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Oct 24, 2017

अनुपम शारदीय आनन्द

      अनुपम शारदीय आनन्द  
            - जी.के.अवधिया
 मेघरहित नील-धवल स्फटिक-सा निर्मल अम्बर, श्वेत-धवल कास सुमन का वस्त्र धारण किए पंक-रहित धरा, भाँति-भाँति के पुष्पों से पल्लवित मधुकर-गुंजित उपवन एवं वाटिकाएँ, शान्त वेग से प्रवाहित कल-कल निनाद करती सरिताएँ, कमल तथा कुमुद से शोभित तड़ाग, चहुँ ओर शीतल-मंद-बयार का प्रवाह, अमृत की वर्षा करती चन्द्र-किरण शरद् ऋतु के आगमन का द्योतक हैं।
हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन तथा कार्तिक माह को शरद् ऋतु की संज्ञा दी गई है। शरद् ऋतु आते तक वृष्टि का अन्त हो चुका होता है। मौसम मनोरम हो जाता है। दिवस सामान्य होते हैं तो रात्रि में शीतलता व्याप्त रहती है। यद्यपि शरद् की शुरूआत आश्विन माह के आरम्भ से हो जाती है;किन्तु शरद् के सौन्दर्य का आभास शरद् पूर्णिमा अर्थात् क्वार माह की पूर्णिमा से ही शुरू होता है।
शरद ऋतु ने वाल्मीकि, कालिदास तथा तुलसीदास जैसे महान काव्यकारों के रस-लोलुप मन को मुग्ध-मोहित किया है। वाल्मीकि रामायण के किष्किन्धाकाण्ड में महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं -
रात्रि- शशांकोदित सौम्य वस्त्रा
तारागणोन्मीलितचारुनेत्रा।
ज्योत्स्नांशुकप्रावरणाविभाति,
नारीवशुक्लांशुकसंवृतांगी।।
चन्द्र की सौम्य एवं धवल ज्योत्सना से सुशोभित रात्रि किसी श्वेत वस्त्र धारण किए हुए सुन्दरी के समान प्रतीत हो रही है। उदित चन्द्र इसका मुख तथा तारागण इसके उन्मीलित नेत्र हैं।
ऋतु संहार में कवि कालिदास कहते हैं -
काशांसुकाविचक्रपद्ममनोज्ञ वस्त्र
सोन्मादहंसरव नूपुर नादरम्या।
आपक्वशालिरूचिरानतगात्रयष्टि:
 प्राप्ताशरन्नवधूरिव रूप रम्या।।
 कास के श्वेत पुष्पों के वस्त्र से धारण किए हुए नव-वधू के समनाशोभायमनाशरद-नायिका का मुख कमल-पुष्पों से निर्मित है। उन्मादित राजहंस की मधुर ध्वनि ही, इसकी नूपुर-ध्वनि है। पके हुए बालियों से नत धान के पौधों के जैसे तरंगायित इसकी देह-यष्टि किसका मन नहीं मोहती?
रामचरित मानस में तुलसीदास जी राम के मुख से कहलवाते हैं -
बरषाबिगतसरद ऋतु आई। 
लछिमनदेखहु परम सुहाई॥
फूलें कास सकल महि छाई।
जनुबरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥
हे लक्ष्मण! वर्षा व्यतीत हो चुकी और शरद ऋतु का आगमन हो चुका है। सम्पूर्ण धरणी कास के फूलों से आच्छादित है।मानो (कास के सफेद बालों के रूप में) वर्षा ऋतु ने अपनी वृद्धावस्था को प्रकट कर दिया हो।
तुलसीदास जी तो शरद का प्रभाव पक्षियों पर भी बताते हुए कहते हैं  -
जानिसरद ऋतु खंजन आए।
पाइ समय जिमिसुकृत सुहाए॥
जिस प्रकार से समय पाकर सुकृत (सुन्दर कार्य) अपने आप आ जाते हैं उसी प्रकार से शरद् ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए हैं।
शरद् ऋतु को भारतीय संस्कृति में धार्मिक रूप से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है। आश्विन माह में माता दुर्गा ने महिषासुर का, भगवान श्री राम ने रावण तथा कुम्भकर्ण का, भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर का और कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था। यही कारण है कि आश्विन एवं कार्तिक दोनों ही माह पवित्र महीने माने गए हैं। इन दोनों माह में हिन्दू त्योहारों की भरमार होती है यथा नवरात्रि, दशहरा दीपावली, देव प्रबोधनी एकादशी आदि।

