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Nov 1, 2022

व्यंग्यःआपदाएँ बार -बार आए

- डॉ. गोपालबाबू शर्मा

ज्ञानियों और पण्डितों का कथन है कि जीवन में आपदाएँ आएँ, तो उनसे न घबराएँ । उनका यह कहना एक सौ एक नए पैसे सही है। आपदाओं से बड़े-बड़े फायदे हैं। सूखा, बाढ़, भूस्खलन, वृक़ान, भूकम्प आदि अनेक आपदाएँ हैं, जिनका प्रभाव बड़ा व्यापक होता है। सूखा और बाढ़ के दौरे तो हमारे देश में कहीं न कहीं प्रायः हर साल बे-रोक-टोक होते ही रहते हैं। हाँ, भूकम्प, तूफ़ान, युद्ध वगैरह भी यदि जल्दी-जल्दी हमारे मेहमान बनते रहें, तो अच्छा है। इन आपदाओं के आने पर सरकार से लेकर समाज के ‘स्वयंसेवी’ संगठन और जनसाधारण तक की अच्छी-खासी लाटरी खुल जाती है।

सरकार मित्र देशों से ही नहीं, अपने जानी दुश्मनों से भी सहानुभूति के बहाने करोड़ों-अरबों की राहत-सामग्री बटोर लेती है, फिर भी उसका पेटा पूरा नहीं होता। महज राहत के नाम पर ही वह न जाने कितने टैक्स जनता पर थोप देती है। कर्मचारियों से एक-एक दिन का वेतन और जनता-जनार्दन से दान वसूल लेती है। कथित समाज-सेवी संस्थाओं के तो पौ-बारह हो जाते हैं। इन आपदाओं के समय वे चन्दा इकट्ठा करके नाम और काम दोनों ही कमा लेते हैं। छुटभइये नेताओं पर तो चन्दा उगाहने का भूत-सा सवार हो जाता है। परमार्थ से स्वार्थ की ओर अग्रसर होने के ये सुनहरे अवसर हुआ करते हैं ।

कहीं बाढ़ आती है, तो लोग डूबते-उतराते हैं, अपनी सम्पत्ति गवॉँते हैं, मगर कुछ लोग तर हो जाते हैं। कहीं भले ही सूखा हो और सारा इलाक़ा भूखा हो, लेकिन नेताओं, अफसरों और स्वयंसेवी महानुभावों के घर हरियाली छा जाती है। इकट्ठे किए गए चन्दे और सरकार से प्राप्त राहत-कोष का अच्छा-खासा हिस्सा उनके हिस्से में आ जाता है। दान में मिली या तैयार कराई गई राहत-सामग्री में से काफी कुछ उनके घरों की शोभा बढ़ाती है। तीन लोकों में न्यारी भगवान कृष्ण को मथुरा नगरी में भी एक बार भयंकर बाढ़ आई। किसी से नहीं रुक पाई। उस वक़्त देखा गया कि भुने चने, गुड़, पूड़ी, सब्जी,चाय, दूध के पैकेट तक राहत-अधिकारी के कर्मचारी अपने थैलों में खुले आम भर-भर कर अपने घर ले जाते थे। बचा-खुचा सामान बराय-नाम बाढ़-पीड़ितों तक पहुँचाकर यश लूटा जाता था। ।

इन आपदाओं के आते ही व्यापारी-वर्ग के तो ठाट हो जाते हैं। गल्ला, दाल, चीनी, गुड़, तेल, घी, कपड़ा आदि सारी चीज़ों की एकदम तेजी अर्रा पड़ती हे है। दूरदर्शी व्यापारी बखूबी जानते हैं कि इन चीज़ों की खपत होनी ही है, फिर क्यों न खरीददारों के सिर पर अच्छी-खासी चपत लगाते हुए आँधी के आम बटोर लिए जाएँ। अधिकारियों को खुश रखने के लिए उन्हें चन्दा भी तो देना होता है। आखिर चन्दा अपनी गाँठ से तो देना नहीं है। तेल को तिलों में से ही निकालना है।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों, अलाँ-फलाँ नाइटों के आयोजकों, साड़ी और रेडी-मेड कपड़ों की डिस्काउण्ट सेल लगाने वालों को पीड़ितजनों के लिए राहत पहुँचाने तथा पुण्य के भागी बनने-बनाने का एक मजबूत आधार हाथ लग जाता है। घोषणा की जाती है कि आमदनी का सारा पैसा राहत-कोष में दिया जाएगा। लीजिए, मनोरंजन और व्यापार-कर से भी बचे। कितना आया, कितना गया, कितना कमाया, इसे कौन देखता है?

क्रिकेट-मैचों को प्रायोजित करके अपने विज्ञापन के जरिए अन्धाधुन्ध कमाई करने वाली पेय पदार्थों और सिगरेट की कम्पनियों को ही नहीं, गुटकों-सुटकों तथा बीडी-तम्बाकू के निर्माण-कर्ताओं के लिए भी बढ़िया मौका रहता है कि इन दैवीय आपदाओं के आने पर, चाहें तो वे भी इसी तरह की परोपकारी घोषणाएँ करके खुद भारी मुनाफ़ा कमा लें।

