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Nov 2, 2025

लघुकथाः गुब्बारा

 - श्यामसुन्दर 'दीप्ति'

गली में गुब्बारेवाला रोज गुजरता। वह बाहर खड़े बच्चे को गुब्बारा पकड़ा देता और बच्चा माँ-बाप को दिखाता। फिर बच्चा खुद ही पैसे दे जाता था । इसी तरह एक दिन मेरी बेटी से हुआ। मैं उठकर बाहर गया और गुब्बारे का एक रुपया दे आया। दूसरे दिन फिर बेटी ने वैसा ही किया। मैंने कहा, "बेटे, क्या करना है गुब्बारा? रहने दो न!" पर कहाँ मानती थी, रुपया ले ही गई। तीसरे दिन जब रुपया दिया तो लगा कि भई रोज-रोज तो यह काम ठीक नहीं। एक रुपया रोज महज दस मिनट के लिए। अभी फट जाएगा।

मैंने आराम से बैठकर बेटी को समझाया,"बेटे! गुब्बारा कोई खाने की चीज है? नहीं न! एक मिनट में ही फट जाता है। गुब्बारा अच्छा नहीं होता। अच्छे बच्चे गुब्बारा नहीं लेते। हम बाजार से कोई अच्छी चीज लेकर आएँगे।"

वह सिर हिलाती रही।

अगले दिन जब गुब्बारेवाले की आवाज गली में आई, तो बेटी बाहर न निकली और मेरी तरफ देखकर कहने लगी, "गुब्बारा अच्छा नहीं होता न। भैया रोज ही आ जाता है। मैं उसे कह आऊँ कि वह चला जाए।"

"वह आप ही चला जाएगा।" मैंने कहा। वह बैठ गई।

उससे अगले दिन गुब्बारेवाले की आवाज सुनकर वह बाहर जाने लगी, तो मुझे देख कहा, "मैं गुब्बारा नहीं लूँगी" और जब वह वापस आई, तो फिर कहा, "अच्छे बच्चे गुब्बारे नहीं लेते न? राजू तो अच्छा बच्चा नहीं है। गुब्बारा तो एक मिनट में फट जाता है।" और कहती हुई मम्मी के पास रसोई में चली गई और मम्मी से कहने लगी, "मम्मी जी, मुझे गुब्बारा ले दो न!"

May 1, 2022

लघुकथाः चैराहे पर

- डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति

वह अपने घर से निकला। सड़क पर पहुंच रुक गया। फैसला करना था किधर जाए। दाएँ या बाएँ। सड़क में डिवाइडर पड़ा नहीं था। दाई तरफ जाने वालों की तादाद अधिक थी और रफ्तार भी तेज़। जैसे कोई विशेष प्राप्ति हो रही हो। बाई तरफ लोग चाहे कम थे, परन्तु सहज व अपनी गति से जा रहे थे।

उसे ख्याल आया कि भीड़ को दूर से देखा जा सकता है, उसका हिस्सा नहीं बना जा सकता। वह अपने स्वभाव मुताबिक सहजता का पक्षधर था और उसी तरफ चल दिया।

चलते -चलते, वह एक चैराहे पर आ पहुँचा।

चौराहे को देख वह असमंजस में पड़ गया। सवाल उठा, अब किधर? वह सोच ही रहा था कि उसे चौराहे के बीचों- बीच एक व्यक्ति नज़र आया। लोग उसके पास जाकर कुछ पूछते और फिर अपने-अपने  रास्ते पर चल देते। वह वहीं रुका, सात दिन इस दृश्य को निहारता रहा।

अँधेरा होते ही, वह व्यक्ति वहाँ से चला गया। पता नहीं थक गया या छुप गया। लोगों की संख्या भी कम होने लगी।

वह वहीं बैठ गया। एक राहगीर उसके पास आया और किसी रास्ते के बारे में पूछा। उसने सहजता से कहा, ‘‘मैं तो खुद तुम्हारी ही तरफ हूँ, भटका हुआ।’’

