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Jun 1, 2026

स्मृति शेषः नर्मदा लड़ाई के साथी रमेश बिल्लौरे नहीं रहे

 नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ लेखक, शोधकर्ता और पर्यावरण चिंतक रमेश बिल्लौरे का रविवार 10 मई
के दिन दोपहर इंदौर में निधन हो गया। सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों ने उन्हें नर्मदा संघर्ष का ‘चलता-फिरता दस्तावेज’, ‘घुमक्कड़ बुद्धिजीवी’ और ‘नर्मदा का सच्चा पुत्र’ बताते हुए श्रद्धांजलि दी।

रमेश बिल्लौरे नर्मदा घाटी के सवालों पर उस दौर से काम कर रहे थे, जब नर्मदा बचाओ आंदोलन औपचारिक रूप से आकार भी नहीं ले पाया था। बड़े बांधों के सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय प्रभावों को लेकर उन्होंने शुरुआती दौर में ही गंभीर अध्ययन शुरू कर दिया था और लगातार सवाल उठाए। बाद में यही चिंतन नर्मदा संघर्ष की वैचारिक ज़मीन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

बांधों की राजनीति और विकास के मॉडल पर उनकी सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक विरासत मानी जाती है पुस्तक डेमिंग दी नर्मदा: इंडियाज़ ग्रेटेस्‍ट प्‍लांड डिसास्‍टर जिसे उन्होंने पर्यावरण चिंतक क्‍लॉड अल्‍वारिस के साथ मिलकर तैयार किया था। 1988 में प्रकाशित यह अध्ययन नर्मदा परियोजना की शुरुआती तथ्यपरक आलोचनाओं में गिना जाता है। इसे नर्मदा आंदोलन के शुरुआती दस्तावेज़ों में एक महत्त्वपूर्ण कृति माना गया है। 

रमेश बिल्लौरे का नर्मदा से रिश्ता केवल विचार या आंदोलन तक सीमित नहीं था। वह जीवन का रिश्ता था। नर्मदा आंदोलन से जुड़े साथी बताते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी नर्मदा घाटी, विस्थापन, पुनर्वास, पर्यावरण न्याय और जनसंघर्षों के सवालों को समर्पित कर दी।

वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे; वे अनेक विषयों के गंभीर अध्येता, लेखक और संवेदनशील साहित्यकर्मी भी थे। बांधों, विकास और विस्थापन पर उन्होंने अनेक आलोचनात्मक लेख लिखे। सामाजिक प्रश्नों के साथ-साथ साहित्य, इतिहास, लोकजीवन और राजनीति पर भी उनकी पकड़ थी।

रमेश बिल्लौरे की पहचान एक घुमक्कड़, आत्मीय और बेहद जीवंत इंसान के रूप में थी। उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था—दोस्तों के घर, आंदोलन के मोर्चे, गांवों की चौपालें और संघर्ष के मैदान ही उनका घर थे। वे छोटी-छोटी घटनाओं, यात्राओं और जीवन के अनुभवों को इतने रोचक अंदाज़ में सुनाते थे कि कठिन संघर्षों के बीच भी हंसी और ऊर्जा का माहौल बन जाता था। (स्रोत फीचर्स)

Feb 1, 2026

यादेंः मुझसे ईश्वर ने बुलवाया

 - राजनन्दिनी राजपूत

"उस समय एक अलग ही शक्ति साथ देती है सब हो जाता है ", मैंने उससे कहा।

वह बहुत घबराई हुई थी।

'क्या प्रसव- वेदना का दर्द वह सह पाएगी?'

'कैसे होता है यह सब कुछ?'

हमने तो कभी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर भी बात नहीं की थी।

एक वर्ष ही हुआ था उसकी शादी को।

मुझसे उम्र में बड़ी - मेरी बहन।

वह तो प्रणय को भी स्त्री-पुरुष का प्रेम नहीं समझती थी, यह तो पुरुष की माँग है, पूरी करनी ही पड़ती है।

मैं उस से कभी कह नहीं पाई, यह स्त्री का भी सुख है, यह साझेदारी का सुख है।

उस दिन जब अस्पताल से कॉल आया। मैं सुबह पाँच बजे वहाँ पहुँची, उसे देखा, उसके भय को देखा और मिलकर लौट आई कि प्रसव में अभी समय है।

'वह समय का प्रसव होता है', किन्तु इतना दूर हम कहाँ सोचते हैं।

जब दिन में कॉल आया, हम अस्पताल पहुँचे , मेरे कदम जब उसके पास पहुँचे, मेरा हृदय काँप उठा, कम्बल उस पर गोलाकार तरीके से लिपटा था, वह सीधी लेटी हुई थी।

मैं डर गई - ये क्या हुआ। मेरा गला रुँध गया , मेरी बहन...ये किस स्थिति में?

मुझे अपनी सबसे बड़ी बहन याद आ गई, जिसे हमने एक सड़क हादसे में खो दिया था।

उसने मुझसे कुछ कहा और जवाब में मेरी आवाज रूँध गई।

यह पहली बार था जब अपनी बहन को पीड़ा में देखकर मैं पीड़ा से भर उठी।

मेरी आवाज के भारीपन को वह समझ गई, उस दिन मुझे हमारे रिश्ते की आत्मीयता महसूस हुई। उसके चंद शब्दों ने मुझे राहत दी और मेरी एक बात पर वह पुराने दिनों की तरह हँस पड़ी ।

उसकी हँसी ने जैसे मुझे निश्चित कर दिया हो, मैंने कहा , "बच्चे की अँगुलियाँ बिलकुल तुम्हारी अँगुलियों जैसी है।"

मेरे मुँह से यह सुनकर वह खुश हो गई।

मैं घर आ गई थी और उससे अगले दिन कॉल पर बात हुई- 

"सच में , कोई और ही शक्ति काम करती है उस समय, वरना डॉक्टर- वॉक्टर , लोग- वोग कुछ नहीं होते", उसने कहा।

मैं एक क्षण ठहर गई । आखिर मेरा कहा एक वाक्य उसे इतनी हिम्मत/आश्वासन दे गया, जैसे वह वाक्य मुझसे ईश्वर ने  बुलवाया हो।

हम घर आ गए ।

और कुछ समय बाद वहीं शाश्वत (सत्य) बातें सुनने को मिलीं-" काम करती, तो नॉर्मल डिलीवरी होती।"

"आजकल सिजेरियन ठीक है, दर्द नहीं होता।’’

" कब तक लेटेगी, अब तो काम पर लगे। "

इसी तरह की तमाम बातों के बीच मुझे उसकी वे बातें याद आती रहीं, जो उस समय वह बता रही थी और मैंने डरते हुए उससे कहा था, "मुझे मत  बताओ दीदी, मैं डर जाऊँगी।"■

Jan 1, 2026

यादेंः नव वर्ष एक उत्सव वाला दिन

 - डॉ. जेन्नी शबनम
नव वर्ष की प्रतीक्षा पूरे वर्ष रहती है। नव वर्ष एक उत्सव वाला दिन है। हालाँकि समय कितनी तीव्रता से बीत रहा है, यह भी याद दिलाता है। यों लगता है मानो अभी-अभी तो नया साल आया था, इतनी जल्दी बीत गया। 31 दिसम्बर की रात जैसे ही घड़ी की सुई 12 पर पहुँचती है, हम सभी पूरे उल्लास के साथ एक दूसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएँ देते हैं। जैसे ही क्रिसमस आता है, नव वर्ष के आगमन का जोश भर जाता है। नव वर्ष के पहले दिन क्या-क्या करना है इसकी योजना बनती है व तैयारी होने लगती है। 

समय के साथ नव वर्ष मनाने का चलन और शुभकामनाएँ देने का प्रचलन दोनों में बहुत तेजी से बदलाव हुआ है। मेरे बचपन में 31 दिसम्बर की रात का कोई महत्त्व न था। तब न टेलीविज़न था, न मोबाइल, न हर घर में टेलीफोन। 31 दिसम्बर की रात में आजकल के जैसा जश्न नहीं होता था। 1 जनवरी की भोर से नव वर्ष की शुरुआत होती थी। इस दिन कोई सपरिवार पिकनिक पर जाता, तो कोई घर पर मित्रों और परिवार के साथ सुस्वादु भोजन का आनन्द लेता था। अपनी-अपनी इच्छा और क्षमता के अनुसार हर कोई इस दिन को मनाता था। जब से टी.वी. आया तब से नव वर्ष की पूर्व संध्या पर कोई-न-कोई कार्यक्रम अवश्य होता है। अगर कोई योजना न बन सकी तो टी.वी. देखकर मनोरंजन करना भी आदत में शुमार होता गया।    

संचार माध्यमों के प्रसार, बाज़ारी करण और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण पर्व, त्योहार और उत्सव मनाने का रूप बदल गया है। पर्व, त्योहार, उत्सव इत्यादि में धूमधाम शोभनीय है; परन्तु अशिष्टता अशोभनीय है। इन दिनों पूजा, पर्व, त्योहार, अनुष्ठान, व्रत, उत्सव इत्यादि में फूहड़पन देखने को मिलता है। चाहे विवाह समारोह हो या कोई आयोजन या मूर्ति विसर्जन, लाउडस्पीकर या डीजे पर अश्लील गाना-नाचना फैशन बन गया है। धार्मिक आयोजन हो, तो समाज के नियम को न मानना और कानून को तोड़ना अधिकार बन गया है। भले इसमें लोगों की जान चली जाए। जश्न मनाने में उत्साह और उमंग होता ही है; परन्तु दूसरे के अधिकार का हनन कर उत्सव मनाना अनुचित है। 

नव वर्ष हो या कोई खास दिन उत्सव मनाना ही चाहिए। मेरी इच्छा होती है कि साल का हर दिन किसी-न-किसी विशेष दिन को समर्पित कर देना चाहिए, ताकि सालों भर हम सभी अपने कार्य के साथ उत्सव भी मनाते रहें। नव वर्ष के आगमन के उपलक्ष्य में हर जगह कुछ-न-कुछ विशेष आयोजन होता है। बच्चों और युवाओं में तो खास उत्साह रहता है। ठण्ड का मौसम, सजे बाज़ार, जगमग रोशनी, विशेष पकवान से सुगन्धित रेस्तराँ, छुट्टी की धूम, बच्चे-जवान-बूढ़े प्रसन्नचित्त। उपहार के लेने-देने के चलन के कारण सामान पर विशेष छूट। भीड़-भाड़, शोरगुल, मदिरापान, स्वादिष्ट भोजन, नाच-गान, मस्ती भरा माहौल... घड़ी की सुई 12 पर, जोर से हल्ला, पटाखे की गूँज, तालियों की गड़गड़ाहट। कितनी सुन्दर रात और सुहानी भोर! आनन्दित मन से एक दूसरे के गले मिलकर शुभकामना देते लोग। हर फोन की घण्टी बजती और लोग अपनों से बात करते। इस तकनीक ने जीवन में खुशियाँ भर दी हैं। वीडियो कॉल पर अपनों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है; दूरी नहीं खलती। पूरी रात मस्ती- भरी और भोर में सुखकर नींद। 

