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May 1, 2022

यात्रा संस्मरणः लक्षद्वीप की सुरम्य यात्रा

- गोवर्धन यादव

भारत के दक्षिण-पश्चिम किनारे से लगभग 400 कि.मी. की दूरी पर अवस्थित है एक अद्भुत द्वीप, जिसे लक्षद्वीप के नाम से जाना जाता है। यही एकमात्र ऐसा द्वीप है जिस पर जाने के लिए पर्यटक को भारत सरकार से इजाजत लेनी पड़ती है। पूरा आइलैण्ड करीब 32 कि.मी. के क्षेत्र में फ़ैला हुआ है।

यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य, प्रदूषणमुक्त वातावरण, चारों ओर से घिरा शांत समुद्र और इसका पारदर्शी-तल पर्यटक को मंत्रमुग्ध कर देता है। समुद्र के नीले पानी के भीतर तैरती असंख्य रंग-बिरंगी मछलियाँ, द्वीप पर आच्छादित नारियल और पाम के हरे-भरे वृक्ष, चाँदी-सी चमकती मुलायम रेत एक अनोखा दृश्य उपस्थित होता है। इस द्वीप-समूह में कुल मिलाकर 36 द्वीप हैं, जिसमें से केवल तीन द्वीप कलपेनी, अगाती और अमीनी द्वीप पर ही जाने की इजाजत मिलती है। इजाजत कोच्ची स्थित कार्यालय से ली जा सकती है। पर्यटक को अपने स्थानीय पुलिस स्टेशन से इस आशय का प्रमाण-पत्र लेना होता है कि वह अपराधी-किस्म का नहीं है। यदि आप इस सुन्दरतम द्वीप की यात्रा करना चाहते हैं, तो मई से लेकर सितम्बर का समय उचित होगा। शेष समय यहाँ तीखी धूप पड़ती है। अगाती द्वीप की कुल मिलाकर आबादी करीब सात हजार है। ये कभी हिन्दू धर्मावलंबी थे, चौदहवीं सदी में इस्लाम स्वीकार कर लिया था। लक्षद्वीप भारत का एकमात्र मूँगा द्वीप है। इन द्वीपों की शृंखला मूँहा एटोल है। एटोल मूँगे के द्वारा बनाया गई ऐसी रचना है, जो समुद्र की सतह पर पानी और हवा मिलने पर बनती है। सिर्फ़ इन्हीं परिस्थितियों में मूँगा जीवित रह सकता है।

आज यह द्वीप पर्यटन की दृष्टि से तेजी से विकास कर रहा है। पर्यटक यहाँ आकर जहाँ प्रकृति के नैसर्गिक वातावरण को निहारकर मंत्रमुग्ध हो उठता है, वहीं वह वाटर स्पोर्ट्स यानी स्कूबा डायविंग, कायाकिंग, नौकायन, ग्लास-बोट, वाटर स्कीइंग का जमकर लुत्फ़ उठा सकता है। मलयालम, जेसेरी भाषा यहाँ के निवासियों की आम-भाषा है। अगाती और बंगारम द्वीप बहुत ही खूबसूरत द्वीप है। यहाँ बोट हमेशा तैयार मिलती है। नौकायन ही यहाँ का यातायात का मुख्य माध्यम है।

कावारत्ती आइलैंड- कवरत्ती यहाँ की प्रशासनिक राजधानी है। यह सबसे अधिक विकसित भी है साथ ही सैलानियों के लिए एक बहुत ही लोकप्रिय स्थल है। यह आइलैंड पूरी तरह हरियाली, नीले पानी और बालू से घिरा हुआ है, जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। पूरे द्वीप में 52 मस्जिद हैं,
सबसे खूबसूरत मस्जिद है उज्र मस्जिद। इस द्वीप में एक्वेरियम भी है जिसमें सुंदर मछलियों की प्रजातियाँ हैं। यहाँ काँच की तली वाली नौका में बैठकर आप समुद्री दुनिया का नजारा ले सकते हैं। मिनिकॉय आइलैंड यह आइलैंड कवरत्ती से 200 किमी दूर दक्षिण में है। मालदीव के करीब होने के कारण यहाँ भिन्न संस्कृति के दर्शन होते हैं। मिनिकॉय नृत्य परंपरा के मामले में बेहद समृद्ध है। विशेष अवसर पर यहाँ लावा नृत्य किया जाता है। यहाँ खासकर तूना मछली का शिकार और नौका की सैर आनंददायी है। अँग्रेजों के द्वारा 1885 में बनवाया गया प्रकाश स्तंभ देखने लायक है, पर्यटक यहाँ ऊपर तक जा सकते हैं।

बंगारम आइलैंड-  यह आइलैंड बेहद ही शांत है यहाँ की अपार शांति पर्यटकों को खासा पसंद आती है। साथ ही यहाँ नारियल के वृक्ष सघन मात्रा में हैं।

 कालपेनी आइलैंड- यहाँ तीन द्वीप हैं जिनमें आबादी नहीं है। कदमठ आइलैंड एक जैसी गहराई और दूर अनंत तक जाते किनारे कदमठ को स्वर्ग बनाते हैं। यही एकमात्र द्वीप है जिसके पूर्वी और पश्चिमी दोनों ओर लैगून हैं। यहाँ वाटर स्पोर्ट्स की बेहतरीन सुविधाएँ हैं।

लक्षद्वीप जाने से पूर्व हमने कुछ जानकारियाँ इंटरनेट से प्राप्त की थीं। ज्ञात हुआ कि इस द्वीप पर पहुँचने के दो ही साधन है। या तो आपको ।पानी के जहाज से जाना होता है या फ़िर हवाई जहाज से। इस प्रमाण-पत्र के आधार पर आपको अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी होती है। बाद में यह भी ज्ञात हुआ कि पानी के जहाज अभी नहीं चल रहे हैं और वे रिपेयरिंग के लिए कुछ समय तक के लिए रोक दिए गए हैं। हमारे पास एक ही विकल्प बचा था कि हम हवाई यात्रा करते हुए वहाँ पहुँचे। पर्यटक को द्वीप में चार दिन से अधिक रुकने नहीं दिया जाता है। साथ ही यह भी ज्ञात हुआ कि कोच्ची से सप्ताह में केवल एक दिन ही हवाई जहाज यहाँ के लिए उड़ान भरता है। यह भी पता चला कि लौटते समय हवाई जहाज कोच्ची की जगह कोझिकोड के लिए उड़ान भरेगा। ऐसी विकट परिस्थिति में हमने नागपुर के एक टूर्स एन्ड ट्रेवल का सहारा लिया और हमने अपने हिसाब से कार्यक्रम निर्धारित किए। ट्रेवल वाले ने हमारे साथ अपने एक व्यक्ति को यात्रा पर भिजवाया
, ताकि हमें कोई असुविधा न हो। इस यात्रा में हमें सिर्फ़ अगत्ति, बंगारम और तलापैनी द्वीप पर ही जाने की इजाजत मिल पाई थी।