दोनों रात भर बतियाते रहे। सुबह होते ही चौराहे में वह व्यक्ति फिर से नज़र आया।

राहगीर ने उसे कहा, ‘‘धन्यवाद आप का, जो तुमने मुझे इस डरावनी अँधेरी रात गुजारने में मदद की।’’

उसने कहा, ‘‘अरे नहीं भाई, तुम्हारा धन्यवाद, जो तुमने मुझे अँधेरे की भयावहता से अवगत करवाया।’’

उस राहगीर ने चौराहे वाले व्यक्ति से बात की और अपने रास्ते पर पड़ गया।

वह सोचता रहा और दिनचर्या को निहारता रहा। शाम ढलने पर, वह चौराहे के बीच पहुँचा और कहने लगा, ‘‘ये चारों रास्ते किस- किस तरफ जाते हैं?’’

चौराहे के व्यक्ति ने पूछा, ‘‘आप को किस तरफ जाना है?’’

उसने कहा, ‘‘कहीं नहीं।’’

व्यक्ति बोला, ‘‘तो फिर जिज्ञासा क्यों?’’

उसने कहा, ‘‘रात ढलने को हो, तुम चले जाओगे, अँधरे में भटकने वाले राहगीरों को मैं रास्ता बताऊँगा।’’

Jul 4, 2020

बोल, कुछ तो बोल

बोलकुछ तो बोल 
- डॉ.श्याम सुन्दर दीप्ति
हाथो में कुछ -
पकड़ने की ताक़त है ना
फिर ख़ाली क्यों हैं ?
पकड़, कुछ भी पकड़
पैन, पत्थर, कॉलर, मशाल ।

मुँह में ज़ुबान है ना
शब्द हैं
बोलने का गुण है
बोल, कुछ तो बोल
चीख़।

पैरों में ताक़त है ना
चल, चाहे चार क़दम ही ।

दर्द महसूस कर रहा है ना
तेरे चेहरे से साफ़ दिखता है।

जुर्म की मार से परेशान है ना,
फिर भी बेहरकत है?

कीड़े से भी गया गुज़रा है
देखा है कभी उन्हें?
ताका है कभी परिन्दों को?
फड़फड़ाते हुए
जीवन के लिए