विदेशी पावडरों और खुशबुओं से लिपी-पुती बड़े घरों की महिलाओं व अफसरों की नकचढ़ी बीवियों को भी चन्दा इकट्ठा करने के बहाने अपनी लियाकत और ताकत दिखाने का मौका मिल जाता है। कचहरी, इन्कम-टैक्‍स, सेल्स-टैक्स के बाबुओं से लेकर मंत्री तक, सभी ज़्यादा से ज़्यादा चन्दा वसूल करके अपने-अपने आक़ाओं की नजरों में वाहवाही लूटने में जुट जाते हैं। जिस विभाग में जितनी ज़्यादा वसूली होती है, उसे उतनी ही अधिक वाहवाही मिलती है। अख़बारों में नाम आ जाते हैं। जिलाधिकारी, मंत्री या प्रधान मंत्री को चैक अथवा ड्राफ्ट देते हुए फोटो खिंचते हैं, विज्ञापन होता है। यह क्‍या कम ज्ञानकी बात है? इसके अलावा बड़े-बड़े और सामर्थ्यवान् लोगों के 'नोटिस' में आकर, अपनी पहचान बनाकर कभी किसी दिन अपना कोई काम भी बनाया जा सकता है।

एक तथाकथित अखिल भारतीय संस्था के अध्यक्ष महोदय की मीडिया क॑ लोगों से इसी बात पर तुनका-तुनकी हो गई कि दूरदर्शन तथा अखबार उनके कार्यकर्ताओं को पूरा-पूरा कवरेज नहीं दे रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्‍या उनकी समाजसेवी संस्था भूकम्प- पीड़ितों को राहत पहुँचाने के काम में प्रचार पाने के लिए लगी है? तो उनका बेझिझक उत्तर धा-'जो हम कर रहे हैं, उसका पता तो लोगों को चलना ही चाहिए। वरना हमारे करने का फ़ायदा क्‍या?’

सार की बात यह कि आपदाएँ कुछ लोगों के लिए सचमुच सौगात बन कर आती हैं तथा ढेर सारी खुशियाँ लाती हैं। अतः ऐसे लोग मनौती मनाते रहते हैं कि आपदाएँ आएँ और बार-बार आएँ।

सम्पर्कः 46, गोपाल विहार कॉलोनी, देवरी रोड, आगरा-282001 (उ.प्र.)

Jun 1, 2022

व्यंग्यः कृपया फूल न तोड़ें

- डॉ. गोपालबाबू शर्मा

आज से पचास साल पहले हम एकदम छड़े थे, अल्ल बछेड़े थे। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की भाँति हम भी मानते थे कि 'सैर कर दुनिया की ग़ाफिल जिन्दगानी फिर कहाँ? ज़िन्दगानी भी रही तो नौजवानी फिर कहाँ?' सो एक बार जा पहुँचे नैनीताल। तल्‍ली ताल और मल्‍ली ताल के बीच फलों की झील के सहारे-सहारे सड़क और सड़क के एक किनारे पर जगह-जगह फूलों की क्यारियों की खूबसूरत कतार। नगरपालिका की ओर से क्यारियों में लगी पट्टिकाओं पर लिखवाया गया था- ‘कृपया फूल न तोड़ें। यह आपके नगर की शोभा है।’ पता नहीं, अब नैनीताल का क्‍या हाल-चाल है। देश के बँटवारे की तरह अब समाज में मध्यम वर्ग के भी दो टुकड़े हो गए हैं- उच्च मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग। इस कमरतोड़ महँगाई के ज़माने में 'नौन, तेल, लकड़ी' के चक्कर में पड़े निम्न मध्यम वर्ग के किसी व्यक्ति को अब नैनीताल, मसूरी या शिमला कहाँ सूझ पाता है।

पेड़-पौधों और फूलों का संरक्षण स्वस्थ पर्यावरण के लिए भी ज़रूरी है। पर्यावरण-प्रदूषण तो थोड़ा-बहुत पहले भी था, पर इन दिनों लोग हर ओर उसके सुधार की बात ज़ोर-शोर से करने लगे हैं, भले ही वह काग़ज़ी या दिखावटी ज़्यादा हो। बिजली अक्सर गुल होगी, तो दुकानों पर जनरेटर चलेंगे ही और जब जनरेटर चलेंगे तो प्रदूषण फैलेगा ही। कैसे रुक पाएगा यह? रेलवे रोड जैसे पॉश बाज़ार में भी जनरेटरों का धुआँ और इतना हल्ला कि साफ-साफ देखना और सुनना दोनों ही मुश्किल।

अभी एक लतीफा सुनने को मिला। एक व्यक्ति ने अपने मित्र से कहा-आज मैंने दस रुपये बचा लिए।

‘कैसे?’ मित्र ने पूछा।

‘मैं सुबह टहलने जाता हूँ। पार्क में लिखा- फूल तोड़ने पर दस रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा। मैंने फूल नहीं तोड़ा।’

‘फूलों को तोड़े जाने से बचाने की यह एक अच्छी हिमायत है, पर व्यवहार में कितनी कारगर हो पाती है है?’

कुछ लोगों को फूल चोरी- चोरी तोड़ने में ही मजा आता है। पता नहीं कि एक अत्यन्त तेज-तर्रार और पाक-साफ छवि वाले भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त की जानकारी में यह बात थी या नहीं कि उनके दैनिक पूजा-पाठ के लिए उनका नौकर एक पार्क से चोरी- छिपे फूल तोड़ कर लाता था। उसका पकड़ा जाना देश-व्यापी चर्चा का विषय बन गया।

लोग-बाग तो अब आमतौर पर घर के आगे पटरी की जगह को भी घेर लेने में बड़ी शान समझते हैं, पर हमने घर में ही खाली ज़मीन छोड़ रखी है और उसमें पेड़-पौधे लगा दिए हैं। केले का भी एक पेड़ लगाया था। एक पेड़ से अनेक पेड़ हो गए। उन पर केले भी आते थे, लेकिन हम उन्हें अकेले नहीं खाते ये। इतने सारे खा भी नहीं पाते थे। अतः आस-पड़ोस और परिचितों में बाँट देते थे और मुफ्त की वाहवाही लूट लेते थे। बड़ा सुख मिलता था।