हमारे साथ इस यात्रा में अन्य प्रदेशों से श्री अनन्त रालेगाँवकर जी, एन. श्रीरामन, श्रीमती पुषा श्रीरामन, सुश्री वीणा महाडिकर जी, सुश्री शालिनी डोणे जी, श्री साकेत केलकरजी, श्री सर्वोत्तम केलकरजी, सुश्री शर्मिन कौटो, सुश्री स्मिता श्रीवास्तवजी, सुश्री चित्रा परांजपे जी एवं दीपक गोखले जी भी शामिल थे। ये सभी अलग-अलग रूट से कोच्ची पहुँचे थे।

17/19-01-2020  ( सुवर्ण जयंति एक्स. रात्रि 11।30)

17 तारीख की शाम को हम छिन्दवाड़ा से नागपुर के लिए रवाना हुए। सुवर्ण जयंती एक्स. नागपुर रात्रि साढ़े ग्यारह बजे पहुँचती है। लगातार दो दिन की यात्रा के पश्चात् हम दिनांक 19 जनवरी की
सुबह छह-साढे़ छह बजे के करीब कोच्चि पहुँचे। शहर की प्रख्यात थ्री-स्टार होटेल सारा (

SARA) में हमें रुकवाया गया। चूँकि हमारे पास आज का दिन ही शेष था, अगली सुबह हमें शीघ्रता से तैयार होकर कोच्चि एअर-पोर्ट पहुँचना था। अगत्ति के लिए फ़्लाइट सुबह साढ़े नौ बजे की थी। अतः हमने इस अल्पावधि में कोच्ची शहर के कुछ प्रसिद्ध स्थलों को देखने का मानस बनाया।

इस अल्पावधि में हमने फ़ोक क्लोर म्युजियम, सेंट फ़्रांसिस जेवियर चर्च) , साइनेगोग जिव्ज मन्दिर (यहूदियों का प्रार्थना स्थल)  तथा डच पैलेस देखा और दोपहर को हमने ‘फ़ोर्ट क्वीन’ होटेल में सुस्वादु भोजन का आनन्द लिया।

ज्ञात हो कि पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा 8 जुलाई 1497 में भारत की खोज में निकला था। 20 मई 1498 को वह केरल तट के कोज्जीकोड जिले के कालीकट के कप्पाडु पहुँचा था। सन् 1502  में वह पुनः दूसरी बार भारत आया था। लंबी बीमारी के बाद उसका निधन सन 1524 में हुआ। उसके मृत शरीर को कोच्चि के संत फ़्रांसिस चर्च में दफ़नाया गया था। सन 1539 में पुर्तगाल के इस हीरो के शरीर के अवशेषों को निकालकर पुर्तगाल के विडिगुअरा में दफ़नाया गया।

20-22 जनवरी -अगत्ति।द्वीप- बीस जनवरी की सुबह आठ बजे हमने होटेल सारा छोड़ दिया और सीधे एअरपोर्ट पहुँचे। सुबह साढ़े नौ बजे की इंडियन एअरलाइन की फ़्लाइट अगत्ति के लिए थी। कोच्ची (कोचीन) से अगत्ति  तक की उड़ान में महज एक घंटा तीस मिनट लगते हैं।

अगत्ति द्वीप- हवाई अडडे से कुछ ही दूरी पर सैलानियों के लिए हट्स बने हुए हैं। मीलों दूर-दूर तक फ़ैली, चाँदी-सी चमचमाती मखमली रेत के मध्य ये हट्स बने हुए हैं। इस मखमली रेत पर चलना एक अलग ही तरीके का अहसास दिलाता है। जगह-जगह नारियल के असंख्य पेड़ और पास ही लहलहाता-समुद्र आपको किसी दिव्य लोक में ले जाने के लिए पर्याप्त है। इतना अलौकिक दृश्य, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। दूर-दूर तक फ़ैली नीले पानी की चादर, क्षितिज पर रंग बिखेरता सूरज, सफ़ेद झक्कास रेत और रंग-बिरंगी मछलियाँ अगत्ति  की असली पहचान है। यदि संयोग से उस दिन पूर्णिमा हो तो इस द्वीप के सुन्दरता को देखकर आप मंत्रमुग्ध हो उठेंगे।

तलापैनी द्वीप- यहाँ तीन द्वीप हैं जिनमें आबादी नहीं है। इनके चारों ओर लैगून की सुंदरता देखने लायक है। कूमेल एक खाड़ी है जहाँ पर्यटन की पूरी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। यहाँ से पित्ती और थिलक्कम नाम के दो द्वीपों को देखा जा सकता है। इस द्वीप का पानी इतना साफ है कि, आप इस पानी में अंदर तैरने वाले जीवों को आसानी से देख सकते हैं। साथ ही यहाँ आप तैर सकते हैं, रीफ पर चल सकते हैं, नौका में बैठकर घूम सकते हैं और कई वाटर स्पोर्ट्स का आनंद ले सकते हैं।

बंगारम आइलैण्ड- अन्य द्वीपों से यह सबसे खूबसूरत द्वीप है। यह बेहद ही शांत द्वीप है। इसकी शांति पर्यटकों को अच्छी खासी पसंद आती है। यहाँ नारियल के सघन वृक्ष आपका मन मोह लेते है। डालफ़िन, कछुए, मेंढक और रंग-बिरंगी मछलियाँ यहाँ देखी जा सकती है। मन मोह लेने वाले इस द्वीप पर हमने बहुत सारा समय आनन्द में बिताया और इसी के किनारे एक विशालकाय टैंट के नीचे बैठकर हम सब पर्यटकों ने सुस्वादु भोजन का आनन्द लिया। और अगत्ति  द्वीप के लिए रवाना हो गए। चूंकि 22 जनवरी की रात हमारी यात्रा की अन्तिम रात्रि थी, अगली सुबह हमें वापिस जाना था। इस अन्तिम पड़ाव पर हम सब शांत समुद्र के किनारे बैठकर शेर-शायरी और सुन्दर गीतों और कविताओं का आनन्द उठाते रहे