चल,
बोल,
पकड़ हाथों में,
इतना कुछ है तेरे पास।
मानव होने के गौरव का
अपमान न कर।

अमृतसर
9815808506

Jan 27, 2018

नएपन का संकल्प

नएपन का संकल्प
- डॉ.श्याम सुन्दर दीप्ति
धामिर्क कर्मकाण्डों के प्रति शुरू से ही सवाल उठाता रहा हूँ। वह चाहे व्रत की बात थी या जन्म, ब्याह, मौत को लेकर उनसे जुड़ी रस्मों की बात। इसी सिलिसले में यही याद आता है कोई काम शुरू करने से पहले मुहूर्त निकलवाना।
जब धीरे-धीरे, पड़ाव दर पड़ाव, शरीर विज्ञान के कार्यों से गुजरते हुए, विवेक से सोचने की आदत पड़ी तो मनुष्य के स्वभाव व मुहूर्त को जोड़ा, तो एक सार्थकता समझ में आई। देखा जाता है कि प्रायः किसी काम के बारे में नर्णय ले लें तो फिर कार्य की योजना शुरू हो जाती है। किसी के पूछने पर जवाब होता है- लगे हुए हैं। फिर सवाल होता है– तो कब आरम्भ करोगे- तो जवाब रहता है –जल्दी ही। पर जब महूर्त निकलवाया है, तो फिर एक निशाना, एक लक्ष्य तय हो जाता है, कि यह कार्य करना ही करना है। कर ही देना है का अपना ही महत्व होता है । यह है महूर्त की सार्थकता, जो मैंने जाना। तारीख तय कर देना, न कि अन्य जुड़े पहलू- जैसे शुभ घड़ी व कर्म कांड। यह बात अलग है कि कोई अपने पक्के इरादे से, दृढ़ मन से तय कर ले कि फलां दिन, करना ही करना है। यह मौका कसी विशिष्ट-विशेष व्यक्ति का जन्म दिन हो सकता है, किसी परिवार के सदस्य से जुड़ा हुआ भी।
नया वर्ष शुरू हो गया है। यह साल दर साल आता है, कईयों का मत हो सकता है कि इसमें नया क्या है? कुछ भी तो नहीं बदलता, सिवाए इस तारीख बदलने के। जो लोग इसका चाव से इन्तजार करते हैं व धूमधाम से मनाते हैं, उनकी जिंदगी में भी कोई बदलाव नज़र नहीं आता। अधिकतर के लिए यह एक मस्ती का बहाना रहता है। मिलकर जश्न मनाना, बस। और अब तो होटल- कल्चर ने इसे बाज़ार से जोड़ दिया है।
नये वर्ष के आने सी प्रतीक्षा 365 दिन करनी पड़ती है। नया महीना, नया सप्ताह, नया दिन भी तो अपने आप में कुछ कहते समझते हैं। नये शब्द में ताजगी का अहसास भी छुपा हुआ है। नये वस्त्र, नया बैग। नयेपन से एक चाव भी जुड़ा है। नई कक्षा में दाखिल होना। एक पादान, एक पाँव और आगे बढ़ जाने की खुशी। नयापन ऐसे भी नज़र आता है या दिखाया जा सकता है।
उस नयेपन को इस परिपेक्ष्य में जानने-समझने की जरूरत है। हर रात सोने से पहले अगर हम दिन के कामों का विश्लेषण करें तो अगले दिन के सूरज की किरणों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। पिछले कार्य के विश्लेषण पर किया गया नयेपन का निर्माण ही सार्थक होता है।
अब जब हम 2018 की तरफ बढ़ते हुए, 2017 की घटनाओं पर नज़र डालते हैं तो यह अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, राजकीय संदर्भ में सोचने को मजबूर करती है। वास्तव में हमें इस तरह ही सोचने की शिक्षा दी गई है कि इन घटनाओं से आपको क्या लेना-देना। कौन जीता, कौन हारा, क्या नई नीतियाँ लाई गईँ। आप अपने में मस्त रहिये। पर क्या यह सब हमसे जुड़ी नहीं होती? क्या यह हमें प्रभावित नहीं करती? क्या हमें सचमुच ही इनके बारे में नहीं सोचना चाहिए?
वास्तव में सोचना भी एक आदत है, एक प्रक्रिया है जो निरन्तरता चाहती है। घटनाएँ व समस्याएँ सिर्फ राष्ट्रीय- राजकीय ही नहीं होती, गाँव, कस्बे मोहल्ले से लेकर घर के अन्दर भी होती हैं। प्रश्न यह है कि सोचने से अतीत में से कुछ ढूँढना है या जो गया सो गयाके स्वर पर जिंदगी को गतिशील करके रखता है। विश्लेषणकारी स्वर ही बढ़िया जिन्दगी के लिए गाए जाने वाले गीतों को गाता- गुनगुनाता है। जहाँ कहीं भी हम बढ़िया जिन्दगी की झलक देखते हैं, वह अतीत की जाँच-परख, गलतियों को ढूँढने और फिर उनमें सुधार लाने की बुद्धिमता का ही परिणाम है।
समझना और सुधारना बड़े संकल्प लग सकते हैं। हैं भी। पर इन्हें व्यक्तिगत जिन्दगी या अपने आस-पास के परिपेक्ष्य में गाँव, वार्ड से शुरु कर सकते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं संगठित ढंग से किया गया कार्य अधिक फल देता है, पर शुरूआत तो व्यक्तिगत ही रहेगा। उदाहरण के लिए अगर आपका वातावरण परेशान करता है, पूरे गाँव या मोहल्ले में पेड़ लगाने का सामूहिक कार्य कठिन लगता है, तो कम से कम एक पेड़ अपने घर के बाहर या भीतर आँगन में तो लगाया ही जा सकता है। अगर घर या बाहर जगह नहीं है तो एक छोटा सा पौधा गमले में लगा कर ही शुरुआत की जा सकती है।
नयेपन में बहुत कुछ है। एक ताजगी भरे हवा के झोंके सी, जो जीने का बहाना प्रकृति ने सृजित किया है, नये वर्ष के रूप में। छोटे-छोटे नन्हें- नन्हें संकल्प इस दुनिया को खूबसूरत बनाने में, अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लक्ष्य से इसकी शरुआत हो।
सम्पर्कः 97- गुरूनानक ऐवेन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर, email- drdeeptiss@gmail.com

