कुत्ते उनकी राह में बाधा डालने के लिए खड़े हैं।  

भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अन्याय, अत्याचार, तानाशाही, निरंकुशता आदि के ख़िलाफ़ हम कितना भी भौंके, कोई सुनवाई नहीं है। नेताओं को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, उन्हें अपने फ़ायदे के लिए जो सही लगता है वे करते हैं; वे हाथी जो ठहरे। आम जनता तो कुत्ता है, भौंके, भौंकता रहे। जिधर रोटी मिलेगी दुम हिलाते हुए कुछ कुत्ता हाथी के पीछे चला जाएगा। कुछ कुत्ता हमेशा की तरह भौंक-भौंककर जनता को जगाएगा, ताकि वे अपना अधिकार जानें और सही के लिए भौंकने में साथ दें। 

जब-जब चुनाव आएगा तब-तब हाथी होश में आएगा और गिरगिट-सा रंग बदलते हुए अपनी चाल थोड़ी धीमी करेगा। बाज़ार से गुज़रते हुए रोटी का टुकड़ा फेंकता जाएगा, थोड़ा पुचकारेगा, थोड़ा दया दिखाएगा; जो झाँसे में न आया उसे पाँव तले कुचल देगा। यों भी पेट और वोट का रिश्ता बहुत पुराना है। पाँच साल जनता कुत्ते की तरह भौंकता है और नेता हाथी की तरह मदमस्त चलता रहता है।

समाज में हर तरह के लोग होते हैं, जो हर कार्य का आकलन, अवलोकन और निष्पादन अपने सोच-विचार से करते हैं। हमारी सोच को शिक्षा, धर्म और संस्कृति सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है। जाने कब आएगा वह दिन जब न कोई शासक होग़ा न कोई शोषित। सभी की सोच पर से धर्म और जाति का पर्दा उठेगा और जनहित को ध्यान में रखकर इंसानियत वाले समाज का निर्माण होगा।  

शासक हाथी और शोषित कुत्ता, खेल जारी है... हाथी अपने मद में चूर जा रहा है और कुत्ते भौंक रहे हैं। हाथी सदा सही होता है और कुत्ता सदा बेवकूफ़! सन्दर्भ भले उलट गया पर कहावत सही है- ‘ हाथी चले बाज़ार कुत्ता भौंके हज़ार।’’

Jan 1, 2026

यादेंः नव वर्ष एक उत्सव वाला दिन

 - डॉ. जेन्नी शबनम
नव वर्ष की प्रतीक्षा पूरे वर्ष रहती है। नव वर्ष एक उत्सव वाला दिन है। हालाँकि समय कितनी तीव्रता से बीत रहा है, यह भी याद दिलाता है। यों लगता है मानो अभी-अभी तो नया साल आया था, इतनी जल्दी बीत गया। 31 दिसम्बर की रात जैसे ही घड़ी की सुई 12 पर पहुँचती है, हम सभी पूरे उल्लास के साथ एक दूसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएँ देते हैं। जैसे ही क्रिसमस आता है, नव वर्ष के आगमन का जोश भर जाता है। नव वर्ष के पहले दिन क्या-क्या करना है इसकी योजना बनती है व तैयारी होने लगती है। 

समय के साथ नव वर्ष मनाने का चलन और शुभकामनाएँ देने का प्रचलन दोनों में बहुत तेजी से बदलाव हुआ है। मेरे बचपन में 31 दिसम्बर की रात का कोई महत्त्व न था। तब न टेलीविज़न था, न मोबाइल, न हर घर में टेलीफोन। 31 दिसम्बर की रात में आजकल के जैसा जश्न नहीं होता था। 1 जनवरी की भोर से नव वर्ष की शुरुआत होती थी। इस दिन कोई सपरिवार पिकनिक पर जाता, तो कोई घर पर मित्रों और परिवार के साथ सुस्वादु भोजन का आनन्द लेता था। अपनी-अपनी इच्छा और क्षमता के अनुसार हर कोई इस दिन को मनाता था। जब से टी.वी. आया तब से नव वर्ष की पूर्व संध्या पर कोई-न-कोई कार्यक्रम अवश्य होता है। अगर कोई योजना न बन सकी तो टी.वी. देखकर मनोरंजन करना भी आदत में शुमार होता गया।    

संचार माध्यमों के प्रसार, बाज़ारी करण और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण पर्व, त्योहार और उत्सव मनाने का रूप बदल गया है। पर्व, त्योहार, उत्सव इत्यादि में धूमधाम शोभनीय है; परन्तु अशिष्टता अशोभनीय है। इन दिनों पूजा, पर्व, त्योहार, अनुष्ठान, व्रत, उत्सव इत्यादि में फूहड़पन देखने को मिलता है। चाहे विवाह समारोह हो या कोई आयोजन या मूर्ति विसर्जन, लाउडस्पीकर या डीजे पर अश्लील गाना-नाचना फैशन बन गया है। धार्मिक आयोजन हो, तो समाज के नियम को न मानना और कानून को तोड़ना अधिकार बन गया है। भले इसमें लोगों की जान चली जाए। जश्न मनाने में उत्साह और उमंग होता ही है; परन्तु दूसरे के अधिकार का हनन कर उत्सव मनाना अनुचित है। 

नव वर्ष हो या कोई खास दिन उत्सव मनाना ही चाहिए। मेरी इच्छा होती है कि साल का हर दिन किसी-न-किसी विशेष दिन को समर्पित कर देना चाहिए, ताकि सालों भर हम सभी अपने कार्य के साथ उत्सव भी मनाते रहें। नव वर्ष के आगमन के उपलक्ष्य में हर जगह कुछ-न-कुछ विशेष आयोजन होता है। बच्चों और युवाओं में तो खास उत्साह रहता है। ठण्ड का मौसम, सजे बाज़ार, जगमग रोशनी, विशेष पकवान से सुगन्धित रेस्तराँ, छुट्टी की धूम, बच्चे-जवान-बूढ़े प्रसन्नचित्त। उपहार के लेने-देने के चलन के कारण सामान पर विशेष छूट। भीड़-भाड़, शोरगुल, मदिरापान, स्वादिष्ट भोजन, नाच-गान, मस्ती भरा माहौल... घड़ी की सुई 12 पर, जोर से हल्ला, पटाखे की गूँज, तालियों की गड़गड़ाहट। कितनी सुन्दर रात और सुहानी भोर! आनन्दित मन से एक दूसरे के गले मिलकर शुभकामना देते लोग। हर फोन की घण्टी बजती और लोग अपनों से बात करते। इस तकनीक ने जीवन में खुशियाँ भर दी हैं। वीडियो कॉल पर अपनों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है; दूरी नहीं खलती। पूरी रात मस्ती- भरी और भोर में सुखकर नींद। 

मेरे बच्चे जब तक छोटे रहे क्रिसमस, नव वर्ष, वैलेंटाइन डे, बर्थडे, दीवाली इत्यादि ख़ूब मनाया। मेरे पति के संस्थान में नव वर्ष की पूर्व संध्या पर बहुत बड़ी पार्टी होती थी। सारी रात खाना-पीना, गाना-बजाना, नाचना, पटाखे फोड़ना इत्यादि होता था। घर में मैं और मेरी बेटी शुद्ध शाकाहारी हैं। दीवाली मेरा प्रिय त्योहार है; क्योंकि इस दिन दीपों की जगमग और हर घर में शाकाहारी पकवान बनता है। बाहर से शाकाहारी रेस्तराँ से खाना आए तो ही मन से खाती हूँ, केक भी एगलेस खाती हूँ। शुद्ध शाकाहार, कर्णप्रिय संगीत, मनचाहे तरीक़े से नाचना-गाना, हँसी-मज़ाक, ठहाके, खेलना, अलाव तापना इत्यादि किसी ख़ास दिन के आयोजन में करना मेरा पसन्दीदा कार्य है, जिसे मैं प्रसन्न मन से करती हूँ। 

