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Jan 1, 2024

उदंती.com, जनवरी 2024

वर्ष- 16, अंक- 6

नया सवेरा उतर धरा पर ,

लगा रहा किरणों का चन्दन

सुरभित कर कण-कण वसुधा का,

करता है  सबका अभिनन्दन ।

   - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

इस अंक में

अनकहीः स्वदेशी न्याय प्रणाली का आरंभ   - डॉ. रत्ना वर्मा

आलेखः हमारा संविधान हर भारतीय के सपने को सशक्त बनाता है - सलिल सरोज

आलेखः राष्ट्रवाद और समावेशी विकास के परिणाम - प्रमोद भार्गव

मुद्दाः पत्रकारिताः नया समाज बनाने में भागीदारी का संकल्प  - सुरेन्द्र अग्निहोत्री

दो ग़ज़लः 1. इस वतन के वास्ते, 2. इस कदर गुस्साए हैं बादल  - बृज राज किशोर ‘राहगीर’

लघुकथाः कन्फ़ेशन  -  डॉ. सुधा गुप्ता

संस्मरणः अटल जी का वह प्रेरक पत्रः  - शशि पाधा

कविताः एक और चिट्ठी - अनीता सैनी दीप्ति

व्यंग्यः जीवन संध्या भोज - जवाहर चौधरी

निबंधः क्या आपने मेरी रचना पढ़ी है? - हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

कविताः वानप्रस्थ  -  डॉ.  शिप्रा मिश्रा

पर्यावरणः पर्यावरणवाद के 76 वर्ष  - सुनीता नारायण

जयंतीः वैदिक ज्ञान से विश्व को आलोकित करते महर्षि महेश योगी  -  रविन्द्र गिन्नौरे

कहानीः माँ री!   - कुलबीर बड़ेसरों, पंजाबी से अनुवाद - सुभाष नीरव

ताँकाः उदय हुआ नया - भीकम सिंह

जिज्ञासाः ज्ञान और अज्ञान  -  ओशो

जीवन दर्शनः फोमो:खो जाने का भय  - विजय जोशी

अनकहीः स्वदेशी न्याय प्रणाली का आरंभ

- डॉ.  रत्ना वर्मा

आजाद देश के नागरिक अपने देश में सुख शांति और चिंता से परे होकर खुशहाल जीवन गुजारे, इसके लिए ही हमारी न्याय व्यवस्था है; परंतु हम देशवासियों का यह दुर्भाग्य है कि गुलामी के दौर में अंग्रेजों द्वारा बनाए कानून व्यवस्था को 75 वर्षों तक हमने ज्यों का त्यों ढोया है, जबकि होना तो यह था कि अपने देश की सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अपराध और न्याय की समीक्षा करके आजादी के बाद इन नियम- कानून में आवश्यक बदलाव किए जाते;  लेकिन हमारे देश में ऐसा हुआ नहीं । अंग्रेजों ने जो कानून और न्याय व्यवस्था बनाए, वे सब अपने फायदे के लिए थे । आजादी के लिए अपनी जान न्योछावर करने वालों ने  भारत को आजादी तो दिला दी; परंतु आजाद भारत के लोगों ने अंग्रेजों के बनाए कानून को बदलने में इतना वक्त लगा दिया। 

‘देर आयद दुरुस्त आयद’ की दर्ज पर, आने वाले साल के लिए एक सौगात की तरह राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोमवार को तीन नए आपराधिक न्याय विधेयकों को मंजूरी दी है। इन कानूनों का मकसद अपराधों व उनकी सजाओं को परिभाषित कर, आपराधिक न्याय प्रणाली को पूरी तरह से बदलना है। इसे एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। 

यद्यपि इन तीनों कानूनों को को लेकर मन में एक सवाल उठता है कि जब हमारे राजनीतिक पुरोधाओं को यह पता था कि ये पुराने कानून 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों के शासन की रक्षा के लिए बनाए गए थे,  जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजों के शासन की सुरक्षा करना था, तो फिर उसे बदलने में इतने बरस क्यों लगे? इसी प्रकार देश में अन्य कितने ही नियम, कानून और व्यवस्था हैं, जो अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए ही बनाए थे, उदाहरण के लिए शिक्षा व्यवस्था को ही लें, जिसमें बहुत ज्यादा परिवर्तन और सुधार करने की आवश्यकता है।

आज जबकि अन्य विकासशील देश अपनी शिक्षा व्यवस्था, भाषा और संस्कृति के बल पर दुनिया के सर्वोच्च शिखर पर आसीन हैं, वहीं हम आज भी अंग्रेजी की पूँछ पकड़कर दुनिया जीतना चाहते हैं। हिन्दी बोलने वाले और हिन्दी माध्यम में पढ़ने वालों को आज भी उच्च संस्थानों में प्राथमिकता नहीं दी जाती। प्रशासन के सबसे ऊँचे पायदान में पहुँचने वाले अधिकारी अंग्रेजी ही बोलते हैं और उनके काम-काज भी अंग्रेजी में ही होते हैं। हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने और पाठ्यक्रम में भारतीय संस्कृति और भारतीय मूल्य और परंपराओं के साथ भारत के वास्तविक इतिहास को शामिल किया होता, तो आज हम अपनी संस्कृति और विरासत के बल पर बहुत ऊँचाई पर होते। यह तो हम सभी जानते हैं कि इस दिशा में हमने आज तक कोई विशेष प्रयास नहीं किए. यदि हमने आजादी के बाद से ही बदलाव का प्रयास किया होता तो हमें अपनी श्रेष्ठता का लोहा मनवाने में इतने बरस नहीं लगते।   

खैर ‘जब जागे, तभी सवेरा’ की उक्ति को स्वीकार करते हुए यह तो कहना पड़ेगा कि पहली बार कानून में आतंकवाद को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, राजद्रोह को अपराध के रूप में खत्म किया गया है। साथ ही पहली बार भारतीय न्याय संहिता में आतंकवाद शब्द को परिभाषित किया गया है।  

इसके साथ ही कई और महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं, जिसमें ‘सामाजिक सेवा’ (Community Work) को दंड के रूप में स्थान दिया गया, जो समाज के हित में किए जाएँगे।  पुलिस की जवाबदेही तय करने के लिए भी कई प्रावधान जोड़े गए हैं। उम्मीद है इससे पुलिस और जनता के बीच बढ़ती दूरियों को कम करने में सहायता मिलेगी। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों के लिए अलग से प्रबंध किए गए हैं।  भारतीय दंड संहिता में धोखाधड़ी या ठगी से संबंधित अपराध धारा 420 अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 कहलाएगा। आम आदमी की जुबान पर एक मुहावरे की तरह रचे - बसे शब्द कि अरे वह अमुख व्यक्ति तो चार सौ बीसी करने में माहिर है , को बदलकर तीन सौ सोलह कहने में वक्त तो लगेगा । वक्त तो दे देंगे पर न्याय मिलने में अब देर न हो ऐसी अपेक्षा की जानी चाहिए। 

इन नए कानूनों को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी यही कहा कि यह नई न्याय प्रणाली सभी को पारदर्शी और त्वरित न्याय देने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों से सशक्त होगी।  इतिहास में पहली बार हमारे कानून आतंकवाद, संगठित अपराधों और आर्थिक अपराधों को परिभाषित करते हैं तथा कानून से बचने के हर रास्ते को रोकते हैं। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फिल्मी अंदांज में कहा कि नए आपराधिक कानूनों के लागू होने से ‘तारीख पे तारीख’ युग का अंत सुनिश्चित होगा और तीन साल में न्याय मिलेगा। 

इसमें कोई दो मत नहीं कि जो भी नियम- कानून में सुधार और बदलाव किए जाते हैं वे समाज की भलाई के लिए है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सोढ़ी जी ने भी बिल्कुल सही कहा है - ‘एक जीवंत समाज में, कानूनों को भी बदलना होगा। आपके पास स्थिर कानून नहीं हो सकते।’ इन कानूनों को लेकर इसे बनाने वाले तो सब पक्ष में बोलेंगे ही पर साथ ही इन कानूनों को लेकर इनकी उपादेयता पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। तो यह भी उतना ही सत्य है कि जहाँ बदलाव का स्वागत होता है वहाँ विरोध भी होता है। 

हमें नए साल में इस नए बदलाव का स्वागत करते हुए यह उम्मीद करना चाहिए कि इससे  देश में अमन, चैन और शांति के साथ जीवन बसर करने को मिलेगा, अपराध कम होंगे और देश तेजी से तरक्की करते हुए दुनिया में एक मिसाल बनाते हुए अपना स्थान सर्वोच्च शिखर पर रख सकेगा।  इसी उम्मीद के साथ सभी को नव वर्ष की शुभकामनाएँ...

आलेखः राष्ट्रवाद और समावेशी विकास के परिणाम

 - प्रमोद भार्गव

पाँच राज्यों में हुए चुनाव में भाजपा की बड़ी विजय को मोदी का जादू और लाडली बहनों के आशीर्वाद का परिणाम माना जा रहा है। इसे 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव का सेमिफाइनल भी कहा जा रहा है। जो भी कह लें, यह परिणाम प्रखर राष्ट्रवाद और समावेषी विकास के पर्याय हैं। मतदाताओं के बड़े समूह ने साफ जता दिया है कि वे जाति और धर्म की नकारात्मक राजनीति करने वाले दलों के पक्ष में नहीं है; अतएव उन्हें पनौती जैसे मुद्दे खड़े करने से बाज आना चाहिए। मतदाताओं ने राष्ट्रवाद, सनातन, सुशासन राजनीतिक स्थिरता और ढाँचागत विकास के साथ समावेशी विकास के पक्ष में मतदान किया है। जिससे व्यापक राष्ट्रहित के साथ विकास भी सर्वोपरी रहे। मध्यप्रदेश पिछड़ा वर्ग और जनजाति बहुल राज्य है, लेकिन उसने कांग्रेस और कथित इंडिया अर्थात् आईएनडीआई, गठबंधन के जातिवार गणना के मुद्दे को सर्वथा नकार दिया। अब यह मुद्दा लोकसभा चुनाव में इस मुद्दे के जनक रहे नीतिश कुमार के बिहार में भी चलने वाला नहीं है। राहुल गांधी जातीय गणना को लेकर बाग-बाग हो रहे थे। जबकि नरेंद्र मोदी ने बड़ा दाँव चलते हुए कह दिया कि मेरी नजर में केवल चार जातियाँ हैं, गरीब महिला, युवा और किसान। उन्हीं के हितों को सर्वोपरि रखते हुए केंद्र और भाजपा शासित राज्यों में लोक-कल्याणकारी योजनाएँ बनाई जा रही हैं। ये योजनाएँ भले ही राजस्व पर असर डाल रही हों, लेकिन गरीबों के जीवन को आसान बनाने में लाभदायी सिद्ध हो रही हैं। यही वजह रही कि मध्यप्रदेश में जिन 1.31 करोड़ लाडली बहनों को जून 2023 से 1000 और फिर 1250 रुपए प्रति माह दिए जा रहे हैं, उनकी बदौलत दीपावली के त्योहार पर ऐसी  रौनक आई कि बाजार गुलजार हो गया। गरीबों को दी गई आर्थिक मदद का यह समावेशी वितरण का कारगर उपाय है।   

इन्हीं मुद्दों का नतीजा रहा कि चुनाव में मतदान के बढ़े प्रतिशत ने इस बार अब तक के सारे मापदण्ड ध्वस्त कर दिए। हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की गारंटियों और जाति जनगणना जैसे मुद्दे विफल हो गए। मोदी की गारंटी, डबल इंजन सरकार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे नारों की गूँज ने मतदाता के भीतर विश्वास पैदा किया और भाजपा को मिले जनादेश ने राजस्थान व छत्तीसगढ़ कांग्रेस से छीन लिए। मध्यप्रदेश को न केवल बचाया बल्कि 163 सीटें जीतकर सत्ता संचालन का मार्ग और प्रशस्त कर दिया। तेलंगाना में 9 सीटें तो जीती हीं, मतदान का प्रतिशत 6 से बढ़कर 14 हो गया। भाजपा की इस चौतरफा बढ़त की प्रमुख वजह यह भी रही कि वह युवा और शिक्षित बेरोजगारों को जहाँ डिजिटलीकरण, कृत्रिम बुद्धिमता और यहाँ तक की एक दम नए तकनीकी हमले से जुड़े विषय डीपफेक जैसे मुद्दों को उछाल रही थी, वहीं विदेशी शिक्षा प्राप्त राहुल गांधी, अंबानी, अडाणी, पनौती और ओबीसी की गिनती जैसे रूढ़ मुद्दों का ही राग अलापते रह गए। युवा पीढ़ी को बेहतर भविष्य की राह दिखाने का उनके पास कोई पाठ ही नहीं था। मोदी के इसी संवाद का कारण रहा कि युवा भाजपा की झोली में जाता दिखा। 

मध्यप्रदेश में लाडली बहनों के मन में जहाँ शिवराज भैया रहे, वहीं अन्य मतदाताओं के मन में मोदी का जादू रहा। जिसने सत्ता की कठिन डगर को सरल कर दिया। लाडली बहनों के वोट 2 प्रतिशत बढ़े वोटों ने भाजपा को फिर से सत्ता की चाबी सौंप दी। इस बार प्रदेश में कुल 77.15 फीसदी हुए मतदान में महिलाओं ने 76.3 प्रतिशत मतदान की आहुति दी। शिवराज ने इसी साल फरवरी में लाडली बहना योजना की थी। इसके बाद अत्यंत फुर्ती से इस योजना की कागजी कार्यवाही पूरी करके इसे 10 जून से खाते में डालने का काम भी शुरू कर दिया। पहले माह 1000 रुपए डाले गए बाद में इसे बढ़ाकर 1250 रुपए प्रतिमाह कर दिया। प्रदेश के इतिहास में यह सबसे तेजी से प्रचलन में आकर लोकप्रिय होने वाली योजना रही। शिवराज ने इसे बढ़ाकर 3000 रुपये कर देने का भरोसा देकर बहनों का समूचा समर्थन पाने का मार्ग खोल दिया। बहनों ने भैया पर भरोसा किया और अपने मत की सौगात देकर भाजपा को भारी बहुमत से अलंकृत कर दिया। जबकि कांग्रेस अति आत्मविश्वास के भ्रम में डूबी रह गई। अन्यथा कमलनाथ को एक अच्छा अवसर सत्तारुढ़ होने का मिला था, जिसमें वे चूक गए। अपने पक्ष में माहौल देख चुनाव के एन वक्त पर कांग्रेस हाथ पे हाथ धरे बैठी रह गई। दिग्विजय सिंह ने जरूर चुनिंदा सीटों पर दौरे किए और प्रत्याशियों का मनोबल बढ़ाया, लेकिन ज्यादातर प्रत्याशी अपने ही संसाधनों से सोशल मीडिया पर इकलौते लड़ते दिखाई दिए। उन्हें संगठन की कोई ठोस मदद नहीं मिली। नतीजतन कांग्रेस 66 सीटों पर सिमट गई। 2003 में जब उमा भारती ने मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को बंटाढार कहते हुए सत्ता से बेदखल किया था, तब भी कांग्रेस की 73 सीटें आई थीं। अलबत्ता भाजपा ने संघ और संगठन से लेकर अपनी पूरी ताकत झोंक दी।      