Jul 25, 2017

सावन की महक

 सावन की महक 
- डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति

सावन के महीने की पहली घटा थी। एकदम अँधेरा हो गया। कमरे की रोशनी कम लगने लगी और साथ ही लाइट चली गई।
कूलर -पंखे की बात तो नहीं थी पर अँधेरा, जैसे रात हो गई हो। काम तो क्या होना था, उमस होने लगी। खिड़कियाँ जो बंद थी।
सभी कर्मचारी बाहर आने लगे, बरामदों में।
राजकुमार ने अपने सामने पड़ी काम वाली फाइल पर एक निशानी रखकर बंद कर दिया। वह सोचने लगा- अब क्या करें। क्या पता है लाइट का!
बाहर बरामदें में बातें, गप्पे, हँसी-ठट्ठे का माहौल बना लगता था।
वह बाहर कहाँ जाएगा। उसने कभी इस कमरे से बाह पाँव नहीं रखा।
कभी- कभी दफ्तर का मुआयना करता है ,तो सबको पता चल जाता है और सभी अपनी सीटों पर दुबककर बैठ जाते हैं।
कमरे में वही सिलसिला... बेल।  चपरासी, यैस सर! उसे बुला। वह चीख पड़ा!
वह उठा। उसका मन काली घटा को देखकर बाहर का नज़ारा लेने को हुआ।
उसे लगा, उसके बाहर जाने से दफ्तर के सभी कर्मचारी खामोश हो जाएँगे। इधर- उधर छुपने लगेंगे। वह अँधेरे में गुम हो जाएँगे। उनकी हँसी रुक जाएगी।
वह सोचता -सोचता दरवाजे तक पहुँच गया। फिर एकदम रुक गया ।
तो क्या हुआ? उसका अंदर बोला।
नहीं! नहीं! उसका मन बदला और वह बंद खिड़की की तरफ हुआ।
खिड़की से पर्दा हटाया, खिड़की खोली। एकदम ठंडी हवा का झोंका आया और वह वापस आकर सीट पर बैठ गया। उसी समय आसमान में बिजली चमकी। बादल गरजे और बारिश शुरू हो गई।
सम्पर्क: 97- गुरु नानक ऐवन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर, drdeeptiss@gmail.com