मुझे अपने बचपन से बड़े होने तक का अधिकतर नया साल मनाना याद है। मेरी पढ़ाई भागलपुर के क्रिश्चन स्कूल से हुई है। प्राइमरी स्कूल में क्राफ़्ट के क्लास में अन्य चीज़ों के अलावा कागज़ का क्रिसमस ट्री बनाना सीखा। हाई स्कूल में मेरा स्कूल 19 दिसम्बर को क्रिसमस की छुट्टी अर्थात् बड़े दिन की छुट्टी के लिए बन्द होता था। क्रिसमस से नव वर्ष के पहले दिन तक छुट्टी वाला माहौल। मुझे साल के पहले दिन का इन्तिज़ार सबसे अधिक इस कारण रहता था कि आज से कॉपी पर नया साल लिखना है। लिखने की आदत बचपन से रही है। पूरे घर को साफ़ करना, पुराना कैलेण्डर फाड़ना और नया टाँगना। जाने कितना आनन्द आता था इन छोटे-छोटे कामों में। हम बच्चों को पता चला था कि साल का पहला दिन जैसा बीतता है वैसा ही पूरा साल बीतेगा। सुबह-सुबह उठकर नहाना, घर साफ़ करना, कुछ अच्छा खाना बनाना, सिनेमा देखना, पढ़ना-लिखना इत्यादि ताकि सालभर ऐसा ही दिन बीते। बच्चा मन कितना सच्चा होता है, बिना तर्क कुछ भी मान लेता है।

जब तक मेरे पापा जीवित रहे, एक जनवरी को घर में पापा-मम्मी के सहकर्मी और मित्र आते, भोज होता, नियत समय पर वे जाते और हम लोग अपने-अपने कार्य में मगन। हाँ! मेरे घर में सुबह से गाना ज़रूर बजता रहता था, चाहे रेडियो या रिकॉर्ड प्लेयर। पापा की मृत्यु के बाद हमारा कुछ वर्ष बिना किसी त्योहार और उत्सव के बीता। जब मैं कॉलेज में पढ़ने लगी और पापा के गुजरे काफी वर्ष हो गए थे, तब मुझे सिनेमा देखने का चस्का लग गया। हर एक जनवरी को मम्मी को जबरन सिनेमा देखने के लिए ले जाती। छुट्टी की भीड़ के कारण हॉल में टिकट खरीदना जंग जीतने जैसा होता था; मैं जंग भी जीतती और सिनेमा भी देखती। 

मेरे जीवन का कुछ समय शान्तिनिकेतन में बीता है। वर्ष 1991 में पहली जनवरी को मैं अपनी एक मित्र के साथ घर से बाहर निकली नव वर्ष मनाने। कहीं कुछ नहीं, रोज़ की तरह सब कुछ शान्त। मैंने किसी से पूछा कि नव वर्ष के अवसर पर कहीं कुछ क्यों नहीं हो रहा है। तब पता चला कि बंगाल में अंग्रेज़ी तिथि से नहीं; बल्कि हिन्दी तिथि से नव वर्ष मनाते हैं। सुबह खिचड़ी बना-खाकर निकली थी, रात को दही चूड़ा खाकर नव वर्ष मना लिया। 

वर्ष 2000 में मेरी बेटी का जन्म हुआ। मेरा मन था कि वह मिलेनियम बेबी हो। इस कारण डॉक्टर से पहली जनवरी तय करने को कहा; परन्तु सिजेरियन सात तारीख़ से पहले सम्भव नहीं था। नव वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के वसंत विहार के एक होटल में दलेर मेंहदी का प्रोग्राम था, जिसका टिकट हम लोगों ने लिया। हालाँकि कभी भी बच्चे के जन्म की सम्भावना थी; इसलिए भीड़ में जाना हितकर नहीं और उस पर ठण्ड बेशुमार। फिर भी मैं गई। मेरे पति के परिवार के लोग और मेरी माँ भी गईं। मैं और मेरी माँ भीड़ में बाक़ी सबसे अलग हो गए। मेरा बेटा अपने चाचा के साथ था, इसलिए मुझे चिन्ता नहीं थी। हमारे पास न फ़ोन, न पैसे। इतनी धक्का-मुक्की थी कि मैं अपने पेट को बचाने के कारण न घुस सकी, न खाना खा सकी, न कार्यक्रम देख सकी। किसी अनजान से मोबाइल माँगकर पति को फ़ोन किया। अंततः लौटी और साल का पहला दिन अपोलो अस्पताल में बीता।  

लन्दन कई बार गई हूँ, पर वर्ष 2014 के क्रिसमस और नव वर्ष पर पहली बार गई थी। पूरा शहर खूबसूरती से सजा हुआ। रंगीन लाइट, जगमग रास्ते, रोड के ऊपर रंगीन लाइट की झालरें। 31 दिसम्बर की रात थेम्स नदी के किनारे आतिशबाजी होती है और बिग बेन की घंटी बजती है। शो का टिकट पहले से लेना होता है, जिसका पता हमें नहीं था। मैं अपने दोनों बच्चों के साथ गई। वहाँ तक पहुँचने के सारे रास्ते बन्द थे। एक पुलिस वाले ने बताया कि सिर्फ टिकट वाले जा सकते हैं, जो अब ख़त्म हो चुका है। वहाँ के रास्ते ऐसे हैं कि दूर से भी कुछ नहीं दिख सकता। हमने एक पिज़्ज़ा वाले की दूकान पर खड़े होकर पिज्जा बनाना सीखा और पिज्जा खाकर लौट आए। हाँ! 12 बजते ही आतिशबाजी की आवाज़ें सुनाई पड़ीं और आसमान में थोड़ी-सा आतिशबाजी देख सकी। लन्दन शहर की जगमग ख़ूबसूरती का ख़ूब आनन्द लिया।  

वर्ष 2021 के 31 दिसम्बर को मैं अकेली थी। नव वर्ष में पहली बार अकेली थी; क्योंकि बेटी बंगलोर में पढ़ाई कर रही है। मेरी माँ का इस वर्ष ही देहान्त हुआ था, तो मैं बहुत दुःखी रहती थी। मेरी एक मित्र की बेटी को पता चला कि मैं अकेली हूँ, तो वह आ गई। बाहर से खाना मँगाकर हमने पार्टी की। एक जनवरी की सुबह वह चली गई, उसका ऑफिस खुला था। मैं सिनेमा हॉल में जाकर सिनेमा देख आई। कई साल ऐसा हुआ है कि मैं अपने जन्मदिन पर अकेली होती हूँ। कई बार मेरी बेटी सिनेमा का टिकट ऑनलाइन बुक कर देती है। मैं ख़ुद को तोहफ़ा देती हूँ, सिनेमा देखती हूँ, काफ़ी पीकर आती हूँ। कभी मन किया तो किसी शाकाहारी रेस्तराँ में जाकर कुछ खा लेती हूँ। उत्सव मनाने का यह मेरा अपना तरीक़ा है। 

मेरे बच्चे जब स्कूल पास कर गए, तब से उनकी दुनिया बहुत विस्तृत हो गई। नव वर्ष हो या जन्मदिन, दोस्तों के साथ मनाना उन्हें पसन्द है। एक दिन घर वालों के साथ और एक दिन दोस्तों के साथ। नव वर्ष, जन्मदिन, पर्व-त्योहार बच्चों के साथ मनाना अच्छा लगता है; परन्तु समय के साथ बच्चों से दूरी और बदलाव को मन ने अब स्वीकार कर लिया है। सभी साथ हों, तो हर दिन खास हो जाता है। वे दूर रहें तो फ़ोन इस दूरी को मिटा देता है, पर कमी तो महसूस होती है। बेटा अपने परिवार में मस्त और बेटी अपने दोस्तों के साथ। अब 31 दिसम्बर की रात 12 बजे अपने दोनों बच्चों को शुभकामना देकर नए वर्ष का स्वागत करती हूँ। अब न कोई योजना बनाती हूँ, न मन में बहुत उत्साह रह गया है पूर्व की भाँति। धीरे-धीरे उम्र के साथ मन घट रहा है और मैं स्वयं में सिमट रही हूँ। सिनेमा देखने का सिलसिला अब भी जारी है; परन्तु उम्र और परिवार के कारण अब इसमें अंतराल आ जाता है। शायद समय और उम्र जीवन से उत्साह को धीरे-धीरे मिटाता जाता है, ताकि वृद्ध होने के अकेलेपन की तैयारी शुरू हो जाए।      

हर नया वर्ष ढेरों यादों और उम्मीदों के साथ आता है। साल के पहले दिन मन उल्लास और उमंग से भर जाता है। भविष्य के लिए फिर से सपने सजने लगते हैं। अतीत के दुःख को भूलकर एक नई आशा के साथ नव वर्ष का स्वागत करते हैं। फिर धीरे-धीरे समय के प्रवाह में नव वर्ष का उत्साह खोने लगता है और जीवन सुख-दुःख के साथ बीतने लगता है; पुनः नए वर्ष की प्रतीक्षा में। परन्तु बीच-बीच में पर्व-त्योहार मन में उमंग जगाए रखता है। जीवन ऐसा ही है। सच है, यदि पर्व-त्योहार न हो तो इंसान कर्तव्यों और कामों की भीड़ में राहत का अनुभव कैसे करें। 

नव वर्ष का प्रथम दिन समय और जीवन के बीतने और परिवर्तन को याद दिलाता है। एक नया दिन, नया साल और जीवन से एक और वर्ष सरक जाता है। जीवन पथ पर आनंदमय सफ़र के लिए नई ऊर्जा के संचार के साथ ऊष्मा, जोश, जुनून, हौसला और जीवन्तता का होना आवश्यक है। नव वर्ष में जीवन्तता और मानवता से पूरा संसार सुन्दर और चहचहाता रहे, यही आशा है। 

नव वर्ष मंगलमय हो!