          इन चुनाव परिणामों के यूँ तो कई संदेश हैं, लेकिन जो सबसे बड़ा संदेश तीनों राज्यों की बड़ी जीत में अंतर्निहित है, उसने साफ कर दिया है कि भाजपा की यह जीत किसी एक जाति, धर्म और धुव्रीकरण की नहीं है, बल्कि सकारात्मकता की है। चुनावी विश्लेषक खासातौर से मध्यप्रदेश में बढ़े मतदान को सत्ता विरोधी रुझान का पर्याय बता रहे थे, जबकि वह सत्ता की रचनात्मकता का सुखद पर्याय बनकर सामने आया है। यह अनिवार्य मतदान की जरूरत की पूर्ति कर रहा है। हालांकि फिलहाल हमारे देश में अनिवार्य मतदान की संवैधानिक बाध्यता नहीं है। मेरी सोच के मुताबिक ज्यादा मतदान की जो बड़ी खूबी है, वह है कि अब अल्पसंख्यक व जातीय समूहों को वोट बैंक की लाचारगी से छुटकारा मिल रहा है। इससे कालांतर में राजनीतिक दलों को भी तुष्टीकरण की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी;  क्योंकि जब मतदान का प्रतिशत 75 से 85 होने लगता हैं, तो किसी धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र विशेष से जुड़े मतदाताओं की अहमियत नगण्य हो जाती है।  नतीजतन उनका संख्याबल जीत या हार की गारंटी नहीं रह जाता। लिहाजा सांप्रदायिक व जातीय आधार पर ध्रुवीकरण की राजनीति शून्य हो जाती है। कालांतर में यह स्थिति मतदाता को धन व शराब के लालच से भी मुक्त कर देगी;  क्योंकि कोई प्रत्याशी छोटे मतदाता समूहों को तो लालच का चुग्गा डालकर बरगला सकता है, लेकिन संख्यात्मक दृष्टि से बड़े समूहों को लुभाना मुश्किल होता है ? यही वजह रही कि भाजपा ने मध्यप्रदेश में तो लगातार पाचवीं बार बड़ी जीत हासिल की ही, कांग्रेस से राजस्थान और छत्तीसगढ़ छीनने में भी सफल रही। इन तीनों राज्यों में आदिवासी मतदाताओं के बड़े समूह भाजपा के पक्ष में जाते दिखे हैं और जिस अनुसूचित जाति के मतदाता को बसपा का प्रतिबद्ध मत माना जाता था, वह भी भाजपा की तरफ उन्मुख हुआ है। यही कारण है कि मध्यप्रदेश में आप, सपा और बसपा एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही हैं। मध्यप्रदेश के रतलाम जिले की सैलाना सीट से जरूर ‘भारत आदिवासी पार्टी’ के कमलेश्वर डोडियार जीतने में सफल हुए हैं। इस बार प्रदेश में कोई निर्दलीय प्रत्याशी भी जीतने में सफल नहीं हुआ है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी कमोवेश यही स्थिति रही है। मतदाता की यह जागरूकता जताती है कि वह अब समावेषी विकास और राष्ट्रवादी अवधारणा का पक्षधर बन रहा है। ■ 

सम्पर्कः शब्दार्थ 49  श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100


आलेखः हमारा संविधान हर भारतीय के सपने को सशक्त बनाता है

- सलिल सरोज

भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, संविधान निर्माताओं का सपना शासन के ऐसे व्यवहार्य मॉडल को विकसित करने का था जो लोगों की प्रधानता को केंद्र में रखते हुए राष्ट्र की सर्वोत्तम सेवा करे। यह संविधान के निर्माताओं की दूरदर्शिता और दूरदर्शी नेतृत्व है जिसने देश को एक उत्कृष्ट संविधान प्रदान किया है जिसने पिछले सात दशकों में राष्ट्र के लिए एक प्रकाश स्तंभ के रूप में काम किया है। देश लोकतांत्रिक प्रणाली की सफलता के लिए भारत के संविधान द्वारा निर्धारित मजबूत इमारत और संस्थागत ढाँचे के लिए बहुत अधिक ऋणी है। हमारा संविधान भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का संकल्प है। वास्तव में, यह लोगों को सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक न्याय, स्वतंत्रता और समानता हासिल करने का वादा है; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता; स्थिति और अवसर की समानता; और सभी के बीच - भाईचारे को बढ़ावा देना, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता को सुनिश्चित करना। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने बहुत स्पष्ट रूप से विभिन्न प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करते हुए मुख्य अपेक्षाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा: "संविधान तैयार करने में हमारा उद्देश्य दो गुना है: राजनीतिक लोकतंत्र के रूप को निर्धारित करना, और यह निर्धारित करना कि हमारा आदर्श आर्थिक लोकतंत्र है और यह भी निर्धारित करना है कि प्रत्येक सरकार, जो भी सत्ता में है, प्रयास करेगी आर्थिक लोकतंत्र लाने की…”

 भारत का संविधान राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र के लिए एक संरचना प्रदान करता है। यह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीकों से विभिन्न राष्ट्रीय लक्ष्यों पर जोर देने, सुनिश्चित करने और प्राप्त करने के लिए भारत के लोगों की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। यह केवल कानूनी पांडुलिपि नहीं है; बल्कि, यह एक ऐसा वाहन है जो समय की बदलती जरूरतों और वास्तविकताओं को समायोजित और अनुकूलित करके लोगों के सपनों और आकांक्षाओं को साकार करने के लिए देश को आगे बढ़ाता है। भारत को राज्यों के संघ के रूप में बनाना, कानून के समक्ष समानता और कानूनों की समान सुरक्षा संविधान का सार है। साथ ही, संविधान समाज के वंचित और वंचित वर्गों की जरूरतों और चिंताओं के प्रति भी संवेदनशील है।

29 अगस्त 1947 को, मसौदा संविधान की तैयारी के लिए डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में संविधान सभा द्वारा मसौदा समिति का चुनाव किया गया था। संविधान सभा स्वतंत्र भारत के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार करने के महान् कार्य को सटीक रूप से तीन साल से भी कम समय में पूरा करने में सक्षम थी - दो साल, ग्यारह महीने और सत्रह दिन। उन्होंने 90,000 शब्दों में हाथ से लिखा हुआ एक बढ़िया दस्तावेज़ तैयार किया। 26 नवंबर 1949 को, यह भारत के लोगों की ओर से गर्व से घोषणा कर सकता है कि हम एतद्द्वारा इस संविधान को अपनाते हैं, इसे लागू करते हैं और खुद को देते हैं। कुल मिलाकर, 284 सदस्यों ने वास्तव में संविधान के पारित होने के रूप में अपने हस्ताक्षर किए। मूल संविधान में एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियाँ शामिल हैं। नागरिकता, चुनाव, अंतिम संसद, अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधानों से संबंधित प्रावधानों को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया। भारत का शेष संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। उस दिन, संविधान सभा का अस्तित्व समाप्त हो गया, 1952 में एक नई संसद के गठन तक खुद को भारत की अस्थायी संसद में बदल दिया।

 भारत के संविधान की प्रस्तावना उन मूलभूत मूल्यों, दर्शन और उद्देश्यों को मूर्त रूप देती है और दर्शाती है जिन पर संविधान आधारित है। संविधान सभा के सदस्य पंडित ठाकुर दास भार्गव ने प्रस्तावना के महत्त्व को निम्नलिखित शब्दों में अभिव्यक्त किया: "प्रस्तावना संविधान का सबसे कीमती हिस्सा है। यह संविधान की आत्मा है। यह संविधान की कुंजी है।" ... यह संविधान में स्थापित एक गहना है... यह एक उचित पैमाना है जिससे कोई भी संविधान के मूल्य को माप सकता है।"

संविधान, एक लैटिन अभिव्यक्ति में हमारा सुप्रीम लेक्स  है। यह लेखों और खंडों के संग्रह से कहीं अधिक है। यह एक प्रेरणादायक दस्तावेज है, हम जिस समाज के आदर्श हैं और यहाँ तक कि जिस बेहतर समाज के लिए हम प्रयास कर रहे हैं, उसका एक आदर्श है। भारत का संविधान अपनी तह में हमारी सभ्यतागत विरासत के आदर्शों और मूल्यों के साथ-साथ हमारे स्वतंत्रता संग्राम से उत्पन्न विश्वासों और आकांक्षाओं को भी समाहित करता है। संविधान हमारे गणतंत्र के संस्थापक पिता के सामूहिक ज्ञान का प्रतीक है और संक्षेप में, यह भारत के लोगों की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है।

संविधान सभा के विशिष्ट सदस्यों के साथ-साथ संविधान की मसौदा समिति द्वारा किए गए अथक प्रयासों ने हमें एक ऐसा संविधान विरासत में दिया है जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है। उन्होंने शानदार तरीके से शासन की एक अनूठी योजना तैयार की, जो न केवल सरकार के एक लोकतांत्रिक स्वरूप के लिए बल्कि एक समावेशी समाज के लिए भी उपलब्ध कराती है। इस तरह के एक संपूर्ण दस्तावेज को रखने का उद्देश्य, यहाँ तक कि न्यूनतम विवरण भी शामिल है, सिस्टम में निश्चितता और स्थिरता को बढ़ावा देना है। संविधान द्वारा परिकल्पित मुख्य लक्ष्य जीवन रेखा के रूप में जवाबदेही के साथ गरिमापूर्ण मानव अस्तित्व और सभी की भलाई के लिए एक कल्याणकारी राज्य की शर्त है।

 भारत का संविधान जो समय-समय पर चुनावों का प्रावधान करता है, प्रतिनिधियों के एक समूह से दूसरे समूह को राजनीतिक सत्ता का लोकतांत्रिक हस्तांतरण सुनिश्चित करता है। पिछले कुछ वर्षों में, निस्संदेह भारत में लोकतंत्र और गहरा हुआ है। लोक सभा के सत्रह आम चुनाव और राज्य विधानमंडलों के लिए अब तक हुए तीन सौ से अधिक चुनाव लोगों की बढ़ी हुई भागीदारी के साथ हमारे लोकतंत्र के सफल कामकाज की गवाही देते हैं। निस्संदेह, भारतीय मतदाताओं ने परिपक्वता प्रदर्शित की है जिसने इसे दुनिया भर से प्रशंसा दिलाई है।

 भारत में लोकतंत्र परिपक्व हो चुका है, और सभी बाधाओं के बावजूद, हमने अपनी संसदीय प्रणाली को बनाए रखा है। राजनीतिक स्थिरता, पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय मतदाताओं और राजनीतिक व्यवस्था की परिपक्वता की साक्षी रही है। 1.2 बिलियन से अधिक लोगों  के साथ दुनिया के दूसरे सबसे बड़े आबादी वाले देश के रूप में, वास्तविक चुनौती भाषा, धर्म, क्षेत्र, जाति, संस्कृति, जातीयता और अन्य कारकों के आधार पर लोगों की असंख्य पहचानों को संरक्षित और संरक्षित करना है। उदार राजनीतिक प्रणाली और उत्तरदायी लोकतांत्रिक संस्थानों ने विविधता में एकता और लोगों के बीच समावेश की भावना को सुरक्षित करने में अच्छा प्रदर्शन किया है। वास्तव में, यह हमारी बहुदलीय प्रणाली है जो लोगों की अधिक राजनीतिक भागीदारी को प्रोत्साहित करती है और भारतीय जनता की विविधता और बहुलता को प्रतिबिंबित करती है।

राजनीतिक संस्थाएँ और ढाँचे न केवल समाज को प्रतिबिंबित करते हैं, बल्कि वे इसे प्रभावित और परिवर्तित भी करते हैं। इस संदर्भ में, भारत की संसद सामाजिक परिवर्तन लाने और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को प्रभावित करने में प्रत्यक्ष और कंडीशनिंग की भूमिका निभाती है। लोगों की सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था होने के नाते, संसद सभी सरकारी गतिविधियों की जीवन रेखा है। समग्र रूप से संसदीय गतिविधि - कानून बनाना, वित्त को नियंत्रित करना और कार्यकारी शाखा की देखरेख - विकास के पूरे स्पेक्ट्रम को कवर करती है। यह सदन के पटल पर है कि कुछ प्राथमिक प्रक्रियाओं को गति दी जाती है जो सार्वजनिक जीवन में व्यवस्थित परिवर्तन और नवाचारों का रास्ता खोलने की क्षमता रखती हैं। चूँकि सरकार के संसदीय स्वरूप में कार्यपालिका विधायिका का निर्माण है और विधायिका कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है, कोई भी सरकार विधायिका द्वारा दिए गए निर्देशों की अनदेखी नहीं कर सकती है।

एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने विभिन्न विधानों और नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से एक कल्याणकारी राज्य की सुविधा के लिए संविधान के निर्माताओं के सपने को साकार करने का प्रयास किया है। परिणामस्वरूप, हमने बहुत कुछ हासिल किया है और कई क्षेत्रों में सफल हुए हैं; फिर भी, ऐसे कई अन्य क्षेत्र हैं जिन पर अभी भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। महिलाओं के सशक्तिकरण, बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष जोर, स्वच्छ भारत मिशन, नागरिकों को वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का सीधा हस्तांतरण, गरीबों के लिए बैंकिंग सुविधाओं में वृद्धि और जो बैंकिंग द्वारा कवर नहीं किए गए थे, जैसे नीतिगत हस्तक्षेप प्रणाली, किसानों के लाभ के लिए नीतियां और कार्यक्रम, वंचित लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ आदि संविधान निर्माताओं के सपने को साकार करने में काफी मददगार साबित होंगी।

   महात्मा गांधी ने भारत की विशिष्ट और विशेष परिस्थितियों पर लागू सार्वभौमिक मूल्यों के संदर्भ में भारत के नए संविधान की कल्पना की थी। 1931 की शुरुआत में, गांधीजी ने लिखा था: “मैं एक ऐसे संविधान के लिए प्रयास करूँगा, जो भारत को गुलामी और संरक्षण से मुक्त करेगा। मैं एक ऐसे भारत के लिए काम करूँगा, जिसमें गरीब से गरीब यह महसूस करे कि यह उनका देश है जिसके निर्माण में उनकी एक प्रभावी आवाज है: एक ऐसा भारत जिसमें कोई उच्च वर्ग या निम्न वर्ग के लोग नहीं हैं, एक ऐसा भारत जिसमें सभी समुदाय एक साथ रहेंगे सही सामंजस्य। ऐसे भारत में छुआछूत के अभिशाप के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। हम शांति से रहेंगे और बाकी दुनिया न तो शोषण करेगी और न ही शोषित… यह मेरे सपनों का भारत है जिसके लिए मैं संघर्ष करूंगा।"