मेरे बच्चे जब तक छोटे रहे क्रिसमस, नव वर्ष, वैलेंटाइन डे, बर्थडे, दीवाली इत्यादि ख़ूब मनाया। मेरे पति के संस्थान में नव वर्ष की पूर्व संध्या पर बहुत बड़ी पार्टी होती थी। सारी रात खाना-पीना, गाना-बजाना, नाचना, पटाखे फोड़ना इत्यादि होता था। घर में मैं और मेरी बेटी शुद्ध शाकाहारी हैं। दीवाली मेरा प्रिय त्योहार है; क्योंकि इस दिन दीपों की जगमग और हर घर में शाकाहारी पकवान बनता है। बाहर से शाकाहारी रेस्तराँ से खाना आए तो ही मन से खाती हूँ, केक भी एगलेस खाती हूँ। शुद्ध शाकाहार, कर्णप्रिय संगीत, मनचाहे तरीक़े से नाचना-गाना, हँसी-मज़ाक, ठहाके, खेलना, अलाव तापना इत्यादि किसी ख़ास दिन के आयोजन में करना मेरा पसन्दीदा कार्य है, जिसे मैं प्रसन्न मन से करती हूँ। 

मुझे अपने बचपन से बड़े होने तक का अधिकतर नया साल मनाना याद है। मेरी पढ़ाई भागलपुर के क्रिश्चन स्कूल से हुई है। प्राइमरी स्कूल में क्राफ़्ट के क्लास में अन्य चीज़ों के अलावा कागज़ का क्रिसमस ट्री बनाना सीखा। हाई स्कूल में मेरा स्कूल 19 दिसम्बर को क्रिसमस की छुट्टी अर्थात् बड़े दिन की छुट्टी के लिए बन्द होता था। क्रिसमस से नव वर्ष के पहले दिन तक छुट्टी वाला माहौल। मुझे साल के पहले दिन का इन्तिज़ार सबसे अधिक इस कारण रहता था कि आज से कॉपी पर नया साल लिखना है। लिखने की आदत बचपन से रही है। पूरे घर को साफ़ करना, पुराना कैलेण्डर फाड़ना और नया टाँगना। जाने कितना आनन्द आता था इन छोटे-छोटे कामों में। हम बच्चों को पता चला था कि साल का पहला दिन जैसा बीतता है वैसा ही पूरा साल बीतेगा। सुबह-सुबह उठकर नहाना, घर साफ़ करना, कुछ अच्छा खाना बनाना, सिनेमा देखना, पढ़ना-लिखना इत्यादि ताकि सालभर ऐसा ही दिन बीते। बच्चा मन कितना सच्चा होता है, बिना तर्क कुछ भी मान लेता है।

जब तक मेरे पापा जीवित रहे, एक जनवरी को घर में पापा-मम्मी के सहकर्मी और मित्र आते, भोज होता, नियत समय पर वे जाते और हम लोग अपने-अपने कार्य में मगन। हाँ! मेरे घर में सुबह से गाना ज़रूर बजता रहता था, चाहे रेडियो या रिकॉर्ड प्लेयर। पापा की मृत्यु के बाद हमारा कुछ वर्ष बिना किसी त्योहार और उत्सव के बीता। जब मैं कॉलेज में पढ़ने लगी और पापा के गुजरे काफी वर्ष हो गए थे, तब मुझे सिनेमा देखने का चस्का लग गया। हर एक जनवरी को मम्मी को जबरन सिनेमा देखने के लिए ले जाती। छुट्टी की भीड़ के कारण हॉल में टिकट खरीदना जंग जीतने जैसा होता था; मैं जंग भी जीतती और सिनेमा भी देखती। 

मेरे जीवन का कुछ समय शान्तिनिकेतन में बीता है। वर्ष 1991 में पहली जनवरी को मैं अपनी एक मित्र के साथ घर से बाहर निकली नव वर्ष मनाने। कहीं कुछ नहीं, रोज़ की तरह सब कुछ शान्त। मैंने किसी से पूछा कि नव वर्ष के अवसर पर कहीं कुछ क्यों नहीं हो रहा है। तब पता चला कि बंगाल में अंग्रेज़ी तिथि से नहीं; बल्कि हिन्दी तिथि से नव वर्ष मनाते हैं। सुबह खिचड़ी बना-खाकर निकली थी, रात को दही चूड़ा खाकर नव वर्ष मना लिया। 

वर्ष 2000 में मेरी बेटी का जन्म हुआ। मेरा मन था कि वह मिलेनियम बेबी हो। इस कारण डॉक्टर से पहली जनवरी तय करने को कहा; परन्तु सिजेरियन सात तारीख़ से पहले सम्भव नहीं था। नव वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के वसंत विहार के एक होटल में दलेर मेंहदी का प्रोग्राम था, जिसका टिकट हम लोगों ने लिया। हालाँकि कभी भी बच्चे के जन्म की सम्भावना थी; इसलिए भीड़ में जाना हितकर नहीं और उस पर ठण्ड बेशुमार। फिर भी मैं गई। मेरे पति के परिवार के लोग और मेरी माँ भी गईं। मैं और मेरी माँ भीड़ में बाक़ी सबसे अलग हो गए। मेरा बेटा अपने चाचा के साथ था, इसलिए मुझे चिन्ता नहीं थी। हमारे पास न फ़ोन, न पैसे। इतनी धक्का-मुक्की थी कि मैं अपने पेट को बचाने के कारण न घुस सकी, न खाना खा सकी, न कार्यक्रम देख सकी। किसी अनजान से मोबाइल माँगकर पति को फ़ोन किया। अंततः लौटी और साल का पहला दिन अपोलो अस्पताल में बीता।  

लन्दन कई बार गई हूँ, पर वर्ष 2014 के क्रिसमस और नव वर्ष पर पहली बार गई थी। पूरा शहर खूबसूरती से सजा हुआ। रंगीन लाइट, जगमग रास्ते, रोड के ऊपर रंगीन लाइट की झालरें। 31 दिसम्बर की रात थेम्स नदी के किनारे आतिशबाजी होती है और बिग बेन की घंटी बजती है। शो का टिकट पहले से लेना होता है, जिसका पता हमें नहीं था। मैं अपने दोनों बच्चों के साथ गई। वहाँ तक पहुँचने के सारे रास्ते बन्द थे। एक पुलिस वाले ने बताया कि सिर्फ टिकट वाले जा सकते हैं, जो अब ख़त्म हो चुका है। वहाँ के रास्ते ऐसे हैं कि दूर से भी कुछ नहीं दिख सकता। हमने एक पिज़्ज़ा वाले की दूकान पर खड़े होकर पिज्जा बनाना सीखा और पिज्जा खाकर लौट आए। हाँ! 12 बजते ही आतिशबाजी की आवाज़ें सुनाई पड़ीं और आसमान में थोड़ी-सा आतिशबाजी देख सकी। लन्दन शहर की जगमग ख़ूबसूरती का ख़ूब आनन्द लिया।  

वर्ष 2021 के 31 दिसम्बर को मैं अकेली थी। नव वर्ष में पहली बार अकेली थी; क्योंकि बेटी बंगलोर में पढ़ाई कर रही है। मेरी माँ का इस वर्ष ही देहान्त हुआ था, तो मैं बहुत दुःखी रहती थी। मेरी एक मित्र की बेटी को पता चला कि मैं अकेली हूँ, तो वह आ गई। बाहर से खाना मँगाकर हमने पार्टी की। एक जनवरी की सुबह वह चली गई, उसका ऑफिस खुला था। मैं सिनेमा हॉल में जाकर सिनेमा देख आई। कई साल ऐसा हुआ है कि मैं अपने जन्मदिन पर अकेली होती हूँ। कई बार मेरी बेटी सिनेमा का टिकट ऑनलाइन बुक कर देती है। मैं ख़ुद को तोहफ़ा देती हूँ, सिनेमा देखती हूँ, काफ़ी पीकर आती हूँ। कभी मन किया तो किसी शाकाहारी रेस्तराँ में जाकर कुछ खा लेती हूँ। उत्सव मनाने का यह मेरा अपना तरीक़ा है। 

मेरे बच्चे जब स्कूल पास कर गए, तब से उनकी दुनिया बहुत विस्तृत हो गई। नव वर्ष हो या जन्मदिन, दोस्तों के साथ मनाना उन्हें पसन्द है। एक दिन घर वालों के साथ और एक दिन दोस्तों के साथ। नव वर्ष, जन्मदिन, पर्व-त्योहार बच्चों के साथ मनाना अच्छा लगता है; परन्तु समय के साथ बच्चों से दूरी और बदलाव को मन ने अब स्वीकार कर लिया है। सभी साथ हों, तो हर दिन खास हो जाता है। वे दूर रहें तो फ़ोन इस दूरी को मिटा देता है, पर कमी तो महसूस होती है। बेटा अपने परिवार में मस्त और बेटी अपने दोस्तों के साथ। अब 31 दिसम्बर की रात 12 बजे अपने दोनों बच्चों को शुभकामना देकर नए वर्ष का स्वागत करती हूँ। अब न कोई योजना बनाती हूँ, न मन में बहुत उत्साह रह गया है पूर्व की भाँति। धीरे-धीरे उम्र के साथ मन घट रहा है और मैं स्वयं में सिमट रही हूँ। सिनेमा देखने का सिलसिला अब भी जारी है; परन्तु उम्र और परिवार के कारण अब इसमें अंतराल आ जाता है। शायद समय और उम्र जीवन से उत्साह को धीरे-धीरे मिटाता जाता है, ताकि वृद्ध होने के अकेलेपन की तैयारी शुरू हो जाए।      

हर नया वर्ष ढेरों यादों और उम्मीदों के साथ आता है। साल के पहले दिन मन उल्लास और उमंग से भर जाता है। भविष्य के लिए फिर से सपने सजने लगते हैं। अतीत के दुःख को भूलकर एक नई आशा के साथ नव वर्ष का स्वागत करते हैं। फिर धीरे-धीरे समय के प्रवाह में नव वर्ष का उत्साह खोने लगता है और जीवन सुख-दुःख के साथ बीतने लगता है; पुनः नए वर्ष की प्रतीक्षा में। परन्तु बीच-बीच में पर्व-त्योहार मन में उमंग जगाए रखता है। जीवन ऐसा ही है। सच है, यदि पर्व-त्योहार न हो तो इंसान कर्तव्यों और कामों की भीड़ में राहत का अनुभव कैसे करें। 

नव वर्ष का प्रथम दिन समय और जीवन के बीतने और परिवर्तन को याद दिलाता है। एक नया दिन, नया साल और जीवन से एक और वर्ष सरक जाता है। जीवन पथ पर आनंदमय सफ़र के लिए नई ऊर्जा के संचार के साथ ऊष्मा, जोश, जुनून, हौसला और जीवन्तता का होना आवश्यक है। नव वर्ष में जीवन्तता और मानवता से पूरा संसार सुन्दर और चहचहाता रहे, यही आशा है। 

नव वर्ष मंगलमय हो!