Feb 10, 2015

लघुकथाएँ

 सच झूठ
सुरेन्द्र सर्वेक्षण में लगी अपनी ड्यूटी करता हुआ, एक घर से दूसरे घर जा रहा था।
एक घर में उसे दो सदस्य मिले, बाप- बेटा।
उसने एक फार्म निकाला और अपने ढंग से भरने लगा। घर के मुखिया का नाम, पता, काम लिखने के बाद, पूछना शुरू किया-
'आटा कितना लग जाता होगा?'
'जितना मर्जी लिख लो जनाब ! '
'फिर भी, बीस- पच्चीस किलो तो लग ही जाता होगा?'
'हां जी।'
'दालें कितनी खा लेते हो? '
'आप समझदार हो, लिख लो खुद ही।'
'पांच- छह किलो तो खा लेते होंगे? '
'क्यों नहीं, क्यूं नहीं।'
'घी? '
'खाते हैं जी।'
'वह तो परमात्मा की कृपा से खाते ही होंगे। कितना शुद्ध और दूसरा कितना? '
'देसी घी? वह तो आपने याद दिला दिया। दिल तो बहुत करता है।' उसके चेहरे पर जरा- सी उदासी आ गई।
'मीट- अण्डों का सेवन?'
'परमात्मा का नाम लेते हैं जी, पर जी में बहुत आता है।' कहते हुए उसने एक गहरी सांस ली।
इसी तरह दो सौ साठ प्रश्नों वाला फार्म, सुरेन्द्र ने एक- एक करके भरा। पूरी बात हो जाने पर, सुरेन्द्र ने फार्म से अंदाजा लगाया और पूछा, 'बाकी तो सब ठीक है, पर जो आपने बताया है, उससे अनुमान होता है कि आप कुछ ज्यादा नहीं बता पाए।'
इस बार बेटे ने जवाब दिया, 'दरअसल सही बात बताएं, हम घर में रोटी बनाते ही नहीं। हम बाप- बेटे दो आदमी यहां रहते हैं। बाकी तो गांव में हैं। हमने एक होटल वाले से बात तय कर रखी है। दाल- रोटी सुबह, यूं ही शाम को।'
सुरेन्द्र दोनों की तरफ टिकटिकी बांधे देखता रहा घंटा पौन लगाया फार्म भरने में और निकला..
'भई! ये क्या किया आपने?'
'किया क्या बेटा ! पहले तो मुझे लगा कि मैं यह क्या बता रहा हूं। फिर ज्यों- ज्यों तू पूछता रहा, मेरा मन किया कि तुझसे बातें जरूर करूं।'
'पर आपने झूठ क्यों बो?'
'झूठ कहां बोला बेटा। यह तो सब सच है। झूठ तो बेटा यह है जो हम अब गुजर कर रहे हैं।'
हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
'साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।'
तू इस बारे में कुछ कहना चाहता है ? मजिस्ट्रेट ने पूछा।
मुझे क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी लगाकर बैठा था। हीर के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नजर नहीं आई।

सम्पर्क: 97, गुरु नानक एवेन्यू, मजीठा रोड,अमृतसर (पंजाब)-143004, मो. 09815808506 . ईमेल: drdeeptiss@yahoo.co.in

Apr 16, 2014

वो लम्हें

 वो लम्हें
-श्याम सुंदर दीप्ति 
 









घर की बालकोनी में
हाथ में चाय का प्याला हो
पत्तों की सरसराहट हो
तैरते हुए बादलों में
तेरा झांकना देख ही लूँगा मै
पर ऐसी घड़ी फिर आये तो।
समंदर का किनारा हो
हाथ में बर्फ का गोला हो
लहरें छू रही  हों पैरों को
डूबते सूरज की लाली से
तेरी तस्वीर बना ही लूँगा मै
पर वह पल लौट के आये तो।
बैठ पहाड़ से गिरते झरने के पास
दूर बर्फ से ढके पर्वतों की
हवा में जरा सी ठिठुरन हो
' चमचमाती धूप में
तेरा साया पा ही लूँगा मै
काश ! वो लम्हें फिर मिल पायें तो..  