पर केलों के कारण परेशानी में पड़ गए। जिसे देखो वही केले के पत्ते कथा के लिए माँगने चला आता। लोग कथा करवाते हैं और कई- कई बार कथा करवाने के बाद भी वे लीलावती और कलावती की सन्दर्भ- कथा को ही सत्यनारायण की कथा समझते हैं। ‘सत्य ही नारायण है’ और यही असली कथा है, इस वे नहीं जान पाते। खैर, कथा करवाने वाले पत्ते लेने आते, लेकिन वक्‍त का भी ध्यान न रखते। हमें अपना नहाना, खाना, लिखना-पढ़ना, सब कुछ छोड़कर, पहले उन्हें केले के पत्ते देने पड़ते। दो पत्तों से भी काम न चलता, पूरे चार ही हों। कई बार तो पत्ते काटते समय हड़बड़ी में केले के पत्तों का रस टपककर हमारे कपड़ों पर गिर पड़ता और कभी न छूटने वाले निशान छोड़ जाता। कुछ ऐसे भी परिचित सज्जन आते, जिन्हें चिरे हुए पत्ते बिल्कुल न भाते और वे मन-पसन्द नए-नए छाँटकर ले जाते।

लोगों की समझ में न तो अपने आप आया और न हमारे समझाने से आया कि जब पत्ते ही नहीं रहेंगे, तो केले के पेड़ भी कहाँ रह पाएँगे? सूख नहीं जाएँगे? माँगने वालों से तभी पीछा छूटा, जब केले के पेड़ जड़ से उखड़ गए।

केले के पत्तों की तरह ही शामत आई गुलाब के फूलों की। हमारे यहाँ छह-सात पौधे हैं। उन पर फूल आते हैं, पर बच नहीं पाते हैं। आजकल भजन-पूजन और व्रत भी एक फैशन जैसे हो गए हैं। कुछ दिन पहले महिलाओं में सन्‍तोषी माँ की पूजा का ज़ोर था। अब शुक्रवार के दिन ‘शुभ लक्ष्मी’ की पूजा का शोर है। पूजा के लिए गुलाब का लाल फूल ही चाहिए। पता नहीं क्यों?

‘फूल चौराहे’ से एक-आध रुपये में उसे मोल मँगाने में उन्हें क्या आपत्ति है? अच्छे-भले घर की महिलाएँ भी मुफ्त माँगकर या किसी बच्चे से मँगवाकर काम चलाती हैं। मुहल्ले के नुक्कड़ पर रहने वाली एक लालाइन जी हैं। उनके यहाँ परचून की दुकान है। वे बिना नागा हर शुक्रवार को हमारे यहाँ फूल लेने चली आती हैं और इस तरह अड़ जाती हैं, जैसे हम उनके यहाँ से कोई सामान उधार ले आए हों और वे उसके पैसे वसूल करने आई हों।

महिलाओं के बिहाफ़ पर कुछ पुरुष लोग फूल माँगने इतने अधिकारपूर्वक आते हैं, मानो हमारी यह ज़मीन और ये गुलाब के पौधे उन्हीं के बाप के हों और हम तो बस उनकी ओर से माली की मुफ्त नौकरी बजा रहे हों।

शुक्रवार को सुबह से ही हमारा मन उदास हो जाता है। जानते हैं कि दिन भर गुलाब के फूल तोड़-तोड़ कर लोगों को देने पड़ेंगे और कई दिन तक सूने-सूने, लुटे-पिटे से पौधे अपनी करुण कथा कहते रहेंगे।

हमारे पड़ोसी एक डाक्टर साहब की सरकारी नियुक्ति कहीं ‘हिल एरिया’ में है, लेकिन वे जनाब रहते अक्सर मैदान में ही हैं। पता नहीं, वहाँ उनकी हाज़िरी कौन लगाता है? जब भी उनकी या उनके किसी घर वाले की नाक में कोई फूंसी निकल आती है, तो दवा छोड़ उन्हें फूल सूँघने की ज़रूरत पड़ जाती है। वे बेझिझक आते हैं और घण्टी बजाने के बजाय ज़ोर- ज़ोर से दरवाजा खटखटाते हैं या आवाज़ लगाते हैं। हमें गुलाब का ताजा फूल सादर उनके हवाले करना पड़ता है।

वही दिक्कत पैदा हो गई है, जो केले के पेड़ों की वजह से आती थी। लेने वालों को गुलाब का लाल फूल ही चाहिए। मन के मुताबिक चाहिए। नया-नया चाहिए। छोटा नहीं, बड़ा वाला चाहिए। किसी- किसी को एक-दो नहीं, तीन- तीन चाहिए। जिस समय माँगने आएँ, उसी समय मिलने चाहिए।

एक दिन पर-उपदेश में कुशल एक सज्जन ने हमें समझाया-‘अमाँ यार, क्यों बेकार में दुखी होते हो? फूल तो झर ही जाते हैं। कोई ले जाए तो क्या हर्ज है? इंसान के काम आना इंसान का फर्ज है।’ हमारा कहने का मन हुआ- ‘जनाब, यह जीवन भी तो नश्वर है। इसे भी फूलों की तरह एक दिन झर जाना है, लेकिन क्या इसका मतलब यह हुआ कि इसे आज ही समाप्त कर दें?’ पर कहना निरर्थक ही रहता। स्वार्थ के आगे भला तर्क को कौन सुनता है, कौन गुनता है?

हम बड़े असमंजस में हैं। क्या करें, क्‍या न करें? इस तरह खिले-अधखिले कोमल, सुन्दर फूलों को तोड़-तोड़कर परोपकार करते रहें या फिर हारकर किसी दिन कह दें कि ‘ले जाओ, पूरा पौधा ही उखाड़ कर ले जाओ’ रोज़-ःरोज की झंझट से तो मुक्ति पाएँगे। न बासी बचेगा, न क॒त्ते खाएँगे।

सम्पर्कः 46, गोपाल विहार कॉलोनी, देवरी रोड, आगरा- 282001 (उ.प्र.)