और अन्त में

लक्षद्वीप से लौटकर आए हुए हमें अभी ज्यादा समय नहीं बिता है। दस दिन के इस रोमांचक सफ़र की मधुर-स्मृतियाँ आज भी चमत्कृत करती है। चमत्कृत करते हैं वे अद्भुत क्षण, जब हम पूरब से सूरज को निकलता देख रोमांचित होते थे तो वहीं उसे अस्ताचल में जाता देख, इस आशा के साथ लौट पड़ते थे कि अगली सुबह फ़िर सूरज एक नया उजाला, एम नया संदेशा लेकर फ़िर नीलगगन में अवतरित होगा। खिलखिलाता-दहाड़ता समुद्र और समुद्र के बीच कमल सा खिला द्वीप, जिसकी चांदी-सी चममचाती मुलायम रेत पर विचरण करना और नारियल के पेड़ के पेड़ से बंधे झूले में जी भरके झूलना। रह-रह कर याद आते हैं वे क्षण जब हम सब मिलकर द्वीप पर फ़ैली असीम शांति के बीच सहभोज का आनन्द उठाते है। याद आते हैं वे क्षण जब हम नौका विहार करते हुए समुद्र के तल में फ़ैली शैवाल के सघन बुनावटॊं को देखकर रोमांचित होते थे।

सम्पर्कः 103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म. प्र.) 490001, मो- 9424356400

Jun 5, 2021

पर्यावरणः पुराणों में वृक्ष लगाने की विधि

 -गोवर्धन यादव

हम जब इतिहास की बात कर ही रहे हैं तो और थोड़ा पीछे की ओर चलते हैं। और उस पौराणिक युग की यात्रा करते हैं, जब प्रकृति और मनुष्य के जीवन के बीच कैसे संबंध थे।

मत्स्यपुराण में वृक्ष लगाने कि विधि बतलाई गई है।

पादानां विधिं सूत//यथावद विस्तराद वद//विधिना केन कर्तव्यं पादपोद्दापनं बुधै//ये चे लोकाः स्मृतास्तेषां तानिदानीं वदस्व नः

ऋषियों ने सूतजी से पूछा- अब आप हमें विस्तार के साथ वृक्ष लगाने की यथार्थ विधि बतलाइ। विद्वानों को किस विधि से वृक्ष लगाने चाहिए तथा वृक्षारोपण करने वालों के लिए जिन लोकों की प्राप्ति बतलाई गई है, उन्हें भी आप इस समय हम लोगों को बतलाइए।                                                     

सूतजी ने वृक्ष लगाए जाने के की विधि के बारे में विस्तार से वर्णण किया है। वर्तमान समय में शायद ही इस विधि से कोई वृक्ष लगा पाता है। वृक्ष लगाने वाले अतिविशिष्ठ व्यक्ति के लिए, पहले ही इसकी व्यवस्था करा दी जाती है। उनके आने का इन्तजार किया जाता है और उसके आते ही उसे फ़ूलमालाओं से लाद दिया जाता है और वृक्ष लगाते समय उन महाशय की फ़ोटो उतारकर अखबार में प्रकाशित करा दी जाती है। उसके बाद उस वृक्ष की जड़ों में, पानी डालने शायद ही कोई जा पाता है। नतीजन वृक्ष सूख जाता है। कोशिश तो यह होनी चाहिए कि वृक्ष पले-बढ़े, और लोगो को शीतल छाया और फ़ल दे सके। यदि ऐसा होता तो अब तक उस क्षेत्र विशेष में हरियाला का साम्राज्य छाया होता और न जाने कितने फ़ायदे वहाँ के रहवासियों को मिलते। खैर। सूतजी ने वृक्ष लगाए जाने पर किस-किस चीज की प्राप्ति होती है बतलाया है।

अनेन विधिना यस्तु कुर्याद वृक्षोत्सवं/ सर्वान कामानवाप्नोति फ़लं चानन्त्यमुश्नुते         

यश्चैकमपि राजेन्द्र वृक्षं संस्थापयेन्नरः/सोSपि स्वर्गे वसेद राजन यावदिन्द्रायुतत्रयम                              

भूतान भव्यांश्च मनुजांस्तारयेदद्रुमसम्मितान/परमां सिद्धिमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभाम                             

य इदं श्रृणुयान्नित्यं श्रावयेद वापि मानवः/सोSपि सम्पूजितो देवैब्रर्ह्मलोके महीपते(16-17-18-19)

 अर्थात्- जो विद्वान उपर्युक्त विधि से वृक्षारोपण का उत्सव करता है, उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण होती है। राजेन्द्र ! जो मनुष्य इस प्रकार एक भी वृक्ष की स्थापना करता है, वह जब तक तीस इन्द्र समाप्त हो जाते हैं, तब तक स्वर्ग में निवास करता है। वह जितने वृक्षों का रोपण करता है, अपने पहले और पीछे की उतनी ही पीढ़ियों का उद्धार कर देता है तथा उसे पुनरावृत्ति से रहित परम सिद्धि प्राप्त होती है। जो मनुष्य प्रतिदिन इस प्रसंग को सुनता या सुनाता है, वह भी देवताओं द्वारा सम्मानित और ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है।(मत्स्यपुराण-उनसठवाँ अध्याय)                                                                           

मत्स्यपुराण में वृक्षों का वर्ण बार-बार मिलता है। इसके अलावा पद्मपुराण, भविष्यपुराण, स्कन्दादिपुराण में इसकी विस्तार से विधियाँ बतलाई गईं है।       

 ‘य़स्य भूमिः प्रमाSन्तरिक्षमुतोदरम/दिव्यं यश्च बूर्धानं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रहमणॆ नमः(अथर्ववेद ) (१०/७/३२)

अर्थात्- भूमि जिसकी पादस्थानीय़ और अन्तरिक्ष उदर के समान है तथा द्युलोक जिसका मस्तक है, उन सबसे बड़े ब्रह्म को नमस्कार है।