 संविधान लोगों को उतना ही सशक्त बनाता है जितना कि लोग संविधान को सशक्त करते हैं। भारतीय संविधान के निर्माताओं ने बहुत अच्छी तरह से महसूस किया कि एक संविधान, चाहे वह कितना भी अच्छा लिखा गया हो और कितना विस्तृत हो, इसे लागू करने और इसके मूल्यों के अनुसार जीने के लिए सही लोगों के बिना बहुत कम सार्थक होगा। और इसमें उन्होंने आने वाली पीढ़ियों में अपना विश्वास दर्शाया है। ■

-विधायी अधिकारी, नयी दिल्ली


दो ग़ज़लः इस वतन के वास्ते, इस कदर गुस्साए हैं बादल

  - बृज राज किशोर ‘राहगीर’

1. इस वतन के वास्ते


खिड़कियाँ बेहद ज़रूरी हैं हर इक घर के लिए।

रोशनी लेकर यही आती हैं भीतर के लिए।

 

हाथ जबसे तुमने थामा है सफ़र के बीच में,

ये भी काफ़ी से ज़ियादा है मुक़द्दर के लिए।

 

जान देते आए हैं जो इस वतन के वास्ते,

सर झुकाए हैं खड़े हम उनके आदर के लिए।

 

मैंने ऐसा क्या कहा जो इस क़दर नाराज़ हो,

हाथ में ले आए हो तलवार इस सर के लिए।

 

लोग ऐसे भी हैं जिनको रोशनी भाती नहीं,

चाहिएगा ख़ून मेरा उनके ख़ंजर के लिए।


   2. इस कदर गुस्साए हैं बादल 


बरसते जा रहे हैं, इस क़दर ग़ुस्साए हैं बादल।

नदी के घाट सड़कों पर उठा ले आए हैं बादल।

 

बहुत नाराज़ हैं शायद, बहा ले जाएँगे सब कुछ,

न जाने किस समन्दर को बुलाकर लाए हैं बादल।

 

नहीं जब आए थे हम तो, हमें बुलवा रहे थे तुम,

कहानी यह बुलावे की अभी बतलाए हैं बादल।

 

बरस भर पैर फैला सोए थे अफ़सर शहर वाले,

मगर अब किश्तियाँ उनसे यहाँ चलवाए हैं बादल।

 

अरे नेताओं अब तक कोई भाषण क्यूँ नहीं आया,

विदेशी ताक़तों ने ही यहाँ भिजवाए हैं बादल।

 लेखक के बारे मेंः  पचास वर्षों से लेखनरत, तीन काव्य संग्रह, एक ग़ज़ल संग्रह, एक गीत संग्रह प्रकाशित, देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित, आकाशवाणी एवं मंचों पर काव्य-पाठ।, सम्पर्कः ईशा अपार्टमेंट, रुड़की रोड, मेरठ (उ.प्र.)-250001, मोबा. नं. 9412947379


मुद्दाः पत्रकारिताः नया समाज बनाने में भागीदारी का संकल्प

  - सुरेन्द्र अग्निहोत्री

पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले वर्षों में
काफी परिवर्तन आया है। दैनिक समाचार पत्रों के अनेक संस्करण आने, टी.वी. पत्रकारिता, इंटरनेट तथा वेब पत्रकारिता के चलन के साथ सोशल मीडिया के कारण तकनीक युक्त नई टीम समाज के सामने आयी है लेकिन इस गति के पीछे रहस्य को जानें तो यहाँ भी कुछ ग्लैमर के चकाचौंध के कारण पत्रकारिता के क्षेत्र में अवतरण कर गये है। इनके आगमन से विचार शून्यता समाप्त होनी चाहिए थी पर इस संक्रमण दौर ने हमारी दिशा ही बदल दी है। 

आज हमारा लेखन सतही हो गया है। जो शब्द समय के दस्तावेज बनने की संभावना रखते हैं उनका उपयोग स्वार्थी लेखन, प्रसारण में होना अत्यंत चिंतनीय प्रश्न बन गया है। राजनैतिक धरातल पर चल रहे उठापटक के नाटक में सहयोगी पात्र बनने, मनगढंत विश्लेषण करने के लिये मीडिया जब राजनैतिक हाथों में जाकर प्रतिक्रियावादी कृत्य करने के साथ ही सामाजिक सरोकारों से विलग होती है तो हमारे सामने अपने अस्तित्व की रक्षा का यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है। प्रेस अपने कर्म के प्रति सहज आचरण करे यह आकांक्षा लोकतंत्र का सजग प्रहरी मानने वाले सुदूर देहात से लेकर महानगरों में निवास करने वाले लाखों-करोड़ों भारतवासियों की है। स्वतंत्रता आन्दोलन, सामाजिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि में प्रेस की सकारात्मक भूमिका इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखी गई है। भारतीय पत्रकारिता के आदर्श तिलक से लेकर गणेश शंकर विद्यार्थी तक की पत्रकारिता का सच किसी आईने का मुहताज नहीं है। प्रेस मानसिक स्तर पर कभी वैयक्तिक स्वार्थों से प्रभावित नहीं होने के कारण ही ज्योति स्तम्भ बनकर समाज को नई दिशा देती रही। 

मुझे याद आ रही है मार्डन रिव्यू के संपादक रामानंद चटर्जी की वह बात जब एक दिन चटर्जी साहब गंगा में स्नान करते समय डूबने लगे, तो एक व्यक्ति ने आकर उनकी जान बचाने के लिए गंगा में छलांग लगा दी और उन्हें सकुशल जल के तेज प्रवाह से बाहर ले आए। चटर्जी साहब ने उस व्यक्ति से कहा कि आपने मेरी जान बचाई है, कभी भी जब तुम्हें जरूरत हो, तो मेरे पास चले आना। कुछ समय बाद वही व्यक्ति मार्डन रिव्यू के ऑफिस में पहुँचा और रामानंद चटर्जी को गंगा प्रसंग की चर्चा करते हुए उक्त घटना का स्मरण कराते हुए कहा कि आपने कहा था कि कभी जब जरूरत हो, तो चले आना । मैंने यह कविता लिखी है। आप इसे मार्डन रिव्यू में प्रकाशित करें। 

कविता का गंभीरता से अवलोकन कर मार्डन रिव्यू के संपादक चटर्जी ने कहा, यह कविता नहीं छप सकती। आप चाहे तो मुझे गंगा में डुबो दें । 

तो यह थे पत्रकारिता के मूल्य ! आज की पत्रकारिता पर गौर करें तो सच यह है कि सच को टुकड़ों-टुकड़ों में संदर्भ तोड़कर कभी सनसनी फैलाने के लिए कभी- कभी स्वार्थ सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन इस बात का मतलब यह नहीं कि सभी सत्य को तिरोहित कर रहे हैं । अभी भी माल बनाम मूल्य की लड़ाई में एक बहुत बड़ा वर्ग मूल्यों के साथ अपनी लेखनी का प्रयोग कर रहा है, जिसके चलते समाज के सामने कालिमा युक्त चेहरों की करतूतें प्रकाश में आ रही हैं तो भूमंडलीकरण के नाम पर अपने प्रपंच में वाजिब तर्क गढ़ने की कोशिश में असफल होने पर कहते हैं कि खबर देना (बेचना) एक वैयक्तिक क्रिया है । क्या खबर एक उत्पाद या माल है? क्या अखबार लगभग उसी तरह का उत्पाद है, जैसे साबुन की टिकिया ! खबर पैदा करना और खबर बेचना और खबरों के लिये पत्रकारों का राजनेता की तरह आचरण पाठकों के संवेदना तंत्र को शून्य कर देती है। खबर देना एक जिम्मेदारी का काम है, क्योंकि उसके साथ मूल्य जुड़े हैं। वह एक मानवीय संवेदना को प्रभावित करती है। छवि का अक्स बनाती हैं, पर विपरीत आचरण अँधेरे की गहरी खाई में समाज को धकेलना क्या सत्कर्म बन सकता है? आजादी के आठ दशकों की यात्रा में परिवर्तन का  परिणाम न आना और पतित होने के लिए सिर्फ पत्रकार का जिम्मेदार ठहराकर हम अपने कर्तव्य से इतिश्री नहीं मान सकते हैं। 

पत्रकारिता के मरने के साथ ही लोकतंत्र की मृत्यु को कोई रोक नहीं सकता है। पत्रकारों के प्रति समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी; क्योंकि पत्रकार भी इसी समाज का नागरिक है और उसके साथ ही वही सब जिम्मेदारी है, जो समाज के प्रत्येक नागरिक के साथ होती है। इस कथन के माध्यम से मेरी आशा यह नहीं है कि हम पत्रकारिता के नरक की सारी सड़न और बदबू के लिए सिर्फ सुविधाओं के मद में डूबे पत्रकारों की आत्मालोचन कर ऐसे गुनाह को कबूल कर लें। जरूरत बस आज सम्बंधित विचारों, व्यावहारिक समस्याओं और व्यक्तिगत भावनाओं-कुंठाओं से पार अपनी सार्थक भूमिका सिद्ध करने की अनिवार्यता को स्वीकार करने की है और वहीं परीलोक से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। जलागम, प्राकृतिक संसाधन, शिक्षा, सामाजिक सौहार्द, जल, जंगल, जमीन, लोक संस्कृति उन्नयन, मातृशक्ति, सशक्तीकरण, मानवाधिकार, सामाजिक सुरक्षा, आजीविका संवर्द्धन, युवा पीढ़ी को प्रोत्साहन, जनाधिकारों हेतु पहल, शिक्षा, स्वास्थ्य, परम्परागत श्रेष्ठ रीतियों, उत्सवों, त्योहारों एवं अन्य पर्वों का सम्मान के ऊँच-नीच, अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिये साथ रूढ़ियों, कुरीतियों, जातिप्रथा, दहेज दानव, आदि विषयों पर कलम का प्रयोग कर नया समाज बनाने में भागीदारी का संकल्प ही पत्रकारिता को उच्च मूल्यों की ओर पुर्नस्थापित कर सकता है। ■

सम्पर्कः  ए-305, ओ. सी. आर. बिल्डिंग, विधानसभा मार्ग, लखनऊ -226001


लघुकथाः कन्फ़ेशन

श्रद्धा सुमन  -  डॉ. सुधा गुप्ता


गद्य और काव्य में श्रेष्ट सृजन देने वाली डॉ. सुधा गुप्ता जी का 18 नवम्बर 20123 को देहावसान हो गया। 18 मई को वे नब्बे वर्ष की हो जातीं। जापानी काव्यविधाओं में आपका सृजन बेजोड़ रहा। हाइकु, ताँका, सेदोका, हाइबन उन्हें शिखर पर स्थापित करते हैं। उदंती को भी आपने अपने साहित्य से सदैव सुशोभित किया है। उन्हें श्रद्धांजलि स्वरुप यहाँ प्रस्तुत है काव्य से अलग उनकी एक उत्कृष्ट लघुकथा कन्फ़ेशन- 

माइकेल कई बरस से बीमार था। साधारण-सी आर्थिक स्थिति; पत्नी बच्चे सारा भार। जितना सम्भव था इलाज़ कराया गया; किन्तु सब निष्फल। शय्या-क़ैद होकर रह गया। लेटे-लेटे जाने क्या सोचता रहता...अन्ततः परिवार के सदस्य भी अदृष्ट का संकेत समझ कर मौन रह, दुर्घटना की प्रतीक्षा करने लगे। एक बुज़ुर्ग हितैषी ने सुझाया-'अब हाथ में ज़्यादा वक़्त नहीं, फ़ादर को बुला भेजो ताकि माइकेल' कन्फेस'कर ले और शान्ति से जा सके।' बेटा जाकर फ़ादर को बुला लाया। फ़ादर आकर सिरहाने बैठा, पवित्र जल छिड़का और ममता भरी आवाज़ में कहा-'प्रभु ईशू तुम्हें अपनी बाहों में ले लेंगे बच्चे! तुम्हें सब तक़लीफ़ों से मुक्ति मिलेगी, बस एक बार सच्चे हृदय से सब कुछ कुबूल कर लो।'

माइकेल ने मुश्किल से आँखें खोलीं, बोला-'फादर, मैंने कभी किसी को धोखा नहीं दिया।'

फादर ने सांत्वना दी- 'यह तो अच्छी बात है, आगे बोलो।'

माइकेल ने डूबती आवाज़ में कहा-'फादर, मैं झूठ, फ़रेब, छल-कपट से हमेशा बचता रहा।'

फादर ने स्वयं को संयमित करते हुए कहा- 'यह तो ठीक है; पर अब असली बात भी बोलो...माइकेल!'

माइकेल की साँस फूल रही थी, सारी ताकत लगाकर उसने कहा- 'फादर, दूसरों के दुःख में दुःखी हुआ, परिवार की परवाह न कर दूसरों की मदद की...'

अब फादर झल्ला उठे- 'माइकेल, कन्फेस करो...कन्फेस करो...गुनाह कुबूलो...वक्त बहुत कम है...'

