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Apr 1, 2026

संस्मरणः कमली तू आ गई...

  - देवी नागरानी

मुझसे दो दशक छोटी; पर सोच के विस्तार में उसका किरदार मुझसे दो क़दम आगे और ऊँचा।  ऐसी ही एक मानवी ने जब रिश्तों के निबाह और निर्वाह पर निकली बात पर अपने रिश्ते को लेकर आप- बीती सुनाई, तो सच मानिए, दो तीन दिन तक मैं उस मानसिकता के बाहर न आ पाई।                                                                  

उसका कथन- “मैं पाँच बजे काम से रुखसत पाकर छह-साढ़े छह के बीच जब घर पहुँचती हूँ, तो लगता है सभी मेरे इंतजार में मायूस सन्नाटों को जी रहे होते हैं: घर के दर-दरीचे, बिस्तर पर लेटे मेरे अपाहिज पिता, माँ की देखभाल करने वाली अम्मा और मेरी माँ, जिसकी आँखें निरंतर चारों ओर घूमने की आदी होकर जाने क्या कुछ ढूँढते हुए जब मुझपर आकर टिकती है तो वह कह उठती है- “आ गई कमली!” और तत्पश्चात् वह सुकून से सो जाती है।  “पर तुम्हारा नाम तो बीबा है न ?” मैंने विस्मय में पूछा                                                                            

 “हाँ मेरी माँ का नाम कमला है, और वह अपनी इस अविकसित अवस्था में मुझको कमली के नाम से पहचानती है।”

सुनकर एक अजीब- सी सिहरन शरीर में लहरा उठी, लगा कहीं दिमाग में बिजली कौंध उठी।  माँ अपने बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करते करते ममत्व को साधना की हदों तक ले जाने की अवस्था में अपने आप को इस कद्र भूल जाती है कि उसे अहसास मात्र नहीं रहता कि उसका अपना वजूद बच्चों में समावेश कर गया है।

मैं इस समय यहाँ A.I.R स्टेशन में सिन्धी रिकॉर्डिंग की इन्चार्ज मिस बीबा के केबिन में बैठी रिश्तों की उन गूढ़ रहस्यमय स्थिति के बारे में सोचती रही।  कभी लगता है हमारी सोच भी किन हदों में जकड़ी हुई है, जिसका हमें इल्म ही नहीं। विकसित- अविकसित अवस्थाओं से परे अंतःकरण में भी कई गुफाएँ हैं जो हमें हर बंधन से, हर सीमा से पार करते कराते हमें अपने आप से जोड़ती है। और इन बातों का महत्त्व सिर्फ बीबे जैसे बेटी ही समझ सकती, जिसने माता-पिता की देखरेख के लिए अब तक शादी नहीं की है।

रिश्ता वो ही निभाएगा ‘देवी’ जिसको रिश्ता समझ में आया है। 

सोच को ब्रेक देते हुए मैंने बीबा से पूछा- “इस अवस्था में माँ कितने दिन से है?”   

“कुछ एक साल के क़रीब हुआ है और उनकी यह प्रतिक्रिया- मुझे कमली कहकर पुकारना, और उस रूप में ढूँढना, सामने देखकर राहत महसूस करना, खुद मुझे हैरत में डाल देती है। उनके मनोभावों को जानते हुए जैसे ही मैं घर में पाँव रखती हूँ, उनके सामने जाकर खड़ी हो जाती हूँ, जब तक वह अपनी आँखें घुमाते हुए मुझ पर टिकाकर यह नहीं कहती- “कमली तू आ गई!” 