Dec 3, 2025

यादेंः रेलवे स्टेशन

 - प्रशान्त

जब मैं अपने यादों के पन्नों को पलटता हूँ तो पाता हूँ, वो बरवीं के दिन और पाता हूँ यादों से पटा रेलवे स्टेशन। वो रेलवे स्टेशन जिस पर मैं रोज जाता था अकेले नहीं; बल्कि अपने एक दोस्त के साथ। ऐसा स्टेशन जिसने मैं रोज जाता था पर कहीं नहीं जाता था। जब दिन भर की भागा – दौड़ के बाद आठ बजे क्लास खत्म होती, तो मानो वो स्टेशन हमें अपनी ओर खींचता और हम उसके जादू के कारण उसकी ओर चल देते। कभी ऐसे ही चल देते तो कभी स्टेशन के सामने वाले भइया की दुकान से लाई-चना ले कर चल देते। लाई-चना खाना उद्देश्य नहीं होता; क्योंकि हम ज्यादातर बिना लाई-चना के ही घुस जाते। मेरे और मेरे मित्र के बीच में अनगिनत बातें, छोटी-से-छोटी फालतू बात से बड़े-से-बड़े वैश्विक मुद्दों पर बातें। जैसे क्या हुआ अमेरिका के चुनाव में, क्या हुआ रूस-यूक्रेन वार में और क्या हुआ एक फालतू से सोशल मीडिया के पोस्ट में। 

उस समय मेरे पास फोन नहीं था, था भी तो टूटी स्क्रीन का की-पैड, जो ज्यादातर मैं अपने कमरे पर रखे रहता था। हालाँकि की मेरे मित्र के पास टच स्क्रीन फोन था, जो कभी-कभी ले आता था। मेरे साथ प्रयागराज (इलाहाबाद) में मेरे बड़े भइया भी रहते थे, उनकी छबी काफी हद तक प्रेमचंद जी के बड़े भाई साहब से मिलती थी। अगर मैं देर कमरे में पहुँचा, तो प्रायः यही बहाना बना देता की क्लास देर तक चली, जबकि असली कारण वह स्टेशन था। जब कभी क्लास जल्दी छूट जाती, तो लाई-चना लेना निश्चित रहता था और स्टेशन में बैठना भी। उस स्टेशन से इतना लगाव था या फिर इतनी बातें की हम ट्रेन के इंजन से आगे उस छोर निकलते ताकि कुछ और समय मिल सके। दिन भर की बातें जैसे क्लास की चुगली, अध्यापक की बुराइयाँ और अनेकों डायरेक्टर की गलतियाँ। अपने-अपने स्कूल की बातें, अपने गाँव की बातें, ऐसी-ऐसी बातें जो कभी खत्म नहीं हुई।

 कभी-कभी इतवार को हमारी कोचिंग की क्लासेस सुबह हो जाया करती, तो स्टेशन के सामने एक शहर की प्रसिद्ध चाय की दुकान पर, क्लास खत्म होने पर, चाय या फिर कभी समोसे खाते-खाते अनगिनत बातें। हमारी बातों में बातों में दिलचस्प बात यह आई की मेरे मित्र को एक कन्या पसंद आ गई, वे दोनों कभी-कभी सोशल मीडिया पर बात भी कर लिया करते थे, तो वे मुझे अपने अफ़साने सुनाता, जो काफी ज्यादा तरंगमय होते उसके लिए, हाँ मेरे लिए भी होते पर उतने नहीं; क्योंकि मैं उसकी बातों अपने से नहीं जोड़ पाता था। इसका कारण यह भी था की अभी तक मेरा ऐसा कोई अनुभव नहीं था। 

कभी बात चलती की ये वन्दे भारत हमारे स्टेशन पर क्यों नहीं रुकती और ये पसेन्जर प्रत्येक स्टेशन पर क्यूँ रुकती है। वहाँ से दर्जनों गाड़ियाँ गुजरती कुछ रुकती, तो कुछ अपनी अकड़ दिखती निकाल जाती, पर हम कहीं नहीं जाते। ऐसा प्रतीत होता की प्रत्येक गाड़ी इस समय की यादों को भरे ले जा रही है, जो कभी लौटकर फिर मिलेगी। रेलवे के लगे पंखे पर रोज तंज कसा जाता और साथ ही साथ रेलवे पर भी। वह पंखा भी बड़ी ढींठ प्रवत्ति का था, कभी नहीं सुधरा, या फिर वो भी चाहता रहा होगा कि मुझ पर रोज टिप्पणी की जाए कि – “इतना धीरे चलता है कि हमें क्या हवा देगा, खुद नहीं ले पाता है|” 

समय के बारे में उतनी समझ नहीं थी पर हाँ इतना पता था की समय बदलता है और समय सच में बदल गया, गिरगिट की तरह तो नहीं बदला पर बदल गया। बारहवीं की परीक्षा पास आने लगी तो कोचिंग का आखरी दिन भी उनके साथ आ गया। मुझे इतना याद है की उस दिन की क्लास सुबह थी, जिसके कारण मेरे पास अधिक समय था स्टेशन पर रुकने के लिए अधिक देर उस पंखे पर टिप्पणी करने के लिए। उस दिन भी दर्जनों ट्रेन गुजरी होंगी पता नहीं। फिर कुछ समय बाद एक ट्रेन आई, वह भी चली गई पिछली ट्रेनों की तरह मगर इस बार हम वहीं नहीं खड़े थे। मैं अपने दोस्त को, उस स्टेशन को छोड़कर किसी दूसरे स्टेशन की तलाश में उस ट्रेन पर चढ़ गया था। वो ट्रेनें मुझे दूसरे शहर में कभी-कभी मिल जाती हैं पर ज्यादातर रेल लाइन के बाहर मेरे कमरे पर ही मिलती हैं। मैं अब जब भी कभी इलाहाबाद जाता हूँ, तो यह कोशिश हमेशा रहती है की उस दोस्त से मिलूँ या फिर यों कहे कि उस स्टेशन की हवा से मिलूँ जो जीवन के एक अंश की यादों को अपने में घोले हैं।

सम्पर्कः पटना, बिहार , मो. 7321065687

Nov 2, 2025

यादेंः यादगार एक्सप्रेस

 - विजय विक्रान्त, कनाडा

भारत छोड़े हुए एक लम्बा अरसा हो गया है। कैसे ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा यहाँ कैनेडा में गुज़ार दिया, इसका कोई अन्दाज़ा ही नहीं रहा। वक्त गुज़रता गया और इसी के साथ साथ ज़िन्दगी की गाड़ी ने भी अपनी रफ़्तातार तेज़ करनी शुरू करदी। तेज़ी का, यह न रुकने वाला आलम, हमेशा से ही अपनी भरपूर जवानी पर रहा है। 

फिर भी न जाने क्यों, दिल के किसी कोने में, पुरानी यादों के आगोश में जाकर गुम हो जाने के लिए तबीयत बेचैन रहती है। वो यादें, जो कभी हकीकत हुआ करती थीं, आज उन्हीं को तरोताज़ा करने को जी कर रहा है। जाने अंजाने में आज आपको भी अपने इस सफ़र में मैं ने अपना हमसफ़र बना ही लिया है।

चलो, आज ज़िन्दगी की तेज़ रफ़्तार को कीली पर टाँगकर, और कुछ आहिस्ता करके, जीने का मज़ा लिया जाए। यही वो तेज़ रफ़तार है, जिसकी वजह से हम ख़ुदा की बख़्शी हुई नियामतों से महरूम हो गए हैं।

चलो, एक बार थोड़ी देर के लिए बच्चे क्यों न बन जाएँ। याद करें उन लम्हों को जब मुहल्ले के मैदान में दोस्तों के साथ गिल्ली डण्डा, पिट्ठू, कबड्डी और कंचों से खेला करते थे। खुले आसमान में पतंगें उड़ाया करते थे और बारिश में झूम- झूमके नाचते, गाते और नहाते थे। यही नहीं, बारिश के बहते पानी में हम अपनी अपनी कागज़ की किश्तियाँ भी तैराया करते थे।

चलो, एक बार पशु पक्षियों के बीच में जाकर चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की कुहुक, कबूतरों की गुटरगूँ, मुर्गों की बाँग, कौओं की कौं कौं, कुत्तों की भौं भौं, गऊओं के रँभाने और घोड़ों के हिनहिनाने में जो एक छुपा हुआ संगीत है उसे बड़े ग़ौर से ध्यान लगाकर सुनें। यही नहीं मोर को नाचता, ख़रगोशों को फुदकता और हिरनों को उछलता देखकर क्यों ना हम भी आज एक ठुमका लगाएँ।

चलो, एक बार खेतों में जाकर माटी की सुगन्ध, सरसों के पीले फूलों की चादर, गेहूँ की बालियों, बाजरे का सिट्टा, ज्वार और मक्की के भुट्टों में कुदरत का करिश्मा देखें।

चलो, एक बार फिर से उन्हीं खेतों में जाकर हल जोतते हुए किसान, बैलों का कुएँ से पानी निकालते हुए रहट की चर्रक चूँ, क्यारियों में पानी का चुपचाप गुमसुम बहना और पास के तालाब में तैरती हुई मछलियों के नाच को सराहें।

चलो, एक बार फिर से वो पुस्तकें पढ़ें, जिन पर बुकशेल्फ़ में रखे रखे धूल जम गई है। गुम हो जाएँ उन ख़्यालों में, जब इन्हीं किताबों की सोहबत में वक्त का पता ही नहीं चलता था। याद करें- अमीर ख़ुसरो, मिर्ज़ा ग़ालिब, बुल्ले शाह, वृन्दावन लाल वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंशराय बच्चन, धर्मवीर भारती, महीप सिंह, भीष्म साहनी और बहुत सारे दिग्गज लेखकों को, जिन्होंने अपने साहित्य की सारी दुनिया में एक बहुत बड़ी छाप छोड़ दी है।

चलो, एक बार फिर से याद करें उन दिनों को जब फ़ॉउन्टेन पैन या फिर स्याही वाली दवात और कलम से लिखाई किया करते थे और स्याही को सुखाने के लिए ब्लॉटिंग पेपर का इस्तेमाल होता था। कभी -कभी तो इसी स्याही से किताबें और हाथ पैर काले- नीले हो जाते थे। कैसे भूल सकते हैं उन लम्हों को जब फ़ॉउन्टेन पैन लीक कर जाता था और जेब के ऊपर दुनिया का नक्शा बन जाता था।

चलो, एक बार फिर से छत पर जाकर बिस्तर के ऊपर पानी का छिड़काव किया जाए। उसके बाद सफ़ेद चादर ओढ़कर लम्बी तानकर सोया जाए। 

चलो, एक बार फिर से कुछ दोस्तों को साथ लेकर बस्ती से दूर पटेल पार्क में जाकर पिकनिक मनाई जाए। यादों की दुनिया को तरोताज़ा करते हुए दोराहा जाए, उन लम्हों को, जब ठण्डा करने के लिए देसी आमों को पानी की भरी हुई बाल्टी में डाला जाता था और देसी आम चूसने का मज़ा ही कुछ और होता था।

