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Feb 17, 2010

बर्फीली मेहमाननवाजी


- बिमल श्रीवास्तव
बचपन में हम लोग भूगोल की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ा करते थे कि उत्तरी ध्रुव के आसपास रहने वाले एस्कीमो लोग बर्फ के मैदानों में रहते हैं, रेनडियर (बारहसिंघे जैसा दिखने वाला एक प्रकार का हिरण) पालते हैं तथा बर्फ से बने घरों में रहते हैं जिन्हें इग्लू कहा जाता है। यह भी पढ़ा था कि बर्फ से बने इन इग्लू के बाहर तो इतनी ठंडक रहती है कि पानी जम कर बर्फ बन जाता है किन्तु घरों के अन्दर का भाग अच्छा खासा गर्म रहता है, जिसके कारण एस्कीमो वहां अपने कपड़े तक उतार देते हैं। उस समय हम सोचते थे कि काश हम भी इस प्रकार के बर्फ के घरों में रह पाते।
तो अब यह कामना काफी हद तक पूरी की जा सकती है, क्योंकि अब योरप तथा अमरीका के अनेक भागों में ऐसे होटल बन गए हैं जो केवल बर्फ के बने हैं। उन होटलों में बर्फ की दीवारें, बर्फ की छतें, बर्फ के खंभे और बर्फ के फर्श तो हैं ही, साथ ही बर्फ के बिस्तर (जिन पर फोम के गद्दे हैं), बर्फ के सिनेमा घर, बर्फ के चर्च और यहां तक कि कुर्सियां, मे$ज, कप, प्लेट, मदिरा पान के गिलास और बर्तन तक बर्फ के बने हैं। ओढऩे के लिए वहां रेनडियर की खाल तथा विशेष रूप से तैयार किए गए खोल का उपयोग किया जाता है। जहां तक मदिरा का सवाल है तो अत्यधिक ठंडक के कारण यहां पर बीयर जम कर ठोस हो जाती है, इसीलिए वोडका या वोडका आधारित पेय उपयोग में लाए जाते हैं। कुछ पर्यटक यहां केवल शीत कालीन विवाह के प्रयोजन से आते हैं, जिसके लिए बर्फ के बने चर्च उपयोग में लाए जाते हैं।
आश्चर्य की बात तो यह है कि बर्फ तथा हिम (स्नो) से बनाए गए ये होटल केवल सर्दियों में बनते हैं तथा तीन चार महीनों तक उपयोग के बाद उन्हें तोड़ कर दुबारा पानी के रूप में नदियों में बहा दिया जाता है। अगली सर्दियों में नई ताजी बर्फ से एक बार फिर से बिलकुल नए सिरे से एक नया होटल तैयार किया जाता है, नई डिजाइन, नई वास्तुकला, नए आकार तथा नई सुविधाओं के साथ।
बर्फ से बना सबसे पहला होटल 1990 में उत्तरी स्वीडन के किरुना नगर के यूकसयार्वी नामक स्थान पर बनाया गया था। यह स्थान उत्तर ध्रुवीय क्षेत्र में स्थित आकर्टिक वृत्त से भी 200 किलोमीटर उत्तर में स्थित है, जहां भयंकर शीत लहर का प्रकोप होता है। यह काफी खूबसूरत जगह है, जो अपने घने ध्रुवीय जंगलों, जमी हुई झीलों तथा उत्तर ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देने वाले रहस्यमयी -उत्तरी प्रकाश- के लिए प्रसिद्घ है। यहां पर परिवहन के लिए कुत्तों द्वारा खींची जाने वाली स्लेज गाडियां अथवा स्नो मोबाइल वाहन ही उपयोग में आते हैं तथा यहां अधिकतर पर्यटक गर्मियों में ध्रुवीय क्षेत्रों के पर्यटन का आनन्द लेने के लिए आते थे। किन्तु सर्दियों के आते-आते यह क्षेत्र कड़ाके की ठंड तथा घनघोर अंधेरे से जूझने लगता था तथा वहां बहने वाली टार्ने नदी जम कर ठोस बन जाती थी।