उखड़ती साँसों के बीच कुछ टूटे फूटे शब्द बाहर आए, 'वही...तो कर...रहा हूँ...फादर...!' ■


संस्मरणः अटल जी का वह प्रेरक पत्रः

 - शशि पाधा 

मेरे जन्म दिवस पर मेरी एक मित्र ने मेरी रुचि का ध्यान रखते हुए तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी द्वारा रचित कविता संग्रह ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ मुझे भेंट किया।  बाजपेयी जी के ओजस्वी भाषणों के प्रभाव से कोई भी भारतवासी अछूता नहीं रहा होगा। किन्तु मुझे तब तक यह नहीं पता था कि वे प्रभावशाली वक्त्ता के साथ-साथ उच्चकोटि के संवेदनशील कवि भी हैं। कभी-कभी उनके भाषण में हम पद्य की कुछ रोचक पंक्त्तियाँ  सुनते तो थे लेकिन वे सभी विषय के संदर्भ में ही होतीं थीं।

संग्रह पाकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। उनके काव्य में मैंने उनके संघर्षमय जीवन;राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेलवास तथा राष्ट्रीय भावना आदि सभी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति पायी।। उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए मैं भी कुछ नया लिखने के लिये प्रेरित होती। इस तरह इस संग्रह के द्वारा एक विलक्षण काव्य प्रतिभा के धनी कवि के साथ अपनी भावनाओं को शब्द रूप देने का प्रयत्न करती हुई एक नई लेखिका का भावनात्मक संबन्ध बन गया।

इसी बीच कारगिल का युद्ध आरम्भ हो गया। कल तक जिस भयंकर युद्ध  का अनुमान भी न था, ऊँचे पर्वतों पर वही  छद्मवेश में घुसपैठ करता हुआ आ पहुँचा। देश भर की सैनिक छावनिओं में सीमाओं पर तुरन्त पहुँचने की तैयारी हो गई। एक सैनिक अधिकारी की पत्नी होने के नाते मैंने स्वयं अनगिन शूरवीरों को भारत माँ की रक्षा के लिए जाते हुए बड़े गर्व के साथ विदा किया। उन दिनों मैंने उन वीरों की आँखों में  संकल्प के प्रति दृढ़ता, तत्परता और कर्त्तव्य परायणता के जो ओजस्वी भाव देखे वे मुझे कभी अर्जुन, कभी अभिमन्यु जैसे अनुपम  योद्धायों का स्मरण करा गए। वायुमंडल को चीरते हुए जयघोष के साथ जब वे सीमाओं की ओर प्रस्थान करते तो उस छावनी के लोगों के हाथ श्रद्धा, गौरव तथा आशीर्वाद की भावना से ऊपर उठ जाते। सीमा के किसी शिविर में मैं जब भी अपने पति के साथ जाती तो सैनिकों के उत्साह और दृढ़ संकल्प को देखकर अभिभूत भी होती और श्रद्धा से नतमस्तक भी।

आज तक केवल मानवीय रिश्तों की ऊहापोह तथा प्राकृतिक सौन्दर्य को शब्दबद्ध करती मेरी लेखनी को उन दिनों जैसे किसी वीराँगना ने थाम लिया था। स्वत: ही सैनिकों के शौर्य और बलिदान से गर्वित रचनाएँ लिखी जाने लगीं। वीरों के सम्मान में लिखीं मेरी इन रचनाओं को भारत के मुख्य दैनिक पत्र ‘पंजाब केसरी’ ने बड़े गर्व के साथ प्रकाशित किया और मेरी भावनाओं को जन-जन तक पहुँचाया।

एक दिन दूरदर्शन पर सीमा पर हिमालय की दुर्गम ऊँचाइयों पर युद्धरत सैनिकों  के साहस, उत्साह और जोश को देखकर न जाने मुझे क्या सूझी। उस समय मैं एक गर्विता सैनिक पत्नी थी या बलिवेदी पर जान न्योछावर करने वाले वीरों की ममतामयी माँ के समान थी, मैं नहीं जानती। किन्तु भावनाओं के प्रवाह में बहकर मैंने श्री बाजपेयी जी को एक पत्र लिखा।

पत्र कुछ ऐसा था  --‘ आप सीमाओं पर शत्रु के साथ वीरता से लड़ते हुए सैनिकों के समाचार तो रोज़ ही सुनते /देखते हैं। मैंने अपने जीवन के लगभग ३० वर्ष इन वीर योद्धाओं के साथ बिताए है। हिमालय की दुर्गम चोटियों पर युद्धरत इन सैनिको की वीरता को देखकर आज मैं स्वयं ही अचम्भित हूँ। क्योंकि, शान्तिकाल में यही सैनिक इतने कोमल हृदय रखते हैं कि किसी पशु-पक्षी को हानि पहुँचाने की बात तो क्या, हर घायल प्राणी की दिन रात सेवा में लगे रहते हैं। धार्मिक इतने कि हर शाम अपने अपने धर्म स्थल में घंटों भगवत भजन में लीन रहते हैं। अस्त्र-शस्त्र थामने वाले यही हाथ कई बाग- बगीचों मे बड़े स्नेह से सुन्दर फूल रोपते हैं, वृक्षारोपण अभियान में सैकड़ों वृक्षों का शिशु के समान लालन-पालन करते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कभी विदूषक, कभी गायक और कभी नर्तक बनकर अपना मनोरंजन करते हैं। आज यही वीर मातृभूमि की रक्षा के लिये जिस संकल्प, साहस और अक्षुण्ण वीरता से शत्रु को खदेड़ रहे हैं, आज मेरा मस्तक उनके सामने नत है और हृदय गर्व से परिपूर्ण।

 मैं जब प्रतिदिन सैनिक छावनी में रहते हुए युद्धरत सैनिकों के परिवारों से मिलती हूँ तो उनकी आँखों में लिखे अनगिन प्रश्नों को पढ़कर निरुत्तर हो जाती हूँ। क्योंकि, युद्ध कब समाप्त होगा इसका उत्तर अभी तक किसी के पास नहीं है। 

आप राष्ट्र नेता हैं, कूटनीति को भी भली-भान्ति जानते हैं  हैं। युद्ध का राक्षस केवल नर संहार चाहता है। कृपया कोई ठोस कदम उठाइये, युद्ध रोकिए ताकि और नर संहार न हो। हमारे सैनिक शत्रु को परास्त करके सकुशल घर लौट आएँ और  देश में फिर से सुख शांति स्थापित हो सके।  एक सैनिक की पत्नी होने के नाते, एक कवि हृदय राष्ट्र नेता का आशीर्वाद हमारे सैनिकों के साथ रहे केवल इसी कामना के साथ आज आपको पत्र लिख रही हूँ। साथ ही उन महा वीरों को समर्पित अपनी कुछ रचनाएँ आपको भेज रही हूँ। 

मैंने अपनी प्रकाशनाधीन पुस्तक में संग्रहीत, सैनिकों को समर्पित कुछ रचनाएँ पत्र के साथ संलग्न कर दीं। शायद युद्ध के उन दारुण पलों में मैं अपना गर्व;अपना दुख और. अपना ममत्व एक कवि ह्रदय राष्ट्रनेता के साथ साँझा करना चाहती थी।

इसी बीच हर रोज़ दूरदर्शन पर युद्ध के संहार को देखकर मन क्षुब्ध रहता। बलिदान हुए कितने ही अधिकारियों/ सैनिकों को मैं जानती थी और जिन्हें नहीं भी जानती थी वे भी तो मेरे वृहद सैनिक परिवार से ही थे। मन में कई प्रश्न उठते कि हिमाच्छादित उन दुर्गम पर्वतों को दो देशों में बाँटने का अधिकार किसने मानव को दिया है ? सैकड़ों वीरों के रक्त्त से रंगे ये मूक पहाड़ भी आज करुण चीतकार करके सचेत कर रहे थे  कि इस संहार को रोको, किन्तु युद्ध था कि रुकने का कहीं नाम नहीं।

 लगभग एक सप्ताह के बाद डाक से मेरे नाम एक पत्र आया। जैसे ही लिफाफ़े पर मोहर देखी, मैं किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गई। पत्र प्रधान मंत्री सचिवालय से आया था। मैंने पत्र खोला तो हैरानी और प्रसन्नता ने मुझे घेर लिया, क्योंकि पत्र लिखकर उत्तर पाने की बात तो मैंने सोची ही न थी। उत्तर पढ़कर मुझे लगा कि हमारे वीर सैनिकों को उनका आशीर्वाद मिल गया। उत्तर में श्री बाजपेयी जी ने  लिखा था ---

प्रिय सुश्री शशि पाधा,

  आपका 13 जुलाई ,1999 का पत्र प्राप्त हुआ जिसके साथ आपने अपनी कविताएँ संलग्न की हैं। आपने कविता में  सैनिकों के साहस और बलिदान की जो भावाभिव्यक्ति दी है, वह सराहनीय है। मैं आपके इस प्रयास की सराहना करता हूँ।

 शुभकामनाओं सहित, 

  आपका,

अटल बिहारी बाजपेयी 

कभी- कभी किसी भी आशा-आकांक्षा के बिना कुछ आशातीत घट जाता है जो जीवन भर आपके साथ रहता है। इस घटना को मैं आजन्म भूल नहीं पाऊँगी। इतने व्यस्त होते हुए भी उन्होंने मेरी रचनाओं को पढ़कर तुरन्त उत्तर देने की सोची, यह शायद एक राष्ट्र नेता के साथ- साथ उनके एक संवेदनशील कवि हृदय होने का परिचायक है।

लगभग तीन माह तक कारगिल क्षेत्र की ऊँची पहाड़ियों पर यह युद्ध चलता रहा। कितने ही शहीद सैनिक तिरंगे झण्डे में लिपटे हुए लकड़ी के ताबूतों में घर लौटे। कितने मासूम बच्चे अनाथ हुए, कितने सिन्दूर पुंछे, कितने माता-पिता के सहारे टूटे और ना जाने कितनी सैनिक छावनियों में निराशा का कोहरा छाया रहा। इसका कोई लेखा जोखा नहीं हो पाया क्योंकि कभी न मिटने वाली मन की पीड़ा को कोई किन अक्षरों में लिख सकता है !

 कुछ वर्षों के पश्चात राष्ट्रपति भवन के अशोका हाल में एक भव्य समारोह में मेरे पति को राष्ट्र के प्रति उनकी  सेवाओं के लिए ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल ‘ से अलंकृत किया गया। इस अलंकरण समारोह में मैंने प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी जी को अन्य विशिष्ट अतिथि गणों के साथ बैठे देखा। अभिवादन के बाद बातचीत करते हुए मैंने उन्हें अपने काव्य -संग्रह और उनके पत्रोत्तर के विषय में बताया। आँखें बन्द करके जैसे वे कुछ भी बोलने से पहले सोचते है, ठीक उसी मुद्रा के साथ वे बोले, " बहुत प्रसन्न्ता हुई आपसे मिलकर। लिखती रहिए, देशप्रेम से परिपूर्ण, सैनिकों के शौर्य की गाथाएँ लिखती रहिए। राष्ट्र के प्रति हम रचनाकारों का यही मुख्य कर्तव्य है।”

 और, मैं उनका आशीर्वाद लेकर चली आई जो आज तक मुझे प्रेरित करता है।  ■

निबन्धः क्या आपने मेरी रचना पढ़ी है?

  - हज़ारी प्रसाद द्विवेदी

हमारे साहित्यिकों की एक भारी विशेषता यह है कि जिसे देखो, वही गंभीर बना है, गंभीर तत्त्ववाद पर बहस कर रहा है और जो कुछ भी वह लिखता हैं, उसके विषय में निश्चित धारणा बनाए बैठा है कि वह एक क्रांतिकारी लेख है। जब आए दिन ऐसे ख्यात-अख्यात साहित्यिक मिल जाते हैं, जो छूटते ही पूछ बैठते हैं, "आप ने मेरी अमुक रचना तो पढ़ी होगी?" तो उनकी नीरस प्रवृत्ति या विनोदप्रियता का अभाव बुरी तरह प्रकट हो जाता है। एक फिलॉस्फर ने कहा है कि विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक-सा होता है। आप दुर्दांत डाकू के दिल में विनोद प्रियता भर दीजिए, वह लोकतंत्र का लीडर हो जाएगा; आप समाज-सुधार के उत्साही कार्य कर्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजैक्शन दे दीजिए, वह अख़बारनवीस हो जाएगा। और यद्यपि कठिन है, फिर भी किसी युक्ति से उदीयमान छायावादी कवि की नाड़ी में थोड़ा विनोद भर दीजिए, वह किसी फ़िल्म कंपनी का नामी अभिनेता हो जाएगा।  

एक आधुनिक चीनी फिलासफर को दिन-रात यह चिंता परेशान करती रही थी कि आख़िर प्रजातंत्र के नेताओं और डिक्टेटरों में अंतर क्या है। यदि आप सचमुच गंभीरतापूर्वक छान-बीन करें तो रूज़वेल्ट और स्टालिन में कोई मौलिक अंतर नहीं मिलेगा। या दूर की बात छोड़िए।  गाँधी और जिन्ना में कोई अंतर नहीं है ....जहाँ तक शक्ति- प्रयोग का प्रश्न है। गांधी की बात भी कांग्रेस के लिए क़ानून है और जिन्ना की बात भी मुस्लिम लीग के लिए वेद-वाक्य है। फिर भी एक डेमोक्रेट है और दूसरा डिक्टेटर। क्यों? चीनी फिलॉसफर ने चार वर्ष की निरंतर साधना के बाद आविष्कार किया कि डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है, पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं। उनको आप जहाँ भी देखें और जब भी देखें, उन की भृकुटियाँ तानी हुई हैं, मुट्ठियाँ बँधी हुई हैं, ललाट कुंचित है, अधरोष्ठ दाँतों की उपांत रेखा के समानांतर जमा हुआ है-- मानो ये अभी दुनिया को भस्म कर देना चाहते हैं। अगर इन शक्तिशाली डिक्टेटरों में हँसने का थोड़ा-सा भी माद्दा होता, तो दुनिया आज कुछ और हो गई होती।

जब-जब मैं कलकत्ते के चिड़ियाघर में गया हूँ तब-तब मुझे ऐसा लगा है कि संसार के जीवों में सबसे अधिक गंभीर और चिंतामग्न चेहरा उस चिड़िया घर में रखे हुए एक बनमानुष का है। उसको देखते ही जान पड़ता है कि संसार की समस्त वेदना को, वह हस्तामलक की भाँति देख रहा है और अपनी सुदूर पातिनि दृष्टि से इन आने-जाने वाले दर्शकों के करुण भविष्य को वह प्रत्यक्ष देख रहा है। मैंने बाद में पढ़ा है कि अफ़्रीका के हब्शियों में यह विश्वास है कि यह वनमानुष मनुष्य की बोली बोल भी सकते है और संसार के रहस्य को भली-भाँति समझ भी सकते हैं; परन्तु इस डर से बोलते नहीं कि कहीं लोग पकड़कर उन्हें ग़ुलाम न बना लें। यह बात मुझे जब तक नहीं मालूम थी, तब तक मैं समझता था कि यह कलकत्ते वाला बनमानुष ही बहुत गंभीर और तत्व-चिंतक लगता है। अब मैंने अपनी राय में संशोधन कर लिया है; वस्तुतः संसार के सभी बनमानुष गंभीर और तत्वदर्शी दिखाई देते हैं!

मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि आदिम युग का मनुष्य ... जबकि वह वानरी योनि से मानवी योनि में नया-नया आया था ... कुछ इस कलकतिये बनमानुष की ही भाँति गम्भीर रहा होगा। मगर यह भी कैसे कहूँ? ज़ेब्रा और गैण्डा भी मुझे कम गंभीर नहीं लगते तथा गधे और ऊँट भी इस सूची से अलग नहीं किए जा सकते। फिर भी इनकी तुलना बनमानुष से नहीं की जा सकती। अंतत: गधे और बनमानुष की गम्भीरता में मौलिक भेद है। गधा उदास होता है और इसलिए नकारात्मक है; पर बनमानुष सोचता हुआ रहता है और इसलिए उसकी गंभीरता में कुछ तत्त्व है, कुछ सार है। गधे की गम्भीरता प्रोलितारियत की उदासी है और बनमानुष की गंभीरता वर्गवादी मनीषी की। दोनों को एक श्रेणी का नहीं कहा जा सकता।

परन्तु इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि आदि मानव कुछ गंभीर, कुछ तत्त्व चिन्तक और कुछ उदास ज़रूर था और उसकी उदासी वर्गवादी विचारक की उदासी की जाति की ही रही हो, ऐसा भी हो सकता है। सच पूछिए तो शुरू-शुरू में मनुष्य कुछ साम्यवादी ही था। हँसाना-हँसाना तब शुरू हुआ होगा जब उसने कुछ पूँजी इकट्ठी कर ली होगी और संचय के साधन जुटा लिए होंगे। मेरा निश्चित मत है कि हँसना-हँसाना पूंजीवादी मनोवृत्ति की उपज है। इस युग के हिंदी साहित्यिक जो हँसाना नापसंद करते हैं, उसका कारण शायद यह है कि वे पूंजीवादी बुर्जुआ मनोवृत्ति की मन-ही-मन घृणा करने लगे हैं। उनकी युक्ति शायद इस प्रकार है---चूँकि संसार के सभी लोग हँस नहीं सकते, इसीलिए हँसी एक गुनाह है और चूँकि संसार के सभी लोग थोड़ा बहुत रो सकते हैं, इसीलिए रोना ही वास्तविक धर्म है। फिर भी अधिकतर साहित्यिक रोते नहीं, केवल रोनी सूरत बनाए रहते हैं। जिसे थोड़ी-सी भी गणित सिखाई गई हो, वह बहुत आसानी से इस आचरण की युक्ति-युक्तता समझ सकता है। मैं समझ रहा हूँ।

यह तो स्वयंसिद्ध बात है है कि दुनिया में दुःख- सुख की अपेक्षा अधिक है अर्थात् रोदन हास्य से अधिक है। अब सारी दुनिया के रोदन को बराबर-बराबर बाँट दीजिए और हँसी को भी बराबर-बराबर बाँट दीजिए। स्पष्ट है कि सब को रोदन हास्य से ज़्यादा मिलेगा, अब रोदन में से हास्य घटा दीजिए। कुछ रोदन ही बचा रहेगा। इसका मतलब यह हुआ कि जो कुछ मिलेगा उससे फूट-फूटकर तो नहीं रोया जा सकता; पर चेहरा ज़रूर रुआँसा बना रहेगा। यह युक्ति मुझे तो ठीक जँचती है।

लेकिन युक्ति का ठीक जँचना साहित्य की आलोचना के क्षेत्र में सब समय प्रमाण-स्वरूप ग्रहण नहीं किया जाता। रहस्यवादी आलोचक यह नहीं मानते कि युक्ति और तर्क ही सब कुछ है। मैंने आलोचक शब्द के विशेषण के लिए रहस्यवादी शब्द किसी को चौंका देने की मंशा से व्यवहार नहीं किया है। बहुत परिश्रम के बाद मैंने यह निष्कर्ष निकाला है कि हिंदी में वस्तुतः रहस्यवादी कवि हैं ही नहीं। यदि कोई रहस्यवादी कहा जा सकता है, तो वह निश्चय ही एक श्रेणी का आलोचक है। जहाँ तक हिन्दी बोलने वालों का सम्बन्ध है, रहस्यवादी साधू और फ़क़ीर तो बहुत हैं; पर वे सब साधना की दुनिया के जीव हैं, साहित्य की दुनिया में रहस्यवादी जीव यदि कोई है, तो वे निश्चय ही एक तरह के आलोचक हैं। और जब कभी मैं रहस्यवादी शब्द की बात सोचता हूँ तो काशी के भदैनी मोहल्ले की सड़क पर साधना करने वाला रहमत अली फ़क़ीर मेरे सामने ज़रूर आ जाता है। यह फ़क़ीर मन वचन और कर्म तीनों से विशुद्ध रहस्यवादी था। 'आवनिकेत' वह ज़रूर था; पर उसके बड़े-से-बड़े निन्दक को भी यह कहने में ज़रूर संकोच होगा कि वह 'स्थिरमति' भी था।

सो, मैंने एक दिन देखा कि यह रहमत अली शून्य की ओर आँखें उठाए हुए किसी अदृश्य वस्तु पर निरन्तर प्रहार कर रहा है। लात, मुक्के, घूँसे-एक, दो, तीन,.... लगातार। दर्शक तो वहाँ बहुत थे कुछ सहमे हुए, कुछ भक्तियुक्त, कुछ 'योंही से' और  गंभीर। एकाध मुस्करा भी रहे थे। इन्हें देखकर ही मुझे रहस्यवादी आलोचकों की याद आई। सारा काण्ड कुछ ऐसा अजीब था की विनोद की एक हल्की रेखा के सिवा तत्त्वज्ञान पहुँचा देने का और कोई साधन ही नहीं था। तब से जब मैं देखता हूँ कि कोई शून्य की ओर आँखें उठाए है और किसी अदृश्य वस्तु पर निरंतर प्रहार कर  रहा है, तब मुझे रहस्यवाद की याद आए बिना नहीं रहती। सो यह रहस्यवादी दल युक्ति नहीं माना करता। 'युक्ति' शब्द में ही (यूज+ति) किसी वस्तु से योग का सम्बन्ध है। और यह मान लिया गया है कि योग दृश्य वस्तु से ही स्थापित किया जा सकता है। अदृश्य के साथ योग कैसा?

आसमान में निरंतर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है और मैं निश्चित जानता हूँ कि रहस्यवादी आलोचना लिखना कुछ हँसी-खेल नहीं है। पुस्तक को छुआ तक नहीं और आलोचना ऐसी लिखी कि त्रैलोक्य विकम्पितः -यह क्या काम साधना है! आए दिन साहित्यिकों के विषय में विचार होता ही रहता है और इन विचारों पर विचार लिखने वाले बुद्धिमान लोग गम्भीर भाव से सिर हिलाकर कहते हैं-आख़िर साहित्य कहें किसे? बहसें होती हैं, अख़बार रँगे जाते है, मेरे जैसे आलसी आदमी भी चिंतित हो जाते हैं और अंत में सोचता हूँ कि 'साहित्यिक' तो साहित्य के सम्बन्धी को ही कहते हैं न? सो सम्बन्ध तो कई तरह के हैं। बादनारायण एक है। आपके घर अगर बेर का फल है, मेरे घर बेर के पेड़, तो इस सम्बन्ध को पुराने पंडित 'बादनारायण' सम्बन्ध कहेंगे। साहित्य से सम्बन्ध रखने वाले जीव पाँच प्रकार के हैं-लेखक, पाठक, सम्पादक, प्रकाशक और आलोचक। सबके क्षेत्र अलग-अलग हैं। पढ़नेवाला आलोचना नहीं करता, आलोचना करने वाला पढ़ता नहीं---यही तो उचित नाता है। एक ही आदमी पढ़े भी और लिखे भी, या पढ़े भी और आलोचना भी करे या लिखे भी और इत्यादि-इत्यादि, तो साहित्य में अराजकता फैल जाय। इसीलिए जब एक लेखक दूसरे लेखक से पूछता है कि आपने मेरी अमुक रचना पढ़ी है, तब जी में आता है कि कह दूँ, “डाक्टर के पास जाओ। तुम्हारे दिमाग़ में कुछ दोष है”; पर डॉक्टर क्या करेगा? विनोद का इंजैक्शन किसी फैक्टरी ने अभी तक तैयार नहीं किया। इसीलिए, मुस्कराकर चुप लगा जाता हूँ। मेरे एक होमियोपैथ मित्र का दृढ़ मत है कि विनोद की कमी दूर करने के लिये कोई इंजैक्शन तैयार किया जा सकता है। वे इस बात का प्रयत्न भी कर रहे हैं कि किसी हँसोड़ की छाया किसी तरह अल्कोहल में घुलाकर उस पर से विनोद की दवा तैयार करें और चिकित्सा की और साहित्य की दुनिया में एक ही साथ शान्ति कर दें। पर वह अभी प्रयोगावस्था में ही हैं। तब तक मुझे भी सब सहना पड़ेगा और सहे भी जा रहा हूँ। ■

(डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी उत्कृष्ठ  समालोचक,  मौलिक निबंधकार एवं सांस्कृतिक विचारधारा के उपन्यासकार थे)


व्यंग्यः जीवन संध्या भोज

  - जवाहर चौधरी

अब क्या बतावें भाई साहब, रोने बैठते हैं, तो समझ में नहीं आता कि सुरु किससे करें । कोई एक बात हो तो सलीके और संस्कार के साथ रो लेवें इन्सान । यहाँ तो बरात लगी पड़ी है ससुरी । लोग जिस तरह औंधी खोपड़ी से नाच रहे हैं ना, वैसा तो आज तक देखा नहीं हमने । कहने को कह रहे हैं आगे बढ़ो,  दुनिया आगे बढ़ रही है, विकास हो रहा है ! फिर कहते हैं पीछे चलो बाप-दादा पुकार रहे हैं, पीछे सब अच्छा है !! अरे समझ में नहीं आता है कि आगा अच्छा है या पीछा !! जिसे देखो पगला रहा है... ना ना हम राजनीति की बात नहीं कर रहे है और न ही करेंगे । हमें क्या करना है, इस बुढ़ापे में तो सर पे जो भी खड़ा होता है, यमराज ही दीखता है । 

कुर्सी पे कोई सच्चा-साधु बैठे या लुच्चा–लबार हमें क्या । आज जिन्दा हैं, तो आपके लिए रामू  काका हैं, कल मरके फिर पैदा हुए, तो कौन जाने रहीम चाचा हो जाएँ । लोग तो कहते हैं- लाखों योनियाँ हैं, आदमी कुत्ता बिल्ली भी हो सकता है । आदमी ही बनेंगे इसकी कोई गैरंटी है क्या ! इसलिए राजनीति की बातें करके हम काहे अपना और आपका कीमती समय बरबाद करें ! ... अब देखिए,  आप इतनी गौर से बात सुन रहे हैं; तो किसलिए ! कोई डर है हमारा? या कोई कर्जा लिये हो हमसे ? ... अरे भाई इंसानियत है इसलिए दुःख बाँट रहे हो हमारा । वरना ढूँढ लीजिए यहाँ से वहाँ तक, कोई अपनी इच्छा से किसी की मन की बात सुनता है क्या? बकवास सुनने का समय ही नहीं है किसी के पास । घर में बूढ़े अपना पसेरी भर समय लिये बैठे हैं, सारा सारा दिन कोई चुटकी भर बाँटने वाला नहीं मिलता । एक जमाना था, जब मिलने वाले फूल लिये खड़े रहते थे । ... लेकिन छोड़िए पुरानी बातें । 

 ... हाँ तो हम कह रहे थे, आत्मा जो है, सूखी जाती है । बच्चों को पढ़ाए- लिखाए; इसलिए कि इनकी जिंदगी बन जाएगी । ये इन्सान बन जाएँगे, कुछ हमारी भी सदगति हो जाएगी । अब जब धरम- करम का समय आया, तो फुग्गे उड़ गए आकाश में । दो लाइन का फादर्स-डे वेक्सिन ठोंक देते हैं, सोचते हैं साल भर बाप को औलादी-बुखार नहीं चढ़ेगा । ... बताइए हम क्या करें ! ताली-थाली बजा-बजाकर बुढ़ापा-गो बुढ़ापा-गो करें !? सब हो जाएगा इससे ! पिछले महीने बिसेसर बाबू गुजरे । बच्चे विदेश में, मजबूरी बनी रही, कोई नहीं आया । हम जैसे बूढ़े कन्धों ने उठाया, महरी के लड़के ने आग दी ... पता नहीं ऊपर के लोक में किसी ने द्वार खोला या नहीं । न पूजा-पाठ, न तेरहवीं न नुक्ता-घाटा । सफल आदमी थे, लेकिन बड़े बेआबरू होके तेरे कूचे से निकले । कोई इस तरह जाता है क्या !? ये कैसी दुनिया बना ली है हम लोगों ने ! 

 देखो भाई, अगली पूरण मासी को हमारी कविता की किताब का जलसा रखा है । क्या कहते हैं लोकार्पण कार्यक्रम और ‘जीवन संध्या भोज’ भी है । भोजन प्रसादी का आयोजन है,  तो आना जरुर । ... सोच रहे होगे कि हमने कब लिखीं कविताएँ... तो ऐसा है कि कोई तो बहाना चाहिए बुलाने का । कहते कि अपना नुक्ता कर रहे हैं, तो कौन आता । कभी कुछ पन्ने काले किए थे, सो उन्हीं को छपा लिया । जरूर आइएगा, नमस्कार । ■

सम्पर्कः  BH 26 सुखलिया, भारतमाता मंदिर के पास, इंदौर- 4520 10, फोन- 940 670 1 670  


पर्यावरणः पर्यावरणवाद के 76 वर्ष

  - सुनीता नारायण

देश अपनी आज़ादी के 76वें साल का जश्न मना रहा है। इस मौके पर यह जायज़ा लेना उचित होगा कि पर्यावरण आंदोलनों ने देश की नीतियों और विकास को आकार देने में क्या भूमिका निभाई है।

पर्यावरण आंदोलन की तीन अलग-अलग राहें हैं जिन पर हम इतिहास में इनके पदचिह्न देख सकते हैं।

पहली, जिसमें पर्यावरण आंदोलन ने प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के लिए विकास रणनीति को परिभाषित करने में भूमिका निभाई है। दूसरी, जिसमें पर्यावरणीय अभियानों ने विकास परियोजनाओं का विरोध किया है और इस संघर्ष से कार्रवाई के लिए सर्वसम्मति उभरी है। तीसरी, पर्यावरणीय आंदोलन ने प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य के मामलों में नीतियों में बदलाव करने की ओर ज़ोर लगाया है।

आंदोलन की ‘प्रकृति’ जटिल है। पिछले 75 सालों में ये आंदोलन दो धाराओं में बंटकर काम करते रहे हैं - विकास के रूप में पर्यावरणवाद और संरक्षण के रूप में पर्यावरणवाद।

आंदोलन में यह विभाजन इसके जन्म के समय, 1970 के दशक में, भी नज़र आ रहा था। 1973 में, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ नामक एक कार्यक्रम शुरू किया गया था जो संरक्षण की पश्चिमी अवधारणा के अनुरूप प्रमुख प्रजातियों के संरक्षण हेतु अभयारण्यों हेतु भूमि चिह्नित करने के लिए था।

लगभग उसी समय, हिमालय के ऊँचे इलाकों में महिलाओं ने चिपको आंदोलन शुरू किया था, जिसमें उन्होंने पेड़ काटने (पेड़ों पर आरी-कुल्हाड़ी चलाने) का विरोध किया था। उनका आंदोलन संरक्षण के बारे में नहीं था; उन्हें जीवित रहने के लिए पेड़ों की आवश्यकता थी और इसलिए वे उन्हें काटने और उन्हें उगाने का अधिकार चाहते थे।

यह भेद हमारी नीतियों में भी झलकता है, जो प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और उनके संरक्षण के बीच डोलती रहती हैं। और इन सब में, समुदायों के अधिकार उपेक्षित रहे हैं।

प्रोजेक्ट टाइगर वर्ष 2004 में तब पतन के गर्त में पहुँच गया था जब राजस्थान के सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के सभी बाघ शिकारियों की बलि चढ़ गए थे। तब, टाइगर टास्क फोर्स ने सुधार के लिए एजेंडा तय किया, जिसमें अभयारण्य की सुरक्षा को मज़बूत करना और टाइगर कोर ज़ोन वाले इलाकों से गाँवों को अन्यत्र बसाना शामिल था। तब से जंगल में बाघों की संख्या स्थिर हो गई है। अलबत्ता, यह सवाल बना हुआ है कि क्या स्थानीय समुदायों को इस संरक्षण प्रयास से कोई लाभ हो रहा है?