चलो, एक बार फिर से शहर के कोलाहल से दूर, पास वाले गाँव में तालाब किनारे बैठा जाए, वहाँ पर पानी में ठीकरों को ऐसे फेंका जाए कि वे तैरते नज़र आएँ। पत्थरों पर बैठकर पैरों को पानी में डालकर ठण्डा किया जाए। आसपास के खेतों में हल चलाते हुए किसान से कुछ अपने दिल की बात कही जाए और कुछ उसकी सुनी जाए। मौका मिले तो सर्सों के साग और मक्की की रोटियों के ज़ायके का भी लुत्फ़ उठाया जाए।

चलो, एक बार फिर से उन वाईनल रिकार्डों को, जिन्हें याद करके सुनना तो दूर रहा हाथ लगाए हुए भी एक बहुत लम्बा अरसा हो गया है, बड़ी मुद्दतों के बाद सुना जाए। इसी बहाने कुछ देर के लिए अपने आपको के.एल.सहगल, पंकज मलिक, लता मंगेशकर, सी.एच.आत्मा, बेग़म अख़्तर, किशोर कुमार, मन्ना डे, महेन्द्र कपूर, सचिनदेव बर्मन, आशा भोंसले, शान्ति हीरानन्द, शमशाद बेग़म, कमल बारोट, सुधा मल्होत्रा, ज़ोहरा बाई अम्बाला, मुकेश, मुहम्मद रफ़ी, जगजीत सिंह, तलत महमूद, गीता दत्त, रहमत कव्वाल, शंकर-शंभू कव्वाल, यूसफ आज़ाद, रशीदा ख़ातून, नुसरत फ़तेह अली ख़ान, सी. रामचन्द, हेमन्त कुमार, नूरजहाँ और सुरैया जैसे फ़नकारों के भूले बिसरे सदा बहार गीतों के आनन्द में डुबो दिया जाए। 

काश ज़िन्दगी की इस दौड़- धूप में यह सब मुमकिन हो पाता और हमें गुज़रे हुए दिनों के साथ थोड़ा वक्त गुज़ारने का मौका मिलता; लेकिन इन ख़ुशगवार पुरानी यादों के साथ- साथ ज़िन्दगी का एक बहुत बड़ा कड़वा सच भी जुड़ा हुआ है। कुछ यादें तो हम हमेशा- हमेशा के लिए भुला देना चाहते हैं। ऐसी यादों के लिए तो यही कहना वाजिब होगा।

भूली हुई यादों, मुझे इतना न सताओ,

अब चैन से रहने दो, मेरे पास न आओ।

Jun 1, 2025

स्मृति शेषः पर्यावरण कार्यकर्ता समाज सुधारक विमला बहुगुणा

- भारत डोगरा

बहुत ही कम उम्र में महात्मा गांधी का मार्ग अपनाकर जीवन जीने वाली विमला बहुगुणा ने 14 फरवरी 2025 को देहरादून स्थित अपने घर पर अंतिम साँस ली। वे 92 वर्ष की थीं। अपने पीछे वे बेटी मधु पाठक और बेटे राजीव व प्रदीप को छोड़ गईं। उनके पति सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा का 2021 में 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया था।

अक्सर लोग विमला बहुगुणा को सुंदरलाल बहुगुणा के साथ मिलकर किए गए कामों के लिए याद करते हैं। लेकिन वे स्वतंत्र रूप में एक महान समाज सुधारक, न्याय की पैरोकार और पर्यावरण कार्यकर्ता थीं। उन्होंने स्वयं दूर-दराज़ के जंगलों में चिपको आंदोलन (पेड़ों को बचाने के लिए उनका आलिंगन करना) के साथ-साथ शराब-विरोधी और अन्य समाज सुधार आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया।

भूमिहीन लोगों के अधिकारों में दृढ़ विश्वास रखने वाली विमला बहुगुणा ने सरला बहन के मार्गदर्शन में ‘भूदान’ कार्यकर्ता के रूप में अपना सामाजिक काम शुरू किया था। वे भूमिहीन लोगों को भूमि दिलाने के लिए दूर-दराज़ के गाँवों में जाती थीं।

भूदान आंदोलन के प्रसिद्ध नेता विनोबा भावे ने इन शुरुआती दिनों में विमला बहुगुणा के काम करने के तरीके और दूर-दराज़ के गाँवों में उनके प्रभाव को करीब से देखा था: दूर-दराज़ के गाँवों में, और कई बार तो बहुत ही प्रतिकूल परिस्थितियों में, वे पहली बार भूदान का संकल्प दिलाने के लिए जाती थीं। विनोबा भावे के सचिव ने सरला बहन को (विनोबा भावे की भावनाएँ व्यक्त करते हुए) लिखा था, “मैंने उसके जैसी लड़की कार्यकर्ता नहीं देखी। वह सिर्फ पहाड़ों की लड़की नहीं है, वह पहाड़ों की देवी है।”

सरला बहन ने इन गाँवों से मिली प्रतिक्रिया के आधार पर बताया है कि एक नए क्षेत्र में काम करने के बावजूद, विमला को अक्सर अपने से अनुभवी स्थानीय पुरुष सदस्यों वाले समूह में नेतृत्व की भूमिका मिलती थी।

विमला बहुगुणा का दृढ़ विचार था कि महिलाओं को समानता का अधिकार मिले। उन्होंने उस समय प्रांतीय राजनीति के उभरते सितारे सुंदरलाल बहुगुणा के विवाह प्रस्ताव के समय यह शर्त रखी थी कि यदि सुंदरलाल राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ने और महात्मा गांधी के मार्ग पर चलकर स्वयं लोगों की सेवा करने का मार्ग अपनाने के लिए सहमत होते हैं, तभी वे विवाह के लिए राज़ी होंगी।

उन्होंने अपनी राह चुन ली थी और उसी पर चलीं। सुंदरलाल बहुगुणा ने सभी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को त्याग दिया। शादी के तुरंत बाद युवा जोड़े ने टिहरी गढ़वाल के एक सुदूर गाँव सिलयारा में खुद के लिए एक बहुत ही साधारण-सा आश्रम बनाने के लिए कड़ी मेहनत की।

यहाँ वे सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक सहारा और प्रेरणादायक शख्सियत बन गईं, जिन्होंने नदियों और जंगलों की रक्षा के लिए, दलितों के समान अधिकारों के लिए, शराब की बढ़ती समस्याओं के खिलाफ काम किया और कई रचनात्मक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया।

जब भूकंप ने सिलयारा आश्रम के एक बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया था, तब विमला बहुगुणा ने आश्रम का पुनर्निर्माण कार्य आरंभ होने तक बड़ी हिम्मत से इस मुश्किल घड़ी का सामना किया।

उनका सबसे कठिन और लंबा संघर्ष टिहरी बाँध परियोजना के खिलाफ था। इस संघर्ष में सुंदरलाल ने बाँध स्थल के पास नदी के किनारे एक झोंपड़ी में रहने की प्रतिज्ञा ली थी। उनके इस संघर्ष में वे दूर कैसे रह सकती थीं, तो विमला जी भी वहीं उनके साथ रहीं।

मैं 1977 के आसपास विमला जी से पहली बार मिला था। तब मैं 22 वर्षीया पत्रकार के रूप में चिपको आंदोलन और उससे जुड़े मुद्दों पर लिखने के लिए सिलयारा आश्रम गया था। बहुत जल्द ही वे हमारे परिवार के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गईं। उनके अंतिम दिनों तक हम फोन पर बात करते रहे और जब मैं उन्हें अपनी नई किताब भेंट करने गया, तो वे बहुत खुश हुई थीं।

मैं जब-जब उनके घर या आश्रम गया, तब-तब मैं न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी गहरी रुचि से प्रभावित हुआ। वे हाल के घटनाक्रमों से अवगत होने के साथ-साथ इन मुद्दों पर मेरी राय जानने में बहुत रुचि रखती थीं, और बेशक इन पर वे अपनी टिप्पणियाँ और नज़रिया भी साझा करती थीं।

वे एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए प्रतिबद्ध थीं। चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किलें आईं, वे कभी अपने मार्ग से विचलित नहीं हुईं।

उनके काम को विस्तार से इन दो किताबों - प्लेनेट इन पेरिल (Planet in Peril) और विमला एंड सुंदरलाल – चिपको मूवमेंट एंड स्ट्रगल अगेंस्ट टिहरी डैम प्रोजेक्ट (Vimla and Sunderlal Bahuguna—Chipko Movement and Struggle against Tehri Dam Project in Garhwal Himalaya) - में पढ़ा जा सकता है।

विमला जी सदैव एक प्रेरणा स्रोत रहेंगी। (स्रोत फीचर्स)

Dec 1, 2024

स्मरणः रोहिणी गोडबोले - लीलावती की एक बेटी

  - अरविन्द गुप्ता 

रोहिणी गोडबोले का जन्म 1952 में पुणे के एक मध्यम वर्गीय महाराष्ट्रीयन परिवार में हुआ था। उनके प्रगतिशील परिवार में बौद्धिक गतिविधियों को हमेशा प्रोत्साहित किया जाता था। स्वयं उनकी मां ने तीन बेटियों के जन्म के बाद बी.ए. और एम.ए. किया और फिर बी.एड. करने के बाद पुणे के प्रतिष्ठित हुज़ूरपागा हाई स्कूल (स्थापना 1884) में बतौर शिक्षक अपना कैरियर शुरू किया। उनके दादाजी ने मैट्रिकुलेशन से पहले अपनी बेटियों की शादी नहीं कराने का फैसला किया था। ज़ाहिर है, उनका परिवार लड़कियों के कैरियर को प्रोत्साहित करता था। रोहिणी की तीन बहनों में से एक डॉक्टर और बाकी दो विज्ञान शिक्षिका बनीं।

वैज्ञानिक बनना एक कैरियर विकल्प हो सकता है, यह विचार रोहिणी के दिमाग में काफी बाद में आया था। ऐसा शायद इसलिए हुआ; क्योंकि उनकी कन्या शाला में सातवीं कक्षा तक केवल गृह-विज्ञान ही पढ़ाया जाता था। सातवीं कक्षा में राज्य प्रतिभा छात्रवृत्ति के लिए तैयारी करते समय उन्होंने पहली बार भौतिकी, जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान का अध्ययन किया और वह भी अपने दम पर। वे यह छात्रवृत्ति पाने वाली अपने स्कूल की पहली छात्रा थीं। 

फिर उन्होंने विज्ञान पत्रिकाएँ पढ़ना, विज्ञान निबंध लेखन प्रतियोगिताओं में भाग लेना और पाठ्यपुस्तकों के बाहर की चीज़ें सीखना शुरू कीं। एक दिन उनकी बड़ी बहन नेशनल साइंस टैलेंट स्कालरशिप का एक पर्चा लेकर घर आई। उस छात्रवृत्ति की पहली शर्त यह थी कि विजेता को मूल विज्ञान का अध्ययन करना ज़रूरी होता था। इस छात्रवृत्ति की वजह से ही वे अपनी गर्मियों की छुट्टियाँ  (एस. पी. कॉलेज, पुणे से भौतिकी में बीएससी करते हुए) आईआईटी दिल्ली और आईआईटी कानपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में बिता पाई थीं। 