उत्तर ध्रुवीय क्षेत्रों में गर्मियों में पर्यटन के उद्देश्य से भ्रमण सेवाएं चलाने वाली कम्पनी 'यूकस' (जिसका नाम अब 'आइस होटल' हो गया है) को तब यह विचार आया कि इस शीत रूपी प्रकोप का कुछ लाभ उठाया जाए तथा पर्यटकों के लिए आकर्षण की सामग्री बनाई जाए। परीक्षण के तौर पर उस कम्पनी ने जमी हुई टार्ने नदी पर 60 वर्ग मीटर का इग्लू घर बनवाया तथा उसमें फ्रेंच कलाकार की कला प्रदर्शनी लगाई। यह प्रयास काफी लोकप्रिय रहा। उसके बाद कुछ उत्साही युवकों ने उस इग्लू घर में रात बिताने की योजना बनाई। वे रेनडियर की खाल तथा स्लीपिंग बैग लेकर इग्लू में सफलतापूर्वक रात बिताकर सुबह वापस आ गए। और वहीं से बर्फ के होटल की नींव पड़ी।
वर्ष 1990 में जन्मे 60 वर्ग मीटर वाले उस 'आइस होटल' का आकार अब बढ़ कर 5000 वर्ग मीटर हो गया है, उसमें अब 60 कमरे हैं, 25 सुइट्स हैं, बर्फ का बना सिनेमा हाल, बार, बर्फ की कला दीर्घा तथा इस प्रकार के अन्य कई आकर्षण हैं। होटल का एक कमरा तो ऐसा है जहां ठहरने पर 'उत्तर ध्रुवीय प्रकाश' भी देखा जा सकता है। इसके लिए कमरे की छत में एक खिड़की बनाई गई है, जिससे आकाश का दृश्य दिखता है। (वैसे होटल से बाहर निकलने पर 'उत्तर ध्रुवीय प्रकाश' स्वत: ही दिख जाता है।)
इस होटल में प्रतिदिन 14,000 पर्यटक रात्रि में तथा 37,000 दिन में ठहरते हैं। होटल के अन्दर का तापमान लगभग शून्य से चार से नौ डिग्री सेल्सियस कम बना रहता है, जबकि बाहर का तापमान शून्य से चालीस डिग्री नीचे या उससे भी कम रहता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस बर्फीले होटल में रेफ्रीजरेटर भी उपलब्ध हैं, किन्तु उनका काम ची$जों को ठंडा रखना नहीं, बल्कि गर्म रखना है, क्योंकि वस्तुओं को ठंडा करने के लिए उन्हें बाहर रख देना ही पर्याप्त होता है। इन होटलों के कमरों में प्रकाश के लिए ऑप्टिकल फाइबर केबल अथवा मोमबत्तियों की व्यवस्था की जाती है, क्योंकि यहां विद्युत की सप्लाई नहीं होती है।
बर्फीले क्षेत्रों में बर्फ से होटल बनाना सुनने में सरल लगता हो किन्तु यह वास्तव में अत्यंत पेचीदा, खर्चीला एवं इंजीनियरिंग तकनीक से भरपूर कार्य है। निर्माण कार्य प्रति वर्ष अक्टूबर माह में आरम्भ होता है तथा दिसम्बर तक होटल तैयार हो जाता है। निर्माण के उपयोग में आने वाली बर्फ टार्ने नदी से निकाली गई कठोर बर्फ होती है, जिसे आरी से काट- काट कर उनकी लगभग दो- दो टन की बड़ी- बड़ी सिल्लियां तैयार की जाती हैं। (यह कार्य तो मार्च में ही आरंभ हो जाता है तथा सिल्लियों को शीत गृहों में रखा जाता है)। नदी के शुद्घ प्रवाहित जल के उपयोग के कारण ये बर्फ की सिल्लियां साफ व पारदर्शी होती हैं। फिर इन सिल्लियों को निर्माण स्थल तक पहुंचाया जाता है, जहां इनसे होटल की दीवारें, छत आदि बनाई जाती हैं। कठोर बर्फ के अतिरिक्त