...धरा ने ओढ़ ली सफेद चादर

 ...धरा ने ओढ़ ली सफेद चादर  
- रश्मि शर्मा
कल निकल गई थी शहर से दूर.....अचानक नजर पड़ गई कास के सफेद फूलों पर। झट से याद आ गई स्कूल पाठ्यक्रम  में पढ़ी तुलसीदास रचित शरदलालित्य का वर्णन.....
 ‘वर्षा विगत शरदरितु आई, देखहूं लक्ष्मण परम सुहाई,
 फूले कास सकल मही छाई, जनु बरसा कृत प्रकट बुढा़ई
  पुराने को तज के नए की ओर देखने का वक्त है शरदऋतु.....जब बारिश  समाप्ति की ओर होती है तो हमें सबसे पहले मैदानी इलाकों में कास के सफेद फूल लहलहाते दिखाई पड़ते हैं। लगता है धरा ने सफेद चादर ओढ़ ली है।  बहुत ही मनोरम होता है यह दृश्य....कास के फूल जब तेज हवाओं से झूमते हैं तो मन आनंदित हो जाता है, जैसा कि कल मेरा हो गया था। उस पर से लगातार बारिश....सफेद आसमान में आच्छादित बादलमन को धवल मुग्धता से बाँध रहे थे। जैसे पूरी धरा स्नान कर तरोताज़ा हो गई हो। सब कुछ नया, सुंदर मनमोहक.....
तो सामने खड़ी थी शरद ऋतु.....शरद ऋतु यानी त्योहारों का मौसम...फूलों का मौसम...सबसे खूबसूरत होता है नाजुक हरसिंगार का खिलना और धरती पर बिछ जाना.... मैं ढूँढती हूँ रातों में खिले हरसिंगार ...उसके नारंगी डंठल को देख हर्षित होती हूँ...और एकदम सुबह  समेट लाती हूं हथेलियों में। मन में उपजे नाज़ुक अहसास के साथ शहर के कुछ किलोमीटर दूर निकल जाइए तो तालाब - पोखरों में लाल-सफेद कमल और कुमदिनी लदे दिखते हैं, यहाँ तक कि गड्ढों में भी कुमुदिनी सुशोभित होती है। जी ललक उठता है  कि उतर जाएँ पोखरों में और तोड़ लाए कुछ कमल।
यह मौसम होता है साफ नीला आसमान और ठंड के आगमन से पहले खूबसूरत मौसम का सन्धि काल।  न गरमी न ठंड....मन खिला-खिला सा लगता है...खिले फूल ...खुले आसमान की तरह। मधुमालती की लताएँ भरने लगती हैं इसी वक्त। शाम को मालती के फूलों की हल्की-हल्की मादक खुशबू मन मोहती है और चाँद अपने पूरे सौंदर्य के साथ होता है। शरद पूर्णिमा का चाँद, सोलह कलाओं से परिपूर्ण। शरद में ही कृष्ण ने गोपियों संग रासलीला रचाई थी.....
शायद इसलिए हमारे कविगण इस ऋतु के प्रशंसक हैं। निराला लिखते  हैं...झरते हैं चुंबन गगन के’  तो उधर वैदिक वांग्मय सौ शरद की बात करता है- जीवेम्शरद- शतम्अर्थात कर्म करते हुए सौ शरद जीवित रहें।
यह ऐसा मौसम है जब न हमें ताप का अहसास होता है न ही ठंड का। फसलें भी लहलहाती हैं इसलिए सबके मन में खुशी होती है। उपर से सबसे ज्यादा त्योहार शरद ऋतु में ही मनाया जाता है। पितृपक्ष  के पंद्रह दिनों के बाद दशहरा। दशहरा में चार दिनों तक इतनी गहमागहमी होती है, लोग पूजोत्सव में इस कदर रमे होते हैं कि लगता नहीं पूरे झारखंड में कोई समस्या या गरीबी है।
वैसे भी झारखंड का राजनीतिक मौसम जैसा भी रहे, यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य इतना अभिभूत करने वाला है कि बाहर के राज्यों से आए लोगों की बातें छोड़ दीजिए...... हमें खुद अहसास होता है कि हम एक ऐसी जगह निवास करते हैं जहाँ पर प्रकृति ने कूट- कूट कर सौंदर्य भरा है और यह  नैसर्गिक है।  अब तक सरकारी उपेक्षा का शिकार है....शायद इसलिए अछूता सौंदर्य आंखों में भर आता है।
तुलसीदास लिखते हैं- शरद के सुहावने मौसम में राजा, तपस्वी, व्यापारी, भिखारी सब हर्षित होकर नगर में विचरते हैं और हम जैसे कुछ प्रकृति प्रेमी शरद ऋतु का वर्ष भर इंतजार करते हैं और शहर के कोलाहल से दूर गाँवों की ओर जा निकलते हैं।
सम्पर्कः रांची, झारखंड,
Email- rashmiarashmi@gmail.com