 यहाँ परमब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार कर, प्रकृति के अनुसार चलने का निर्देश दिया गया है। वेदों के अनुसार प्रकृति एवं पुरुष का सम्बन्ध एक दूसरे पर आधारित है। ऋग्वेद में प्रकृति का मनोहारी चित्रण हुआ है। वहाँ प्राकृतिक जीवन को ही सुख-शांति का आधार माना गया है। किस ऋतु में कैसा रहन-सहन हो, क्या खान-पान हो, क्या सावधानियाँ हों- इन सबका सम्यक वर्णण है।

ऋग्वेद (७/१०३/७) में वर्षा ऋतु को उत्सव मानकर शस्य-श्यामला प्रकृति के साथ, अपनी हार्दिक प्रसन्नता अभिव्यक्त की गई है।

वेर्दों के अनुसार पर्यावरण को अनेक वर्गों में बाँटा जा सकता है। यथा- वायु, जल, ध्वनि, खाद्य और मिट्टी, वनस्पति, वनसंपदा, पशु-पक्षी-संरक्षण आदि। स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए पर्यावरण की रक्षा में वायु की स्वछता का प्रथम स्थान है। बिना प्राणवायु के एक क्षण भी जीना संभव नहीं है। ईश्वर ने प्राणिजगत् के लिए संपूर्ण पृथ्वी के चारों ओर वायु का सागर फैला रखा है। हमारे शरीर में रक्त-वाहिनियों में बहता हुआ खून, बाहर की तरफ़ दवाब डालता है, यदि इसे संतुलित नहीं किया गया तो शरीर की धमनियां फ़ट जाएँगीं और हमारा जीवन नष्ट हो जाएगा। वायु का सागर इससे हमारी रक्षा करता है। पेड़-पौधे आक्सीजन देकर क्लोरोफ़िल की उपस्थिति में, इसमें से कार्बनडाईआक्साइड अपने लिए रख लेते हैं और हमें आक्सीजन देते हैं। इस प्रकार पेड़-पौधे वायु की शुद्धि द्वारा हमारी प्राण-रक्षा करते हैं। वायु की शुद्धि के लिए यजुर्वेद में स्पष्ट किया है

तनूनपादसुरो विश्ववेदा देवो देवेषु देवः/पथो अनक्तु मध्वा घृतेन(२७/१२)                        

द्वाविमौ वातौ वात सिन्धोरा परावतः/दक्षं ते अन्य आ वायु परान्यो वातु यद्रपः’ (ऋग्वेद-१०/१३७/२)

 वात ते गृहेSमृतस्य निधिर्हितः/ततो नो देहि जीवसे (ऋग्वेद-१०/१८६/३)

हमारे पूर्वजों को यह ज्ञान था कि हवा कई प्रकार के गैसों का मिश्रण है, उनके अलग-अलग गुण एवं अवगुण हैं, इसमें प्राणवायु भी है, जो हमारे जीवन के लिए आवश्यक है। शुद्ध ताजी हवा अमूल्य औषधी है और वह हमारी आयु को बढ़ाती है।

वेदों में यह भी कहा गया है कि तीखी ध्वनि से बचें, आपस में वार्ता करते समय धीमा एवं मधुर बोलें।

मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा/सम्यश्च सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया (अथर्ववेद ३/३०/३)। जिह्वाया अग्र मधु मे जिह्वामूले मधूलकम/ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि (अथर्वेवेद१/३४/२)

अर्थात- मेरी जीभ से मधुर शब्द निकलें। भगवान का भजन-पूजन-कीर्तन करते समय मूल में मधुरता हो। मधुरता मेरे कर्म में निश्चय रहे। मेरे चित्त में मधुरता बनी रहे। इसी तरह खाद्य-प्रदूषण से बचाव के उपाय एवं। मिट्टी (पृथ्वी) एवं वनस्पतियों में प्रदूषण की रोकथाम के उपाय भी बतलाए गए हैं।

यस्यामन्नं व्रीहियवौ यस्या इमाः पंच कृष्टयः/भूम्यै पर्जन्यपल्यै नोमोSत्तु वर्षमेदसे। (अथर्ववेद-१२/१/४२)

अर्था- भोजन और स्वास्थ्य देने वाली सभी वनस्पतियाँ इस भूमि पर उत्पन्न होती है। पृथ्वी सभी वनस्पतियों की माता और मेघ पिता हैं, क्योंकि वर्षा के रुप में पानी बहाकर यह पृथ्वी में गर्भाधान करता है।

आप किसी भी ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए, सभी में प्रकृति का यशोगान मिलेगा और यह भी मिलेगा कि आपके और उसके बीच कैसे संबंध होंने चाहिए और किस तरह से हमें उसे स्वस्थ और स्वच्छ बनाए रखना है। शायद हम भूलते जा रहे हैं कि पर्यावरण चेतना हमारी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा रहा है। हमने हमेशा से ही उसे मातृभाव से देखा है। प्यार-दुलार-और जीवन देने वाली माता के रुप में। जो माँ अपने बच्चे को, अपने जीवन का अर्क निकालकर पिलाती हो, उसे उस दूध की कीमत जानना चाहिए। यदि हम उसके साथ दुर्व्यवहार करेंगे, उसका अपमान करेंगे अथवा उसकी उपेक्षा करेंगे, तो निश्चित ही उसके मन में हमारे प्रति ममत्व का भाव स्वतः ही तिरोहित होता जाएगा। काफ़ी गलतियाँ करने के बावजूद , माँ कभी भी अपने बच्चों पर कुपित नहीं होती। लेकिन जब अति हो जाए -मर्यादा टूट जाए तो फ़िर उसके क्रोध को झेलना कठिन हो जाता है। अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए फ़िर उसे अपने बच्चों की बलि लेने में भी, कोई झिझक नहीं होती।       