निर्माण के लिए नदी से निकाले गए बर्फ के चूरे का भी उपयोग किया जाता है, जिसे कुशल इंजीनियरों द्वारा सांचों में भर कर (अथवा तोपनुमा शक्तिशाली मशीनों द्वारा तीव्र गति से हिम के बर्फीले कणों की बौछार कर के) वांछित आकार प्रदान किया जाता है, जिससे छत का भार सहन करने वाले खम्भे तथा होटल के अन्य आवश्यक ढाचों का निर्माण किया जाता है। पूरे होटल को बनाने में लगभग 30,000 टन हिम तथा 4000 टन बर्फ लग जाती है। यह सारी बर्फ जमी हुई टार्ने नदी से उधार के तौर पर लाई जाती है तथा गर्मियां आने पर टार्ने नदी को सधन्यवाद वापस कर दी जाती है।
यह जान कर आश्चर्य होता है कि इतनी सारी बर्फ के बीच खड़ा हुआ होटल अन्दर से गर्म कैसे रह पाता है। इसका कारण यह है कि बर्फ वास्तव में ताप का कुचालक है, अर्थात न तो यह कमरों के अन्दर की गर्मी को बाहर जाने देता है और ना ही बाहर की ठंडक को अन्दर आने देता है। इसी कारण बाहर की कड़क ठंड के बावजूद इन होटलों के यात्रियों के लिए कमरे के अन्दर आरामदायी तापमान बना रहता है।
स्वीडन के 'आइस होटल' की तर्ज पर अब कई देशों में बर्फ के होटल खुल चुके हैं तथा खुलते जा रहे हैं। जैसे बर्फीले देश ग्रीनलैण्ड में होटल इग्लू तथा होटल आकर्टिक बने हैं। नॉर्वे का बर्फ का होटल 'आइस लॉज' समुद्र सतह से 1250 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है इसलिए वह गर्मियों में भी कई महीनों तक बना रहता है। फिनलैण्ड का आल्ता इग्लू होटल भी स्वीडन के 'आइस होटल' की तरह ही अति विकसित होटल है तथा उसमें भी तमाम सुविधाएं उपलब्ध हैं। रोमानिया का बर्फ का होटल वहां की बैलिया नामक झील पर बना है, जो समुद्र सतह से 2034 मीटर की ऊंचाई पर फैगारास पर्वत पर स्थित है। इसे वर्ष 2006 में बनाया गया था।
कनाडा में वर्ष 2000 में क्यूबेक नगर के पास पहला बर्फ का होटल बनाया गया था जो दिसम्बर से अप्रैल तक रहता है। इसमें बर्फ के बने 85 बिस्तर हैं, जिन पर हिरन के फर के अस्तर लगे हैं। इस होटल के निर्माण में 4750 टन बर्फ का उपयोग होता है। इसी प्रकार संयुक्त राज्य अमरीका ने वर्ष 2004 में अलास्का राज्य में ऑरारा आइस होटल नामक बर्फ का होटल बनाया। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि इस होटल को एक वर्ष तक खोले जाने की अनुमति इसलिए नहीं दी गई थी क्योंकि उसमें आग लग जाने की अवस्था में उसे बुझाने के समुचित प्रबंध उपलब्ध नहीं थे। प्रश्न यह उठाया जा रहा था कि क्या बर्फ के बने उस होटल में आग लग सकती थी। किन्तु नियम तो नियम ही होते हैं। इसलिए अग्नि शमन के प्रबंध के बाद वर्ष 2005 में वह होटल खुल पाया।