उन्होंने बीएससी पूरी की और विश्वविद्यालय में शीर्ष स्थान प्राप्त किया। तब उन्हें बैंक ऑफ महाराष्ट्र से नौकरी का एक प्रस्ताव मिला, जिसमें उन्हें लगभग उतना ही वेतन मिलता, जितना उस समय उनके पिता कमाते थे। वैसा ही आलम आज आई.टी. क्षेत्र द्वारा दिए जाने वाले वेतन का भी है, जो युवाओं को विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में जाने से रोकता है!! उन्होंने अनुसंधान की ओर पहला कदम तब उठाया, जब वे आईआईटी मुंबई से एमएससी कर रही थीं। वहाँ के कई प्रोफेसरों ने उन्हें किताबों से परे देखना और अपने सवालों के जवाब खुद खोजना सिखाया। जब वे  एम .एससी.  के दूसरे वर्ष में थीं, उस समय अमेरिकन युनिवर्सिटी विमेंस एसोसिएशन ने अमरीका में अध्ययन करने वाली छात्राओं के लिए एक छात्रवृत्ति की घोषणा की। उस छात्रवृत्ति को पाने के लिए किसी अमेरिकी विश्वविद्यालय में दाखिला लेना ज़रूरी था। उन्होंने पार्टिकल-फिज़िक्स में शोध करने के लिए स्टोनीब्रुक विश्वविद्यालय में दाखिला लिया।

अपनी पीएच. डी. पूरी करने के बाद वे भारत लौटीं। हालाँकि उन्हें युरोप में पोस्ट-डॉक्टरल शोध के लिए नौकरी का प्रस्ताव मिला था, लेकिन विदेश में पांच साल बिताने के बाद वे घर लौटना चाहती थीं। अगर उन्होंने युरोप में आगे पढ़ाई की होती, तो शायद उनकी ज़िंदगी बिल्कुल अलग मोड़ ले लेती। 

बहरहाल, उन्हें अपने निर्णय का कोई मलाल नहीं हुआ। पीएच. डी. के बाद उन्होंने मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में तीन सफल वर्ष बिताए और फिर मुंबई विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में पढ़ाना शुरू किया। टाटा इंस्टीट्यूट में उनके सभी वरिष्ठ साथियों को लगा कि व्याख्याता का पद स्वीकार करने से उनका शोधकार्य समाप्त हो जाएगा। यह भारत में शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों के बीच के व्यापक अंतर को दर्शाता है। 

इसका पहला अनुभव उन्हें तब हुआ जब उन्होंने विश्वविद्यालय में मकान पाने के लिए आवेदन किया। जहाँ टाटा इंस्टीट्यूट में शामिल होने के तुरंत बाद ही उन्हें मकान मिल गया था, वहीं मुंबई विश्वविद्यालय में उन्हें तमाम बेतुके सवालों के जवाब देने पड़े; जैसे कि क्या वे शादीशुदा हैं, उनके माता-पिता कहाँ रहते हैं वगैरह, वगैरह। 

वे पार्टिकल फिज़िक्स में अपने पूर्व सहयोगियों और टाटा इंस्टीट्यूट के शोध छात्रों के सहयोग से अपना शोध कार्य जारी रख पाईं।

1995 में उन्होंने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलोर में शोधकार्य और अध्यापन शुरू किया। उन्होंने हाई एनर्जी फिज़िक्स के क्षेत्र में काम किया और उस क्षेत्र में काफी प्रसिद्धि भी कमाई। उन्होंने जिनेवा स्थित प्रयोगशाला सर्न के लार्ज हेड्रॉन कोलाइडर में भौतिकी के सैद्धांतिक पहलुओं पर काम किया। जब उनकी और उनके एक युवा जर्मन सहकर्मी द्वारा की गई भविष्यवाणी सच निकली, तो लोगों ने उसे ‘ड्रीस-गोडबोले प्रभाव' नाम दिया। उसके बाद उन्हें तमाम पुरस्कार और सम्मान मिले। अलबत्ता, उनका सबसे प्रिय पुरस्कार आईआईटी बॉम्बे का डिस्टिंग्विश्ड एलम्नस अवार्ड था। इस पुरस्कार को पाने वाली पहली महिला होना उनके लिए विशेष रूप से संतोषजनक था। 2019 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा।

इस दौरान उन्होंने एक जर्मन सहकर्मी के साथ 12 वर्षों तक वैवाहिक जीवन भी जीया हालांकि दो अलग-अलग महाद्वीपों में रहते हुए। लेकिन दोनों ने तब तक बच्चे न पैदा करने का फैसला किया जब तक कि दोनों को एक जगह नौकरी नहीं मिल जाती।

लड़कियों और युवा महिलाओं की विज्ञान और अनुसंधान में रुचि और जिज्ञासा बढ़ाने में मदद करना उन्हें अपनी एक अहम ज़िम्मेदारी महसूस होती थी। इसके तहत उन्होंने 100 भारतीय महिला वैज्ञानिकों को उनके बचपन, उनकी विज्ञान यात्रा, उनके अनुभवों और संघर्षों को लिखने के लिए आमंत्रित किया। 2008 में ये संस्मरण लीलावती'स डॉटर्स (Leelavati's Daughters) नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए। यह एक नायाब पुस्तक है। पहली बार अदृश्य भारतीय महिला वैज्ञानिकों की अनूठी कहानियाँ  लोगों को पढ़ने को मिलीं। इस पुस्तक का संपादन प्रो. रोहिणी गोडबोले और प्रो. रामकृष्ण रामस्वामी ने मिलकर किया और इसको इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज़, बैंगलोर ने प्रकाशित किया। इस अनूठी पुस्तक के कुछ अध्यायों के अनुवाद भी हुए और वे हिंदी में एकलव्य द्वारा प्रकाशित पत्रिका शैक्षणिक संदर्भ, और मराठी के प्रतिष्ठित अखबार लोकसत्ता में प्रकाशित हुए।

प्रो. रोहिणी गोडबोले से मिलने के मुझे कई अवसर मिले। उनके अकस्मात् निधन से एक शून्य पैदा हुआ है। उनकी अनूठी पुस्तक लीलावती'स डॉटर्स का सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। (स्रोत फीचर्स)

Feb 1, 2023

यादेंः 14 फरवरी जन्म दिवस- मधुबाला- नज़ाक़त की खूबसूरत सिंड्रेला


- डॉ.  दीपेन्द्र कमथान
अरेबियन विला, पाँच कारों और अठारह अलशैशियन कुत्तों की 
मलिका की कब्र का नामोनिशाँ नहीं…

14 फरवरी 1933, वेलेंटाइन डे वाले दिन जन्मी मधुबाला का जन्म मुमताज जहां बेगम देहलवी के रूप में दिल्ली, पंजाब प्रांत, ब्रिटिश भारत के उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत की पेशावर घाटी से युसुफजई जनजाति के पश्तून वंश के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। वह अताउल्लाह खान और आयशा बेगम की ग्यारह संतानों में से पाँचवीं थीं। आठ साल की उम्र में अपने परिवार के साथ बॉम्बे चली गईं मधुबाला को ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन पर खुर्शीद अनवर की रचनाएँ गाने के लिए नियुक्त किया गया। बॉम्बे स्थित बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो के मालिक राय बहादुर चुन्नीलाल, जो मधुबाला को पसंद करते थे, ने मधुबाला को बॉम्बे टॉकीज के प्रोडक्शन में एक किशोर भूमिका के लिए ₹150 के वेतन पर फिल्म बसंत (1942) के लिए साइन किया I बसंत  व्यावसायिक रूप से एक सफल फिल्म बन गई , देविका रानी बसन्त में उनके अभिनय से बहुत प्रभावित हुईं, तथा उनका नाम मुमताज़ से बदल कर 'मधुबाला ' रख दिया।

एक रूढ़िवादी परिवार में जन्मी, मधुबाला बहुत धार्मिक थीं और बचपन से ही इस्लाम का पालन करती थीं। 1940 के दशक के अंत में अपने को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने के बाद, उन्होंने बॉम्बे में पेडर रोड, बांद्रा में एक बंगला किराए पर लिया और इसका नाम ‘अरेबियन विला’ रखा। यह मृत्यु तक उसका स्थायी निवास बन गया। तीन हिंदुस्तानी भाषाओं की मूल वक्ता मधुबाला ने 1950 में पूर्व अभिनेत्री सुशीला रानी पटेल से अंग्रेजी सीखना शुरू किया और केवल तीन महीनों में भाषा में पारंगत हो गईं। उन्होंने 12 साल की उम्र में ड्राइविंग भी सीखी और पाँच कारों की मालिक थी एक ब्यूक, एक शेवरले, स्टेशन वैगन, हिलमैन और टाउन इन कंट्री (जिसका स्वामित्व उस समय भारत में केवल दो लोगों के पास था, के महाराजा ग्वालियर और मधुबाला)। उन्होंने अरेबियन विला में अठारह अलशैशियन  कुत्तों को पालतू जानवर के रूप में भी रखा।

मधुबाला की सुंदरता और शारीरिक आकर्षण को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया, जिससे मीडिया ने उन्हें ‘भारतीय सिनेमा का शुक्र’ और ‘द ब्यूटी विद ट्रेजेडी’ के रूप में संदर्भित किया। द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया की क्लेयर मेंडोंका ने 1951 में उन्हें ‘भरतीय स्क्रीन की नंबर एक सुंदरता’ कहा। निरूपा रॉय ने कहा कि ‘उनके लुक के साथ कभी कोई नहीं था और न ही कभी होगा’ जबकि निम्मी (1954 की फिल्म अमर में सह-कलाकार) ने मधुबाला के साथ अपनी पहली मुलाकात के बाद एक रात की नींद हराम करना स्वीकार किया। 2011 में, शम्मी कपूर ने रेल का डिब्बा (1953) की शूटिंग के दौरान उनके साथ प्यार में पड़ने की बात कबूल की: "आज भी ... मैं शपथ ले सकता हूँ कि मैंने इससे अधिक सुंदर महिला कभी नहीं देखी, जब मैं अब भी उसके बारे में सोचता हूँ, छह दशकों के बाद, मेरे दिल की धड़कन याद आती है। मधुबाला लक्स और गोदरेज द्वारा सौंदर्य उत्पादों की ब्रांड एम्बेसडर बन गईं।

मधुबाला का करियर उनके समकालीनों में सबसे छोटा था, लेकिन जब तक उन्होंने अभिनय छोड़ दिया, तब तक उन्होंने 70 से अधिक फिल्मों में सफलतापूर्वक अभिनय किया था। 1944 में देविका रानी ने मधुबाला को ज्वार भाटा (1944) में भूमिका के लिए बुलाया। मधुबाला जल्द ही चंदूलाल शाह के स्टूडियो रंजीत मूवीटोन के साथ ₹300 के मासिक भुगतान पर तीन साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए। मुमताज़ महल (1944), धन्नाभगत (1945),राजपुतानी (1946),फूलवारी (1946) और पुजारी (1946) उन सभी में उन्हें ‘बेबी मुमताज’ के रूप में श्रेय दिया गया था।  उन्होंने 1940 के दशक के अंत में नील कमल (1947) और अमर (1954), हॉरर फिल्म महल (1949), और रोमांटिक फिल्मों बादल (1951) और तराना (1951) से पहचान हासिल की। मधुबाला को मिस्टर एंड मिसेज '55 (1955), चलती का नाम गाड़ी (1958) और हाफ टिकट (1962), क्राइम फिल्मों हावड़ा ब्रिज और काला पानी (1958), और संगीतमय बरसात की रात (1960) में और सफलता मिली। 