सम्पर्कः कावेरीनगर, छिन्दवाड़ा

Feb 11, 2020

विश्व भ्रमण करते घुमक्कड़ परिंदे

 विश्व भ्रमण करते घुमक्कड़ परिंदे
-गोवर्धन यादव         
बच्चो!
 क्या कभी आपने किसी पक्षी को उड़ते हुए देखा है ?
 प्रश्न सुनते ही शायद आपके मन में क्रोध उत्पन्न होने लगेगा और आप झट से कह उठेंगे कि यह भी भला कोई प्रश्न हुआ? हम तो रोज पक्षियों को आसमान में उड़ते हुए देखते हैं।
इसी प्रश्न को पलटते हुए मैं दूसरा सवाल दोहराऊँ कि क्या कभी, आपमें से किसी ने, पक्षी की तरह आसमान में उड़ते हुए बहुत दूर तक जा पाने की कल्पना की है ? तब आप चुप्पी साध लेंगे। क्योंकि आपके मन में कभी भी आकाश में उड़ान भरने की कल्पना तक नहीं जागी। यदि कल्पना जागी होती तो शायद इसके परिणाम कुछ और होते।
बच्चो -आज हम सुगम, सुविधाजनक, आरामतलबी की जिन्दगी जी रहे हैं। हम अधिक से अधिक शौक-मौज से भरे दिन काटना चाहते हैं और विलासिता में निमग्न रहने का साधन ढूँढते रहते हैं। आरामतलबी जीवन जीने के लिए आलीशान बंगलों का निर्माण करते हैं और पूरी जिन्दगी उसी चार-दीवारी में काट देते हें। लेकिन पशु-पक्षी ऎसा कदापि नहीं करते। न तो वे अपने लिए कोई घर बनाने की सोचते हैं और न ही विलासिता की चीजें बटोरकर रखते हैं। शायद यही कारण है कि वे लंबी-लंबी यात्राएँ करते हुए एक देश से दूसरे देश में जा पहुँचते हैं। उन्हें न तो वीजा की जरुरत पड़ती है और न ही पासपोर्ट बनाने की जरुरत। वे खुलकर प्रकृति में आए नित बदलाव का आनन्द उठाते हैं और एक अवधि पश्चात फिर अपने पुराने ठिकाने पर आ पहुँचते है।
आरामतलबी या आलसीपन यह दोनों ही सजीव चेतन प्राणी की अन्तरात्मा की मूल प्रकृति के विपरीत है। यदि हमारे मन से इस दुर्बुद्धि के बादल छँट जाएँ, तो हमारे अन्दर सदा साहसिकता का परिचय देने की- शौर्य प्रवृत्ति उमगती दिखाई देगी। बहादुरी और वीरता का प्रतिल ही सच्चा आनन्द और सन्तोष दे सकते हैं, इस मंत्र को तो छोटे-छोटे कीट-पतंगे और पशु-पक्षी भी भली-भांति जानते हैं।
बहुत- सी ऐसी चिड़ियाँ हैं, जो बदलती हुए ऋतुओं में आनन्द लेने के लिए दुर्गम यात्राएँ करती हैं। उन्हें काफ़ी जोखिम उठानी पड़ती है और काफ़ी श्रम भी करना पड़ता है तथा मनोयोग का प्रयोग भी करना पड़ता है। पर वे बेकार की झंझटों में न पड़ते हुए साहसिकता का परिचय देती हुई, लंबी उड़ान भरते हुए आन्तरिक प्रसन्नता एवं सन्तोष का अनुभव करती है। वे जानती हैं कि पेट तो कहीं भी भरा जा सकता है और रात कहीं भी काटी जा सकती है। मनुष्य भले ही इसे पसन्द न करे; परन्तु पशु-पक्षी से लेकर कीट-पतंगे तक कोई भी एक जगह रुकना पसंद नहीं करते।
इन पक्षियों की लम्बी यात्राएँ, ऊँची उड़ानें आश्चर्यजनक है। बागटेल 2000 मील की लम्बी यात्रा करके मुम्बई के निकट एक मैदान में उतरते हैं और फिर विभिन्न स्थानों के लिए बिखर जाते हैं। गोल्डन फ़्लावर पक्षी अमेरिका से चलते हैं। पतझड़ में विश्राम करते हैं , फिर थकान मिटाकर अटलांटिक और दक्षिण महासागर पार करते हुए दक्षिण अमेरिका जा पहुँचते हैं। आते समय वे समुद्र के ऊपर से उड़ते हैं और जाते समय जमीन के रास्ते लौटते हैं। अलास्का में उनके घोंसले होते हैं और वहीं अंडे देते हैं। हर वर्ष वे दो-ढाई हजार मील की यात्रा करते हैं। पृथ्वी की परिक्रमा केवल तीन हजार मील की है। इस प्रकार वे लगभग पृथ्वी की एक परिक्रमा हर वर्ष पूरी करते हैं।