बर्फ के होटलों की तरह ही कुछ देशों में बर्फ के किले (या महल) भी बनाए जाते हैं, जो सर्दियों में बनते हैं तथा गर्मियों में समाप्त हो जाते हैं। बर्फ का प्रथम ज्ञात किला लगभग पौने दो सौ वर्ष पूर्व रूस के सेंट पीटर्सबर्ग नगर में वहां की तत्कालीन महारानी अन्ना द्वारा बनवाया गया था। वर्ष 2005 से प्रति वर्ष उस स्थान पर बर्फ के किले की अनुकृति बनाई जाती है। इसी प्रकार अन्य कई देशों में बर्फ के किले पर्यटक आकर्षण, मनोरजन या खेलकूद के उद्देश्य से या अन्य कारणों से बनाए जाते हैं। बर्फ के होटल लोकप्रिय होते जा रहे हैं तथा महंगे होने के बावजूद इनमें रहने वाले पर्यटकों की संख्या वर्ष प्रति वर्ष बढ़ती ही जाती है। (स्रोत फीचर्स)

Apr 27, 2009

जंगली भैंसा संसार का सबसे खतरनाक प्राणी

जंगली भैंसा संसार का सबसे खतरनाक प्राणी
-बिमल श्रीवास्तव
भारत की भैंसें तो पालतू भैंसे अर्थात वॉटर बफैलो हैं। किन्तु अफ्रीका के भैंसे किंग बफैलो अथवा केप बफैलो हैं जो कभी पालतू नहीं बनाए जा सकते और बहुत ही खूंखार होते हैं। मौका पडऩे पर तो ये शेर को भी पछाड़ देते हैं।
कुछ वर्ष पूर्व मुझे केन्या की राजधानी नैरोबी के राष्ट्रीय उद्यान में जाने का अवसर मिला था। राष्ट्रीय उद्यान के गाइड नें हमें बताया कि अफ्रीका के पांच बड़ेे पशुओं में शेर, तेंदुआ, हाथी, गैण्डा तथा भैंसे का नाम आता है। इन्हें देखने के लिए यूरोप, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि के पयर्टक टूट-से पड़ते हैं। ये सारे पशु मात्र आकार के कारण नहीं बल्कि इसलिए बड़े कहलाते हैं कि ये अत्यंत खतरनाक होते हैं और यदि ये किसी के पीछे पड़ जाएं तो उसका बच पाना मुश्किल होता है। शुरू के दिनों में जब शिकारी लोग अफ्रीका में शिकार के उद्देश्य से आते थे, तो जो शिकारी इन बड़े पशुओं का शिकार कर लेता था उसे बहुत बहादुर माना जाता था और इन पांच बड़े पशुओं में भी सबसे खतरनाक भैंसे होते हैं।
यह जान कर तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ। मैंने बताया कि भारत में तो भैंसों को हम लोग पालते हैं, उन पर सवारी करते हैं, और तो और उनका दूध भी पीते हैं। अफ्रीकी गाइड ने फौरन टोका। उसने बताया कि भारत की भैंसें तो पालतू भैंसे अर्थात वॉटर बफैलो हैं। किन्तु अफ्रीका के भैंसे किंग बफैलो अथवा केप बफैलो हैं जो कभी पालतू नहीं बनाए जा सकते और बहुत ही खूंखार होते हैं। मौका पडऩे पर तो ये शेर को भी पछाड़ देते हैं। यह सुनकर इन पशुओं के बारे में मेरी जिज्ञासा बढ़ गई। अफ्रीकी भैंसा या केप भैंसा ये जंगली भैंसे मुख्यत: अफ्रीका के मध्य भाग में (सहारा के दक्षिण तथा दक्षिण अफ्रीका के उत्तर में) पाए जाते हैं। जैसे इथोपिया, सोमालिया, जिम्बाब्वे, नमीबिया, बोत्सवाना, मोज़ाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, तथा तंज़ानिया आदि। चरने के लिए ये प्राय: जंगल के आसपास का खुला मैदान पसन्द करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अफ्रीकी भैंसे और भारतीय भैंस रंग-रूप, आकार, खानपान तथा बनावट में एक-दूसरे से बहुत मेल खाते हैं, किन्तु वास्तव में ये दो अलग-अलग प्रजाति के जीव हैं जिनका जीव विज्ञान के अनुसार सम्भवत: निकट का