दानवीर मधुबाला

मधुबाला ने सक्रिय रूप से 1950 में  पोलियो मायलाइटिस से पीड़ित प्रत्येक बच्चे और जम्मू और कश्मीर राहत कोष में 5,000 और पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों के लिए 50,000 का दान दिया। उन्होंने 1962 में भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान को एक कैमरा क्रेन भी भेंट की, जो आज तक चालू है।

अधूरे रिश्ते …

‘जिंदगी में जिनको उन्होंने चाहा, वो उनके ना हुए, जो हुए वो भी उनके ना थे’ … वह ऐसी थी जिन पर अंत तक अपनी ही असुरक्षा का भूत सवार था। वह आदमी से प्यार करती थीं और उन्हें खो दिया। लतीफ, मोहन सिन्हा, कमाल अमरोही, प्रेमनाथ, जुल्फिकार अली भुट्टो, दिलीप कुमार, प्रदीप कुमार, भारत भूषण, किशोर कुमार I

मधुबाला का पहला रिश्ता उनके ‘बादल’ सह-कलाकार प्रेमनाथ के साथ 1951 की शुरुआत में था। धार्मिक मतभेदों के कारण वे छह महीने के भीतर टूट गए, लेकिन प्रेमनाथ जीवन भर मधुबाला और उनके पिता अताउल्लाह खान के करीब रहे। ‘ज्वार भाटा’ (1944) के सेट पर वह पहली बार दिलीप कुमार से मिलीं। उनके मन में दिलीप कुमार के प्रति आकर्षण पैदा हुआ तथा वह उनसे प्रेम करने लगीं। वह दिलीप कुमार से विवाह करना चाहती थी॥ उस समय वह 18 साल की थीं तथा दिलीप कुमार 29 साल के थे।

1951 में ‘तराना’ के फिल्मांकन के दौरान मधुबाला अभिनेता दिलीप कुमार के साथ रोमांटिक रूप से जुड़ गईं। यह मामला सात साल तक जारी रहा और मीडिया और जनता से व्यापक ध्यान मिला। जैसे-जैसे उनका रिश्ता आगे बढ़ा, मधुबाला और दिलीप ने सगाई कर ली; लेकिन पिता की आपत्तियों के कारण उन्होंने शादी नहीं की। पिता चाहते थे कि दिलीप उनके प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों में काम करें, जिसे उन्होंने मना कर दिया। साथ ही, दिलीप ने मधुबाला को बताया कि अगर उन्हें शादी करनी है, तो उन्हें अपने परिवार से सभी संबंध तोड़ने होंगे।1958 मे पिता अयातुल्लाह खान ने कोर्ट मे दिलीप कुमार के खिलाफ़ एक केस दायर करके दोनों को परस्पर प्रेम खत्म करने पर बाध्य भी किया।1957 में नया दौर पेशी के मामले में अदालती मुकदमे के बीच वह अंततः उनसे अलग हो गईं।

मधुबाला को विवाह के लिए तीन अलग-अलग लोगों से प्रस्ताव मिले। वह सुझाव के लिए अपनी मित्र नर्गिस के पास गईं। नर्गिस ने भारत भूषण से विवाह करने का सुझाव दिया जो कि एक विधुर थे। नर्गिस के अनुसार भारत भूषण, प्रदीप कुमार एवं किशोर कुमार से बेहतर थे; लेकिन मधुबाला ने अपनी इच्छा से किशोर कुमार को चुना, जो उनके बचपन के साथी थे, और उनकी दोस्त रूमा गुहा ठाकुर के पूर्व पति भी थे ।दो साल के लम्बे प्रेमालाप के बाद मधुबाला ने 16 अक्टूबर 1960 को किशोर से अदालत में शादी की, जिसके चलते किशोर कुमार ने धर्म परिवर्तन किया और इस्लाम धर्म अपनाते हुए करीम अब्दुल नाम रखा।  

 मुग़ल-ए-आज़म को मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 

ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ (1960) में मधुबाला के अनारकली के चित्रण ने उन्हें प्रशंसा और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री श्रेणी में फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। मुगल-ए-आज़म उस समय भारत में सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म थी। ‘मुगल-ए-आज़म’ बनाने के दौरान, मधुबाला का कैद वाला दृश्य वास्तविक बनाने के लिए निर्देशक के. असिफ ने उन्हें असली की लौहे की जंजीर पहनाई थीं, जो उनके वजन से दुगनी थीं जिससे उन्हें काफी गहरी चोट लग गई थी और वह कई दिनों तक दर्द में रही।

‘शराबी’ (1964) उनकी आख़री फिल्म थी, 1971 में, मधुबाला की मृत्यु के दो साल बाद अधूरी एक्शन फिल्म ‘ज्वाला’ रिलीज हुई जो मुख्य रूप से बॉडी डबल्स की मदद से पूरी की गई थी।

10 अगस्त 2017 को, नई दिल्ली में मैडम तुसाद संग्रहालय के द्वारा मधुबाला के मोम के पुतले का अनावरण किया गया था। 

उन्होंने 1953 में अपने प्रोडक्शन हाउस मधुबाला प्राइवेट लिमिटेड के तहत तीन फिल्मों नाता (1955), महलों के  ख्वाब (1960) और पठान (1962) का निर्माण किया ।

अंतिम वर्ष…

एक प्रतिष्ठित मुस्लिम फ़कीर ने भविष्यवाणी की थी कि मधुबाला कम उम्र में ही मर जाएँगी। वह एक जन्मजात हृदय विकार वेंट्रिकुलर सेप्टल दोष (दिल में छेद) के कारण साँस फूलने और हेमोप्टाइसिस से पीड़ित थी, है जिसका उस समय कोई इलाज नहीं था I मधुबाला ने अपने अंतिम वर्ष बिस्तर पर बिताए । उन्हें लगभग हर हफ्ते एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन से गुजरना पड़ता था। उसके शरीर ने अतिरिक्त रक्त का उत्पादन करना शुरू कर दिया जो उसकी नाक और मुँह से बाहर निकल सकता था, जिसकी वजह से उन्हें खून निकलवाना पड़ता था और एक ऑक्सीजन सिलेंडर को उसके पास रखना पड़ा; क्योंकि वह अक्सर हाइपोक्सिया से पीड़ित रहती थी।अंततः 36 साल की उम्र के नौ दिन बाद, 23 फरवरी की सुबह 9:30 बजे उनकी मृत्यु हो गई।

मधुबाला को उनकी निजी डायरी के साथ सांताक्रूज, बॉम्बे में जुहू मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाया गया था। उनका मकबरा संगमरमर से बनाया गया था और शिलालेखों में कुरान की आयतें और पद्य समर्पण शामिल थे, लेकिन नई कब्रों के लिए रास्ता बनाने को उनके अवशेष अज्ञात स्थान पर रखे गए ।

अब शायद ही कोई 'अनारकली' रुपहले परदे पर अपने हुस्न के जलवे बिखेरती हुई दिखाई दे I वो सच में अनारकली ही थी, शाहज़ादा सलीम की भी और उसके हुस्न अदाओं के अनगिनत शैदाइयों की भी I आज असल की अनारकली होतीं तो शायद यही सोचतीं की 'मोहब्बत की झूठी कहानी' असल किसकी थी।

सम्पर्क: जे -10, रामपुर गार्डन, बरेली -243001, मो. 9837042827

Dec 2, 2022

यादेंः यहाँ बदला वफ़ा का बेवफाई के सिवा क्या है...

 - डॉ. दीपेन्द्र कमथान

पद्मश्री, पाँच राष्ट्रीय और छह फिल्म फेयर अवार्ड वाले मोहम्मद रफ़ी साहब की कब्र का नामोनिशाँ नहीं ।

रफ़ी साहब के बिना 42 साल कैसे गुज़र गए कभी महसूस ही नहीं हुआ, रफ़ी की आवाज़ आज भी कानों में ऐसी ज़िंदा है की लगता नहीं हमने उन्हें खो दिया।

24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटा सुलतानसिंह गाँव में हाजी अली मोहम्मद और अल्लाह रक्खी बाई के घर में छठी संतान के रूप में रफ़ी का जन्म हुआ था । घर में प्यार से 'फ़ीकु' बुलाते थे ।

रफ़ी साहब की दो शादियाँ हुईं।  उनकी पहली पत्नी बाशीरा बीबी उनकी रिश्तेदार थीं जो देश विभाजन के समय हुए दंगों में मारे गए अपने माता -पिता की वजह से लाहौर, पाकिस्तान चली गईं, उनसे एक पुत्र सईद हुए ।

उनकी दूसरी पत्नी बिलकीस बानो थीं, जिनसे उनके 6 बच्चे हुए । उनके बेटे शाहिद  रफ़ी साहब के नाम से एक संगीत अकादमी चला रहे हैं और संगीत के क्षेत्र काफी सक्रिय हैं ।

गली मोहल्ले में गाते हुए एक फ़कीर को सुनकर उनकी  संगीत में रुचि पैदा हुई, जिसको उनके बड़े भाई ने महसूस कर उनको उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, बरक़त अली खान, उस्ताद वाहिद खान, पंडित जीवन लाल मट्टू और फ़िरोज़ निज़ामी से शास्त्रीय संगीत की शागिर्दी दिलवाई ।

और सहगल साहब की भविष्यवाणी सच साबित हुई...