Sep 10, 2020

आलेख

कब कटेगा यह भ्रम-जाल?

-डॉ. गोपाल बाबू शर्मा

‘ओम जय जगदीश हरे’ आरती अत्यधिक प्रचलित है। हिन्दू घरों में, मन्दिरों में तथा कथा-कीर्तन आदि विभिन्न धार्मिक अवसरों पर यह आरती बड़ी श्रद्धा के साथ गाई जाती है। इस आरती को किसने लिखा, इस सम्बन्ध में या तो लोग जानते नहीं, अथवा भ्रमवश इसे स्वामी शिवानन्द की मान लेते हैं, क्योंकि आरती के अन्त में यह नाम आता है-
श्री जगदीश जी की आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी सुख-सम्पत्ति पावै॥
वास्तव में इस आरती के लेखक फुल्लौर (पंजाब) निवासी स्व. पण्डित श्रद्धाराम फुल्लौर हैं । इसे प्रार्थना के रूप में उन्होंने अपनी कृति ‘सत्य धर्म मुक्तावली’ में संकलित किया था। सन् 1870 में लिखी गई यह कविता आरती के रूप में इतनी लोकप्रिय हुई कि अन्य लेखक इसे अपनी रचना बताने लगे शिवानन्द स्वामी इसी तरह का चस्पा किया गया नाम है।
निम्नलिखित दो दोहे बहुत प्रचलित हैं -
गोधन, गजधन, बाजिधन, और रतन धन खान।
जब आवै सन्तोष धन, सब धन धूरि समान॥
बृच्छ कबहुँ नहिं फल भखें, नदी न संचै नीर।
 परमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर॥
कुछ विद्वान् इन्हें कबीर का बताते हैं। प्रो. रामदेव शुक्ल ने प्रथम दोहे को अपने लेख ‘कबीर का सच’ में स्पष्टतः कबीर के दोहे के रूप में उद्धृत किया है।
कतिपय पब्लिक स्कूलों में निर्धारित पाठ्यपुस्तक ‘पुष्पांजलि’ भाग-3 में भी ये दोनों दोहे ‘कबीर के दोहे पाठ के अन्तर्गत संकलित हैं।’
अगर ये दोहे वस्तुतः कबीर के हैं, तो डॉ. भगवत स्वरूप मिश्र, बाबू श्याम सुन्दर दास, डॉ. माता प्रसाद गुप्त आदि के द्वारा सम्पादित कबीर-ग्रंथावलियों में क्यों नहीं हैं?
कुछ विद्वान्  इन दोहों को रहीम का मानते हैं, किन्तु किस प्रामाणिक आधार पर, इसका कोई उत्तर उनके पास नहीं। डॉ. विद्यानिवास मिश्र तथा गोविन्द रजनीश द्वारा सम्पादित ‘रहीम-नामावली’ में भी ये दोहे देखने को नहीं मिलते। दोहे किसी के भी हों। कबीर और रहीम दोनों ही सम्माननीय कवि हैं; लेकिन यह तय तो होना ही चाहिए कि आखिरकार ये दोहे किसके हैं? कबीर के या रहीम के? या किसी और के?
शृंगार रस से परिपूर्ण निम्नलिखित दोहा साहित्य-प्रेमियों में काफी प्रचलित है-
            अमिय, हलाहल, मदभरे, सेत, स्याम, रतनार।
 जियत, मरत, झुकि-मुकी परत, जेहि चितवत इक बार॥
 विषय और शैली की एकरूपता के कारण भ्रमवश लोग इसे महाकवि बिहारी द्वारा रचा हुआ मान लेते हैं। वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र ‘नियाज’ तथा कविवर शैवाल सत्यार्थी ने भी इसकी चर्चा बिहारी-रचित दोहे के रूप में की है।
वस्तुतः यह दोहा बिहारी का नहीं, अपितु ‘रसलीन’ का है। ‘रसलीन’ का पूरा नाम था सैयद गुलाम नबी। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ग्रंथ ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में इनका उल्लेख किया है । ये बिलग्राम (जि. हरदोई) के रहने वाले थे। इनका एक काव्य-ग्रंथ ‘अंग-दर्पण’ (सम्वत् 1794) भी है। उपर्युक्त दोहा इसी ‘अंग-दर्पण’ का है। निम्नलिखित दोहा भी काफी प्रसिद्ध है और अक्सर इसे उत्कट प्रेम के प्रसंग में उद्धृत किया जाता है-
कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खइयो मांस।
 दो नैना मत खाइयो, पिया-मिलन की आस ।
 इस दोहे को कोई-कोई विद्वान् जायसी का बता देते हैं। दि. 21.3.2009 को अलीगढ़ के एक शिक्षण-संस्थान में आयोजित अखिल भारतीय कवि-सम्मेलन के अवसर पर साहित्य की डॉक्टर एक कवयित्री महोदया ने कविता-पाठ से पहले भूमिका बाँधते हुए इस दोहे का उल्लेख किया और इसे अमीर खुसरो का यता दिया।
गाज़ियाबाद से प्रकाशित ‘साहित्य-जनमंच’ पत्रिका में श्री वृन्दावन त्रिपाठी ‘रत्नेश’ जी का एक लेख छपा। इसमें उन्होंने प्रसंगवश इस दोहे की भी चर्चा की और इसकी रचना का श्रेय बाबा फरीदकोट को दिया। इस सम्बन्ध में जब उन्हें  पत्र लिखा गया, तो उनका उत्तर था-फरीदकोट में कोई सूफी सन्त थे। उन्होंने इस दोहे को लिखा है और उस सन्त का न कोई नाम मिलता है, न अन्य रचनाएँ।