सम्बंध नहींं है। इनकी आदतें भी एकदम अलग-अलग होती हैं। जहां भारतीय भैंस सीधी-साधी, शान्त तथा पालने योग्य होती है, वहीं केप भैंसा अत्यंत बलशाली, खूंखार, हिंसक प्रकृति का तथा बदले की भावना से ग्रस्त होता है। अनुमान है कि पूरे विश्व इतिहास में शिकार के दौरान हिंसक पशुओं द्वारा मारे गए सर्वाधिक शिकारी भैंसों के शिकार हुए हैं। इनसे टक्कर लेने की हिम्मत शेर भी नहीं कर पाता। जब भी शेर इनका शिकार करता है तो उसका निशाना केवल बूढ़े, बीमार या छोटे बच्चे या नौसिखिया भैंसे ही होते हैं। अन्यथा ये अपने नुकीले सींगों तथा शक्तिशाली प्रहार से शेर को गम्भीर रूप से घायल कर सकते हैं, मार भी सकते हैं। इस प्रकार अफ्रीकी भैंसे को संसार का सबसे खतरनाक प्राणी माना जा सकता है। किन्तु यदि इन्हें छेड़ा ना जाए तो सामान्यत: ये नुकसान नहीं पहुंचाते तथा रास्ता छोड़कर अन्दर चले जाते हैं।
अफ्रीकी भैंसे का जीव वैज्ञानिक नाम सिन्सेरस काफर है। इसका भार लगभग 750-900 किलोग्राम (नर) तथा 400- 750 किलोग्राम (मादा) होता है। इनकी ऊंचाई लगभग 1.7 मीटर तक होती है। इनके सींग एक मीटर या उससे भी अधिक लंबे हो सकते हैं। नर लगभग 8 वर्षों में तथा मादाएं लगभग 5 वर्षों में युवा हो जाते हैं। लगभग 11 महीने के गर्भ धारण के बाद मादा एक बच्चे को जन्म देती है। इनका जीवन काल 15 से 23 वर्षों का होता है। ये 15-20 से लेकर 300 या अधिक के विशाल समूहों में रहते हैं तथा घास पर अपना गुज़ारा करते हैं।
किसी ज़माने में अफ्रीकी भैंसों का बहुत अधिक शिकार किया गया था, जिसका प्रमुख प्रयोजन शिकारी की बहादुरी का प्रदर्शन हुआ करता था। ये शिकारी लोग भैंसों के विशाल सींगों को अपने ड्राइगं रूम की शोभा बढ़ाने के काम में लाते थे। अब तो इस प्रकार के शिकार पर प्रतिबन्ध है, किन्तु अभी भी चोरी छुपे अफ्रीका में इनका शिकार होता रहता है। इसके अलावा खेती के लिए भूमि का अधिक उपयोग किए जाने के कारण इनके प्राकृतिक वास भी सिकुड़ गए हैं। इन सभी कारणों से अफ्रीकी भैंसों की संख्या काफी कम हो गई है। फिलहाल इसे कम जोखिम (लो रिस्क) श्रेणी के प्राणियों (श्रेणी सी, डी) में रखा जाता है। अफ्रीकी भैंसे को पालतू बनाने तथा उनका समागम घरेलू भैंसों से कराने के प्रयास भी असफल रहे हैं।
भारतीय भैंस
जब हम भारतीय भैंसों की बात करते हैं, तब तो सारा वातावरण ही बदला नजऱ आता है। कहां वे अफ्रीकी खूंखार भैंसे, और कहां ये पालतू, सीधी-सादी जुगाली करती हुई घरेलू भैंसें, जिनकी पीठ पर बैठे-बैठे छोटे बच्चे, उन्हें हांकते हुए ले जाते हैं। लगभग वही शक्ल, वही आकार, वही रंग-रूप किन्तु फिर भी अलग प्रजाति। वास्तव में भारत में रहने वाले किसी ग्रामीण बच्चे को अफ्रीकी भैंसा दिखाया जाए तो संभवत: वह उसकी पीठ थपथपाने को आगे बढ़ जाए और दूसरी तरफ यदि किसी अफ्रीकी वनवासी को भारतीय भैंस दिखाई जाए तो सम्भवत: वह उससे दूर भागने का प्रयास करे। वैसे