आर्कटिका टिटहरी इन सब घुम्मकड़ पक्षियों में सबसे आगे है। उत्तरी ध्रुव के समीप उसका घोंसला होता है। पतझड़ में वह दक्षिण ध्रुव जा पहुँचती है। बसन्त में फिर उत्तरी ध्रुव लौट आती है। जर्मनी के बगुले चार माह में करीब 4000 मील का सफ़र पूरा करते हैं। रूसी बतखें भी 5000 मील की लम्बी यात्रा करती हैं। यह पक्षी औसतन 200 मील की यात्रा हर रोज करते हैं। टर्नस्टान इन सबसे अधिक उड़ती है। उसकी दैनिक उड़ान 500 मील के करीब तक होती है। साथ ही उसका 17 हजार फ़ीट ऊँचाई पर उड़ना और भी अधिक आश्चर्यजनक है। हाँ समुद्र पार करते समय उड़ने की ऊँचाई तीन हजार फ़ीट से अधिक नहीं होती।
च्चो!- इन घुम्मकड़ पक्षियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के ठीक बाद, हमारे मन में यह प्रश्न उठना लाजमी है कि आखिर वह कौन सा कारण है कि जिसके चलते ये पक्षी खतरनाक और कष्टदायक उड़ाने भरते हैं ? क्या इनके लिए उड़ान अनिवार्य है ? क्या वे अपने क्षेत्र में रहकर गुजारा नहीं कर सकते ? या वे थोड़ा- सा उड़कर, एक जगह रहकर अपना काम नहीं चला सकते ? आखिर ऐसा कौन सा कारण है कि वे अपनी जान जोखिम में डालने वाला ऐसा कदम, उन्हें क्यों उठाना पड़ता है ?
पक्षी विज्ञान के वैज्ञानियों ने यह पाया है कि बाह्य दृष्टि से उनके सामने कोई कठिनाई नहीं होती, जिसके कारण उन्हें इतना बड़ा जोखिम उठाने के लिए विवश होना पड़े। आहार की- ऋतु प्रभाव की घट-बढ़ होती रह सकती है, पर दूसरे पक्षी तो उन्हीं परिस्थितियों में किसी प्रकार निर्वाह करते हैं। फिर सैलानी चिड़ियों को ही ऐसी विचित्र उमंग क्यों उठती है ? इस प्रश्न का उत्तर उनकी वृक्क ग्रन्थियों में पाए जाने वाले विशेष हारमोन रसों से मिलता है। जिस प्रकार कुछ बढ़े हुए हारमोन उन्हें संतान उत्पत्ति के लिए बेचैनी उत्पन्न करती है, लगभग वैसी ही बेचैनी इस प्रकार की लम्बी उड़ान भरने के लिए इन पक्षियों को विवश करती है। वे अपने भीतर एक अद्भुत उमंग अनुभव करते हैं और वह इतनी प्रबल होती है कि उसे पूरा कि बिना उनसे रहा ही नहीं जाता। यह उड़ान हारमोन न केवल प्रेरणा देते हैं, वरन उसके लिए उनके शरीरों में आवश्यक साधन सामग्री भी जुटाते हैं। पंखों में अतिरिक्त शक्ति, खुराक का समुचित साधन न जुट सकने की क्षतिपूर्ति करने के लिए बढ़ी हुई चर्बी- साथ उड़ने की प्रवृत्ति, समय का ज्ञान, नियत स्थानों की पहचान, सफ़र का सही मार्ग जैसी कितनी ही एक से एक अद्भुत बातें हैं, जो इस लम्बी उड़ान और वापसी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन उड़ान हारमोनों को पक्षी के शरीर, मन और अन्तर्मन में इस प्रकार के समस्त साधन जुटाने पड़ते हैं, जिससे उनकी यात्रा प्रवृत्ति तथा प्रक्रिया को सलतापूर्वक कार्यान्वित होते रहने का अवसर मिलता रहे।
प्रकृति नहीं चाहती कि कोई भी प्राणी अपनी प्रतिभा को आलसी और विलासी बनाकर नष्ट करे। प्रकृति इन यात्रा प्रेमी पक्षियों को यही प्रेरणा देती है कि वे विभिन्न स्थानों के सुन्दर दृश्य देखें और वहाँ के ऋतु- प्रभाव एवं आहार-विहार के हर्षोल्लास का अनुभव करें। अपनी क्षमता और योग्यता को परिपुष्ट करें।
मनुष्य में आरामतलबी की प्रवृत्ति इतनी घातक है कि वह कुछ महत्त्वपूर्ण काम कर ही नहीं सकता, अपनी प्रगति के द्वार किसी को रोकने हों तो उसे काम से जी चुराने की आदत डालनी चाहिए और साहसिकता का त्याग कर विलासी बनने की बात सोचनी चाहिए। ऐसे लोगों को मुँह चिढ़ाते हुए- उनकी भर्त्सना करते हुए ही यह उड़ान पक्षी, विश्व-निरीक्षण, विश्व-भ्रमण करते रहते हैं- ऐसा लगता है।
सम्पर्कः 103 कावेरी नगर छिन्दवाडाम.प्र. ४८०००१, 7162-246651,9424356400, goverdhanyadav44@gmail.com