Email- drdeeptiss@gmail.com

Jul 12, 2011

जीवन- शैली

बूंदों में जाने क्या नशा है...
- डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति
नए वातावरण ने पिता को बताया- समझाया भी है कि बच्चों के साथ दोस्त बनने का समय है। वह दोस्त बनने की कोशिश भी करते हैं, पर बीच- बीच में पिता प्रकट हो जाता है, सिर्फ प्रकट ही नहीं होता, हावी होता है। फिर पिता बोलता है, सुनता नहीं। संवाद गायब। पिता के व्यवहार में एकदम तबदीली, बच्चे को झुँझला देती है। अभी तो दोस्त की तरह था और अभी अभी...।
समय का बदलाव हमारे समय की बात है। परिवार की रूपरेखा बदली है। इसके अन्तर्गत पिता और बच्चे भी। क्या सचमुच ही पिता के साथ बच्चों का सम्बन्ध बदला है?
समाज और माता पिता की नजर में, बच्चे बहुत बदल गए हैं। बच्चे होशियार हैं, चालाक हैं, बच्चे पहले से अधिक समझदार हैं। माँ- बाप को लगता है कि बच्चे अपनी उम्र से बड़ी बातें करते हैं। ...हम तो बुद्धू थे...।
वास्तव में देखें तो बच्चा नहीं बदला है। बच्चा अब भी वही है। वही है, जो बाहें उठा कर कह रहा होता है कि उसे गोदी में उठा लो। अब भी वह गोली- टॉफी की माँग करता है। अब भी वह माँ- बापू का पल्लू कमीज खींच कर, ध्यान माँगता है कि मेरी बात सुनो। अब भी वह बोलना शुरू करने पर, पिता से पूछता रहता है 'यह तया है? वो तया है?' वह उसी तरह जिज्ञासु है।
बदला है तो पिता बदला है। एकल परिवार में, उसके पास बच्चे को गोदी में उठाने का समय है। उसे गोली- टॉफी दिलाने का भी। एकाकी परिवार के साथ, बच्चे भी एक- दो हैं। उन बच्चों के लिए समय कुछ अधिक है।
पर क्या यह सचमुच उतना सच है?
एक पहलू यह भी है कि बच्चे जिद्दी हुए हैं, कहना नहीं मानते। उनकी इच्छाएँ बढ़ी हैं, रूठते ज्यादा हैं, बात मनवा कर छोड़ते हैं? क्या वह बदले नहीं हैं?
माता- पिता कहेंगे- समय ही खराब आ गया है। मीडिया गलत है। सारा माहौल ही बिगड़ा हुआ है।
क्या इस माहौल का हिस्सा पिता नहीं है?
एक तरफ पिता यह दावा करते हैं कि उन्होंने बच्चे के साथ फासला कम किया है। वह बच्चों की बात सुनते हैं, उन्हें समय देते हैं, उनकी परवाह करते हैं। दूसरी और यूं लगता है कि यह दूरी कम होने की बजाए बढ़ी है।
बच्चे के पालन- पोषण के पड़ाव को, पिता के दावों से मिला कर देखें-
जन्म के बाद, क्रैच, डे- केयर, फिर स्कूल के बाद पिता के इन्तजार करने तक टी.वी. या वीडियों गेम के हवाले, उसके बाद होमवर्क में व्यस्तता या मुकाबलेबाजी का दवाब। कहां है पिता? पिता का साथ होते हुए भी पिता गायब है। सुबह- शाम अवश्य मिलते हैं।
क्या पिता सचमुच समय दे रहा है?
पिता बच्चों को प्रतिदिन उसे बोलता सुनता है, बढ़ता देखता है। एक- एक शब्द, एक- एक इंच।
पिता को उसके कद की परवाह है, उसके भार की चिन्ता है। इसलिए खाने की फिक्र भी।
पर बच्चों के शारीरिक विकास के साथ, मानसिक, भावनात्मक व बौद्धिक विकास भी होता है।
एक मनोवैज्ञानिक तथ्य समझें। दो वर्ष की आयु पर जब बच्चा बोलना शुरू करता है, अपने आस- पास के बारे में सब जानना चाहता है, तब उसकी प्रवृत्ति 'क्या है?' वाली होती है। 13-14 वर्ष पर उसके साथ एक नई प्रवृत्ति विकसित होती है 'क्यों है?' वह जानना चाहता है- ऐसा क्यों है? क्यों करना चाहिए? क्यों करूं? वह अब जिज्ञासु के साथ, आलोचनात्मक भी हो रहा होता है। इस पड़ाव पर उसे आगे बोलने वाला, आगे से सवाल करने वाला, हर बात पर बहस करने वाला, कहा जाता है। प्राय: उसे 'क्यों' के पहलू पर संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता और अगर थोड़ी- बहुत व्याख्या मिलती भी है तो वह संतुष्ट नहीं करती। वह उसे पाने के लिए इधर- उधर भटकता है। फिर उसे बिगड़ा हुआ कहते हैं। उसकी कम्पनी को बैड कहा जाता है या फिर स्कूल के वातावरण या मीडिया को दोषी ठहराया जाता है। वास्तव में यह उसकी जिन्दगी का सामान्य पड़ाव है, जिसके बारे में पिता अनभिज्ञ हैं। जबकि पिता को तो खुश होना चाहिए कि उनका बच्चा विश्लेषणात्मक हो गया है। वह अब समाज को समझने लगा है। यह वह पड़ाव है- जहां सेहतमंद संवाद शुरू होना चाहिए, जबकि यहां से चुप्पी शुरू हो जाती है।