Oct 1, 2025

1 अक्टूबरः वृद्ध दिवसः अनुभव का पिटारा है इनके पास

  - डॉ. जेन्नी शबनम 

मानव तथा मौसम का स्वभाव एक-सा होता है। कब, क्या, कैसे, कौन, कहाँ, क्यों परिवर्तित हो जाए, पता ही नहीं चलता। यों मानव-जीवन तथा मौसम प्रकृति के हिस्से हैं, जिनका परिवर्तन निश्चित व नियत समय पर होता है; परन्तु कई बार ऐसे अप्रत्याशित रूपांतरण होते हैं, जो न निर्धारित हैं न अपेक्षित। मौसम का पूर्वानुमान और ज्योतिष की भविष्यवाणी असत्य सिद्ध हो जाती है; परन्तु सभी की कामना होती है कि जीवन तथा मौसम सदैव उचित व अनुकूल रहे, जिससे जीवन कष्टपूर्ण एवं दुःखमय न बने।  

मानव-जीवन जन्म से मृत्यु तक की यात्रा है, जिसमें कई पड़ाव आते हैं। हर पड़ाव पर व्यक्ति से अपेक्षित कुशल-व्यवहार की आशा रहती है। जैसे बच्चों के लिए खाना, खेलना, पढ़ना, अनुशासन में रहना इत्यादि अपेक्षित हैं, वैसे ही वयस्क तथा वृद्ध के लिए कुछ आचरण व कार्य निश्चित होते हैं। वयस्क एवं प्रौढ़ धनोपार्जन- कार्य में लगे रहते हैं तथा वृद्ध अवकाश ग्रहण करने के बाद अपने घर व बच्चों के साथ समय व्यतीत करते हैं। वृद्ध व्यक्ति का जीवन अनुभवों से भरा होता है, अतः उन्हें उचित आदर-सम्मान देना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र (यूनाइटेड नेशन) ने वृद्धजन के सम्मान के लिए 14 दिसम्बर 1990 में वृद्ध दिवस मनाने की घोषणा की थी। 1 अक्टूबर 1991 के दिन पहली बार वृद्ध दिवस मनाया गया। अब हर वर्ष अक्टूबर की पहली तिथि को विश्व भर में 'अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस' मनाया जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1 जुलाई 2022 तक बुज़ुर्गों की आबादी 14.9 करोड़ थी। वर्ष 2036 तक बुज़ुर्गों की संख्या 22.7 करोड़ होने का अनुमान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व भर में पुरुषों का औसत जीवनकाल 70-75 वर्ष और स्त्रियों का 75-80 वर्ष है।  

सामान्यतः व्यक्ति जब प्रौढ़ रहता है तब जीवन के सभी आवश्यक कार्यों को पूर्ण करने की योजना बनाता है। बच्चों की शिक्षा व विवाह, उत्तम आवास, समुचित स्वास्थ्य-सुविधा, परिवार के जीवन स्तर को उन्नत करना, भविष्य के लिए कुछ धन एकत्रित करना इत्यादि के लिए हर व्यक्ति प्रयासरत रहता है। अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते-करते जब व्यक्ति उम्र के अन्तिम पड़ाव पर पहुँचता है, तब समझ आता है कि उसने अपने जीवन को यूँ ही समाप्त कर दिया, कभी स्वयं के लिए जिया ही नहीं। यदि आर्थिक स्थिति सुदृढ़ है, तो वृद्धावस्था थोड़ी सरल व सहज होती है; परन्तु आर्थिक स्थिति अच्छी न हो तो वृद्धावस्था अत्यन्त दयनीय व कष्टप्रद हो जाती है, विशेषकर अस्वस्थ होने की अवस्था में।  

हर व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण करें। यह देखा गया है कि माता-पिता कठिन परिश्रम कर बच्चों को विदेश भेजने के लिए इच्छुक व तत्पर रहते हैं। जो बच्चे पढ़ने या नौकरी के लिए विदेश चले गए, उनके माता-पिता गौरवान्वित होते हैं; क्योंकि बच्चों की सफलता पर माता-पिता को स्वयं के सफल होने की अनुभूति होती है। ऐसे माता-पिता को समाज से भी सम्मान मिलता है। पर जब उनकी वृद्धावस्था आती है तब वे अकेलेपन का अनुभव करते हैं। जो बच्चे विदेश चले गए, उनमें से अधिकतर वापस नहीं लौटते हैं। कई बार देखा गया है कि वृद्ध माता-पिता की बीमारी या मृत्यु पर भी वे नहीं आ पाते। यह अत्यन्त दुःखद स्थिति है; परन्तु इसमें दोष किसी का नहीं। कई बार विदेश में कार्यरत बच्चे चाहकर भी नहीं आ पाते हैं; क्योंकि उनका कार्य या छुट्टी इसमें बाधा बनती है। कुछ बच्चे अपने माता-पिता को पैसे भेजकर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं। कुछ बच्चे अपने माता-पिता से मानसिक-जुड़ाव नहीं रखते, अतः वे चिन्ता भी नहीं करते कि माता-पिता को उनकी कितनी आवश्यकता है। कई घटनाएँ ऐसी देखी गईं हैं कि माता-पिता की मृत्यु पर बच्चे वीडियो कॉल द्वारा दाह-संस्कार का हिस्सा बने हैं। 

एक दुःखद घटना समाचारपत्र में छपी कि एक वृद्धा माँ सोफ़े पर बैठी द्वार की ओर देखती हुई छह माह से मृत पड़ी कंकाल बन गई थी। उस माँ के बच्चे विदेश में थे। निःसन्देह वे अपनी माँ के सम्पर्क में नहीं रहते होंगे, इसलिए उन्हें पता नहीं था कि उनकी माँ छह माह पहले मर चुकी है। सच! कुछ बच्चे कितने असंवेदनशील होते हैं! समाचारपत्र में आए दिन पढ़ने को मिलता है कि बच्चों ने वृद्ध माता-पिता को पीटा, खाने-खाने को तड़पाया, एक-एक पैसे के लिए तरसाया, अस्वस्थ होने पर देखभाल नहीं की, अत्यधिक अस्वस्थ होने पर महँगा उपचार नहीं करवाया। भाइयों के बीच कलह है कि माता-पिता को कौन रखे। बच्चों ने माता-पिता की सम्पत्ति अपने नाम करके उन्हें घर से निकाल दिया और उनसे कोई सम्पर्क न रखा। समाज में जगहँसाई के डर से माता-पिता को घर में रखा, पर इतनी मानसिक यंत्रणा दी कि वे साथ रहने के बदले मर जाना चाहते हैं। बच्चों ने वृद्ध माता-पिता से उकताकर सारे सम्बन्ध तोड़ लिए। बिना बताए रेलवे स्टेशन या मन्दिर या वृद्धाश्रम में वृद्ध माता-पिता को छोड़ दिया। वृद्ध को भूलने की बीमारी होने पर यदि वे घर से चले गए, तो उनके बच्चों ने कोई खोज-ख़बर नहीं ली। जीवन से तंग आकर किसी वृद्ध ने आत्महत्या कर ली आदि।

इसी समाज में कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जिन्होंने बिना दिखावा, बिना अपेक्षा, बिना सम्पत्ति के लालच अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा की, बहुत आदर-सत्कार किया और उनका मानसिक सम्बल बने रहे। कई घरों में आज भी बच्चे अपने माता-पिता से सलाह लेकर कोई कार्य करते हैं, चाहे उम्र कितनी भी हो। हालाँकि ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है; परन्तु यह भी सच है।  

हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों की शिक्षा उत्तम एवं विवाह समृद्ध घर में हो तथा वे सदैव सुखी रहें। इसके लिए वे जीवन भर की पूँजी लगा देते हैं, चाहे आर्थिक स्थिति कितनी भी निम्न क्यों न हो। अपनी वृद्धावस्था की चिन्ता न कर बच्चों के सुख-सुविधा के लिए जीना भारतीय परम्परा है, जिसे हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य से अधिक निभाता है। संतान अगर सुपात्र हो, तो वृद्धावस्था सुखद व्यतीत होता है। शारीरिक कष्ट कम या अधिक तो सभी को भोगना पड़ता है। लेकिन संतान स्वार्थी, अहंकारी, कृतघ्न, दुष्ट, निकम्मी, असभ्य, उदण्ड हो, तो वृद्धावस्था अत्यन्त कष्टकारी होता है। ऐसी संतान शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से कष्ट देती है और वृद्ध माता-पिता लाचार होकर सब सहने को विवश होते हैं।  

वृद्ध होना जीवन-क्रम का नियम है। परन्तु वृद्धावस्था की कठिनाइयाँ ऐसी हैं, जिसे सोचकर हर प्रौढ़ चिन्तित रहता है। माना जाता है कि स्वभाव से बाल्यावस्था और वृद्धावस्था एक समान हैं। व्यक्ति वृद्धावस्था में बच्चों-सा आचरण करने लगता है; परन्तु बाल्यावस्था और वृद्धावस्था में एक बहुत बड़ा अंतर है। बच्चे अगर हठ करें या कोई अनुचित माँग रखें तो माता-पिता उसे मनाते हैं और हठ पूरी भी करते हैं, वहीं अगर कोई वृद्ध हठ करे या कोई उचित माँग भी करे तो उनके बच्चे अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करते हैं।  

वृद्ध का मनोविज्ञान वृद्ध के अलावा कोई नहीं समझता है। हर वृद्ध की इच्छा होती है कि उनके बच्चे उनके साथ थोड़ा समय व्यतीत करें, उनके स्वास्थ्य की देखभाल करें, बच्चों के जीवन में क्या हो रहा है जानें, अपना सुख-दुःख और अनुभव बच्चों से बाँटें, बच्चों के बच्चे का पालन-पोषण करें, बच्चों के महत्त्वपूर्ण निर्णय में उनकी सहभागिता हो या कम-से-कम इसकी सूचना मिले इत्यादि। कुछ वृद्धों की यह इच्छा पूरी होती है, पर अधिकतर वृद्धों की इच्छाएँ उनके मन में ही दम तोड़ देती हैं। जिन बच्चों को उँगली पकड़कर चलना सिखाया, अक्षर-अक्षर पढ़ना सिखाया, रात-रातभर जागकर पालन-पोषण किया, हर समय उनकी छत्रछाया बनकर रहे, वे ही बच्चे अब कहते हैं कि तुमने क्या किया, हर माँ-बाप का जो कर्त्तव्य है वह तुमने किया, तो इसमें विशेष क्या किया? पालन-पोषण में अगर थोड़ी भी चूक हो गई हो, तो बच्चे दोषारोपण करते हैं बिना यह सोचे कि उनके माता-पिता तब युवा थे और सब कुछ धीरे-धीरे सीख रहे थे, कुछ त्रुटि तो हुई ही होगी। कोई भी मनुष्य पर्फेक्ट नहीं होता, तो माता-पिता से यह उम्मीद क्यों?  

वृद्धावस्था ज्ञान और अनुभव का पिटारा होता है, जिसे व्यक्ति समय-समय पर खोलता है और चाहता है कि अगली पीढ़ी उनसे सीख लें, ताकि उनका जीवन सुगम, सरल व सफल हो। नई पीढ़ी को यह लगता है कि पुरानी पीढ़ी नासमझ है, समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है जिसे वे जानते-समझते नहीं हैं, उनके पुराने ज्ञान या अनुभव का क्या लाभ। नई पीढ़ी उनकी बातों को अनसुना करती है या  ''निरर्थक बातें मत करो'' कहकर चुप करा देती है। यह सही है कि बदलते समय के अनुसार नए तकनीक का ज्ञान अधिकतर वृद्धों को नहीं है; परन्तु जीवन का अनुभव उनके पास ख़ूब होता है, जिससे नई पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है।

नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में दूरी व टकराव का कारण जेनेरशन गैप, शिक्षा का स्तर, आर्थिक स्थिति, परम्परा, परिवेश, व्यवसाय, निर्भरता, तकनीक, नई खोज, जीवन जीने की नई पद्धति, रहन-सहन, परिधान, दिखावा, दिनचर्या, लालच, बुद्धिमता, सोच-विचार, भावनात्मक दूरी, संवेदनशीलता, संवेदनहीनता, बीमारी, लम्बी बीमारी, शारीरिक अक्षमता, बच्चों-सा व्यवहार, संयुक्त परिवार, एकल परिवार, बहुमंज़िला फ्लैट, खान-पान, भोज और पार्टी, मद्यपान, धूमपान, अनुशासन इत्यादि है। इस दूरी को पाटकर और वृद्धों के अनुभव से सीख लेकर अगर नई पीढ़ी कार्य करती है, तो निःसन्देह उनका जीवन सरल-सुगम होगा।  

अधिकतर वृद्ध वृद्धावस्था को शाप सममझते हैं; क्योंकि शारीरिक और आर्थिक निर्भरता उन्हें लाचार बना देती है, जिससे उन्हें आत्मग्लानि होती है। वृद्धजनों की समस्याएँ इतनी अधिक हैं कि उनके अपने उन्हें सम्मान देना तो दूर, नाता तक तोड़ लेते हैं। ऐसे में उपेक्षित वृद्ध अपना शेष जीवन कैसे व्यतीत करें, यह उनके जीवन का बहुत बड़ा प्रश्न बन जाता है। छोटे बच्चों का पालना-पोषण करना जितना ही आनन्ददायक होता है, वृद्ध की देखभाल करना उतना ही अधिक कष्टदायक होता है। बच्चों के नियत समय पर बड़े होने और निर्भरता समाप्त होने का पता होता है; लेकन वृद्ध की अस्वस्थता एवं शारीरिक निर्भरता के समाप्त होने का कोई नियत समय नहीं है। 

एक अवस्था के बाद पूर्णतः स्वस्थ रहना किसी भी वृद्ध के लिए सम्भव नहीं होता है। इसलिए कितनी भी अच्छी संतान हो, एक समय के बाद वह थक व ऊब जाती है। अक्सर वृद्ध अपनी असहाय अवस्था पर शोक मनाते हैं और अपने जीवन की समाप्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। ऐसे में संतान को चाहिए कि थोड़ा समय ही सही अपने बुज़ुर्गों के साथ बिताएँ, ताकि उनका मनोबल गिरे नहीं, मानसिक सम्बल मिले और उन्हें यह अनुभूति हो कि उनके बच्चे साथ हैं।  

परन्तु ऐसा भी नहीं है कि वृद्धावस्था में आपसी कटुता का सारा दोष बच्चों का ही है। वृद्ध होने पर भी माता-पिता द्वारा घर में अपना वर्चस्व बनाए रखना, बच्चों पर अत्यधिक अनुशासन करना, बच्चों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करना, तनिक भी असुविधा होने पर बच्चों पर दोषारोपण करना, बच्चों की आर्थिक स्थिति से भिज्ञ रहकर भी अनावश्यक व्यय करना, बच्चों द्वारा कुछ अच्छा समझाने पर अपमान का अनुभव करना, बिना बात घर में कलह करना, बच्चों के बच्चों पर अपना अधिकार समझना, बच्चों के द्वारा अपनी कामनाओं की पूर्ति करना, बच्चों की असुविधा का ध्यान न रखना, वृद्धावस्था को स्वीकार न करना, नई पीढ़ी के साथ सामंजस्य न बिठाना इत्यादि कारण हैं, जिससे बच्चों के साथ सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं।  

अतः वृद्धावस्था में किसी भी रूप में अपनी संतान पर बोझ बनना सबसे बड़ा अपराध है, इसे हर व्यक्ति को समझकर व मानकर चलना चाहिए। भावनात्मक एवं मानसिक निर्भरता तो उचित है, परन्तु शारीरिक और आर्थिक रूप से निर्भर न बनना ही श्रेयस्कर है। हालाँकि यह सभी के लिए संभव नहीं है, परन्तु चेष्टा अवश्य करनी चाहिए। वृद्ध स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक योग-अभ्यास, नियमित व संयमित दिनचर्या का पालन करें। अस्वस्थ होने पर तुरन्त चिकित्सा करवाएँ ताकि कोई भी बीमारी बढ़े नहीं। अनावश्यक रूप से बच्चों के मामले में हस्तक्षेप न करें। जितना सम्भव हो आत्मनिर्भर रहें। सभी बच्चों को समान रूप से प्यार करें तथा उनमें आपसी मनमुटाव या दुराव की भावना न भरें। स्वयं को हमेशा व्यस्त रखें और सदैव सकारात्मक सोचें।