कुछ पल रुककर बीबा कहने लगी- “अपने आपे- से बाहर की अवस्था और खुद से भीतर जुड़ने की अवस्था का नाम ही शायद ममता है और वह है मेरी माँ कमली।”                                    

उसके कहने और मेरे सुनने के बीच का वक़्त जैसे ठहर गया। मैं कितनी सदियाँ पीछे लाँघ आई थी यह मैंने तब जाना, जब उसकी आवाज़ ने मुझमें चेतना लौटाई :

“ मैडम जी आपकी चाय ठंडी हो रही है।”

मैं याद के भूल - भुलैया में खो जाती हूँ।  शायद वे मेरे ज़हन में अपना स्थान बना बैठी हैं।  बारी-  बारी वे इन झरोखों से सांस लेने आ जाती है।

अब तो सिर्फ यही, बाकी कुछ और याद आने पर... 

email- dnangrani@gmail.com


Dec 3, 2025

अतीत के पन्ने सेः विस्थापन के दौर की बिखरती यादें

 - देवी नागरानी

सिन्धी, सिन्धु घाटी सभ्यता के मानव जाति के वंशज हैं। सिन्धु नदी के तट पर रचित वेदों-ग्रंथों की महान और आदर्श संस्कृति और सभ्यता हमारे ही पूर्वजों की देन हैं। वैदिक-संस्कृति की नींव रखने वाले सिन्धु सभ्यता के ही लोग है।

संसार के इतिहास में कठिन से कठिन परिस्थितियों में इतनी बड़ी संख्या में मानवीय पलायन नहीं हुआ, जैसा भारत -विभाजन के वक़्त हुआ। यह अपने आप में एक अजीबो-ग़रीब इतिहास है, जिसने जुड़वाँ ज़ख़्मी देशों को जन्म दिया और एक सिन्धु सभ्यता की सम्पूर्ण जाति को दर-ब-दर की ठोकरें खाने को छोड़ दिया, जो संसार की प्राचीनतम गौरवपूर्ण संस्कृति की जन्मदाता और वारिस हैं।

बस जिसका दर्द वही जाने? कई दिलजले शायर व लेखकों ने उन रिसते हुए ज़ख्मों को अपनी कलम से उस पिघलते लावे को अपने अंदाज़ में परिभाषित करते हुए अभिव्यक्त किया है। मैंने भी इस ओर अपने मन की भावना को यों लिखा है:

उस शिकारी से ये पूछो पर क़तरना भी है क्या

पर कटे पंछी से पूछो ऊँचा उड़ना भी है क्या?

आशियाना ढूँढते हैं, शाख़ से बिछड़े हुए

गिरते उन पत्तों से पूछो, आशियाना भी है क्या? -देवी

विभाजन का दौर मानवीय इतिहास का एक ऐसा वक़्त रहा जिसमें विषम परिस्थितियों की आँधी, शांति, सद्भावना, पारस्परिक संबंध और मानवीय मूल्यों के कोमल हरे-भरे अंकुरों को उजाड़कर नष्ट करता रहा। प्रताड़ना के रेखांकित चिह्न वक़्त की दीवारों में चुने जाने के बावजूद भी रह-रहकर सिसकियाँ भरते रहे हैं, अपने वजूद की तलाश में खामोश खंडहरो में भटकते रहे हैं। इक़बाल का यह शेर इसी दशा को परिभाषित कर रहा है...

ढूँढता फिर रहा हूँ मैं, इकबाल अपने आपको

आप ही गोया मुसाफिर, आप ही मंज़िल हूँ मैं

इस बँटवारे के परिणामस्वरूप विश्व के इतिहास में इतनी संख्या में लोगों का विस्थापन एवं पलायन कभी नहीं हुआ था। अमानुषता ने मानवता की दहलीज़ पर नारी उत्पीड़न की त्रासदी, विस्थापिता, अपहृता बलात्कृता एवं नारियों की अतृप्त आत्माओं की प्रताड़ना ने आज तक उन घावों का मुकम्मिल मरहम नहीं पाया है।

ऐसा परिवर्तन एक खतरनाक षड्यंत्र की तरह आता है या लाया जाता है। यह ऐसे धीमे ज़हर की तरह है कि इन्सानियत मृत्यु की तरफ़ तो बढ़ती हैं; लेकिन आदम उसे विकास का नाम पर आगे और आगे ले जाने में प्रयासरत रहता है। विकास के पुराने और नए मूल्यों में कोई संधि नज़र नहीं आती। पहले समाज के लोगों के भले के लिए प्रयत्न हुआ करते थे, अब हर कार्य को करने के पीछे एक बौद्धिक आधार होता है। अब वे प्रयास, सियासत की चौखट पर व्यापार और सौदेबाज़ी की दुकानें- सी लगने लगे हैं।