केप भैंसों तथा घरेलू भैंसों में प्रमुख अन्तर यह होता है कि केप भैंसों के दोनों सींगों की जड़ें सिर पर लगभग जुड़ी रहती हैं, जबकि एशियाई भैंसों में सींगों की जड़ें काफी दूर-दूर होती हैं। वास्तव में भैंसों का मानव के साथ सदियों पुराना नाता रहा है। सम्भवत: मानव ने भैंसों को ईसा से तीन सदी पूर्व पालना शुरू किया था। भारत की भैंस का वैज्ञानिक नाम बुबालिस है, तथा मुख्यत: ये भारत, पाकिस्तान तथा दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक देशों से लेकर मिस्र आदि तक पाई जाती हैं। यदि इनकी एक और प्रजाति (जिन्हें दलदली भैंसे कहते हैं) को भी शामिल कर लें तो ये भैंसें इन्डोनशिया, चीन, ताईवान, थाईलैण्ड, मलेशिया, फलीपीन्स, बर्मा वगैरह में भी बहुतायत से पाई जाती हैं। भारतीय भैंस का भार 300-400 से लेकर 700-1200 किलोग्राम तक होता है। इनकी ऊंचाई 1.5 से 1.8 मीटर तक होती है तथा रंग अधिकतर काला (या भूरा) होता है। इनके सींग प्राय: वक्राकार होते हैं, जिनकी लम्बाई एक मीटर तक होती है। इनकी पूंछ लम्बी होती है तथा उसके अन्त में बालों का घना गुच्छा होता है।
भैंस लगभग 18 महीने के बाद युवावस्था को प्राप्त कर लेती है तथा लगभग 10 महीने की गर्भावस्था के पश्चात एक या दो बच्चों को जन्म देती है। इन भैंसों को पानी या कीचड़ बहुत पसन्द है। उत्तर भारत में प्रचलित एक मुहावरे (अब गई भैंस पानी में) का अर्थ है कि यदि भैंस एक बार पानी में चली जाए तो उसे बाहर निकालना बहुत ही कठिन है। पानी में घुसकर तथा कीचड़ में लोटकर यह मच्छरों, पिस्सुओं तथा परजीवियों से अपनी रक्षा करती है। भैंस भारत तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का एक लोकप्रिय पशु है, क्योंकि यह कठिन परिस्थितियों को सहने में सक्षम होती है। इन देशों में भैंस को दूध के लिए पाला जाता है। इसके अलावा इनका उपयोग खेती, बोझ ढोने, हल जोतने तथा सवारी, दौड़ आदि के लिए भी किया जाता है। इनकी खाल उत्तम श्रेणी के जूते बनाने के काम आती है। भैंस के मांस को काराबीफ कहते हैं तथा इसमें कम कैलोरी होती है। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में इसका भी बहुत अधिक उपयोग होता है। अधिक चर्बी के कारण भैंस के दूध से मोजरेला चीज़ का निर्माण किया जाता है। वर्ष 1992 में सम्पूर्ण विश्व में भैंसों की कुल संख्या लगभग 14.8 करोड़ आंकी गई थी। इनमें से 95 प्रतिशत केवल एशिया में थीं। इनकी सबसे अधिक संख्या भारत में (8.2 करोड़) और चीन (2.2 करोड़) थी। पाकिस्तान तीसरे स्थान पर था। भारत की प्रसिद्ध भैंसों में मुर्रा, नीली रावी, जफ़राबादी, सूरती, मेहसाना, कुण्डी, नागपुरी आदि हैं। इनमें सबसे अधिक दूध देने वाली मुर्रा भैंस होती है। वैसे सबसे अधिक प्रचलित तो यहां की देशी भैंस है। भारत में भारतीय बाइसन (अरना भैंसा) नामक जंगली भैंसे की एक प्रजाति पाई जाती है, जिसका वैज्ञानिक नाम बूबलिस है। यह अधिकतर असम तथा देश के अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों, और भूटान व नेपाल में पाया जाता है।
