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Oct 1, 2026

सॉनेटः मुक्त हो जाओ

- अनिमा दास 


त्याग दूँ.. स्मृतियों की भावपूर्ण उर्मियों को

कि हृदयार्णव हो जाए निश्चल व गरलमय 

अभेद्य अध्वर की असहायता में है श्वास जो

हो भस्म में सुगंध श्मशान हो मेरा निलय 

 

मैं नहीं ककुंजल जो करूँ प्रतीक्षा सुधा वृष्टि की 

अनंत काल रहूँ नीरव मुद्रा में तीव्र निदाघ लिये 

प्रश्न करती रहूँगी कि 'शेष जन्म में क्या मैं थी?'

त्याग दूँ वे प्रश्न भी जो मुझे निसर्ग से कभी मिले।

 

मेरे अंतः के अतल गह्वर में उद्विग्न शाखाओं पर 

अपवादों के पक्षिदल करते अनवरत कोलाहल

कुहेलिका से पूर्ण चतुर्पार्श्व चित्रित व्यथा का नगर 

विक्षिप्त विरहिणी है विश्वास की वैशाली विह्वल

 

शीघ्र हो जाओ दूरत्व में मिलित ऐ व्यथा -अनुक्त 

हो जाओ शून्य में ॐ..नील शिखा से सदा मुक्त।


May 1, 2026

सॉनेटः इस समय

  - अनिमा दास 

इस समय मैं, तुमसे नहीं करती कोई संवाद 

शून्याकाश की मौन कविता में अभी हूँ लीन 

मुझे स्पर्श नहीं करते शब्द-वाण, कटु निनाद 

मैं नहीं हूँ किसी ध्वनि में, न हूँ उसकी अधीन।

 

इस समय मैं,हूँ आबद्ध स्वयं की प्रतिच्छाया में 

सर्वशेष महोदधि में एक क्षुद्र जलकण लवणीय 

लुप्तप्राय मेरा सत्व होने मुक्त अभिशप्त ग्रह से 

होता वेगहीन विस्मृत कर प्राक कथा मोहनीय।

 

इस समय, विष की वर्षा में ज्वलन है अतिशय 

हाँ! अद्य हुआ है श्रीहीन मेरे भाग का वृन्दावन 

हृदय नहीं है यमुना-तट की सुरभि में नृत्यमय 

प्राण-पीयूष हो रहा शुष्क, शून्य हो रहा कानन।

 

इस समय,मयूर-वर्ण व्यथा हो रही अर्ध जीवित  

अंत क्यों नहीं है गतिमय श्वास का, क्यों है प्रथित?


Apr 1, 2025

सॉनेटः निर्दिष्ट दिशा में






 - अनिमा दास 

एक संकेत सा.. एक रहस्य सा.. काव्य प्रेयसी के घनत्व में 

रहते हो तुम, हे कवि! तुम अनंत रश्मियों का हो एक बिंदु 

नहीं होते जब तुम परिभाषित अनेक शब्दों में.. अपनत्व में 

नक्षत्रों में होते तुम उद्भासित बन संपूर्ण अंतरिक्षीय सिन्धु 

 

मेरे जैसे कई कहते हैं तुम लघु में हो वृहद.. वृहद में अनंत 

जब घन अरण्य में चंचल होती चंद्र-किरण, मैं कहती हूँ 

कविवर के शब्द पंच रूप से हो निस्सृत सप्त अक्षर पर्यंत 

पुनः पंच रूप में होते आबद्ध, मैं उस चित्रकल्प में रहती हूँ 

 

प्रत्येक छंद में संचरित प्राण.. तमस में भी होता आलोकित 

यह प्रकाश.. यह निर्झर..शैलशीर्ष की यह लालिमा समस्त 

करते प्रश्न.. कहो कवि कैसे तुम वर्णमाला को किए जीवित 

क्या ये वही अर्ण हैं, जो तुम्हें किया है पाठक हृदयाधीनस्थ? 

 

तुम्हारे अवतरण से महार्णव की शुभ्र-उर्मियाँ हुईं काव्यमय 

हुई महीयसी, कथा हुई संपूर्णा..प्रस्फुटित हुआ किसलय। 


Aug 1, 2023

सॉनेटः श्रावण की शुष्कता


 





-   प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

नैराश्य की हाला अंतस में जब प्राणों तक भर जाती है

श्रावण की शुष्कता उदासीन चंचल मन को भरमाती है

जिससे चाहा सुख अंजुरि भर उसने क्यों कर यूँ  ठुकराया

घनघोर उपेक्षा से आहत पागल मनवा ये भरपाया।


है उथल-पुथल इस जीवन में है ग्रस्त व्याधियों से ये तन

और व्यथा की सरिता में डूबा रहता है मेरा भावुक मन

भोगी मैंने पीड़ा अनंत पर मौन सदा को साध लिया

कड़वाहट को नित पी- पीकर जीवन कैसा भरपूर जिया?