इसी प्रकार, चिपको आंदोलन ने देश को वन संरक्षण और वनीकरण के लिए प्रेरित किया। 1980 के दशक में वन संरक्षण कानून लागू किया गया था, जिसमें यह व्यवस्था थी कि केंद्र सरकार की अनुमति के बिना वन भूमि का उपयोग अन्य कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता है।

इस कानून ने कुछ हद तक वन भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रवृत्ति को रोकने का काम किया है, लेकिन साथ ही इसने उन समुदायों को वनों से दूर कर दिया है, जो इनकी रक्षा करते थे। आज सवाल यह है कि जंगल कैसे उगाएँ, कैसे उन्हें काटें और दोबारा फिर उन्हें उगाएँ ताकि भारत काष्ठ-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सके और इस तरह बढ़ सके कि स्थानीय लोगों को इससे फायदा हो।

1980 के दशक में, नर्मदा नदी पर बाँध बनाने की परियोजना ‘विनाशकारी’ विकास का चरमबिंदु था। यह परियोजना 1983 में साइलेंट वैली पनबिजली परियोजना को रोकने के निर्णय के बाद आई थी। साइलेंट वैली परियोजना केरल के उपोष्णकटिबंधीय जंगलों की समृद्ध जैव विविधता को बचाने के लिए रोकी गई थी।

नर्मदा परियोजना के मामले में भी मुद्दे वही थे - जंगलों की क्षति और विस्थापित गाँवों का पुनर्वास। इस आंदोलन को बहुत सम्मान और निंदा दोनों मिली, लेकिन इस आंदोलन ने इस मुद्दे को बहुत अच्छे से उठाया कि नीति में और फिर सबसे  महत्त्वपूर्ण रूप से क्रियांवयन में पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

1980 के दशक की इन हाई-प्रोफाइल परियोजनाओं के कारण 1990 के दशक में पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन करने और मंज़ूरी देने के ताम-झाम की स्थापना हुई; लेकिन संतुलन बनाने का उपरोक्त कार्य अभी भी अधबीच में है।

यह 1980 के दशक के उत्तरार्ध में सूखा पड़ा था, जिसने हमारे सहयोगी और पर्यावरणविद अनिल अग्रवाल को जल प्रबंधन की मान्यताओं को फिर से देखने-समझने के लिए प्रेरित किया।

डाइंग विज़डम नामक पुस्तक में विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में पारंपरिक जल प्रबंधन की तकनीकी प्रवीणता का दस्तावेज़ीकरण किया गया है। इसने विकेन्द्रीकृत और समुदाय-आधारित जल संरक्षण के विचार को उभारा, जिसके बाद आजीविका में सुधार करने और जहाँ बारिश होती है वहीं उस पानी को भंडारित करने के लिए जल निकायों के पुनर्जनन की दिशा में नीतिगत बदलाव हुए।

दिसंबर 1984 में आई औद्योगिक आपदा भोपाल गैस कांड - जिसमें यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से गैस लीक हुई थी और मौके पर ही हज़ारों लोग मारे गए थे - के कारण औद्योगिक दुर्घटनाओं से निपटने के लिए बने कानूनों में सुधार हुआ, और कुछ हद तक कंपनियों की तैयारियों में सुधार हुआ; लेकिन हमने उन लोगों को अब तक न्याय नहीं दिया है, जो इसके चलते अब भी स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं और उनके पास आजीविका का अभाव है।

1990 के दशक में दिल्ली में स्वच्छ हवा के अधिकार के लिए लड़ाई शुरू हुई। इस लड़ाई से बेहतर ईंधन के विकल्प मिले और प्रौद्योगिकी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है - दिल्ली ने स्वच्छ संपीड़ित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) को अपनाया।

लेकिन जैसे-जैसे सड़कों पर वाहन और प्रदूषण बढ़ाने वाले ईंधन का दहन (उपयोग) बढ़ा, वैसे-वैसे वायु प्रदूषण में भारी वृद्धि हुई। अच्छी खबर यह है कि आज, प्रदूषण और स्वास्थ्य पर इसके प्रभावों के खिलाफ व्यापक अफसोस (या चिंता) है। बुरी खबर यह है कि हम परिवहन प्रणाली को बेहतर करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर रहे हैं - यानी उद्योग, बिजली या खाना पकाने में उपयोग होने वाले प्रदूषणकारी ईंधन के उपयोग को थामने के कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं।

ऐसी और भी अन्य घटनाएँ हैं जिन्हें पर्यावरण इतिहास डायरी में अवश्य दर्ज़ किया जाना चाहिए। हालांकि, भारत के पर्यावरण आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण लाभ वह आवाज़ है जो इसने देश के नागरिकों को दी है। यही आंदोलन की आत्मा है। दरअसल, पर्यावरणवाद का सरोकार तकनीकी सुधारों से नहीं है बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत करने से है। (स्रोत फीचर्स) ■

(यह लेख 16 अगस्त, 2023 को ‘डाउन टू अर्थ’ में मूलत: अंग्रेज़ी में ‘76 years of environmentalism’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।)    


12 जनवरी जयंतीः वैदिक ज्ञान से विश्व को आलोकित करते महर्षि महेश योगी

  -  रविन्द्र गिन्नौरे

"आओ..! मैं जीवन में झांकने का अवसर देता हूं, ताकि लोग शांति और खुशी के हर क्षण का आनंद ले सकें।" ऐसा आव्हान करते हुए महर्षि महेश योगी ने वैदिक ज्ञान से विश्व को आलोकित करते हुए अपने भावातीत ध्यान की विशिष्ट शैली से व्यक्ति की चेतना को निरंतर विकास की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया।

 ऐसे समय में जब शांति का सूरज पश्चिम में अस्ताचल हो रहा था। पश्चिम के लोगों में अपने जीवन के प्रति एक ऊब गहराने लगी थी और अकारण हिंसा का सैलाब उमड़ रहा था। शांति की तलाशते युवा नशे में डूब रहे थे। एक विकृत संस्कृति का बोलबाला हो उठा जो हिप्पी संस्कृति का चोला पहन शांति, सौंदर्य की आस में कर्म हीन जीवन की ओर अग्रसर हो रहे थे, जहाँ उदय हुआ महर्षि का 'भावातीत ध्यान'।

  1957 से महर्षि महेश योगी ने 150 देशों का भ्रमण कर भारतीय आध्यात्मिक तथा भावातीत ध्यान को एक आंदोलन का रूप दिया। योगी के दर्शन का मूल आधार था कि 'जीवन परम आनंद से भरपूर है और मानव का जन्म इस आनंद उठाने के लिए हुआ है। हर व्यक्ति में उर्जा, ज्ञान और सामर्थ्य अपरिमित है इसका सदुपयोग कर जीवन को सुखद बनाया जा सकता है।' विश्व को शांति और सदाचार की शिक्षा देते हुए योगी ने विश्व भ्रमण करते रहे। भावातीत ध्यान का अलख योगी ने लगाया और दुनिया भर में उनके साठ लाख से ज्यादा अनुयाई बन गए।

महर्षि का भावातीत ध्यान-  

  भावातीत ध्यान में भाव जागृत होकर भावातीत हुआ जाता है क्योंकि संसार भवसागर है। भाव को जानो तो भावातीत हुआ जा सकेगा। भाव को जानकर ही भवसागर से मुक्ति संभव है।  

   जब तक चित्त शांत नहीं होता तब तक ध्यान घटित नहीं होगा। योगनिद्रा प्राप्त करके शांत होना सीखना चाहिएं। शरीर को शिथिल कर के हर अंग को ऊर्जावान बनना चाहिए, यही महर्षि के ध्यान का ध्येय है।

 भावातीत ध्यान (Transcendental Maditation) एक मंत्र है, जो शांत मुद्रा में दोहराए गए मंत्र के ऊपर ध्यान केंद्रित कर के आंतरिक शांति और नवीनीकरण प्राप्त करने की एक आध्यात्मिक तकनीक है। 

ऐसी स्थिति तब आती है, जब मन स्थिर हो जाता है विचार से परे चले जाने में अभ्यास कर्ता सक्षम हो जाता है और तब वह परम सुख और निस्तब्धता की एक मूक अवस्था में प्रवेश करता है। महर्षि का भावतीत ध्यान ऐसी ही सुखद स्थिति में ला खड़ा करता है।

 महर्षि के 'भावातीत ध्यान' से प्रभावित होकर 1968 में ख्याति प्राप्त 'रॉक म्यूजिक ग्रुप बीटल्स' उनके आश्रम पर पहुंचा और सभी उनके अनुयाई बन बैठे। 1975 तक 'भावातीत ध्यान' पश्चिमी देशों में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया यही समय था जब पश्चिम के प्रसिद्ध अखबारों और पत्रिकाओं में महर्षि महेश योगी सुर्खियों में आए। 'ध्यान ही सारी समस्याओं का समाधान का समाधान है' और इसे महर्षि ने चरितार्थ कर दिखाया।

 फ्लाइंग योगा-

    महर्षि फिर सुर्खियों में छाए रहे जब उन्होंने अपना अनुयायियों को उड़ना सिखाने का दावा किया। फ्लाइंग योगा- अनुभवातीत ध्यान का एक हिस्सा था जिसने उनके भक्त फुदकते हुए उड़ने की कोशिश करते थे।

 फ्लाइंग योगा को महर्षि ने 'ट्रासेडेंटल मेडिटेशन सिद्धि प्रोग्राम' नाम दिया और इसे ध्यान चिकित्सा के तौर पर प्रायोजित किया।

  1990 में महर्षि हालैंड के व्लोड्राप गांव में अपना आश्रम स्थापित किया जहां से वे अपनी संस्थाओं का संचालन करने लगे। महर्षि ने अपने अनुयायियों के माध्यम से अनेक संस्था बनाई। 2008 तक योगी के 150 देशों में 500 स्कूल, 4 महर्षि विश्वविद्यालय और वैदिक संस्थान संचालित थे। संस्थाओं में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और प्राकृतिक तरीके से बनाई हर्बल दवाओं के उपयोग को बढ़ावा दिया गया। महर्षि ने भारत की आध्यात्मिक ज्ञान की प्राचीन परंपरा को दुनिया के सामने रखा। ध्यान को अभ्यास को रहस्यवाद से हटकर अभ्यास को वैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य कार्यक्रम तक बढ़ा दिया।

रामनाम मुद्रा -

 महर्षि महेश योगी ने विदेश में रामनाम की मुद्रा चलाई। रामनाम की इस मुद्रा में भगवान राम के चमकदार चित्र वाले एक,पांच और दस के नोट थे। राम मुद्रा को महेश की महर्षि की संस्था 'ग्लोबल कंट्री आफ द वर्ल्ड पीस' ने अक्टूबर 2002 में जारी किया। 

नीदरलैंड सरकार ने 2003 में रामनाम मुद्रा को कानूनी मान्यता दी। अमेरिका के आईवा राज्य के महर्षि वैदिक सिटी में भी रामनाम की मुद्रा प्रचलित थी। राम पर आधारित बांड्स भी अमरीका के कई राज्यों में प्रचलन में आए।

महाशून्य में विलीन हुए- 

 अपनी अंतिम यात्रा से पहले एकाएक 11 जनवरी 2008 को महर्षि ने घोषणा कर दी कि 'उनका काम पूरा हो गया है और गुरु के प्रति जो कर्तव्य था वह पूरा हो गया है।' ऐसा कहते हुए महर्षि अपने कमरे में सिमट गए। 91 वर्ष की अवस्था में 5 फरवरी 2008 को महर्षि महेश योगी महाशून्य में विलीन हो गए।

जीवन परिचय-

 वैदिक ज्ञान से विश्व को आलोकित करने वाले महर्षि का जन्म छत्तीसगढ़ में राजिम के समीप ग्राम पाण्डुका में 12 जनवरी 1918 को हुआ था। पाण्डुका में इनके पिता राम प्रसाद श्रीवास्तव राजस्व विभाग में कार्यरत थे। पाण्डुका से गाडरवारा में स्थानांतरण हुआ और बालक महेश की शिक्षा हितकारिणी स्कूल जबलपुर में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिक में स्नातक होकर दर्शनशास्त्र में इन्होंने स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।

जबलपुर की गनकैरिज फैक्ट्री में कार्य के दौरान स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती से इनकी भेंट हुई और यहीं से उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। महेश से योगी बन अध्यात्म की ओर अग्रसर हुए थे और फिर ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती के सानिध्य में 13 वर्ष तक शिक्षा ग्रहण की। इसी के साथ शुरू हुआ आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा देने का सिलसिला। शंकराचार्य की मौजूदगी में महर्षि महेश योगी ने रामेश्वरम में दस हजार ब्रह्मचारियों को दीक्षा दी। इसके पश्चात हिमालय की उपत्यकाओ में दो वर्ष की मौन साधना के बाद ध्यान को विश्व कल्याण के लिए उसे एक आंदोलन के रूप में चलाया जो जीवन पर्यंत चलता रहा।

    "मेरे ना होने से कुछ नुकसान नहीं होगा। मैं नहीं होकर और भी ज्यादा प्रगाढ़ हो जाऊंगा...!" महर्षि महेश योगी के ये शब्द पहले से ज्यादा आज प्रासंगिक हो गए हैं ऐसे योगी जिन्होंने भारतीय संस्कृति के संदेशवाहक, आध्यात्मिक पुरुष बन कर विश्व बंधुत्व बढ़ाते हुए संसार के महान समन्वयक होने का गौरव प्राप्त किया। ■

ravindraginnore58@gmail.com


कविताः ठोकरों की राह पर

  -  लिली मित्रा

ठोकरों की राह पर

और चलने दो मुझे

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे 

 

फ़र्क क्या पड़ता है चोट,

लगी फूल या शूल से

रो पड़ी है या नदी 

लिपट अपने कूल से

घाव सारे भूलकर 

नई चाह बुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा 

दर्द मिलने दो मुझे... 