इस सम्बन्ध में वरिष्ठ कवि श्री चन्द्रसेन विराट जी ने जबलपुर के श्री सुरेन्द्र सिंह पवाँर से बात करने के लिए कहा। श्री पवाँर से फोन बात हुई, तो उन्होंने बताया कि यह दोहा ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में बाबा फरीद के दोहे के रूप में दिया गया है और यह प्रसिद्ध उक्ति-देख पराई लूपरी मत ललचावे जी, रूखा-सूखा खाइके ठंडा पानी पी। भी बाबा फरीद की है।
इस प्रकार की और भी प्रान्तों हिन्दी साहित्य-जगत् में व्याप्त हैं। स्वदेश-प्रेम के सन्दर्भ में निम्नलिखित पंक्तियाँ प्रायः उद्धृत की जाती हैं-
 जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रस-धार नहीं।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
ये पक्तियाँ श्री मैथिलीशरण गुप्त की समझ ली जाती हैं। वड़़े-बड़े विद्वान् और लेखक तक अपने वक्तव्यों और लेखों में इन्हें गुप्त जी की पक्तियों के रूप में सम्मिलित करते हैं।
 आदरणीय डॉ. अम्बा प्रसाद ‘सुमन’ बड़े ही अध्येता और साहित्य-साधक थे। पता नहीं कैसे उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मेरे मानस श्रद्धेय चित्र’ में इन काव्य-पंक्तियों को श्री मैथिलीशरण गुप्त का बता दिया । पत्र लिखने पर उन्होंने अपने उत्तर में कहा- मुझे भी ऐसा ही ध्यान है कि ये पक्तियाँ-  जो भरा नहीं है भावों से.. जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं मैथिलीशरण गुप्त की हैंगुप्त जी की किस पुस्तक की हैं- यह मैं  इस समय नहीं बता सकता। टटोलूँगा ...
दैनिक जागरण में प्रकाशित एक खबर के अन्तर्गत चीन के एक कारीगर द्वारा कालीन में माओत्से तुंग की डिजाइन बनाने के सन्दर्भ में देश-भक्ति की चर्चा करते हुए उपर्युक्त पंक्तियों को उद्धृत द्वारा रचित माना गया। किया गया और इन्हें मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित माना गया।
वस्तुतः ये पक्तियाँ श्री गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ जी की हैं। सनेही जी ‘त्रिशूल’ उपनाम से भी कविता लिखते थे। श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर' जी ने अपने लेख में इन पक्तियों को सनेही जी की ही माना है, जो ‘मोटो’ के रूप में ‘स्वदेश’ पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपा करती थीं।
डॉ. लक्ष्मी शंकर मिश्र ‘निशंक’ तया डॉ. जगदीश गुप्त ने भी इन पंक्तियों को सनेही जी की रचना के रूप में स्वीकारा है। ये पक्तियाँ सम्मेलन-पत्रिका में दी गई ‘सनेही-रचनावली’ की ‘स्वदेश’ कविता के अन्तर्गत भी प्रकाशित हैं ।
इसी प्रकार-
 जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
 वह नर नहीं, नर-पशु निरा है और मृतक समान है॥
पंक्तियाँ भी श्री मैथिलीशरण गुप्त के खाते में डाल दी जाती हैं, जबकि इनके लेखक गुप्त जी नहीं। अमर उजाला में सम्पादक के नाम लिखे अपने पत्र में एक सज्जन ने भी इन पंक्तियों को मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित बताने की कृपा की।
दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय के भी क्या कहने। उसने अपने एक विज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का स्मरण किया। अच्छा किया। इसके लिए वह धन्यवाद का पात्र है; लेकिन यह पुण्य स्मरण ग़लतफ़हमी के साथ किया गया, जिसको न निज गौरव... मृतक समान है॥  को गुप्त जी का लिखा हुआ मान कर। क्या दिल्ली सरकार का सूचना और प्रचार निदेशालय सचमुच इतना अनभिज्ञ है? इस विज्ञापन के द्वारा अनेक पत्र-पत्रिकाओं को ‘आब्लाइज़’ किया गया होगा। यह विज्ञापन ‘वर्तमान साहित्य पत्रिका में भी कवर के’ चौथे पूरे पृष्ठ पर छपा। इसे सैकड़ों-हजारों लोगों ने देखा-पढ़ा होगा; लेकिन आश्चर्य की बात यह कि किसी कवि, लेखक, समीक्षक और प्रबुद्ध पाठक ने दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय के इस कृत्य पर तर्जनी तो क्या, अपनी कन्नी उँगली भी नहीं उठाई। अपने में मस्त और व्यस्त साहित्यकारों का इसे प्रमाद समझा जाए या उनका स्वयं का अज्ञान?