Jun 5, 2019

वन सुरक्षित तो हम भी सुरक्षित

प्रकृतिः
वन सुरक्षित तो हम भी सुरक्षित
गोवर्धन यादव
बौद्ध जातक में पेड़ों को लेकर एक कथा है। एक अरण्य में बोधिसत्व वृक्ष देवता होकर पैदा हुए। उससे थोड़ी दूरी पर दूसरे वृक्ष देवता थे। उस वनखण्ड में सिंह और व्याघ्र रहते थे। उनके भय से वृक्ष सुरक्षित थे, न कोई जंगल में आता और न ही पेड़ काटता। एक दिन मूर्ख पेड़ ने समझदार पेड़ से कहा-' इन सिंहों के कारण हमारा वन मांस की दुर्गंध से भर गया है। मैं इनको डराकर भगा दूँ?’। बोधिसत्व ने कहा-'मित्र, इनके कारण हम सब सुरक्षित हैं। इनको भगा दोगे तो हमारा नामोनिशान भी मिट जाएगा। वह नहीं माना। उसने सिंहो को भगा दिया। अब क्या था। लोग कुल्हाड़े लेकर आते और पेड़ काट-काट कर ले जाते। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे जंगल समाप्ति की ओर बढ़ने लगा और पर्यावरण का संकट आ खड़ा हुआ।
यह छोटी सी कथा हमें बड़ी सीख देती है। यदि वन सुरक्षित रहे तो आदमी भी सुरक्षित रहेगा। प्रकृति ने जीव-जंतुओं, वनस्पति, नदी-पहाड़, वायु, जल, खनिज-सम्पदा आदि की रचना की है। प्रकृति के इन विभिन्न आयामों की रचना करने के पीछे एकमात्र उद्देश्य यही रहा है-' पर्यावरण संरक्षितरहे। प्रकृति के द्वारा प्रदत्त विभिन्न आयामो में संतुलन बनाए रखने से पर्यावरण शुद्ध बना रह सकता है, जो इसके विकास एवं प्रगति में सहायक सिद्ध हो सकता है। इस संतुलन के साथ छेड़छाड़ कर उसे बिगाड़ने का दु:साहस किया जाता है, तो अन्य घटकों को परोक्ष व अपरोक्ष रूप से हानि होती है। मनुष्य व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति के लिए, पानी के स्त्रोतों को प्रदूषित करते हैं, हवा में जहरीली गैस छोड़ते हैं, जमीन और मिट्टी को नष्ट करते हैं, प्राकृतिक जंगलों का सफाया कर करते हैं, जिससे संतुलन बिगड़ता है और पर्यावरण पर कुप्रभाव पड़ता है।
विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त राष्ट्र्र द्वारा सकारात्मक पर्यावरण कार्य हेतु दुनिया भर में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सन् 1972  में स्टाकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें करीब 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का जन्म हुआ तथा प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए, राजनैतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था। उक्त गोष्ठी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 'पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभावविषय पर व्याख्यान दिया था। तभी से हम प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आए हैं।
विश्व वन दिवस पहली बार वर्ष 1971 में यूरोपीय कृषि परिसंघ की 23वीं महासभा द्वारा मनाया गया था। भारत में इस दिवस की शुरूआत 1950 में की गई थी। इस दिवस की शुरूआत भारत में तत्कालीन गृहमंत्री कुलपति कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने की थी। वन हमारे जीवन में अहम भूमिका निभाते है। वनों पर समस्त मानव का जीवन निर्भर करता है, लेकिन वनों के लगातार काटे जाने के कारण इनकी संख्या कम होती जा रही है, यही कारण है कि वातावरण में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है और अनेकों प्रकार के श्वोंससंबधी रोग पैदा होते जा रहे हैं वन वायुमंडल में मौजूद कार्बनडाइऑक्साइड को ग्रहण करते है और हमारे लिए जीवनदायनीऑक्सीजन को छोड़ते हैं। पेड़ों का हमारे दैनिक जीवन में भी बहुत महत्त्व  हैं। हमारे दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाली बहुत सी वस्तुएँ पेड़ों से ही प्राप्त होती हैं,  हमें पेड़ों की देखभाल करनी चाहिए और हमारी कोशिश रहनी चाहिए कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाएँ।
19 नवम्बर 1986 से पर्यावरण संरक्षण अधिनियम लागू हुआ। तदनुसार जल, वायु, भूमि-इन तीनों से संबंधित कारक तथा मानव, पौधों, सूक्ष्म जीव एवं अन्य जीवित पदार्थ आदि पर्यावरण के अतर्गत आते है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के कई महत्त्वपूर्ण बिंदु है जैसे- पर्यावरण की गुणवत्ता के संरक्षण हेतु आवश्यक कदम उठाना, पर्यावरण प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण और उपशमन हेतु राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना बनना और उसे क्रियान्वित करना, पर्यावरण की गुणवत्ता के मानक निर्धारित करना, पर्यावरण सुरक्षा से संबंधित अधिनियमों के अंतर्गत राज्य सरकारों, अधिकारियों और सम्बन्धितों के काम में समन्वय स्थापित करना, क्षेत्रों का परिसिमन करना, जहाँ किसी भी उद्योग की स्थापना अथवा औद्योगिक गतिविधियाँ संचालित न की जा सके आदि-आदि... उक्त अधिनियम का उल्लंघन करने पर कठोर दंड का प्रावधान करना।
1972  की तुलना में 2018 का परिदृश्य काफ़ी बदला-बदला सा है। आज विश्व संगठन पर्यावरण प्रदूषण को अपनी मुख्य चिंता मानने लगा है। इसमें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम, खाद्य एवं कृषि संगठन और विश्व मौसम विज्ञान संगठन आदि प्रमुख हैं। अन्य देशों की तरह ही भारत भी, इस बात को लेकर चिंतित है कि धरती अधिक गरम होती जा रही है। ओजोन की परत पतली पड़ती जा रही है। अम्लीय वर्षा और समुद्री प्रदूषण भयावह रूप धारण करता जा रहा है तथा जैविक संपदा संकट के कगार पर जा पहुँची है। अत: हमारा उत्तरदायित्व है कि पर्यावरण में संतुलन को बनाए रखने के लिए उसे भगीरथ प्रयास करना चाहिए
21 दिसंबर 2012 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक और निर्णय लेते हुए प्रतिवर्ष 21 मार्च को अंतराष्ट्रीय वन दिवस मनाए जाने की घोषणा की थी। इस घोषणा के चार मुख्य उदेश्य थे (1) जंगल और टिकाऊ शहर (2) जंगल और रोजगार (3) जंगल और जलवायु परिवर्तन और (4) जंगल और ऊर्जा।
प्रकृति का दोहन करें, शोषण नहीं
मानव का प्रकृति से गहरा संबंध है। इस संबंध में प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का दृष्टिकोण पश्चिम के लोगों का है, जबकि भारतीय दृष्टिकोण में प्रकृति हमारे लिए पूजनीय रही है, भारतीय मूल्य प्रकृति के पोषण और दोहन करने की है, ना कि शोषण करने की, अत: इसे नैतिक कृत्य मानकर हमें चलना चाहिए। हमें व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर, मानव मात्र पर पर्यावरण असंतुलन में पड़ने वाले दुष्प्रभावों को खत्म करते हुए मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व की अभिवृद्धि करने की महती आवश्यकता है, जो नैतिक आधार पर खरी उतर सके।  यही बात विश्व के हर मानव को समझाने में भी अपना अहम रोल अदा करना चाहिए।