Jan 1, 2025

प्रदूषणः साँसों का संकट

  - जेन्नी शबनम 

सुबह के लगभग 10 बजे बालकनी में निकली, तो देखा कि धुआँसा पसरा हुआ है, जिसे कोहरा या स्मॉग भी कहते हैं। देखने में तो बड़ा अच्छा लगा, मानो जाड़े के दिनों का कुहासा हो। परन्तु साँस में धूल-कण जाने लगे और आँखों में जलन होने लगी। शाम 5 बजे भी यही स्थिति रही। इस कोहरे में कहीं बाहर निकलने का अर्थ है श्वसन तंत्र और आँखों को कष्ट पहुँचाना। परन्तु कोई घर में कब तक छुपा रह सकता है। अपने कार्य एवं व्यवसाय के लिए बाहर जाना आवश्यक है। घर से बाहर भले मास्क पहनकर जाएँ, पर प्रदूषण के प्रभाव से बच नहीं सकते। घर के दरवाज़े व खिड़कियाँ भले बन्द हों, पर वायु प्रदूषण से बचाव सम्भव नहीं है। फेफड़े परेशान हैं और आँखें लाल। 

यों तो पूरा देश वायु प्रदूषण की चपेट में है; परन्तु दिल्ली में प्रदूषण की स्थिति बदतर हो गई है। ऐसा महसूस होता है जैसे साँस लेने पर आपातकाल लग गया हो। जो व्यक्ति श्वास से सम्बन्धित बीमारी से पीड़ित हैं, उनकी स्थिति बेहद गम्भीर हो चुकी है। स्वस्थ व्यक्ति भी आँखों में जलन, सिर दर्द और साँस लेने में परेशानी का अनुभव कर रहा है। सरकार लगातार प्रदूषण के बचाव के लिए कार्य कर रही है; परन्तु स्थिति बदतर होती जा रही है है। वायु प्रदूषण से आँखों में जलन व चुभन, साँस लेने में कठिनाई, गले में ख़राश, शरीर पर एलर्जी, वाहन चालकों को सड़क ठीक से न दिखना इत्यादि समस्या हो रही है। इससे दमा, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारी का ख़तरा बढ़ता है।  

दिल्ली के इस प्रदूषण पर सरकार और विपक्ष में तकरार जारी है। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। मानो इनमें से किसी ने बोरी में भरकर प्रदूषण लाया और पूरी दिल्ली पर छिड़काव कर दिया। विपक्ष का कहना है कि आम जनता के लिए दिल्ली गैस चेंबर बन चुकी है। किन्तु यहाँ सिर्फ़ आम जनता नहीं रहती, देश का राजा अपने मंत्रियों के साथ रहता है, जिसे आरोप लगाने का पूर्ण अधिकार है; समस्या के समाधान का कोई दायित्व नहीं। सत्ता और विपक्ष को किसी भी कठिन समय में आरोप-प्रत्यारोप से बाहर आकर जनता की समस्याओं के समाधान के लिए एकजुट होना चाहिए। 

सबसे अहम प्रश्न यह है कि क्या यह प्रदूषण दिल्ली सरकार फैला रही है? क्या आम जनता अपने कर्त्तव्य का पालन कर रही है? क्या केन्द्र सरकार और दिल्ली सरकार एक साथ मिलकर कोई ठोस क़दम उठा रही है? निःसन्देह सरकार से हमें उम्मीद होती है; परन्तु हम जनता को भी अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत होना आवश्यक है। यदि जनता सचेत रहती, तो वायु प्रदूषण या अन्य कोई भी प्रदूषण नहीं होता। 

सरकार ने पटाखों पर पाबन्दी लगाई; परन्तु जनता ने ग़ैरकानूनी तरीक़े से पटाखे ख़रीदे। पराली जलाने पर पाबन्दी लगाई गई; परन्तु हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश इत्यादि राज्यों ने ख़ूब परली जलाई। दिल्ली में गाड़ियों की रैली मानो हर दिन होती रहती है। सभी पैसे वालों के पास कई-कई गाड़ियाँ हैं। वे बड़ी-सी गाड़ी में अकेले बैठकर चलना अपनी शान समझते हैं। वे सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करेंगे तो उनकी प्रतिष्ठा दाँव पर लग जाएगी। इन दिनों निम्न आय वर्ग का व्यक्ति भी दोपहिया वाहन चलाता है। जबकि दिल्ली की परिवहन व्यवस्था देश के किसी भी हिस्से से बेहतरीन है। मेट्रो और बस की सुविधा दिल्ली के लिए वरदान है। दूर जाने के लिए समय और संसाधन के बचाव का सर्वोत्तम विकल्प मेट्रो है; हालाँकि अधिकतर निम्न व मध्यम आय वर्ग के लोग मेट्रो का उपयोग करते हैं। 

बढ़ती गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण के कारण जब दिल्ली सरकार ने ऑड-इवेन का फ़ॉर्मूला लागू किया तो अधिकतर लोगों को इससे परेशानी हो रही थी; जबकि सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुदृढ़ है। वाहन चालन के ऑड-इवेन की व्यवस्था के बाद शहर में गाड़ियों की भीड़ और प्रदूषण दोनों कम हो गया था। ऐसा लगता था मानो दिल्ली की हवा भी स्वच्छ हवा में साँसें ले रही हो। परन्तु यह फ़ॉर्मूला ज़्यादा दिन चल न सका। दिल्ली सरकार को चाहिए कि ऑड-इवेन फ़ॉर्मूला हमेशा के लिए दिल्ली में लागू करे, ताकि सड़क पर गाड़ियों का दबाव कम हो और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग हो, जिससे प्रदूषण पर लगाम लगे। 

पराली, पठाखा व परिवहन के अलावा निर्माण कार्य से होने वाला प्रदूषण भी वायु को दूषित कर रहा है। दिल्ली में ऊँची-ऊँची इमारतें, सड़क, या अन्य निर्माण कार्य बिना उचित प्रबंधन के होता है, जिससे हवा में धूल-कण पसरते हैं। पाबन्दी के बावजूद लकड़ी जलाए जाते हैं, कूड़ा जलाए जाते हैं। पेड़ बेवज़ह काटे जा रहे हैं। कचरा प्रबंधन सही नहीं है। मलबा का निस्तारण सही नहीं हो रहा है। रासायनिक कचरा और कल-कारखाने का धुआँ वातावरण को दूषित करता है। इस प्रकार के कई कार्य हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। यह सब आम जनता कर रही है, न कि सरकार; परन्तु दोष सरकार को देते हैं। हम अधिकार की बात करते हैं, लेकिन देश के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं। जब-जब जो प्रतिबन्ध सरकार लगाती है, उसे ईमानदारी से जनता निभाए और स्वहित छोड़कर राष्ट्रहित की बात सोचे, तो हर एक व्यक्ति देश की समस्या के निदान में अपना हाथ बँटा सकता है।   

हर आम जनता का कर्त्तव्य है कि देश पर से कुछ भार काम करे। जनसंख्या नियंत्रण, प्राकृतिक जीवन शैली अपनाना, कारपूलिंग का प्रयोग, संयम, अनुशासन, करुणा, धन-सत्ता के लोभ का त्याग, अहंकार पर नियंत्रण, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का सहयोग, स्व-चेतन व तार्किक चिन्तन इत्यादि को अपने जीवन में उतारकर किसी भी समस्या और समाधान पर पहल करें तो निश्चित हो सफल हुआ जा सकता है। चाहे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भोजन प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण हो या स्वास्थ्य प्रदूषण। ■