‘वर्तमान साहित्य’ पत्रिका में गुप्त जी के चित्र के साथ कविता की ये पंक्तियाँ ‘हैंड राइटिंग’ के रूप लिखी गई थीं ये हैंड राइटिंग गुप्त जी की थी या कम्प्यूटर की या किसी और की, यह कौन तय करता? इस ग़लतफ़हमी की ओर ध्यान दिलाते हुए सूचना एवं प्रचार निदेशालय को लिखा गया, पर कोई उत्तर नहीं मिला। मिलना भी नहीं था।
डॉ. गोकर्णनाथ शुक्ल ने अपने लेख सनेही जी का काव्य में साफ़तौर पर इन पंक्तियों को (जिसको न निज...समान है।) को सनेही जी की ही माना है।
स्व. श्री शिशुपाल सिंह ‘शिशु’ के अनुसार तो ‘प्रताप’ में छपने वाला निम्नलिखित मोटो भी श्री गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ का रचा हुआ है -
अंधकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है।
है वह मुर्दा देश, जहाँ साहित्य नहीं है।
किन्तु श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी का मानना है कि यह प्रचलित पद शायद देवी प्रसाद जी ‘पूर्ण’ का रचा हुआ है।
इस भ्रम-जाल को फैलाने में पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों का योगदान कमाल का रहा है। ‘धर्मयुग’ जैसा प्रतिष्ठित और जागरूक पत्र भी अपने को इस कालिख से नहीं बचा पाया। निम्नलिखित पंक्तियों को ‘धर्मयुग’ में  प्रसाद (जयशंकर
प्रसाद) का बताया गया है ।
कामुक चाटुकारिता ही थी, क्या यह गिरा तुम्हारी?
एक नहीं दो-दो मात्राएँ, नर से भारी नारी ॥
ये पंक्तियाँ प्रसाद जी की नहीं, बल्कि उन्हें मैथिलीशरण गुप्त के खण्ड काव्य ‘द्वापर’ में ‘विधृता’ के कथन के रूप में स्थान मिला है।
लखनऊ के किन्हीं नदीम साहब ने दैनिक जागरण में दोस्ती विकती है, बोलो खरीदोगे? शीर्षक से एक टिप्पणी दी और उसके प्रारम्भ में इन पंक्तियों का उल्लेख किया
दोस्ती न ऐसा बंधन है, जो जब चाहा, तब जोड़ लिया।
 मिट्टी का नहीं खिलौना है, जब चाहा तब तोड़ दिया ।
            इन पंक्तियों के रचयिता के रूप में नदीम साहब ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का नाम लिया है। वास्तविकता यह है कि ये पंक्तियाँ श्री राधेश्याम कथावाचक जी की हैं और उनकी लोकप्रिय काव्य-कृति ‘राधेश्याम रामायण’ में आई हैं। सही रूप में पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
मित्रता न ऐसा रिश्ता है, जब जी चाहा तब छोड़ दिया।
 मिट्टी का नहीं खिलौना है, जो खेल-खेल में तोड़ दिया ।
 आगरा के एक सान्ध्य दैनिक में 16 सितम्बर, 2008 को पृष्ठ 10 पर प्रकाशित एक लेख में निम्नलिखित पंक्तियों को भी मैथिलीशरण गुप्त का कहा गया, जबकि ये पंक्तियाँ श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की काव्य-कृति कुरुक्षेत्र की हैं-
 क्षमा शोभती उस मुजंग को, जिसके पास गरल हो।
            उसको क्या, जो दन्तहीन, विष-रहित, विनीत, सरल हो ।
 एक बहुत ही प्रसिद्ध शे’र है-
            ये इश्क नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।
ये शेर जिगर मुरादाबादी का है; लेकिन आगरा के एक सान्ध्यकालीन पत्र ने (दि. 14.2.2008 पृ. 3 एवं दि. 3.2.2009, पृष्ठ 2 पर) तथा 'सच और जोश] के पक्षधर एक अन्य दैनिक अखबार ने (दि. 27.5.2009, पृ. 14 पर) प्रेम-सम्बन्धी टिप्पणियों में इसे मिर्ज़ा ग़ालिब का मानने की उदारता बरती।
शायर सुदर्शन फाक़िर की निम्नलिखित पंक्तियाँ बहुत ही जानी-मानी हैं
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
            भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी ॥
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
            वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।
 लेकिन उपर्यक्त सान्ध्य दैनिक में (दि. 16.9.2008, पृष्ठ 5 पर) एक लेखिका ने इनको गायक जगजीत सिंह की ग़ज़ल बताकर मूल लेखक का पत्ता ही साफ कर दिया। अखबार वाले भी क्यों ग़ौर फ़रमाते?
बहुत कम लोग ऐसे होंगे, जिन्होंने ये पंक्तियों न सुनी हों -
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले,
 वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा ।
 इस शेर को लोगबाग क्रान्तिकारी अशफाक उल्ला खाँ का लिखा हुआ बताते हैं। श्रीकृष्ण भावुक का भी यही मत है, किन्तु वरिष्ठ साहित्यकार श्री मधुर गंज मुरादाबादी ने अनेक प्रमाण देकर यह सिद्ध किया है कि ये शेर स्वतंत्रता सेनानी और क्रांति दर्शी कवि पं. जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ द्वारा रचित ग़ज़ल का है।
श्री मधुर गंजमुरादाबादी हितैषी-स्मारक समिति के अध्यक्ष हैं और हितैषी जी के विषय में काफ़ी जानकारी रखते हैं। इसी प्रकार एक और प्रसिद्ध तथा प्रचलित शे’र है-
 सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
 देखना है ज़ोर कितना बाजुए क़ातिल में है।
इस शेर को आमतौर पर रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ का माना जाता है, लेकिन श्रीकृष्ण ‘भावुक’ ने अपने लेख में लिखा है कि श्री अर्श मल्सियानी, स्वामी वाहिद काजमी, जनाब शम्सुल रहमान फारुकी, चन्द्रमोहन प्रधान आदि विद्वानों के मुताबिक़ यह रचना राम प्रसाद बिस्मिल की नहीं, बल्कि बिहार के मुस्लिम शायर महम्मद हुसैन ‘बिस्मिल’ की है। हालाँकि श्रीकृष्ण ‘भावुक’ ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उपर्युक्त विद्वानों ने किस आधार पर इसे मुहम्मद हुसैन ‘बिस्मिल’ की रचना माना है यदि पूरा विवरण सामने आता, तो बात को समझने और निर्णय पर पहुँचने में आसानी होती।
कानपुर की डॉ. प्रभा दीक्षित ने ‘सौगात’ पत्रिका में प्रकाशित अपने एक लेख में लिखा-कुछ इस शेर (सरफ़रोशी..) को शहीदे आजम भगत सिंह के साथी शहीद शायर बिस्मिल का समझते हैं, किन्तु सत्य यह है कि उक्त शेर कानपुर के हिन्दी छन्दकार हितैषी का है, जिसे क्रान्तिकारी गाया करते थे। इस सम्बन्ध में श्री मधुर गंज मुरादाबाद का साफ-साफ कहना है कि ये पंक्तियाँ हितैषी की नहीं है।
शादी-व्याह के निमंत्रण-पत्रों में प्रारम्भ में ये पंक्तियाँ ज़्यादातर लिखी जाती जाती रही हैं
भेज रहा हूँ नेह-निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को।
 हो मानस के राजहंस तुम, भूल न जाना आने को।
 अधिकतर लोगों को पता ही नहीं होगा कि ये पंक्तियाँ किसकी हैं। जाने-माने कवि और गीतकार श्री रामेन्द्र मोहन त्रिपाठी जी से ज्ञात हुआ कि ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ उनके चाचा जी पं. शम्भूदयाल त्रिपाठी नेह' (छिबरामऊ जि. कन्नौज) द्वारा रचित हैं। ‘हो मानस के राजहंस’ की जगह लोग अज्ञानवश ‘हे मानस के राजहंस...’ लिखने लगे।
यह व्यर्थ ही जन्मा जगाया, देश को जिसने नहीं,
जातीय जीवन की झलक आई कभी जिसमें नहीं।
बहुत कम लोग जानते होंगे कि ये पंक्तियाँ अलीगढ़ के हिन्दी सेवी पं. गोकुल चंद्र शर्मा ‘परन्तप’ की हैं, जो उनके खण्ड काव्य रणवीर प्रताप में लिखी गईं।
चैतन्य महाप्रभु राम और कृष्ण दोनों के उपासक थे। उन्होंने गा-बजा कर संकीर्तन शुरू किया। ‘हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे-हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे-हरे।’ का मंत्र उन्हीं की देन है।
अभी भी बहुत कुछ भ्रम और अनिश्चय की स्थिति ही चल रही है। किसी की लिखी पंक्तियाँ किसी के साथ जोड़ दी जाती हैं। इस मामले में सबसे ज्यादा मेहरवानी श्री मैथिलीशरण गुप्त पर हुई है। उनको उन पंक्तियों का लेखक वता दिया जाता है, जिनको उन्होंने लिखा ही नहीं।
महत्त्वपूर्ण और प्रेरणास्पद उक्तियों के साथ उनके वास्तविक रचनाकारों का नाम भी सामने आए, यह बहुत जरूरी है। रचना के साथ रचनाकार की सही पहचान न हो, तो अनजाने में ही सही, रचनाकार के साथ कितना बड़ा अन्याय है। सुधी समीक्षकों, साहित्यकारों, साहित्य-प्रेमियों तथा प्रबुद्ध पाठकों से अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे विचार करें, पता लगाएँ, ताकि भ्रान्तियाँ दूर हों और सही निर्णय पर पहुँचा जा सके। भ्रान्तियाँ दूर न हों, तो वे नए अज्ञान को जन्म देती हैं और अज्ञान अमरबेल की भाँति फैलता ही चलता है।