प्रकृति अनैतिक कृत्यों को कभी माफ़ नहीं करती
मानव को पर्यावरण से पृथक नहीं समझा जा सकता। अत: घर-परिवार, समाज, राष्ट्र व सारी पृथ्वी, पर्यावरण के रूप में है। प्रकृति इन सभी मानवीय घटकों में सर्वोपरि है। यदि समय रहते इनकी सर्वोपरिसत्ता को स्वीकार न कर पर्यावरण को बिगाड़ने जैसे कार्यों में संलग्न रहते हैं, तो कालान्तर में ये अनैतिक कृत्य-जीवन के लिए समाप्ति का कारण बन सकते है। क्योंकि प्रकृति किसी भी अनैतिक कार्य के लिए ज्यादा समय तक माफ़ नहीं करती है।
पोषण को दृढ़ इच्छाशक्ति बनाएँ
जहाँ दोहन होता है, वहाँ पोषण करने की इच्छा-शक्ति भी होनी चाहिए। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य प्रकृति-प्रदत्त संसाधनों के कुछ भाग का नुकसान, समाज के लिए अत्यंत आवश्यक कार्यों के लिए करता है तो मानव इस अनैतिकता के अपराध बोध से मुक्त हो जाता है। उसने प्रकृति का जो नुकसान किया है, वह समझदारी से दोहन किया है और वह भी सामुदायिक हित में किया है, अत: अनैतिक नहीं है। यदि कोई व्यक्ति केवल आर्थिक आधार या तकनीकी मूल्यांकन के आधार पर निर्णय लेता है, तो वह गलत भी निकल सकता है। इसी प्रकार कई ऐसे कदम भी उठाए जा सकते हैं, जो सबसे उपयुक्त न भी हों, ऐसे कृत्य प्रकृति को नुकसान पहुँचाते है, अत: प्रकृति के दोहन से पूर्व सावधानी बरतनी चाहिए।
भावी पीढ़ी के लिए समृद्धशाली पर्यावरण छोड़ें
उद्योगपति अपने व्यक्तिगत आर्थिक लाभ कमाने हेतु, प्रदूषण फ़ैला कर जन साधारण के साथ खिलवाड़ करते हैं- यह कार्य केवल कानूनी अपराध ही नहीं, बल्कि नैतिक पतन भी है। ऐसे कृत्यों से व्यक्तिगत हित और समाज के हित एक-दूसरे से टकराते है। इन सबका नुकसान प्रकृति को भुगतना पड़ता है। प्रकृति की हानि परिक्षत: मानव की हानि है... उसके जीवन से खिलवाड़ है। जानवरों का शिकार जो प्रतिबन्धित है या वनस्पति को हानि पहुँचाने का कार्य, वनों की कटाई, जंगलों को नष्ट करना, विभिन्न जानवरों को मारकर उनकी खाल ऊँचें दामों में चोरी-छिपे निर्यात करने की घटनाएँ, आये दिन उजागर होती हैं, ऐसे कृत्य करने वाले लोग, अपने आपको पुण्य-पाप की दुनिया से ऊपर मानते हैं। इस प्रकार के कृत्य केवल प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए छेड़-छाड़ है, क्योंकि ऐसे लोगों ने, प्रकृति के साथ समाज के मूल्यों व नियमों का उल्लंघन किया है। अत: ऐसे कार्य निश्चित ही अनैतिक एवं असामाजिक हैं। हमने जो पूर्व की पीढ़ी से प्राप्त किया है, उससे अधिक समृद्धशाली पर्यावरण, भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ देना चाहते हैं, जिसमें अधिक सम्पदा और विकास की प्रबल संभावनाएँ बनी रह सके।
मनुष्य केवल वर्तमान के बारे में ही नहीं सोचता, बल्कि भविष्य के बारे में भी सोचता है। अत: वह चाहेगा कि भविष्य में और अधिक सामाजिक विकास हो सके। वर्तमान के कार्यों से ही भविष्य की उन्नति तय होती है।          
हम चाहेंगे कि भविष्य उज्ज्वल हो तो, प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की बात, उसी स्तर तक सोचें, जिस स्तर पर अपने आपको प्रकृति एवं पर्यावरण का सेवक भी माने। अत: इस दृष्टिकोण को विस्तृत आधार प्रदान करने एवं सारे विश्व को एक परिवार आदि जैसे विचारों को हृदयंगम करवाने हेतु, सार्वजनिक एवं सार्वभौम शिक्षा व्यवस्था की अत्यन्त अवश्यकता है। जो प्रकृति के उपयोग और रक्षा संबंधी, सभी प्रकार की समस्याओं को दृष्टि में रखते हुए तैयार की जानी चाहिए।
वर्तमान पीढ़ी, भावी पीढ़ी के लिए समस्याएँ पैदा न करें
हमें प्रकृति के वर्तमान दोहन के लिए, भविष्य की आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर ही अपनी योजनाओं का निर्माण करना चाहिए। पूर्व की पीढ़ियों ने अपने समय में प्रकृति का पूर्ण विकास कर, उनको भौतिक सम्पत्ति के रूप में बदलकर, अगली पीढ़ियों को प्रदान किया है और यह माना है कि आने वाली पीढ़ी, उन पूर्वजों का उपकार मानेगी। लेकिन वर्तमान पीढ़ी की तो भावी मानव के लिए जटिल समस्याएँ  और प्रकृति के विध्वंस का आधार छोड़कर जाने की संभावनाएँ बन रही है। आज रेगिस्तान बढ़ रहे हैं, जीव-जंतुओं की बहुत-सी प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं, महाद्वीपों और महासागरों का अपरदन हो रहा है। यह परिणाम तो केवल उन मानव की क्रियाओं का ही है, जिनके पास बहुत साधारण औजार व साधन थे, परन्तु इक्कीसवीं शताब्दी के वैज्ञानिक और तकनीकी क्रांति की तुलना में कुछ भी नहीं थे। आज प्रकृति मानव के द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार के विध्वंसकारी कार्यों के लिए उपयोग किए जाने पर रो रही है।
प्रकृति मानव मात्र की हितकारी है
प्रकृति का सही ढंग से दोहन व उपयोग करने हेतु, नये दृष्टिकोण के विकास की आवश्यकता है और इसके लिए व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के हित से ऊपर उठकर, मानव मात्र के हित में सोचने का दृढ़ निश्चय करना होगा तभी पर्यावरण शुद्ध बना रह सकेगा। इस कार्य हेतु, आज की अनैतिक क्रिया को तत्काल समाप्त करना होगा। प्राकृतिक सम्पदा और मानव-दक्षता का दुरुपयोग करके, विलासिता की वस्तुओं को उत्पादित न करते हुए, बीमारी, भुखमरी, अकाल, बाढ़, और गरीबी जैसी स्थिति से निपटने के लिए, उनका समुचित सदुपयोग किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य इस संसार का केन्द्र-बिंदु है, तो इसका अर्थ यह है कि वह सब वस्तुओं से ऊपर है। सारी प्रकृति उसके अधीन है और वह दूसरे जीवों से गुणात्मक रूप से श्रेष्ठ है, तो वह धरती का भी एक केन्द्र है और बाकी सब इसके चारों ओर है।
भौतिक शक्तियों के साथ-साथ नैतिक गुणका भी विकास करें
प्रकृति के प्रति नैतिक दृष्टिकोण को पैदा करने के लिए अधिक समय लग सकता है परन्तु इस धरती पर रहने वाले सब जीचों के लिए यह आवश्यक है। मानव ज्ञान की भौतिक शक्तियाँ आज प्रकृति की शक्तियों के बराबर पहुँच गई है। यह अब और भी आवश्यक हो जाता है कि इन भौतिक शक्तियों के साथ नैतिक गुण भी उसी अनुपात में विकसित हों। मनुष्य़ की यह सब प्राप्तियाँ उसे इस ओर अधिक ध्यान देने के लिए बाधित कर रही हैं कि इनका उपयोग अधिक बुद्धिमानी से करे। संसार के प्रति उसका यह नैतिक दृष्टिकोण तभी सही रूप में प्रकट हो सकता है, जब वह इस जागृति का उपयोग मनुष्य और प्रकृति की एकता के लिए करें।

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