लाहौर के एक संगीत समारोह में कुंदन लाल सहगल को गाना था; मगर लाउडस्पीकर में तकनीकी कमी के कारण प्रोग्राम में कुछ विलम्ब हुआ, रफ़ी के बड़े भाई हमीद ने रफ़ी को स्टेज पर खड़ा कर दिया, उनकी आवाज़ जो गूँजी, तो चारों और एक मादक- सा नशा बिखर गया। सहगल साहब ने भविष्यवाणी की कि यह लड़का एक दिन बहुत बड़ा गायक बनेगा ।

मात्र 13 वर्ष की आयु में रफ़ी ने अपना पहला स्टेज प्रोग्राम दिया, जिसको सुनकर  संगीतकार श्याम सुंदर ने उनको मुंबई आने का न्योता दिया और अपनी एक पंजाबी फिल्म ‘गुलबलोच’ में ज़ीनत बेगम के साथ ‘सोनिये नी हीरिये नी’ गाना गवाकर रफ़ी को पार्श्व गायन का पहला मौका दिया ।

हिंदी फिल्मो में संगीतकार नौशाद अली ने 1944 में फिल्म ‘पहले आप’ में गवाया । नौशाद के ही निर्देशन में फिल्म ‘दुलारी’ का गाया गाना ‘सुहानी  रात  ढल  चुकी  ना  जाने तुम कब आओगे’  रफ़ी के लिए मील का पत्थर बन गया जिसके बाद रफ़ी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा ।

6 फिल्म फेयर अवार्ड में पहला अवार्ड 1961 में फिल्म ‘चौदहवीं का चाँद’ के गाने ‘चौदहवीं का चाँद हो या आफताब’ हो के लिए मिला और छठा फिल्म फेयर अवार्ड 1977 में फिल्म ‘हम किसी से कम नहीं’ के गाने   ‘क्या हुआ तेरा वादा’ के लिए मिला, इसी गाने के लिए उन्हें 1977 में राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला ।

तीन मुस्लिमों ने दिया हिंदी का सर्वश्रेष्ठ ‘भजन’

आज कुछ मौलवी टीवी डिबेट में रफ़ी द्वारा गाया ‘खुदा भी आसमान से जब ज़मीं पर देखता होगा, मेरे मेहबूब को किसने बनाया सोचता होगा’ के ऊपर सवाल उठाते हैं। उनको इस बात का इल्म नहीं कि शकील बदायूँनी का लिखा नौशाद की धुन में पिरोया और रफ़ी की बेहतरीन शास्त्रीय गायन में ढला फिल्म ‘बैजू बावरा’ का भजन ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज’ उन लोगों के मुँह पर तमाचा है, जो धर्म के नाम पर लोगों को बरगलाते हैं ।

            रफ़ी का तानपुरा बरेली में          

जिस तानपुरे पर रफ़ी साहब ने ताउम्र रियाज़ किया, वो तानपुरा हमारे शहर बरेली में धरोहर के रूप में सुरक्षित है ।

बरेली में ‘नाईटएंगिल म्यूजिकल ग्रुप’ के संयोजक एवं महान संगीतकार स्वर्गीय ओ पी नय्यर साहब के शिष्य श्री राज मलिक ने अपने मुंबई प्रवास के दौरान तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन की भतीजी लीला मेनन से खरीदा था, जो अब उनकी संग्रालय की शोभा बढ़ा रहा है ।

1944 में 3 गीत गाने वाले रफ़ी ने करीब 26000 गाने गाए, जिसमें तकरीबन 238 संगीतकार, 274 गीतकार एवं  206  गायक -गायिकाओं के साथ काम किया ।

संगीतकारों में सबसे ज्यादा 346 गाने शंकर जयकिशन के साथ और गीतकारों में 390 गाने मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गाये ।

उन्होंने 903 गाने आशा भोंसले , 447 लता मंगेशकर,172 गाने शमशाद बेगम, 154 सुमन कल्याणपुर  66 गाने किशोर, और 82 गाने मन्ना डे के साथ सहगान किया ।

रफ़ी ने 12 प्रादेशिक फिल्मों में करीब 79 गाने गाये। इसके अलावा गैर प्रादेशिक फ़िल्मी गीत, गैर फ़िल्मी भजन, नात क़व्वाली और ग़ज़ल भी गाई । रफ़ी साहब ने 2 अंग्रेजी गीत भी गाए ।

9 जुलाई 1986 में बांद्रा में पदमश्री मोहम्मद रफ़ी चौक का नाकरण किया गया एवं 22 सितम्बर, 2007 को  ‘तस्सवर बशीर’ द्वारा डिज़ाइन किए गए रफ़ी के पवित्र स्थल का फज़ले स्ट्रीट, बर्मिंघम, इंग्लैंड में उद्घाटन किया गया ।

भारत चीन युद्ध के समय रफ़ी साहब ने सीमाओं पर जाकर जवानों के हौसले बुलंद किए, उन्हें अपने गीतों के ज़रिये एक नया जोश दिया, हिम्मत दी । कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें 1967 में  पद्मश्री  से सम्मानित किया ।

कुछ अनजाने तथ्य ...

गिनीस बुक में सबसे ज़्यादा रिकार्डेड गानों की संख्या रफ़ी साहब की है ।

1948 में स्वतन्त्रता दिवस पर रफ़ी को जवाहर लाल नेहरू ने रजत पदक दिया था ।

2001 में हीरो होंडा और स्टारडस्ट मैगज़ीन की तरफ से बेस्ट सिंगर ऑफ़ द मेल्लिनियम का ख़िताब मिला

2013 में रफ़ी को ‘ग्रेटर वॉयस इन हिंदी सिनेमा’ के लिए सबसे ज़्यादा वोट CNN – IBN’S पोल में  मिले ।

रफ़ी फ़िल्मी परदे पर दो फिल्मों के गाने में अभिनय करते दिखाई दिए, जिसमें एक गाना ‘तेरा जलवा जिसने देखा’ फिल्म ‘लैला मजनूं’ (1945) का, और दूसरा गाना ‘वो अपनी याद दिलाने को’ फिल्म ‘जुगनू’ (1947) था !

रफ़ी के ऊपर उनके बच्चों ने किताब प्रकाशित की ।

रफ़ी की बेटी ‘रफ़ी यास्मीन खालिद’ ने 2012 में Mohammad Rafi : Mere Abba – A Memoir (Westland Books,  ISBN no. 9789381626856)

‘रफ़ी शाहिद, देव, सुजाता ने 2015 में’ Mohammad Rafi : Golden Voice of the Silver Screen' (Om Book International, ISBN no. 9789380070971।

- लक्ष्मी प्यारे की पहली फिल्म ‘छैला बाबू’ ( जो बनी नहीं ) में सबसे पहले रफ़ी ने ग़ज़ल गाई- ‘तेरे प्यार में मुझे ग़म मिला तेरे प्यार की उम्र दराज़ हो’ ।

- शंकर जयकिशन की पहली फिल्म ‘बरसात’ का पहला गाना ‘मैं ज़िन्दगी में हरदम रोता ही रहा हूँ’ रफ़ी ने ही गाया था।

- ओ.पी. नय्यर की ‘बाज़ी’  और कल्याण जी आनंद जी की ‘बेदर्द जमाने क्या जाने’ के प्रथम गीत रफ़ी ने ही गाए  

- एस.डी. बर्मन की पहली फिल्म ‘दो भाई’, मदन मोहन की पहली फिल्म ‘आँखें’ ,आर .डी . बर्मन की पहली फिल्म ‘छोटे नवाब’ की पहली फिल्मों के गानों के अलावा रोशन , भप्पी लाहिरी , उषा खन्ना की पहली फिल्मों के गाने भी रफ़ी ने ही गाये थे ।

रविंद्र जैन जिनकी पहली फिल्म ‘राधेश्याम’ (जो सम्भवत: रिलीज़ नहीं हुई ) के गीतों को रफ़ी ने ही स्वर दिया था ।

26 जुलाई और वो आखरी  गीत !

- रफ़ी साहब ने अपना आखिरी गाना जे.ओम प्रकाश की फिल्म ‘आसपास’ का ‘शहर में चर्चा है ये दुनिया कहती है, गली में मेरी एक लड़की कुँवारी रहती है' लता मंगेशकर के साथ 26 जुलाई 1980 को रिकॉर्ड करवाया था, गीत लिखा था आनंद बक्शी ने और धुन बनायी थी लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने ।

मोहम्मद रफ़ी फ़िल्मी संगीत के पितामह के रूप में सदा याद किए जाते हैं। फिल्म इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है,आज भी उनको उतना ही सम्मान दिया जाता है जितना उनके जीवन काल में दिया जाता था ।

फ़िज़ा का एक एक कण उनको आज भी पुकारता है कि ‘अभी ना जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं’ 

पर भगवान् ने शायद यहीं तक का साथ दिया था ...

31 जुलाई 1980 कि उस रात को रफ़ी साहब ‘तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे’ कहते हुए सब से सदा के लिए दूर हो गए।

कंकरीट के बढ़ते जंगल का इंसान अपने लालच में देश दुनिया के इस चहेते कलाकार की कब्र पर जाने कब का बुलडोज़र चला चुका है । रफ़ी के चाहने वाले अब उनकी  कब्र के नज़दीक लगे एक नारियल के पेड़ के पास इकट्ठे होकर श्रद्धांजलि देते हैं ।

लेखक  के  बारे  में : भारतीय सिनेमा का इतिहास (फिल्मोग्राफी) का संग्रह,  शिक्षा- ऍमएससी, पीएचडी (रसायन), पीजीडीजेएम्एस (मास कॉम), एमबीए । सम्पर्क : जे -10, रामपुर गार्डन, बरेली -243001, मो. 9837042827

Jul 1, 2022

यादें- जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को...

 - वीणा विज ‘उदित’

तन्हाई का मंजर हो और पुराने फिल्मी गीत पार्श्व में बज रहे हों, तो अतीत के गवाक्ष या झरोखे खुलने लग जाते हैं और मन की गहराइयों से कई तस्वीरें उतरकर सामने मुँह निकालकर आपको उसी दौर में बुलाने लगती हैं । मंत्रमुग्ध से खिंचे चले जाते हैं उस दौर के दीवाने हम जैसे...!

नजर लागी राजा तोरे बंगले पर

जो मैं होती राजा तुम्हरी दुल्हनिया

मटक रहती राजा तोरे बंगले पर’.....

किशोरी बाई का किरदार निभाती नलिनी जयवंत नवकेतन फिल्म्स की ‘काला पानी’ फिल्म में मटकती हुई आज भी आँख के समक्ष आ जाती है। पुराने जमाने में हर कामयाब हीरोइन एक बार कोठे वाली का रोल अवश्य करती थी, तभी वह उच्च कोटि की सफल अभिनेत्री मानी जाती थी। देवानंद और मधुबाला की रोमांटिक जोड़ी के साथ नलिनी जयवंत कोठेवाली बनी थी। इस फिल्म में नलिनी जयवंत को फिल्म फेयर का बेस्ट स्पोर्टिंग एक्ट्रेस का अवार्ड मिला था। नरगिस, बीना राय, मीना कुमारी, मधुबाला, रेखा, ऐश्वर्या सभी ने कोठे वालियों के मशहूर रोल निभाए हैं अपने जीवन में। 1958 में यह फिल्म रिलीज हुई थी और हिट साबित हुई थी।

 इससे 2 साल पहले देवानंद और नलिनी जयवंत की रोमांटिक फिल्म ‘मुनीमजी’ देखी थी ।

हम जवाँ होती लड़कियों के बदन में हार्मोनल बदलाव आ रहे थे, तो स्वाभाविक है- रोमांटिक मूवी से अधिक ही रोमांचित और प्रभावित हो रही थीं हम सब! हमारे स्कूल की दसवीं की एक मॉडर्न सिंधी छात्रा राधा लालवानी ने  तो  लगातार 9 दिन पिक्चर हॉल में जाकर यह फिल्म देखी थी! छोटा शहर था यह बात बहुत फैल गई थी। सबकी जुबान पर उसका चर्चा था। मुझे याद है हमारे ग्रुप ने भी राधा के कारण ‘मुनीमजी’ देखी और मन ही मन उसे धन्यवाद देते हुए, बहुत पसंद की थी।