सम्पर्कः  46, गोपाल विहार, देवरी रोड, आगरा- 282001 (उत्तर प्रदेश) , मोबाइल- 09259267929

Aug 14, 2013

हम आज़ाद हैं

हम आज़ाद हैं
- डॉ. गोपाल बाबू शर्मा 
हमें स्वराज मिल गया, पर सुराज नहीं। अंग्रेज चले गए, लेकिन हम अब भी गुलाम हैं। माना कि ऐसा कहने वाले निरे हैं, मगर वे सरफिरे हैं। अरे हम गुलाम नहीं बल्कि सिर से पाँव तक, धूप से छाँव तक और महानगर से लेकर गाँव तक पूरी तरह आज़ाद हैं। आबाद हैं।
आँकड़े बताते हैं कि संसद् का एक दिन का खर्च लगभग पचास लाख रुपये बैठता है। बताइए हमारे देशभक्त नेता इस बेशक़ीमती समय को महज़ लफ़्फ़ाजी और तू-तड़ाक में सार्थक करने के लिए स्वतन्त्र हैं या नहीं?
एक बार जो भी सत्ता हथिया लेता है, उसके पौ बारह हो जाते हैं। वह वहीं करता है, जो वह चाहता है। अपने चहेतों की चौराहों पर मूर्तियाँ खड़ी कर देता है। उनके नाम पर पार्क, स्मारक, संग्रहालय आदि बनवाने में भी वह नहीं चूकता। क्या उस पर किसी तरह की कोई पाबन्दी है?
गाँधी जी ने हमें अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लडऩे के लिए 'असहयोग’ का अहिंसात्मक हथियार दिया था। अब बात बड़ी हो या छोटी, खरी हो या खोटी, उस बिना लाइसेन्सी हथियार का वार चाहे जब शुरू हो जाता है। स्थिति तोड़-फोड़, हिंसा और आगजनी तक पहुँच जाती है। आज हड़ताल, घेरावबन्द, धरना, पुतला-दहन, जाम वग़ैरह कितने आम हैं। बेचारी पब्लिक इनके कारण परेशान है और देश को करोड़ों-अरबों का नुक़सान हो, तो होता रहे, कौन चिन्ता करता है?
राजनैतिक दलों के कथित कार्यकर्ताओं को रैलियों में शामिल होने के लिए देश भर की ट्रेनों में बिना टिकट आने-जाने, टिकट  माँगने पर डट कर हो-हल्ला मचाने और चैकिंग स्टाफ को घूँसा दिखाने की छूट ही छूट  है। कोई माई का लाल या लालू है जो उन्हें रोक सके?
सड़कों पर कूड़ा डालने, मूँगफली, केले, खाकर उनके छिलकों को सार्वजनिक स्थान पर फेंकने, बिखेरने, गंदगी फैलाने, जेनरेटरों के घु़एँ और कनफोड़ शोर से पर्यावरण को प्रदूषित बनाने पर क्या कोई सज़ा मिलती है? अपनी गायों, सूअरों, कुत्तों को आवारा घूमने को छोड़ देने में क्या किसी को कोई परेशानी होती है?
सुविधा-शुल्क के नाम पर रिश्वत डकारने घोटालों में माल मारने, महत्त्वपूर्ण सौदों में दलाली खाने, अनाप-शनाप घन जुटा, उसे देश-विदेश में जहाँ-तहाँ ठिकाने लगाने की सहूलियत है या नहीं?
तस्करी, अपहरण बलात्कार, हत्या, लूटपाट, रंगदारी आदि अब सिर्फ एक खेल की तरह हैं। इनसे जुड़ी कोई खबर किसी पत्र-पत्रिका में छप जाए तो क्या फ़र्क पड़ता है? जेलें भी अब जेल नहीं रहीं, वहाँ भी खास लोगों के लिए हाईटेक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। मौसेरे भाइयों में तालमेल जो रहता है।
नेताओं, सांसदों विधायकों, सरकारी अफ़सरों, खेल अधिकारियों आदि को किसी न किसी बहाने अपने खानदान और पानदान सहित विदेशों में सैर-सपाटे में जाने और वहाँ से क़ीमती विदेशी चीजें लाने के सुनहरे मौक़े मिलने में कोई हील-हुज्जत है क्या?
क्या हमारा विद्यार्थी और युवा वर्ग आज़ाद नहीं है? उसे पढ़ाई-लिखाई से मुँह चुराने, गुरुजनों को अँगूठा दिखाने, लड़कियों के दुपट्टे पर झपट्टे मारने और प्यार का झूठा स्वांग रचाने की आज़ादी है कि नहीं?
बड़े-बड़े उद्योगपति, व्यापारी और लक्ष्मी-वाहन कसम खाएँ और बताएँ कि वे झूठे विज्ञापनों से लोगों को भरमाने, जमाखोरी करने, चीजों के मनमाने दाम बढ़ा कर मुनाफ़ा कमाने, टैक्स न चुकाने के सफल हथकण्डे अपनाते हैं या नहीं? उन्हें किसका डर है?
डॉक्टरों को सैम्पल की दवा बेचने और मोटी-मोटी फ़ीसें लेकर भी इलाज में लापरवाही बरतने से किसने रोका है? इंजीनियर और ठेकेदार अपनी मिली भगत से क्या-क्या नहीं करते? वकीलों द्वारा खुल कर झूठ बोलने और मुवक्किलों की अंटी खोलने के कर्त्तव्य-पालन में क्या बाधा आती है? पुलिस महकमा भी पीछे कहाँ है? वह भी 'फ़्रीडम’ का  पूरा-पूरा मज़ा ले रहा है। वर्दी में रहकर भी ईगुर-बिन्दी और लिपिस्टक लगाई जा सकती है, राधा की भूमिका निभाई जा सकती है।
कहाँ तक बताएँ? सच यह है कि आज हर तरफ़ आज़ादी का आलम है। हर व्यक्ति आज़ादी का झण्डा उठाए निर्द्वन्द्व घूम रहा है। आज़ाद बस वे नहीं है, जो आज की आज़ादी का सही अर्थ नहीं जानते या जानते हैं तो उसे मानते नहीं।

लेखक के बारे में: जन्म: 4 दिसम्बर, 1932, अलीगढ़ (उ.प्र)। अब तक 14 व्यंग्य संग्रह- श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ, वर-कथा अन्नता, सॉरी प्लीस, पोथी पढ़ि- पढ़ि जग जिया, सास बिना सब सूना, जूता चल रहा है, रहिमन पानी  छाँड़िए, एक कप चाय, सब चलता है लोकतंत्र में, अब तो राम भरोसे देश, जय हो दुर्योधनों की, स्वारथ सरिस धर्म नहिं कोऊ, अगर जीभ न होती और पराई थाली का भात। 10 काव्य संकलन- जिन्दगी के  चाँद-सूरज, कूल से बँध है जल, समर्पित है मन, कहेगा आईना सबकुछ (मुक्तक संग्रह),धूप बहुत कम छाँव, मोती कच्चे धागे में (दोहे तथा हाइकु), दूधों नहाओ, पूतों फलो (हास्य-व्यंग्य कविताएँ), सरहदों ने जब पुकारा (भारत-पाक युद्ध सम्बन्धी कविताएँ), सूख गये सब ताल (ग़ज़ल संग्रह), कुर्सी बिन सब सून (व्यंग्य कविताएँ) , काँच के कमरे (लघुकथा संग्रह), लोक जीवन में नारी-विमर्श (लोक साहित्य),जीना सीखें (निबन्ध-संग्रह), अनुसंधान और अनुशीलन (शोध समीक्षात्मक कृति) आदि प्रकाशित हो चुके है। सम्प्रति- श्री वार्ष्णेय पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, अलीगढ़ के हिन्दी विभाग में रीडर के पद से सेवा-निवृत्ति के बाद स्वतन्त्र लेखन। संपर्क: 46, गोपाल विहार, देवरी रोड, आगरा- 282001 मो. 092592-67929