पिता और बच्चों में संवाद बढऩे की बात होती है। वह बढ़ रहा है- भौतिक स्तर पर। बाजार पिता के हाथ में जो है। क्या चाहिए? कपड़े, जूते, बाइक, मोबाइल, दोस्तों को ट्रीट। या फिर ट्यूशन, स्कूल। स्कूल में क्या किया? ग्रेड कैसे हैं? संवाद तो बहुत है, पर बच्चे की जरूरत का एक अंश मात्रा। कहां है प्यार, निकटता, मिलकर बैठना, हंसना, किताबें- ग्रेडों से हटकर बात करना? भौतिक जरूरतों के मद्देनजर विचार होता है, सलाह होती है, जरूर होती है। बाजार में झूमते हुए- पिता बच्चों के दोस्त से लगते हैं।
नए वातावरण ने पिता को बताया- समझाया भी है कि बच्चों के साथ दोस्त बनने का समय है। वह दोस्त बनने की कोशिश भी करते हैं, पर बीच- बीच में पिता प्रकट हो जाता है, सिर्फ प्रकट ही नहीं होता, हावी होता है। फिर पिता बोलता है, सुनता नहीं। संवाद गायब। पिता के व्यवहार में एकदम तब्दीली, बच्चे को झुँझला देती है। अभी तो दोस्त की तरह था और अभी अभी...।
स्थिति का विश्लेषण करें तो पिता को अपना परिप्रेक्ष्य याद है। वह उसी से तुलना करता है। हमें यह सब कहाँ मिला? यह बच्चे कुछ भी माँगते बाद में हैं, मिल पहले जाता है। दोनों कमाते हैं, किस के लिए? घर- गाँव छोड़ा, किसके लिए? अपनी सुविधाओं को अनदेखा कर, इन्हें दिया- बाइक, ए.सी. कमरा। पिता सिर्फ सोचते नहीं, बच्चों को जताते भी हैं।
हमने विज्ञान को, व्यवसाय व स्थान को, इस नए परिप्रेक्ष्य को स्वीकारा है। यह सब सहजता से हमारे जीवन का अंग बने हैं, पर क्या अन्य परिवर्तन हैं, जैसे: एकाकी परिवार हमने चाहे, पर उनमें रहने के ढंग को नहीं बदला।
अच्छी परवरिश के लिए एक- दो बच्चों को चाहा, पर अच्छी परवरिश का अभिप्राय नहीं जाना- सीखा।
सतही जानकारी, जैसे देखा- सुना, इधर- उधर के अनुमानों पर आधारित बच्चों के साथ पेश आ रहे है। पिता का कठोर व्यवहार छोड़ा, तो खुलेपन के अर्थ नहीं तलाशे। अनुशासन की सीमा व महत्व नहीं समझा।
दोस्त बनना चाहा, तो पिता के साथ उसका संतुलन नहीं बना पाए। आर्थिक समृद्धि आने पर, बच्चों की इच्छाएँ पूरी करते रहे। पर बच्चें को सामाजिक सच्चाइयों से अवगत नहीं करवा रहे।
उनकी हर बात मानी, पर जब जिद्दी हो गए तो बुरा लगा।
बच्चे, पिता के लिए सब कुछ हैं, एक तरह जायदाद हैं उनकी। पिता उन्हें खोना नहीं चाहते, यह एक भीतर डर है, जो इस स्थिति में व्यवहार को डाँवाडोल करता है।
क्या करें पिता?
सबसे पहले तो बच्चों के सम्पूर्ण विकास को जानें। स्पष्ट और ठोस संदेश दें। माता और पिता के आपसी संदेशों- संकेतों में भी समानता हो। 'हां' और 'ना' का अर्थ समझाते हुए उसे भावनाओं से खिलवाड़ करने के लिए बढ़ावा न दें। बच्चे के जिद्दी होने और ब्लैक मेल करने में कहीं न कहीं हमारा व्यवहार अपना योगदान करता है।
स्पष्ट संदेश के लिए अपने व्यवहार को एक सरीखा रखें। कथनी व करनी में अन्तर न दिखे बच्चों को।
भावनाओं को समझदारी से निपटाएँ।
बच्चों के साथ संवाद को खुले पक्ष से लें। विचार चर्चा करें। तर्क करें, तर्क सुनें। बच्चों का पक्ष ठीक लगे तो स्वीकारें।
दोस्त बनें, एक अच्छे सलाहकार बनें, पर पिता को भी खोने मत दें।
संपर्क: 97- गुरु नानक ऐवन्यू, मजीठा रोड, अमृतसर, मो. 09815808506