हँस हँस कर जीना सीख लिया अब तो मुझको विश्रांति मिले

क्या समय कभी वो आएगा जब आशा का कोई पुष्प खिले?

कब होगा पुण्य उदय मेरा, सोया सा भाग्य मुस्काएगा ?

कोई  मेरा प्रियतम बनकर , आ मुझको गले लगाएगा ?


हो घना तमस जब चहुँ दिस में तब लगे शून्यता ही प्रियकर

किस किस का मैं प्रतिकार करूँ अब तुम्ही बता दो हे प्रियवर!

*******

(विभागाध्यक्ष, अंग्रेजी ), ग़ज़लकार एवं सॉनेटियर, सागर, मध्यप्रदेश

Jul 1, 2023

सॉनेटः तितली के पँखों पर

    





    - अनिमा दास

‘असमर्थ हो’ जग ने कहा, ‘समर्थ हूँ’ मैंने कहा 

दिव्यांगता की कहानी में मेरा नाम सदा ही रहा

'संपूर्ण नहीं हो' उसने कहा, दो बूँद अश्रु गए ढल 

पीड़ा से मुक्ति चाहता था मैं.. काँपता रहा अंतस्थल। 


विकलता के चरम पर, लगता मुझे सर्वोच्च शृंग शिखर ?

मैंने सरीसृप- सा रेंगते हुए छू लिया अंततः ..पद प्रस्तर

त्यागा कितनों ने, अभिशाप, लांछन व तिरस्कार दिए? 

मैं नहीं, मेरे अंग हैं विवश.. कहा, नव संकल्प लिए।


मानव मंत्र अथवा परिवर्तन तंत्र, का करते मिथ्या चिंतन

असहायता के निर्मम सेतु पर क्यों सो रहा यह जीवन?

तुमने बनाया? उसने बनाया? या किसने है बनाया?

मेरे अंग दिव्य हैं, अतः मैं दिव्य हूँ, ईश्वर ने ही बताया।


मैं भी लाँघ जाऊँगा नदी.. निर्झर..शैल कभी नदराज

चढ़कर तितली के पंखों पर छू आऊँगा मैं हिमताज।।


- कटक, ओड़िशा


Feb 1, 2023

सॉनेटः प्रेम है अपना अधूरा

- प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

मेघ संतापों के काले, व्योम पर छाए

और पीड़ा भी सघन सी, साथ में लाए

सोचता ही रह गया मैं पी गया हाला

अंग में प्रत्येक मेरे चुभ रहा भाला।

 

पुष्प सा महका न जीवन, कष्ट है भारी

नेत्र करके बंद बैठे, रैन भर सारी

धमनियों में रक्त बहता, पर निराशा है

श्वाँस है अवरुद्ध मेरी, दूर आशा है।

 

प्रेम अपना है अधूरा, सच अटल जानो

है तृषा का वास उर मे, यह सहज मानो

हार कर बाजी डगर में, रुक नहीं जाना

ध्येय हो मिल कर हमारा, लक्ष्य को पाना।

 

है यही अब चाह उर में, बस तुम्हें पाऊँ।

भाग्य पर अपने सदा ही, नित्य इतराऊँ।।

 

सम्पर्कः सागर, मध्यप्रदेश, Mail id - <nand.nitya250
@gmail.com, दूरभाष- 7974524871

Dec 2, 2022

सॉनेटः कादंबरी

  - प्रो. विनीत मोहन औदिच्य

शृंगों पर आच्छादित स्वर्णिम परतें  हृदय हुआ कुसुमित

उसकी चिट्ठी पर लगे सिंदूर- सा नभ हुआ आलोकित

सभी शब्द आए ओढ़कर व्यर्थ अभिमान की चादर

भूल गया मैं लिखना उत्तर जो नयनों में उभरा आदर।

 

उतर आया मैं संग पश्चिमी तट पर लिये  अनेक सितारे

किंतु लिख नहीं पाया मम प्रेयसी के स्वर भीगे इशारे

ये मौन शिलाएँ कह रहीं जैसे वो लिये हों सपने हजार

किंतु निशा भी तो गुफाओं में छुपी- सी लिए निद्रा अपार।


 स्वर्ण- मंडित शिखरों से यह प्रश्न करना है अकारण

अंबर का आँचल क्यों है मात्र उनके लिए आवरण

व्यथा की अपेक्षा शीतल पवन समेटे है  विस्फोटक चिंगारी

मैं नहीं, यह घना अंधकार ही कहेगा स्वयं की पीड़ाएँ सारी।


 चलो, कादंबरी!अलकों को समेटों नभ के गहरे नीलेपन से

मैं चन्द्रापीड तुम्हे क्षितिज तक ले चलूँ दूर अधूरेपन से।

सम्पर्कः सागर, मध्यप्रदेश, nand.nitya250@gmail.com