Jan 1, 2023

आलेखः युवा भारत का अमृत महोत्सव

– डॉ. जेन्नी शबनम

भारत की स्वतन्त्रता का 75वाँ साल इस वर्ष पूरा हुआ है। यूँ कहें कि साल 2022 आज़ादी के नाम है। आज़ादी के इस अमृत महोत्सव की तैयारी हर तरफ़ बहुत ज़ोर-शोर हुई। हर जगह ख़ुशहाली का माहौल है। हर एक व्यक्ति अपने-अपने तरीक़े से आज़ादी के इस पर्व को मना रहा है। देश की अधीनता, स्वतंत्रता-आंदोलन, स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान, हमारा इतिहास, आज़ादी के बाद देश के विकास में योगदान आदि चलचित्र की भाँति ज़ेहन में चल रहा है। हमारे लिए गर्व की बात है कि अधीनता से मुक्ति के समय के कुछ लोग अब भी हमारे बीच हैं और उनके सुनाए क़िस्से हममें जोश भर देते हैं। हर घर तिरंगा फहराने का जोश है।

देश की स्वतंत्रता के वर्ष की गिनती के अनुसार हमारा देश प्रौढ़ हो चुका है; लेकिन मेरा मानना है कि जबतक देश विकासशील अवस्था में था, तो देश बालक था। अब हम विकसित देश की श्रेणी में आ चुके हैं, तो हमारा देश युवा माना जाएगा। युवा-शक्ति देश की धरोहर है और देश को आगे बढ़ाने की ऊर्जा भी। देश का युवा बने रहना देश के युवाओं पर निर्भर करता है और देश कब तक युवा रहेगा यह हमारे युवाओं की कर्मठता पर निर्भर है।

जब हमें आज़ादी मिली, देश बहुत विकट परिस्थितियों से गुज़र रहा था। एक तरफ़ हुकूमत बदल रही थी, देश का विभाजन हो गया था, तो दूसरी तरफ़ दंगा शुरू हो गया। देश की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक स्थितियाँ अस्थिर थीं। जाति, धर्म, शिक्षा, प्रांत, भाषा, बोली आदि कई तरह के मसले से हमारा समाज टूट चुका था। समाज पूर्णतः विभाजित हो चुका था। ऐसे में उस समय पूरे देश को एकजुट कर विकास कार्य करना इतना सहज नहीं था; परन्तु हमारे राजनीतिज्ञों, समाज सेवियों, चिन्तकों, प्रबुद्ध वर्ग तथा युवाओं के कठिन प्रयास से देश की स्थिति बदली और आज हम आज़ादी का जश्न मन रहे हैं हैं।  

हमारे कर्मठ नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सम्मिलित प्रयास से देश की स्थिति सुधरी और हमारा देश विकासशील देश से विकसित देश की श्रेणी में आ गया। भारत पूरी तरह अब आत्मनिर्भर है। इन संघर्षों और सुधारों में हमारे बुज़ुर्ग नेताओं और समाज सेवियों के अलावा युवा-शक्ति का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। संघर्षशील पूर्वजों और बलिदानियों को विस्मृत न कर उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए कि संघर्ष और विपरीत समय में साहस को कैसे संगठित कर मानसिक सम्बल बनाया जाए और आगे बढ़ा जाए।

देश की सुरक्षा की मुहिम में हिस्सा लेना हो या बलिदान देना, फ़ौज़ में शामिल होकर देश की सेवा करनी हो या खेत-खलिहान से लेकर राजपथ तक युवाओं की भागीदारी अचम्भित करती है। सत्ता में हों या विपक्ष में, युवाओं के जोश में कहीं कमी नहीं दिखती है। शिक्षा, कला, खेल, राजनीति, व्यवसाय इत्यादि हर क्षेत्र में युवा बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं और देश का नाम स्थापित करते हैं। युवा-शक्ति को अगर सार्थक तरीके से देश के उत्थान में लगाया जाए, तो निःसंदेह भारत विश्वगुरु बन सकता है। हालाँकि कुछ राजनीतिक दल युवा-शक्ति का ग़लत तरीके से उपयोग कर भारत में अशांति और अराजकता फैला रहे हैं, जिसपर अंकुश लगाकर उन्हें सही दिशा देना हर एक भारतवासी का कर्त्तव्य है।

एक बात जो मेरे ज़ेहन में सदैव रहती है कि दर्द के सभी दंश को झेलते हुए आज़ादी में विस्थापित हुए परिवार ने ख़ुद को कितनी कठिनाई से सँभाला होगा। लोगों ने छोटा-से-छोटा काम कर अपने परिवार की देखभाल की होगी। जो कार्य कभी नहीं किया होगा वक़्त की विवशता ने वह काम भी कराया। मेहनत और हौसला के बल पर कई लोगों ने बाद में समृद्धि हासिल की; लेकिन मंज़िल पाने तक की राह कितनी कठिन रही होगी, इस बात की कल्पना ही हम कर सकते हैं। यह बात काबिले-ग़ौर है कि अगर हममें जज़्बा हो,  तो हम किसी भी परिस्थिति में संतुलित रहकर अपनी राह बनाते हैं और एक मुक़ाम हासिल कर सकते हैं।

नवम्बर 2017 में एक दिन मेरे मन में आया कि कुछ सामाजिक कार्य मैं पुनः प्रारम्भ करूँ, क्योंकि छात्र जीवन में मैं सक्रिय राजनीति में रह चुकी हूँ। लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर सब कुछ असंभव लगने लगा है। मन में विचार आया कि किसी गैर सरकारी संस्था से जुड़कर कुछ काम करूँ। कई संस्थाओं का पता चला। दिल्ली के सरिता विहार में एक ग़ैर सरकारी संस्था है जहाँ ई-मेल के द्वारा मेरी बात हुई और उन्होंने आकर उनका केंद्र देखने को कहा। हाँ, मुझे कोई कार्य तो वहाँ भी न मिला, जो वैतनिक हो, पर आश्वासन मिला कि अगर मेरे लायक कोई कार्य हुआ तो वे सूचित करेंगे। जब मैं वहाँ गई, तो उनके कार्य देखकर दंग रह गई। डोनेशन में मिले पुराने सामान का उपयोग और प्रयोग बहुत सार्थक रूप से किया जाता है। हर छोटे-से-छोटे बेकार सामान से बहुत सुन्दर और उपयोगी सामान तैयार होता है। मुझे बेहद सुखद आश्चर्य हुआ कि जिन चीज़ों को लोग बेकार समझकर फेंक देते हैं उससे न सिर्फ उपयोगी सामान बन रहा है, बल्कि देश के जिस हिस्से में जहाँ ज़रूरत हो वहाँ पहुँचाया भी जा रहा है।

मैं सोचने लगी कि अगर हमारे सोच का विस्तार हो तो समाज में बहुत से ऐसे कार्य हैं जो किए जा सकते हैं। कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं है। सूझ-बुझ की ज़रूरत है। न जाने ऐसी कितनी संस्थाएँ हैं, जो युवाओं के द्वारा संचालित हैं, जिससे समाज का कार्य भी हो रहा है और उससे जुड़े लोगों का जीवन यापन भी। सिलाई केंद्र, पशुपालन, शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य, अलग-अलग तरह के व्यवसाय आदि में भारत का युवा बहुत बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है।

एक दिन टी. वी. पर ख़बर देखी कि एक शिक्षित लड़की चाय का ठेला लगाकर हर दिन सैकड़ों रुपये कमा रही है। विदेश से शिक्षा प्राप्त नौजवान अपने गाँव में रहकर वैज्ञानिक तरीके से जैविक खेती कर रहा है। किसी ने कोचिंग सेंटर खोलकर न सिर्फ़ शिक्षा का प्रसार किया है;  बल्कि बड़ी कमाई करके उच्च वर्ग का जीवन जी रहा है। वेबसाइट के द्वारा मार्केटिंग, फ़ूड डिलीवरी, दवा या घर के सामान की होम डिलीवरी आदि जितने भी कार्य हैं लगभग सभी में युवा ही कार्य करते हैं।  एयरपोर्ट पर युवतियों के द्वारा अलग से टैक्सी चालन की व्यवस्था है।     

मुझे याद है जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी, तब डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, सरकारी अधिकारी का पेशा अपनाने पर ज़ोर दिया जाता था। जो पढ़ाई में ज़ियादा अच्छा हो, उनसे उम्मीद रहती थी कि वे यू. पी. एस. सी. या राज्य प्रशासन या बैंक अधिकारी के पद पर ज़रूर पहुँचेंगे। धीरे-धीरे समय के बदलने और भूमंडलीकरण के बाद अन्य पेशा पर भी ध्यान गया। अब तो युवाओं द्वारा ऐसे- ऐसे कार्य हो रहे हैं, जिससे पैसा और शोहरत दोनों मिल रहा है। लोगों के सोचने का नज़रिया काफी बदल गया है। अब हर काम को इज़्ज़त के रूप में देखा जा रहा है। 