उसी वर्ष मैं नौवीं कक्षा में पढ़ती थी। हमारे स्कूल की ओर से पहली बार तब इंदौर में ए.सी.सी. का सोशल सर्विस कैंप लगने जा रहा था। कुल पंद्रह लड़कियाँ ,कटनी से इंदौर एक हफ्ते के कैंप के लिए चुनी गईं थीं और साथ में मिस शाह( क्रिश्चियन) टीचर जा रही थीं। एक हफ्ते के टूर का सारा इंतजाम इंदौर की कोई संस्था कर रही थी। बहुत उत्साह और रोमांच था हवाओं में! खुशी के मारे जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे थे हम सहेलियों के । यह सोचकर कि हम दिन-रात इकट्ठे रहेंगी! क्योंकि उस जमाने की बंदिशों के मुताबिक हम सपने में भी ऐसी बातें नहीं सोच सकते थे।

 खैर, निश्चित दिन कटनी से सुबह रेलगाड़ी में जनाना डब्बे में हमें प्रिंसिपल मिसेज कुक ने बिठाकर विदा किया। उस जमाने में औरतों के लिए जनाना डब्बे होते थे। जबलपुर से होते हुए हम जब तक खंडवा पहुँचे तब तक सूर्य सिर पर था और धूप आसमान पर तेजी बिखेर रही थी। खंडवा में 10 मिनट का स्टापेज था..,,,, उसके बाद इंदौर के लिए 5 घंटे का सफर अभी बाकी था। 10 मिनट के बाद, जैसे ही गाड़ी चलने लगती,  चक्के की चरमराहट की आवाज रेल की पटरियों पर अभी आरंभ ही होती कि फिर रुक जाती !  ऐसा बार - बार हो रहा था।  हम सब साथ में खिड़की से मुँह निकालकर बाहर झाँकने लगीं;  क्योंकि यह लकीर से हटकर रवैया हो रहा था । उन दिनों खिड़कियों पर लोहे की छड़ें नहीं होती थीं। खिड़की बंद करने के लिए धड़ाम से कपाट नीचे गिरता था, जिसमें उँगली या हाथ आने का डर बना रहता था। उसमें लगे लकड़ी के हैंडल से खींचकर उसे ऊपर टिकाना पड़ता था। और कोयले का ईंधन इंजन में जला करता था, जिससे मुँह बाहर निकालते ही इंजन से निकलते धुँए में कोयले के कण से आँख में किरकिरी हो जाती थी। खैर ,हमने बाहर देखा तो हैरान रह गए यह देखकर कि वहाँ सैकड़ों लोग खड़े थे, स्टेशन पर और रेलगाड़ी के आसपास। बहुत से लोग इंजन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए रेल की पटरियों पर बिछे जा रहे थे।

 हम सब सहेलियाँ तरह-तरह की अटकलें लगा रही थीं कि तभी पिछले दरवाजे से बुर्के में लिपटी एक औरत हमारी बोगी में चढ़ी और उसे छोड़कर कुछ लोग पीछे से ही नीचे उतर कर गायब हो गए थे।  वह मोहतरमा चुपचाप बुर्का ओढ़े एक सीट पर हम सब के बीच आकर बैठ गई थीं। काफी देर बाद गाड़ी ने चलना आरंभ किया और हल्के- हल्के गाड़ी खिसकने लगी। तब हमने अपने चेहरे भीतर की ओर घुमाए और अपने एकछत्र साम्राज्य में एक घुसपैठिया देखकर चुपचाप आँखों के इशारे करने लगीं। हाँ, इतना चैन जरूर आया कि घंटे बाद रेल गाड़ी चली, तो सही आखिर।

हमारी एक साथिन विजय तिवारी बहुत चुलबुली थी उसने उस बुर्के वाली के पैर देखे और हम सबको इशारा किया कि उधर देखो। हम देखकर हैरान थे कि उस काले बुर्के के पैर सफेद संगेमरमर के लग रहे थे एक शानदार सैंडल में।  शायद उस मोहतरमा ने हमारी नजरों को पर्दे की जाली  के अंदर से भाँप लिया और पैर छुपाने के चक्कर में उसने हाथों से बुर्का पैरों पर डालने का यत्न किया, तो उन खूबसूरत हाथों को देखकर तो हम सभी की आँखें फटी की फटी रह गईं। अब ‘बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे ?’ सबकी नजर मुझ पर आकर ठहर गईं। मानो कह रही हों कि तुम पता करो यह कौन है। लो जी, जब गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली, तो कुछ सहज होते हुए मैंने हिम्मत करी और उनके पास जाकर बैठ गई।  वह भी शायद अब सहज होने का यत्न करने लगी थीं। हमारी मैडम तो किसी पंगे में नहीं पड़ना चाहती थी। वह मस्त कोई उपन्यास पढ़ने में मशगूल थीं।  मैंने जैसे ही पूछा, ‘आप भी इंदौर चल रही है क्या ?’ तो उन्होंने इधर- उधर देख कर इत्मीनान से अपना बुर्का पलट दिया। लगा,  चौदहवीं का चाँद आसमाँ की हदों को पार कर हमारी बोगी में आ गया हो।  बला की खूबसूरत थीं वह मोहतरमा!

हम सब लड़कियों की दिल की धड़कनें मानो रुक गई थीं। मुँह खुले रह गए थे।

मैं,  नलिनी जयवंत !’

 क्या आप, फिल्म हीरोइन नलिनी जयवंत हैं?’

 तो चेहरे पर एक मीठी मुस्कान बिखेरते हुए उन्होंने आँखों की मस्ती से ‘हाँ’ कहा । बड़ा दिलकश स्टाइल था उनका!

 क्या अदा थी!

 उस पुराने जमाने में फिल्मी अदाकार पर्दे की चीज हुआ करते थे। आम आदमी की पहुँच से परे ...लोग उनसे ख्वाबों में ही मिल सकते थे। हकीकत में उनको देखना मिलना या बात करना तो कोई सोच ही नहीं पाता था। हम सबकी बैठे -बिठाए लॉटरी लग गई थी। मैडम भी उपन्यास बीच में ही छोड़कर हमारे बीच पहुँच गई।

काले फ्रॉक पर सफेद बताशे वाला प्रिंट, सफेद सलवार और काली जाली का दुपट्टा ओढ़े उस संगेमरमर की मूरत को हम सब अपलक निहार रहे थे । उसी वर्ष उनकी नई फिल्म ‘काला पानी’  रिलीज हुई थी।  उत्सुकतावश मैंने पूछ लिया,’आप बंबई से खंडवा कैसे आ गईं? क्या यहाँ  की रहने वाली हैं?’

 नहीं, फिल्म की शूटिंग खत्म करके मैं रिलैक्स होने के लिए अशोक कुमार जी के परिवार में खंडवा आई थी कुछ दिनों के लिए।  ऐसी खबरें छुपती नहीं, फैल जाती हैं। आज मुझे वापस जाना था बंबई। यह भी रेलवे स्टेशन वालों से या कहीं से जनता को पता लग गया। सब मुझे देखना और मुझसे मिलना चाहते थे। इस चिलचिलाती धूप में भी रेल की पटरी पर बारी-बारी से लोग लेटे जा रहे थे कि जब तक मैं उनको नहीं मिलूँगी ,वह गाड़ी को आगे नहीं जाने देंगे। तभी आप लोगों को भी इतनी देर यहाँ रुकना पड़ा। पर एक इसी बोगी में केवल आप लोग थीं, सो मेरे बॉडीगार्ड मुझे यहाँ छोड़ गए कि मैं यहाँ बची रहूँगी। इस आकस्मिक मुसीबत से मेरी रक्षा करने के लिए आप सब का शुक्रिया!’

    ‌ वह बोल रही थीं और हमें लग रहा था उनके होंठों से फूल झड़ रहे हैं। बहुत मीठी और सुरीली आवाज थी उनकी। लगा कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है! स्वर्ग की अप्सराएँ भी ऐसी ही होती होंगी अवश्य! तभी तो ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र भी विमुग्ध हो गए थे मेनका पर और काम वासना में लिप्त हो गए थे।

मैडम ने अचानक पूछ लिया,  आप खंडवा ही क्यों आईं ?  कहीं और चली जातीं।’

असल में मैं अशोक कुमार जी (दादा मोनी) से मिलना चाहती थी। हमारे संबंध आत्मीय हैं हम पिछले कई वर्षों से एक साथ रहते हैं। फिल्म समाधि, संग्राम और मिस्टर एक्स में हम दोनों ने 1950 में इकट्ठे काम किया था जिससे हमारी नजदीकियाँ काफी बढ़ गई थीं। अभी वह अपने परिवार में आए हुए थे । मैं फिल्म शूटिंग समाप्त होने पर उनके पास ही आना चाहती थी- सो आ गई थी।’

आप कब से फिल्मों में काम कर रही हैं?’

उन्होंने प्यार से हमें देखा और  बताना शुरू किया…

‘12- 13 वर्ष की थी ! अपनी चचेरी बहन नूतन की माँ शोभना समर्थ के जन्मदिन पर उनके घर गई थी। तब वहाँ आए प्रोड्यूसर डायरेक्टर कांति भाई देसाई (शायद) ने मुझे देखते ही फिल्म ऑफर की और मैं तभी से अब तक ढेरों फिल्में कर चुकी हूँ।’

कोई चार -पाँच घंटे हम लोग साथ थे और ढेरों बातें चल रही थीं। उन्होंने भी हमसे पूछा ,

आप लोग इकट्ठे होकर कहाँ जा रही हैं ? कितना अच्छा लगता है ना ऐसी आजाद , मस्त जिंदगी जीना!’

हमने अपने ट्रिप की डिटेल उनको बताई।  हीरोइन बनने के बाद आजादी खत्म हो जाती है, यह तो हम उनको देखकर समझ ही रहे थे; क्योंकि उनकी हसरतें जाहिर हो रही थीं। वह बोलीं ,चलो हम सब गाना गाते हैं…

जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को

और दे जाते हैं यादें, तन्हाई में तड़पाने को --हो हो- हो हो’

और तालियाँ बजा -बजाकर हम सब उनकी ही फिल्म ‘मुनीम जी’ का गाना गा रहे थे। बहुत ही सधे स्वर में गा रहीं थीं वो। पूछने पर उन्होंने बताया कि कई फिल्मों में वे अपने गीत स्वयं ही गाती रहीं थीं।

     एक दूसरे से सवाल- जवाब करने से हम आपस में जुड़ते चले जा रहे थे। शायद वह इस बात से बेफिक्र थीं कि उनकी कोई बात पत्रिका या किसी अखबार में लीक हो जाएगी। उस जमाने में हम लोग एक दम लल्लू थे। हमें इतना भी होश नहीं था कि हम उनका पता ले लेते! फोटो खींचने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। उनके पास से कोई खुशबू धीरे- धीरे हमारे मन को भा रही थी-आज सोचती हूँ उन्होंने अवश्य कोई इत्र लगाया होगा। लगता था यह सफर कभी खत्म ना हो! लेकिन अंत तो हर सफर का होता है। इंदौर में हम जब स्टेशन पर उतर रहे थे, तो नामालूम कैसे उस काले बुर्के में वो एकदम से गायब हो गईं। और हम उनके गाने की लाइन दोहराते रहे...

जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को’