जल भैंसें
दक्षिण-पूर्व एशिया, इन्डोनेशिया, मलेशिया, फिलीपीन्स, म्यांमार, चीन, लाओस, वियतनाम, ताईवान आदि में एक अलग प्रजाति की भैंस पाई जाती है, जिसे दलदली भैंस या स्वैम्प बफैलो कहते हैं। इसका जीव वैज्ञानिक नाम बुबालुस काराबान्सिस है। इसका रंग भूरा, पीठ चौड़ी, तथा सींग सीधे तथा पीछे की ओर फैले होते हैं। ये भैंसें खेती तथा बोझा ढोने के लिए उपयुक्त होती हैं मगर दूध कम देती हैं। इन देशों में भैसों से शारीरिक श्रम का बहुत काम लिया जाता है।
दलदली भैंस
फिलीपीन्स में दलदली भैंस जिसका स्थानीय नाम काराबाओ है - की बहुत महत्ता है तथा इसे वहां का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है। इसे विभिन्न पर्यटन पुस्तिकाओं, डाक टिकटों तथा प्रचार सामग्री में दर्शाया जाता है। ऑस्ट्रेलिया में भी भैंसें पाई जाती हैं, जो पिछली सदी में बोझा ढोने तथा मांस के लिए आयात की गई थीं। इसके अलावा कई पालतू भैंसें ऑस्ट्रेलिया में पुन: जंगली भैंसों में परिवर्तित हो गई हैं। उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के देशों (जैसे, ईरान, मिस्र, ट्यूनीशिया आदि) में भी थोड़ी भिन्न प्रकार की जल भैंसें पाई जाती हैं। भैंस का आयात अफ्रीका तथा यूरोप में भी किया गया है। वहां पर इसके पशु फार्म स्थापित किए गए हैं। वर्ष 1978 में अमरीका में लगभग 50 भैंसों का आयात किया गया था। इसके बाद वहां पर कम कैलोरी युक्त मांस तथा मोजरेला चीज़ के उत्पादन के उद्देश्य से इनका प्रजनन कराने का प्रयास किया गया। आजकल अमरीका में लगभग 3500 भैंसें पल रही हैं।
उत्तरी अमरीका में एक और प्रकार का भैंसा पाया जाता है जिसे बाइसन कहते हैं। यह अन्य भैंसों से भिन्न होता है। जीव विज्ञान की भाषा में यह बाइसन (मैदानी भैंसा) तथा अथाबास्क (जंगली भैंसा) कहलाता है। यह एक विशाल प्राणी है, जिसके कन्धों पर एक कूबड़ होता है, सींग छोटे तथा सिर बड़ा होता है। इसकी ऊंचाई 2 मीटर, लम्बाई 2.7 से 3.7 मीटर तथा भार 850 से 1100 किलोग्राम होता है। इसके शरीर पर घने बाल होते है तथा नर के मुंह पर लगभग 30 से.मी. दाढ़ी होती है। यह प्राणी भैंस की बजाय गौवंश का निकट सम्बंधी माना जा सकता है, यद्यपि इसे अमरीका मे भैंसा ही कहते हैं। लगभग 8-9 महीने की गर्भावस्था के पश्चात मादा एक बच्चे को जन्म देती है।
उन्नीसवीं सदी तक अमरीका, कनाडा तथा मेक्सिको में इन प्राणियों के विशाल समूह पाए जाते थे, जिनकी कुल संख्या 6 करोड़ तक आंकी गई थी। किन्तु इनके मांस, खाल तथा अन्य कारणों से इनका अंधाधुन्ध शिकार किया गया जिससे इनकी संख्या में बहुत कमी आई और वर्ष 1839 तक वह घट कर 1000 से भी कम रह गई थी। आज कल संरक्षित क्षेत्रों तथा निजी उद्यानों में इनकी संख्या लगभग दो लाख तक पहुंच गई है। (स्रोत)