आज जब देश अपने युवावस्था में है, देश के युवाओं से उम्मीद बहुत बढ़ गई है। समाज के सरोकार से जुड़कर समय, शक्ति और संसाधनों का सही उपयोग कर देश को समृद्ध, सक्षम एवं शक्तिशाली बनाए रखने के लिए युवा-शक्ति को चिन्तनशील और कर्तव्यपरायण बनना होगा। तभी देश का वर्तमान और भविष्य जो युवा-शक्ति के हाथ में है, सुरक्षित रहेगा और विश्व के माथे पर भारत चाँद-सा चमकता रहेगा।

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Oct 3, 2021

लघुकथा - जेनरेशन गैप

- डॉ. जेन्नी शबनम 

‘रोज-रोज क्या बात करनी है, हर दिन वही बात - खाना खाया, क्या खाया, दूध पी लिया करो, फल खा लिया करो, टाइम से वापस आ जाया करो।’ आवाज में झुँझलाहट थी और फोन कट गया। 

वह हत्प्रभ रह गई। इसमें गुस्सा होने की क्या बात थी। आखिर माँ हूँ, फिक्र तो होती है न। हो सकता है पढ़ाई का बोझ ज्यादा होगा। मन ही मन में बोलकर खुद को सांत्वना देती हुई रंजू रजाई में सिर घुसाकर अपने आँसुओं को छुपाने लगी। यूँ उससे पूछता भी कौन कि आँखें भरी हुई क्यों हैं, किसने, कब, क्यों मन को दुखाया है। सब अपनी-अपनी जिन्दगी में मस्त हैं। 

दूसरे दिन फोन न आया। मन में बेचैनी हो रही थी। दो बार तो फोन पर नंबर डायल भी किया फिर कल वाली बात याद आ गई और रंजू ने फोन रख दिया। सारा दिन मन में अजीब-अजीब-से खयाल आते रहे। दो दिन बाद फोन की घंटी बजी। पहली ही घंटी पर फोन उठा लिया। उधर से आवाज आई ‘माँ, तुमको खाना के अलावा कोई बात नहीं रहती है करने को। हमेशा खाने की बात क्यों करती हो? तुम्हारे कहने से तो फल- दूध नहीं खा लेंगे। जब जो मन करेगा, वही खाएँगे। जब काम हो जाएगा लौटेंगे। तुम बेवजह परेशान रहती हो। सच में तुम बूढ़ी हो गई हो। बेवज़ह दखल देती हो। खाली रहती हो, जाओ दोस्तों से मिलो, घर से बाहर निकलो। सिनेमा देखो, बाजार जाओ।’

रंजू को कुछ भी कहते न बन रहा था। फिर भी कहा -‘अच्छा चलो, खाना नहीं पूछेंगे। पढ़ाई कैसी चल रही है? तबियत ठीक है न?’

‘ओह माँ, हम पढ़ने ही तो आए हैं। हमको पता है कि पढ़ना है। और जब तबियत खराब होगी, हम बता देंगे न।’

रंजू समझ गई कि अब बात करने को कुछ नहीं बचा है। उसने कहा ‘ठीक है, फोन रखती हूँ। अपना खयाल रखना।’ उधर से जवाब का इंतजार न कर फोन काट दिया रंजू ने। सच है, आज के समय के साथ वह चल न सकी थी। शायद यही आज के समय का जेनरेशन गैप है। यूँ जेनरेशन गैप तो हर जेनरेशन में होता है परन्तु उसके जमाने में जिसे फिक्र कहते थे आज के जमाने में दखलअंदाजी कहते हैं। फिक्र व जेनरेशन गैप भी समझ गई है अब वह। 

सम्पर्कः 5/ 7, द्वितीय तल, सर्वप्रिय विहार, नई दिल्ली- 110016  ई मेल- jenny.shabnam@gmail.com

May 3, 2021

श्रद्धांजलिः निधन 22 अप्रैल 2021

 सुनील जी  हमारे दिलों में सदा रहेंगे

-डॉ. जेन्नी शबनम

स्तब्ध हूँ! अवाक् हूँ! मन को यकीन नहीं हो पा रहा कि सुनील मिश्र जी अब हमारे बीच नहीं हैं। कैसे यकीन करूँ कि एक सप्ताह पूर्व जिनसे आगे के कार्यक्रमों पर चर्चा हुई, यूँ अचानक सब छोड़कर चले गए? उनके व्हाट्सएप स्टेटस में लिखा है ''कोई दुःख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, वही हारा जो लड़ा नहीं।'' फिर आप कैसे हार गए सुनील जी? आपको लड़ना था, खूब लड़ना था, हम सब के लिए लड़कर जीतकर आना था। यूँ सफ़र अधूरा छोड़कर नहीं जाना था। आपके अपने, अपने परिवार, अपने मित्र, अपने प्रशंसक, अपने शुभचिंतक, अपने सहकर्मी सबको रुलाकर कल आप चले गए। इस संसार को बहुत ज़रुरत थी आपकी। यूँ अलविदा नहीं कहा जाता सुनील जी।  

जीवन की असफलताओं से जब भी मैं हारती थी, आप मुझे समझाते थे। जीवन में संसारिकता, व्यावहारिकता, सरलता, सहजता, सहृदयता कैसे अपनाएँ, बताते थे। आपके कहे शब्द आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं - ''इतने गहरे होकर विचार करने की उम्र नहीं है। हम सभी जिस समय में रह रहे हैं, अजीब-सा वातावरण है और इसमें जीवन की स्वाभाविकता के साथ जीना अच्छा है। यह ठीक वह समय है जब अपने आसपास से इसकी भी अपेक्षा न करके बल वर्धन करना चाहिए। थोड़ा उपकार वाले भाव में आओ। बाल बच्चे यदि व्यस्त हैं, फ़िक्र करने या जानने का वक़्त नहीं है, अपने संसार में हैं तो उनको खूब शुभकामनाएँ दो। यही हम सबकी नियति है। और उस रिक्ति को अपनी सकारात्मकता के साथ एंटीबायोटिक की तरह विकसित करो। हम तो यही कर रहे हैं। काफी समय से।'' आपकी वैचारिक बुद्धिमता, मानवीयता, गंभीरता और संवेदना सचमुच ऊर्जा देती है मुझे। मेरे लिए आप मित्र भी हैं और प्रेरक वक्ता भी हैं।

मेरे जन्मस्थान भागलपुर में गायक किशोर कुमार का ननिहाल है। वहाँ से सम्बंधित जानकारी लेने को सुनील जी बहुत उत्सुक रहते थे। एक बार किशोर कुमार के ननिहाल मैं गई लेकिन कुछ ख़ास जानकारी हासिल न हो सकी थी। 14 अप्रील को फ़ोन पर हम बात कर रहे थे कि कोरोना का प्रभाव ख़त्म हो तो वे किसी मित्र की गाड़ी से आएँगे और नालंदा विश्वविद्यालय देखने जाएँगे। फिर भागलपुर आएँगे और किशोर कुमार के ननिहाल का पूरा व्योरा लेने चलेंगे। मैंने उन्हें कहा कि आप आएँ तो विक्रमशिला विश्वविद्यालय और कर्ण गढ़ भी आपको ले चलेंगे जो भागलपुर के इतिहास की धरोहर है। मेरी माँ 30 जनवरी 2021 को सदा के लिए छोड़कर चली गई। माँ के बारे में उनसे बात हो रही थी, मैं रो पड़ी और वे भी अपनी माँ को याद कर रो पड़े। मेरे लिए उनके अंतिम शब्द थे  ‘चुप हो जाओ, रोओ नहीं, यही दुनिया है, ऐसे ही जीना होता है, 6 साल हो गए मेरी माँ को गए हुए लेकिन अब भी माँ को यादकर रो पड़ता हूँ, तुम्हारे लिए तो अभी-अभी की घटना है, खुश रहने का प्रयत्न करो और स्वस्थ रहो।’  

सुनील मिश्र जी से मेरा परिचय फेसबुक पर हुआ था। मैं उन दिनों अंतर्जाल पर नई थी। सुनील जी का फ्रेंड रिक्वेस्ट आया। मैंने देखा कि वे फिल्म क्रिटिक है, तो तुरंत उन्हें जोड़ लिया। यूँ भी फिल्म देखना मेरा पसंदीदा कार्य है। सुनील जी के नियमित कॉलम अखबारों में आते रहते थे और फिल्म की समीक्षा भी। किसी भी नए फिल्म की उनके द्वारा लिखी समीक्षा पढ़कर मैं फिल्म देखने का अपना मन बनाती थी, सलमान की फिल्में छोड़कर (सलमान खान की हर फिल्म देखती हूँ)।