Feb 28, 2011

दो लघुकथाएं

1. सच झूठ
सुरेन्द्र सर्वेक्षण में लगी अपनी ड्यूटी करता हुआ, एक घर से दूसरे घर जा रहा था।
एक घर में उसे दो सदस्य मिले, बाप- बेटा।
उसने एक फार्म निकाला और अपने ढंग से भरने लगा। घर के मुखिया का नाम, पता, काम लिखने के बाद, पूछना शुरू किया-
'आटा कितना लग जाता होगा?'
'जितना मर्जी लिख लो जनाब ! '
'फिर भी, बीस- पच्चीस किलो तो लग ही जाता होगा?'
'हां जी।'
'दालें कितनी खा लेते हो? '
'आप समझदार हो, लिख लो खुद ही।'
'पांच- छह किलो तो खा लेते होंगे? '
'क्यों नहीं, क्यूं नहीं।'
'घी? '
'खाते हैं जी।'
'वह तो परमात्मा की कृपा से खाते ही होंगे। कितना शुद्ध और दूसरा कितना? '
'देसी घी? वह तो आपने याद दिला दिया। दिल तो बहुत करता है।' उसके चेहरे पर जरा- सी उदासी आ गई।
'मीट- अण्डों का सेवन?'
'परमात्मा का नाम लेते हैं जी, पर जी में बहुत आता है।' कहते हुए उसने एक गहरी सांस ली।
इसी तरह दो सौ साठ प्रश्नों वाला फार्म, सुरेन्द्र ने एक- एक करके भरा। पूरी बात हो जाने पर, सुरेन्द्र ने फार्म से अंदाजा लगाया और पूछा, 'बाकी तो सब ठीक है, पर जो आपने बताया है, उससे अनुमान होता है कि आप कुछ ज्यादा नहीं बता पाए।'
इस बार बेटे ने जवाब दिया, 'दरअसल सही बात बताएं, हम घर में रोटी बनाते ही नहीं। हम बाप- बेटे दो आदमी यहां रहते हैं। बाकी तो गांव में हैं। हमने एक होटल वाले से बात तय कर रखी है। दाल- रोटी सुबह, यूं ही शाम को।'
सुरेन्द्र दोनों की तरफ टिकटिकी बांधे देखता रहा घंटा पौन लगाया फार्म भरने में और निकला..
'भई! ये क्या किया आपने?'
'किया क्या बेटा ! पहले तो मुझे लगा कि मैं यह क्या बता रहा हूं। फिर ज्यों- ज्यों तू पूछता रहा, मेरा मन किया कि तुझसे बातें जरूर करूं।'
'पर आपने झूठ क्यों बो?'
'झूठ कहां बोला बेटा। यह तो सब सच है। झूठ तो बेटा यह है जो हम अब गुजर कर रहे हैं।'
2.हद
एक अदालत में मुकदमा पेश हुआ।
'साहब, यह पाकिस्तानी है। हमारे देश में हद पार करता हुआ पकड़ा गया है।'
तू इस बारे में कुछ कहना चाहता है ? मजिस्ट्रेट ने पूछा।
मुझे क्या कहना है, सरकार! मैं खेतों में पानी लगाकर बैठा था। हीर के सुरीले बोल मेरे कानों में पड़े। मैं उन्हीं बोलों को सुनता चला आया। मुझे तो कोई हद नजर नहीं आई।