"उस समय एक अलग ही शक्ति साथ देती है सब हो जाता है ", मैंने उससे कहा।
वह बहुत घबराई हुई थी।
'क्या प्रसव- वेदना का दर्द वह सह पाएगी?'
'कैसे होता है यह सब कुछ?'
हमने तो कभी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर भी बात नहीं की थी।
एक वर्ष ही हुआ था उसकी शादी को।
मुझसे उम्र में बड़ी - मेरी बहन।
वह तो प्रणय को भी स्त्री-पुरुष का प्रेम नहीं समझती थी, यह तो पुरुष की माँग है, पूरी करनी ही पड़ती है।
मैं उस से कभी कह नहीं पाई, यह स्त्री का भी सुख है, यह साझेदारी का सुख है।
उस दिन जब अस्पताल से कॉल आया। मैं सुबह पाँच बजे वहाँ पहुँची, उसे देखा, उसके भय को देखा और मिलकर लौट आई कि प्रसव में अभी समय है।
'वह समय का प्रसव होता है', किन्तु इतना दूर हम कहाँ सोचते हैं।
जब दिन में कॉल आया, हम अस्पताल पहुँचे , मेरे कदम जब उसके पास पहुँचे, मेरा हृदय काँप उठा, कम्बल उस पर गोलाकार तरीके से लिपटा था, वह सीधी लेटी हुई थी।
मैं डर गई - ये क्या हुआ। मेरा गला रुँध गया , मेरी बहन...ये किस स्थिति में?
मुझे अपनी सबसे बड़ी बहन याद आ गई, जिसे हमने एक सड़क हादसे में खो दिया था।
उसने मुझसे कुछ कहा और जवाब में मेरी आवाज रूँध गई।
यह पहली बार था जब अपनी बहन को पीड़ा में देखकर मैं पीड़ा से भर उठी।
मेरी आवाज के भारीपन को वह समझ गई, उस दिन मुझे हमारे रिश्ते की आत्मीयता महसूस हुई। उसके चंद शब्दों ने मुझे राहत दी और मेरी एक बात पर वह पुराने दिनों की तरह हँस पड़ी ।
उसकी हँसी ने जैसे मुझे निश्चित कर दिया हो, मैंने कहा , "बच्चे की अँगुलियाँ बिलकुल तुम्हारी अँगुलियों जैसी है।"
मेरे मुँह से यह सुनकर वह खुश हो गई।
मैं घर आ गई थी और उससे अगले दिन कॉल पर बात हुई-
"सच में , कोई और ही शक्ति काम करती है उस समय, वरना डॉक्टर- वॉक्टर , लोग- वोग कुछ नहीं होते", उसने कहा।
मैं एक क्षण ठहर गई । आखिर मेरा कहा एक वाक्य उसे इतनी हिम्मत/आश्वासन दे गया, जैसे वह वाक्य मुझसे ईश्वर ने बुलवाया हो।
हम घर आ गए ।
और कुछ समय बाद वहीं शाश्वत (सत्य) बातें सुनने को मिलीं-" काम करती, तो नॉर्मल डिलीवरी होती।"
"आजकल सिजेरियन ठीक है, दर्द नहीं होता।’’
" कब तक लेटेगी, अब तो काम पर लगे। "
इसी तरह की तमाम बातों के बीच मुझे उसकी वे बातें याद आती रहीं, जो उस समय वह बता रही थी और मैंने डरते हुए उससे कहा था, "मुझे मत बताओ दीदी, मैं डर जाऊँगी।"■

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