सुनील जी से जब आत्मीयता बढ़ी
, तब जाना कि वे वरिष्ठ फिल्म समीक्षक ही नहीं बल्कि लेखक, नाटककार, कवि, कला मर्मज्ञ, वरिष्ठ पत्रकार और मध्यप्रदेश के कला संस्कृति विभाग में अधिकारी हैं। उनके नाटकों का मंचन समय-समय पर होता रहता है, जिसका विडियो मैंने देखा। सन 2006 में सुनील जी ने अमिताभ बच्चन पर पुस्तक लिखी ‘अजेय महानायक’। मई 2018 में सुनील जी को सिनेमा पर सर्वोत्तम लेखन के लिए 65 वाँ नेशनल अवार्ड मिला है। 

फिल्म और कला से जुड़े सभी क्षेत्र के लोगों के साथ वृहत संपर्क रहा है उनका। मुझे याद है, सलीम साहब और हेलेन के साथ उनकी तस्वीर देखकर मैंने कहा कि आप मुझे सलमान खान से मिलवा दीजिएगा। वे हँस पड़े और कहे कि यह तो मुश्किल काम है पर कोशिश करेंगे; सलमान सचमुच दिल का बहुत अच्छा इंसान है। 

फिल्मों पर उनसे खूब बातें होती थीं। धर्मेन्द्र के वे बहुत बड़े प्रशंसक हैं और इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने फेसबुक पर धर्म छवि के नाम से प्रोफाइल बनाया है।

सुनील जी से घनिष्टता बढ़ने के बाद उनके बहुमुखी व्यक्तित्व के हर पहलू को देखा मैंने। वे इतने सहज और सामान्य रहते थे कि शुरू में मुझे पता ही नही चलता था कि वे कितने बड़े विद्वान् और संस्कृतिकर्मी हैं। वे अपने प्रशंसनीय कार्य की चर्चा नहीं करते थे। उनके बारे में या उनके लिखे को कहीं पढ़ा तब पूछने पर वे बताते थे। फिल्म ही नहीं बल्कि कला और साहित्य के हर क्षेत्र पर उनकी पकड़ बहुत मज़बूत है। उनकी हिन्दी इतनी अच्छी है कि मैं अक्सर कहती थी - आपके पास इतना बड़ा शब्द-भण्डार कहाँ से आता है? उनकी कविताओं में भाव, बिम्ब और प्रतीकों का इतना सुन्दर समावेश होता है कि मैं चकित हो जाती हूँ। 

5 - 7 अक्टूबर 2018 को इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली में बहुरुपिया फेस्टिवल हुआ था। वहाँ 6 अक्टूबर को मैं सुनील जी से मिलने गई। यह मेरा पहला और आख़िरी मिलना हुआ उनसे। बहुत सारे बहुरूपियों से मेरा परिचय कराया उन्होंने। मेरे लिए यह अद्भुत अनुभव था। मैंने पहली बार बहुरूपियों का जीवन, उनकी कर्मठता, उनकी कला, उनकी परेशानियों को जाना।  

सुनील जी कला के कर्मयोगी थे। उनकी पारखी नज़रें कला को गंभीरता से देखती थीं फिर उनकी कलम चलती थी। कभी-कभी मैं उनसे कहती थी कि आप इतने बड़े-बड़े लोगों को जानते हैं, मुझ जैसे साधारण दोस्तों को कैसे याद रखते हैं? वे हँसकर कहते कि वे सभी औपचारिक और कार्य का हिस्सा हैं। कुछ ही ऐसे हैं जिनसे व्यक्तिगत जुड़ाव है। अब उसमें चाहे कोई बड़ी हस्ती हो या तुम जैसी सहज मित्र

, सब मुझे याद है और साथ हैं। उनकी कार्यक्षमता, कार्यकुशलता, कर्मठता, विद्वता, लेखनी सबसे मैं अक्सर हैरान होती रहती थी। अकूत ज्ञान का भण्डार और विलक्षण प्रतिभा थी उनमें।  

2017 की बात है। फेसबुक पर उनकी कविताएँ कम दिख रही थीं। मैंने पूछा कि कविताएँ नहीं दिख रहीं, तो उन्होंने बताया कि इंस्टाग्राम पर पोस्ट है। इंस्टाग्राम डाउनलोड करना और उसके फीचर्स भी उन्होंने बताए मुझे। कोरोना काल में हम सभी का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। आशंका और भय का वातावरण था। ऐसे में सुनील जी ने 16 अप्रैल 2020 को ग़ज़ल सिंगर जाज़िम शर्मा जी के साथ पहला लाइव संवाद किया। मैं फेसबुक और इंस्टाग्राम पर कोशिश करती रही कि देखूँ पर तकनीक का अल्प ज्ञान होने के कारण समझ ही नहीं आया कि लाइव कहाँ हो रहा है। सुनील जी से बात हुई तो उन्होंने कहा कि क्यों न ऐसे लाइव को रोज़ किया जाए और हमारे बात करते-करते ही कार्यक्रम का नाम ‘बातों बातों में’ रख दिया उन्होंने।  

23 अप्रैल 2020 को ‘इंस्टा - बातों बातों में’  के लाइव की पहली कड़ी प्रस्तुत हुई जिसमें उन्होंने सर्वेश अस्थाना जी (विख्यात हास्य व्यंग्य कवि) को संवाद के लिए आमंत्रित किया। मैं पहली दर्शक-श्रोता थी, क्योंकि इस बार मैं अच्छी तरह समझकर इंस्टाग्राम खोल कर बैठी थी। बहुत रोचक कार्यक्रम हुआ। पहले दिन कम लोग थे, परन्तु हम सभी का परिचय उन्होंने सर्वेश जी से करवाया। बहुत सफल कार्यक्रम रहा और सुनील जी बहुत प्रसन्न थे। फिर यह कार्यक्रम हमारे कोरोना-काल का हिस्सा बन गया। निर्धारित समय पर रोज़ अलग-अलग विख्यात हस्ती के साथ संवाद का यह कार्यक्रम चलता रहा।

31 जुलाई को 100 वीं कड़ी हुई, जिसमें निर्देशक-अभिनेता सतीश कौशिक दोबारा आमंत्रित थे। सुनील जी इस दिन बहुत प्रसन्न थे और बोले कि वे सोचे ही नहीं थे कि बात करते-करते ‘बातों बातों में’ कार्यक्रम बन जाएगा और इतना सफल होगा। सुविधा के अनुसार कार्यक्रम का दिन और समय बदलता रहा लेकिन यह सिलसिला चलता रहा। इसी बीच इरफ़ान खान, सुशांत सिंह राजपूत, ऋषि कपूर, बासू चटर्जी, जगदीप की मृत्यु हुई। इसपर अलग से ट्रिब्यूट के लिए कार्यक्रम रखा उन्होंने।

14 अप्रैल 2021 को ‘इंस्टा - बातों बातों में’ की 175 वीं कड़ी थी. पिछले दो माह से मैं नेट से दूर थी, क्योंकि मेरी माँ का देहांत हुआ था। 14 अप्रैल को न जाने क्या हुआ कि सुनील जी से काफी लम्बी बातें हुईं, भागलपुर आने का कार्यक्रम बना और फिर शाम को लाइव देखा मैंने। 14 अप्रैल तथा 175 वीं कड़ी अंतिम कड़ी बन गई सुनील जी और हमारे बीच की। 22 अप्रैल 2021 को  रात्रि 8 बजे वे हम सबको छोड़कर चले गए, जहाँ से अब वे कभी न आएँगे न मुझे कुछ ज्ञान की बात बताएँगे। आपसे दुनियादारी बहुत सीखा मैंने, आपको कभी भूल नहीं पाएँगे। आपको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रणाम करती हूँ।

सुनील जी अपनी आवाज़, अपनी लेखनी, अपनी विद्वता, अपनी सहृदयता के साथ हमारे दिलों में सदा जिएँगे। सुनील जी की एक कविता :

रात को कौन सी पहर

जाने क्या नाम रखा होगा

वह कभी-कभी

तुम्हारी तरह शब्दार्थ के बीच

महीन महकती

कविता होने लगती है।

स्वप्न कुछ ऐसा होता है कि

मैं उसे ता-उम्र

पहने रहना चाहता हूँ

तुम जब भी जागना तो

नींद से जागना पीर से नहीं