 

खटखटाता द्वार विगत के

क्यों रहे मन हर समय

घट गया जो, घटा गया है

कालसंचित कुछ अनय

पाट नूतन खोलकर

नई राह चुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे.. 

 

कौन जाने क्या छिपा है

आगतों की ओट में?

निर्माण की अट्टालिका

फिर धूसरित विस्फोट में

अवसाद सारे घोलकर

नई आह सुनने दो मुझे 

 

पाँव छिलने दो ज़रा

दर्द मिलने दो मुझे..


कहानीः माँ री!

 - कुलबीर बड़ेसरों  (पंजाबी से अनुवाद - सुभाष नीरव)
माँ री, तुम्हें इतना उदास देखकर मैं भी उदास हो जाती हूँ। तुम्हारा चेहरा उदास, उजाड़-बियाबान जंगल-सा लगता है जिसके सारे रंग उतर गए हों, मटमैला-सा, फेडिड-सा मानो एक ही पौंछा फिरा हो पूरे मुखड़े पर, होंठों पर... और आँखें... आँखें तो मानो कहीं गहरे उतर गई हों, घनघोर परछाइयों में जहाँ कभी कोई सपना नहीं उगता, कोई उम्मीद नहीं बँधती, कोई तारा नहीं जगमगाता। कभी-कभी तुम सोच के गहरे समंदर में उतर जाती हो। तुम्हारे आस पास क्या हो रहा है, तुम्हें पता ही नहीं लगता। आवाज़ भी लगाओ तो तुम्हें सुनाई नहीं देती, पता नहीं तुम क्या सोच रही होती हो! काश, मैं जान सकती कि उस समय तुम क्या सोच रही होती हो? आख़िर क्या?  क्या तुम रुपये-पैसों के बारे में सोच रही होती हो?  यही न कि यदि तुम इस महीने और आने वाले कुछ और महीने अपने वेतन में से थोड़े-थोड़े पैसे और बचा लो तो उन्हें जोड़कर तुम घर की कोई अन्य आवश्यक चीज़ ले सकती हो। ऐसा ही करती रही हो तुम। पैसे जोड़-जोड कर पहले गैस-चूल्हा लिया, फिर सिलेंडर लिया, फिर घर के हरे रंग वाले लोहे के स्टोव और मिट्टी के तेल की कैनी से पीछा छूटा, मिट्टी के तेल-डिपो से छुटकारा मिला। फिर पैसे इकट्ठे करके तुमने गर्मियों में कूलर लिया, क्योंकि गर्मियों में मेरी पीठ पर होने वाली घमौरियों से तुम सदा ही परेशान हो जाती थीं। फिर तुमने किस्तों पर फ्रिज लिया था जिसमें से बर्फ़ के टुकड़े निकालकर हम शरबत में डालते थे और घंटों तक मैं बर्फ़ के टुकड़ों के साथ खेलती थी, खुश होती थी और मुझे खुश देखकर तुम भी खुश हो जाती थीं। तुम्हारे चेहरे पर एक तसल्ली का अजीब-सा भाव आता था और यह भाव मैं तभी देखती थी, जब तुम कभी मुझे खुश देखतीं...।
तुम मुझे बहुत प्यार करती हो न माँ! सच बताऊँ तुम्हें, मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ... तुम समझती हो, मैं तो बच्ची हूँ। नहीं माँ, मैं बच्ची नहीं हूँ, मुझे सब पता है, सब... बस, जब तुम गहरी सोच में पड़ जाती हो, तब मुझे पता नहीं लगता कि तुम उस समय क्या सोच रही होती हो?  क्या अपने बारे में, मेरे बारे में, दुनिया के बारे में या अपने अकेलेपन के बारे में?... तुम कितनी अकेली हो माँ, मैं समझती हूँ। तुम कितनी जवान हो... कितनी सुंदर हो... पढ़ी-लिखी हो... नौकरी करती हो, पर तुम्हारी किस्मत ने तुम्हें बहुत धोखा दिया। तुम एक ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखा रही थीं, शायद मेरी कुंडली बनवाने गई थीं। पता नहीं, उसे कैसे पता लग गया, वह बोला, "तुम्हारे भाग्य में पति का सुख नहीं है... तुम मंगली हो।"  तुमने तब घबराकर मेरी तरफ देखा था और उतावली में पूछा था, "मेरी बेटी की कुंडली बनाओ पंडित जी, देखना ये मंगली न हो।" बताओ भला, यह पंडित के हाथ में कहाँ है कि मुझे मंगली बनाना है या नहीं।... वापसी पर मैं घर तक सोचती आई। बल्कि रात में भी मुझे ठीक से नींद नहीं आई।
मेरी माँ के भाग्य में पति का सुख क्यों नहीं है? क्यों नहीं... जब बाकी सब स्त्रियों के भाग्य में पति का सुख है तो मेरी माँ के भाग्य में क्यों नहीं है?  क्यों नहीं? वह खुद ही क्यों पैसों के हिसाब-किताब में पड़ी रहती है, हमेशा उंगलियों की पोरों पर कुछ गिनती रहती है, उसके होंठ सदैव गिनती के साथ फड़कते रहते हैं। क्यों वह हमेशा रिक्शा के पैसे बचाती रहती है?  क्यों हमेशा सब्ज़ी वाले से मोलभाव करती रहती है?  सब्ज़ी ही क्यों, वह हर चीज़ का भाव सुनकर परेशान क्यों होती रहती है?
माँ तुम्हारी यह परेशानी देख-देख कर मुझे सब कुछ अच्छा लगना बंद हो जाता है। न मुझे आइसक्रीम अच्छी लगती है, न बर्गर, न पीजा और न ही बार्बी डोल...।
पर, एक चीज़ मुझे हमेशा आकर्षित करती है और वह है, मेरे संग पढ़ती लड़कियों के पिता... मुझे बहुत अच्छा लगता है जब लड़कियाँ अपने पिता के साथ स्कूटर के पीछे बैठकर स्कूल आती हैं, या पिता के साथ कार में। कितनी निश्चिंत लगती हैं वे लड़कियाँ जो अपने अपने पिताओं के साथ स्कूल आती हैं। लगता है, उन्हें कोई फिक्र नहीं, कोई परेशानी नहीं, मानो दुनिया की कोई भी प्रॉब्लम उनके चेहरे की निश्चिंतता को डिगा नहीं सकती। एक अजीब किस्म का अहंकार-सा, या कह लो अभिमान-सा छलकता है इन लड़कियों के चेहरों पर... स्कूटर या कार से उतरतीं वे ठीक तरह मुड़कर अपने पिता की ओर देखती भी नहीं। बस, आधा-अधूरा सा देखकर 'बाय' कहकर तेज़ी के साथ स्कूल के गेट से अंदर की तरफ दौड़ जाती हैं।... मैं होती तो जी भरकर अपने पिता को देखती, खड़े होकर ठीक तरह से उसको 'बाय' कहती। सच, यदि मेरा पिता होता... मैं क्या कहकर बुलाती उसको? 'पापा' या 'डैडी' या सिर्फ़ 'डैड' या 'पिताजी'। नहीं-नहीं, पिताजी नहीं, यह तो पुराना फैशन है... अब कौन बुलाता है पिताजी?  यदि मैं 'पिताजी' बुलाती तो मेरी सब सहेलियाँ मुझ पर हँसतीं, मुझे 'ओल्ड फैशन्ड'  कहतीं... मैं तो 'पापा' कहकर बुलाती, सिर्फ़ 'पापा'। कभी-कभी लाड़ में 'पापा जी' कहती या केवल 'पा'... मैं मन ही मन हँस पड़ती हूँ। फिर मेरे पापा भी मुझे स्कूल छोड़ने आते। कम से कम 'ओपन डे' वाले दिन तो आते ही, मेरी परसेंटेज चैक करते... मेरी स्कूल की प्रॉब्लम्ज़ सुनते... फिर मेरी टीचर के साथ मेरी पढ़ाई और प्रॉब्लम्ज़ डिस्कस करते। मेरे अंदर एक अलग ही तरह का आत्मविश्वास होता - सेल्फ कॉन्फीडेंस! अब जैसे तुम बुझी-बुझी रहती हो, झट छोटी-सी बात पर ही रो पड़ती हो, उदास हो जाती हो, हर किसी से डर जाती हो, सब सवालों से बचती घूमती हो, सुंदर-सा फैशनेबल सूट पहनने से भी झिझकती रहती हो... ये सब न होता। जब कोई हसबेंड-वाइफ़ स्कूटर या मोटर साइकिल पर चिपक कर बैठे जा रहा होता, तो तुम उन्हें मुड़ मुड़कर न देखतीं, बल्कि तुम भी गाढ़े रंग की लिपिस्टिक लगाकर अपने पति के जिस्म को अपनी एक बांह से घेर कर स्कूटर पर चिपककर बैठतीं - निश्चिंत, निडर, खुश... फिर जब मैं पापा के साथ बैठती तो मैं भी पापा से चिपट कर स्कूटर पर बैठती, पापा को कसकर पकड़ लेती तो फिर कोई डर न रहता।
मैं तो अपने पापा से कभी मिली भी नहीं हूँ। कैसे लगते थे मेरे पापा?  मुझे तो कुछ पता ही नहीं। बस, इतना पता है, जब मैं तुम्हारे पेट में थी, तुम अपनी और मेरी जान बचाकर अपनी ससुराल से भाग आई थीं।
तुम्हारा पति और ससुराल वाले तुम्हें बहुत तंग करते थे। तुम्हारा दब्बू स्वभाव था, वे इसका और भी फायदा उठाकर तुम्हे कौंचते थे, तुम्हें अपमानित करते थे और कहते थे, "तू हमारा कुछ संवार...।" माँ री, जब तुम रो-रोकर ये बातें अपनी सहेलियों को बताती थीं, और जब मेरी इंग्लैंड वाली मौसी आई थी, तुम उसको भी बताती थीं। बताती कम थीं, रोती अधिक थीं। मुझे सब पता लग गया था माँ... तुम समझती थीं, मैं छोटी हूँ, मुझे कुछ पता नहीं लगेगा, पर मैं सब सुनती थी बड़े ध्यान से... मुझे सब पता लग गया था कि मेरे ददिहाल वाले बहुत लालची थे, बेकद्रे थे और मेरे पापा ने तुम्हारा साथ तो क्या देना था, तुम्हें तलाक ही दे दिया था।
और तुमने कचहरियों के चक्करों से डरकर उन कागज़ों पर दस्तख़त कर दिए थे जो पापा ने भेजे थे... असल में, तुम बहुत डरपोक हो माँ, बहुत दब्बू... तुम निडर होतीं तो यह सब न होता... अब भी कौन-सा निडरता के साथ जीती हो तुम?  हर समय भयभीत-सी रहती हो। मौसी-मौसा और उनके बच्चे आते हैं तो तुम्हारी जीभ तालू से लगी रहती है। बातें करते समय तुम्हारी जुबान काँपने लगती है, भाग-भागकर तुम काम करती हो, दबी-दबी तुम हर समय मुझे समझाइशें देती रहती हो - कैसे उठना है, कैसे बैठना है, कैसे बात करनी है, कैसे सब कुछ ठीकठाक गुज़र जाना चाहिए, यानी मौसी के बच्चों का यह टूअर...। मौसी के बच्चे कितने बदतमीज़ हैं, कितने मुँहफट हैं। कोई दाल-सब्ज़ी उन्हें पसंद नहीं आती। ऐसा लगता है जैसे इंडिया में पड़ती गरमी की भी माँ तुम ही जिम्मेदार हो... तुम कैसे गिल्टी फील करती हो। तुम्हें और मुझे कुछेक कपड़े और सस्ते-से स्लीपर गिफ्ट में देकर वे लोग हम पर खूब रौब झाड़ते हैं। वही क्यों?...सब रिश्तेदार हमें तुच्छ समझते हैं, क्योंकि हम दुत्कारे हुए, नकारे हुए लोग हैं न!  कोई रिश्तेदार हमारी बात नहीं पूछता। मेरे तीन मामा और तीन मौसियाँ कैनेडा और एक मौसी, एक मामा इंग्लैंड में सैटिल हैं। कोई नहीं सोचता कि उनकी एक बहन इंडिया में अकेली रोज़ी-रोटी कमाकर अपनी बच्ची को खुद पाल रही है। कोई नहीं पूछता कि तुम्हें क्या चाहिए? तुम कैसे हो? गुज़ारा ठीक से हो भी रहा है कि नहीं? वैसे, पूछने की ज़रूरत भी क्या है? क्या दिखाई नहीं देता? यह तो खुद ही सोचने-समझने वाली बात है न! फिर, कितने अवसर होते हैं जब मदद की जा सकती है। जैसे दिन-त्योहार, दीवाली, लोहड़ी, रक्षा-बंधन और जन्मदिन। मगर फोन पर बातें करने के सिवाय कोई कुछ नहीं करता। या फिर इधर-उधर के फालतू काम बताते रहेंगे। इंडिया का यह काम है, वह काम है। माँ री, तुम कैसे दौड़-दौड़ कर उनके काम करती घूमती हो।... कभी इनके लिए इंडिया से रिश्ते खोजती थीं, कभी उनके लड़कों के विवाह करती फिरती थीं, जान तोड़कर काम करती हुई तुम बिछ-बिछ जाती थीं... तुम ऐसी क्यों हो माँ? तुम सबका सोचती हो, तुम्हारे बारे में कौन सोचता है माँ?  तुम्हें तो एक पैसे की भी मदद नहीं किसी भी तरफ से...।
मैं कई बार सोचती हूँ, जब मैं बड़ी हो जाऊँगी... यदि मैं कुछ बन गई, 'कुछ' से मतलब यदि मैं कोई सेलिब्रेटी बन गई या आम साधारण एक एम.बी.बी.एस. डॉक्टर या एक अफ़सर ही बन गई, या फिर मान लो एक टीचर ही बन गई तो क्या करूँगी?... किसका नाम लूँगी कि मेरा कॅरियर, मेरी पढ़ाई, मुझे पालने-पोसने में किसका हाथ है? तुम्हारा नाम लेने के सिवा मेरे पास कोई दूसरा नाम नहीं होगा माँ! किसी का भी नहीं... तुम्हारे सिवाय कौन पूछता है मुझे कि 'बता बच्ची, क्या चाहिए तुझे?' या 'क्या बनना चाहती हो?' किसी की मदद तो क्या, हल्लाशेरी भी नहीं है... बस, सभी रिश्तेदारों को अपनी शेखियाँ बघारने से ही फुरसत नहीं... मेरा छोटा मौसा तो तुम्हें प्रवचन ही सुनाता रहता है फोन पर। इंडिया आता है तो डेरे वाले बाबा को एक लाख का चढ़ावा चढ़ाकर जाता है। तुम्हारी एक सहेली है ऊषा, बड़ी मुँहफट और समझदार है, सुनते ही वह बोली थी, "इससे तो अच्छा था] वह तेरी बेटी के नाम पर एफ.डी. ही करवा जाता तो ज्यादा पुण्य लगता।"
यह वही मौसा है जिसकी खोज तुमने छोटी बहन के लिए की थी। जिसे शगुनों के साथ कैनेडा भेजा था। जहाँ जाकर वह इस योग्य बन सका कि इधर के डेरो पर लाखों का चढ़ावा चढ़ा सके।... वही मौसा अब पंजाब से वापस कैनेडा पहुँचता है तो तुम्हारी बहन को उलाहने देता है कि तेरी बहन ने मुझे ज्यादा फोन नहीं किए।
मौसा ही क्यों?  तुमने तो दो भाभियों और बड़ी बहन के लड़के के लिए बहुएँ भी इंडिया से खोजकर कैनेडा पहुँचाईं... तुम्हारी क्या कद्र हुई माँ? तुम्हारी तो आधी ज़िन्दगी उंगलियों पर हिसाब-किताब लगाते ही बीत गई।
सभी रिश्तेदार हमें अपने बारे में शेखियाँ बघार कर बताते हैं। कोई कहता है – 'मैंने चार बेडरूम वाला घर लिया है जिसमें एक लिविंग रूम और एक ड्राइंगरूम है और दो बेसमेंट हैं।' दूसरा भी बताता है, 'मैंने पुराना घर बेचकर एक बड़ा नया घर ले लिया है।' इसी तरह तीसरा और चौथा भी, यानी हर रिश्तेदार ने बड़े-बड़े घर ले लिए हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ ले ली हैं। उनकी विदेशों से आई चिट्ठियाँ पढ़-पढ़कर मैंने जब से होश संभाला है, देखती आई हूँ कि तुम्हारे चेहरे पर अजीब-सी स्याही फिर जाती थी। तुम उदास-सी अपने किराये के मकान की ओर देखती थीं। सर्दियों की सर्द सुबहों और ठिठुरती शामों को तुम्हें किराये वाले मकान के गुसलखाने में काँपते-ठिठुरते कपड़े धोती देखती थी। "माँ, तेरे हाथ थन्दे हो गए…"  मैं तुतलाती जु़बान में तेरे हाथ अपने छोटे-छोटे हाथों में पकड़कर कहती थी। जवाब में तुम कहती थीं, "कोई बात नहीं बेटा, अगले साल तक मैं वॉशिंग मशीन ले लूँगी।" और फिर तुम होंठों ही होंठों में कुछ गिनती करती थीं... तुम्हारे लरजते होंठ... शायद फिर उसी हिसाब-किताब में...।
स्कूल से छुट्टी के बाद स्कूल की बस सीधा मुझे क्रेश में छोड़ देती, शाम तक मैं वहीं रहती। ऊबी-ऊबी, परेशान-सी। कभी मैं सो जाती, कभी उठकर बाहर बॉल्कनी की मुंडेर के पास खड़ी हो जाती, तेरा इंतज़ार करती। तुम हाँफती हुई एक हाथ में पर्स और दूसरे हाथ में छोटा-मोटा सामान और सब्ज़ी वाला थैला उठाए तेज़ कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ती मुझे दिखाई देतीं तो मैं दौड़कर तेरे पास पहुँच जाती। तुम मेरा स्कूल बैग और क्रेश का बैग संभालती हुई मुझे लेकर बाहर सड़क पर हाँफती हुई चलती रहतीं। मैं तुम्हारे साथ-साथ तुम्हें देखते हुए चलती रहती। 
छुट्टी के दिन मेरा बहुत मन करता कि मैं तुम्हारे और अपने पापा के साथ कहीं घूमने जाऊँ जैसे पॉर्क में, सिनेमा देखने, सर्कस देखने या किसी पार्टी में, पर ऐसा कैसे हो सकता था? तुम तो अकेली थीं, तुम सदैव छुट्टी वाले दिन घर के काम निपटाकर मुझे पढ़ाने बैठ जाती थीं। पर कभी-कभी मैं देखती थी, शाम को तुम भी उदास-सी हो जाती थीं। खिड़की में खड़ी होकर तुम यूँ ही सड़क की ओर देखती रहती थीं, शायद तुम्हारा मन भी करता होगा, घूमने-फिरने को, शॉपिंग करने को, किसी का हाथ पकड़कर सैर करने को, किसी पार्टी में जाकर धमाल मचाने को... है न माँ? तुम्हारा मन अवश्य करता होगा, किसी को अपने सारे दर्द, सारे दुख बताने को। किसी अन्य को अपनी जिम्मेदारियाँ देकर, सुर्खुरू होकर जीने को, चाहे वे जिम्मेदारियाँ बिल चुकाने की हों, घर का किराया देने की हों, घर की किचन से लेकर मेरे स्कूल और क्रेश की फीसें भरने की हों, खुलकर जीने की हों, हर प्रकार की खुशहाली लेने की हों। हर जिम्मेदारी को दूसरे के कंधों पर डालने की या कम से कम बाँट लेने की हो... ज़रूर तुम्हारा भी मन करता होगा न माँ... है न माँ?
मगर मैं कभी तुमसे पूछती नहीं हूँ। कैसे पूछ सकती हूँ? और फिर पूछने-बताने की आवश्यकता भी क्या है? क्या मैं महसूस नहीं करती? मैं सब जानती हूँ माँ! तुम अकेली हो, मैं तुम्हारे अकेलेपन को अनुभव करती हूँ, मैंने तुम्हें किसी महफ़िल में, किसी विवाह या किसी जन्मदिन या मैरिज ऐनीवर्सिरी की पार्टियों में झिझक-झिझकर जाते देखा है, वहाँ जाकर एक कोने में सहमी-दुबकी बैठे देखा है।
आजकल तुम्हारा फिर वही हाल है। वही चिंताओं में घिरा चेहरा, वही उंगलियों की पोरों पर कुछ गिनती... लगता, तुम किसी तैयारी में हो। मैं हैरान थी, कहाँ की तैयारी हो रही है? पूछने पर पता चला कि मेरा सबसे बड़ा मामा अपने बेटे को ब्याहने भारत आ रहा है। विवाह पर और भी बहुत सारे रिश्तेदार पहुँच रहे हैं, जैसे मेरे मामा-मामियाँ, मौसा और सबके बच्चे... मेरे नाना-नानी तो बेचारे इस दुनिया में नहीं थे। शेष पूरा अमीर ननिहाल परिवार ननिहालवाले गाँव में पहुँच रहा था और माँ तुम भी विवाह से कुछ दिन पहले ही अपने आफिस से छुट्टियाँ लेकर और मुझे संग लेकर गाँव में पहुँचोगी, यही प्रोग्राम था तुम्हारा। और तुम मुझे बार बार समझातीं, मैनर्स सिखातीं, दबी-दबी सी, सिकुड़ी-सी, लेकिन ऊपरी तौर पर खूब कान्फीडेंस दर्शाती हुई, खुश-खुश ननिहाल वाले गाँव पहुँची थीं। हमारे रिश्तेदारों की शान देखने वाली थी। अलग-अलग कमरों में अलग-अलग परिवारों ने डेरे जमा रखे थे। हर कमरे में अधखुले बड़े-बड़े अटैची, उनके अंदर से झाँकते नए-नए, सुंदर-सुंदर कपड़े, अल्मारियों में बड़ी-बड़ी हर तरह की बोतलें, चाहे वे स्कॉच की हों, शैम्पू की हों या परफ्यूमों कीं, बस खुशबुएँ ही खुशबुएँ... और सबके चेहरों पर अजीब-सी लालियाँ, चाहे वह पैसे की हों, बेफिक्री की हों या फ़ॉर्नर्स होने के घमंड की हों... पर थीं ज़रूर!
हर रोज़ पार्टी हो रही थी, कभी ‘माइये’ की पार्टी, कभी संगीत की पार्टी, कभी सलामियाँ पड़ रही थीं, भंगड़े पड़ते थे, डैक बजते थे। मेरे मौसाओं की जेबों में से बटुए उछल-उछल पड़ते थे, नोटों से भरे बटुए। और जिस दिन बारात चढ़ी, नज़ारा देखने वाला था। हर तरफ गुलाबी पगड़ियाँ ही पगड़ियाँ! सुंदर-सुंदर कोट-पैंट, टाइयाँ, कलाइयों पर सुनहरी घड़ियाँ और दाएँ हाथ की कलाइयों में सोने के कड़े पहने पुरुष और सिल्क की सुनहरी कढ़ाई वाले सूटों में गहनों से लदी स्त्रियाँ... चाहे वे मेरी मौसियाँ हों या मामियाँ... और मैं... मैं उन रौनकों, रंगों और संगीत की तेज़ धुनों के बीच तुम्हें ढूँढ़ रही थी, और तुम खोई हुई-सी, भाग-भागकर काम करती हुई, हर मज़ाक, हर मखौल के आगे यूँ ही हँसती हुई, सारे विवाह को सिर पर उठाये घूम रही थीं। पता नहीं, तुम पर तरस क्यों आ रहा था। 
'आनंद-कारज' हो रहा था। कितने सुंदर बोल गूँज रहे थे गुरद्वारे के ग्रंथी के। फेरे हो रहे थे। तुम्हारा विवाह भी ऐसे ही हुआ होगा न माँ?... हाँ, ऐसा ही हुआ था, तुम बता रही थीं एक बार किसी को कि तुम्हारी अरेंज मैरिज हुई थी। मैं तुम्हारे मुँह की तरफ देखती हूँ, तुम्हारी आँखों में क्या है? क्या?... आँसू या खालीपन? दम तोड़ती ख्वाहिशें या सिसक रही इच्छाएँ?...
'आनंद-कारज' संपन्न हो गया। अब सब जोड़े उठ उठकर दूल्हा और दुल्हन के गले में हार डालने लगे थे, शगुन उनकी झोलियों में डालकर तस्वीरें खिंचवाते थे। तुम बार-बार अपने होंठों पर जीभ फेर कर खुद को तैयार कर रही थीं। तुम्हारे हाथों में भी दो हार थे। शगुन झोली में डालने के लिए हाथ में पैसे पकड़े हुए थे। जब सब लोग हार और शगुन डाल चुके तो तुम भी मेरा हाथ पकड़ कर उठी थीं। हम दोनों ने दूल्हा-दुल्हन को हार डाले, शगुन डाला और फोटो खिंचवाई। फिर तुम मेरा हाथ पकड़कर वापस अपनी जगह पर आ बैठी थीं। तुम्हारा हाथ अपने हाथ के ऊपर मैंने काँपता हुआ देखा था।
'आनंद-कारज' के बाद भोजन के लिए मैरिज-हॉल की ओर बढ़ती बारात में भंगड़े की धमालें पड़ने लगीं। सब जोड़े एक-दूजे के हाथ पकड़ कर, आँखों में आँखें डाल कर नाच रहे थे... बैंड-बाजे के शोर में नोटों की बारिश हो रही थी। तुम भी मुस्कराती हुई ताली बजा रही थीं। शराबी हुए मेरे छोटे मौसा ने कई बार तुम्हें बांह से पकड़ कर भंगड़े में खींचना चाहा, पर तुम तो लगता था, धरती में समाती जा रही थीं। कितनी गरीब! कितनी अशक्त!
भंगड़े के बीच कोई बच्चा रोने लगता तो उसका पिता उसको एक हाथ में उठाकर चुटकी बजा बजाकर नाचने लगता। मेरे साथ तो ऐसा कभी नहीं हुआ था कि मेरे पापा पार्टी में नाच रहे हों और मै किसी बात पर रोने लगी होऊँ तो मेरे पापा मुझे एक बांह पर बिठाकर दूसरे हाथ से चुटकियाँ बजा बजाकर नाचे हों और मेरी माँ बेफिक्र होकर किसी दूसरे कोने में नाच रही हो। बेझिझक, कान्फीडेंट! हौसला उसके चेहरे से टपक-टपक पड़ता हो, पति के होने का हौसला, पति के पास रुपये-पैसे होने का हौसला, बैंक के लॉकर में गहने होने का हौसला, पति की ओर से मिला पुश्तैनी मकान और ज़मीन होने का हौसला... बस, कोई साथ है, यही हौसला... और उसी हौसले में दायीं बांह उठा उठाकर नाचती हुई, लाल-सुर्ख होती मेरी माँ...।
दिनभर हंगामा होता रहा। रस्में होती रहीं। विवाह होता रहा। शाम को बारात वापस अपने ठिकाने पर पहुँच गई। अब सब हॉल में रिलैक्स होकर बैठ गए थे, हाथों में गिलास और हँसी-ठहाके।
"तू कितने साल की हो गई अब?"  मेरी मौसी ने लापरवाही के साथ मुझसे पूछा और साथ ही, फर्श पर बिछाए सफ़ेद गद्दे पर टेढ़ा-सा होकर लेट गई।
"तेरह साल की...," मैंने जवाब दिया। पर माँ, मैंने देखा जैसे तुम हीनभावना से ग्रस्त हो गई थीं। पता नहीं क्यों तुम्हारे चेहरे पर बेचारगी-सी फैल गई थी।
"लो, और दो-चार साल तक हुई ब्याहने लायक।" मेरी दूसरी मौसी ने तुर्रा छोड़ा।

"अरे, इसका विवाह तो मैं करूँगा अपने हाथों..." मेरे बड़े मौसा ने छाती फुलाकर कहा।
"इसका रिश्ता तो हम ले जाएँगे कैनेडा..." मेरी मौसी ने इंग्लैंड वाले मौसा पर कैनेडा का रौब डाला।
"ले, कैनेडा में क्या है? दूर दूर तक कोई बंदा नहीं दिखाई देता, जैसे उजाड़ हो। बात करो हमारे इंग्लैंड की, जहाँ रौनकें ही रौनकें हैं।" मेरी इंग्लैंड वाली मौसी ने चटखारा लगाया।
"पर अपने से पहले मुझे अपनी माँ का विवाह करना है, उसका अकेलापन दूर करना है। वह भी इंसान है और ज़िन्दगी की हर खुशी, हर सुख पर उसका भी हक़ है। उसके बारे में कोई नहीं सोचता, कोई नहीं देखता। उसका भी हक़ है, सिर उठा कर जीने का...।"
 खनकते गिलास रुक गए थे, सबके मुँह बंद हो गए थे। इतना सन्नाटा... इतनी चुप!  सिर्फ़ मेरी अकेली की आवाज़ गूँज रही थी। अचानक मैंने तुम्हारी तरफ देखा था... मुझे लगा, तुम्हारा सिर तो मैंने अभी ऊँचा कर दिया है, माँ री!... ■