उस दौर और इस दौर के बीच, यादों की टँगी हुई भद्दी दीवार कभी नहीं हटी, आज भी लेखक अपनी क़लम की नोक से कभी कविता, कभी संस्मरण, या कहानी-नावेल का स्वरूप देकर उसे दर्ज करने को तत्पर रहते हैं, उनका लेखन कहीं न कहीं विभाजन के पहले और बाद के दर्द की परछाइयों की तस्वीर सामने ले ही आता है।

यह उस समय की बात है जब सिन्धी शरणार्थी बनकर अपनी अना की धज्जियाँ उड़ते हुए देखकर भी कुछ न कर सके। कितने ही ख़ानदानों के जलते चराग़ बुझ गए। अनेक नारियों को क़त्ल करके अपने ही घर आँगन में दफन किया गया, पर शायद अपनी धरती माँ का कर्ज़ चुकाने की खातिर, न्याय के नाम पर यह अन्याय होने लगा। इस प्रलय काल के पश्चात् बर्फ़ की तरह जमा हुआ यह अहसास चट्टान बनकर ठहर सा गया है कि भारत की आजादी पर बलि के बकरे बने सिन्धी अपनी जान की आहुति देते हुए मौत से होली खेल रहे थे।

इस देश और उस देश के बीच में बँटी हुई ज़िंदगी से समझौता करने को विस्थापित इंसान मजबूर रहा, वर्ना कौन अपने देश की आज़ाद फिज़ाओं को छोड़कर, अपनी जड़ों से उखड़कर नव निर्माण की राह का पथिक बनना चाहेगा?

यही दर्द सीने में लिए हुए आज एक लेखक क़लम की नोक से अपनी जीवन गाथा के अंश व्यक्त करते हुए अपनी आपबीती को जगबीती से जोड़ पाता है, जिसमें हृदय का अहसास धड़कता है, जिसमें शामिल हैं- हालात की साज़िश, मुफ़लिसी, बेरोज़गारी, अमानुषता, कहीं खुशहाली, कहीं बेबसी, बीमारी, दरिंदगी, उसूलों की बलि, हद-सरहद पर फ़सादों के जंगल! प्यार नफ़रत की फ़स्ल से पनपती इन्सानियत व मज़हबी टकराव के बारे में पढ़कर आम आदमी अपने ही भाई-बंधुओं के दुख सुख का परिचय पाता है। इसलिए लेखन का रूप भी गतिशील है, वह विस्तृत, विकसित एवं परिवर्तित स्वरुप में सामने आ रहा है।

सिन्धी कौम के वजूद में अज़ाब की दास्ताँ लम्बी है। विभाजन का दर्द नसों में लहू बनकर दौड़ रहा है। लेखकों की रचनात्मक लेखन देश, काल और भाषा की सारी दूरियाँ तमाम फ़ासलों को उलाँघती आ रहा है।

विस्थापन के दौर की बिखरती यादों की धुँधली तस्वीर सामने आते ही वे करह उठाते हैं, जहाँ दर्द को ही दारू समझकर पी लेने के सिवा कोई और चारा बाकी नहीं रह जाता। लेखक अपने-पराये दर्द से परे कुछ भावनात्मक संधि की चौखट पर अनेक किरदारों के माध्यम से उस रिसती हुई पीड़ा को अभिव्यक्त करता रहा, जो मानव के जीवन का हिस्सा बनी। वे दर्द की लकीरें आज भी कहीं न कहीं दिल की दीवारों को खुरचकर बरबस उन जिए हुए पलों की याद दिलाती है। देखा जाए, तो विभाजन देशों का हुआ है, दिलों की लकीरें अब भी जुड़ी हुई हैं।

दर्द की इस गाथा ने सिंध के लेखकों के दिलों में यही भाव बीज साहित्य की सरज़मीन पर बोए हैं। मैंने इस महायज्ञ में सिन्ध-हिन्द के सिन्धी कथाकारों की अनेक कहानियाँ अरबी सिन्धी से हिंदी में अनुवाद किया हैं। इसी ख्वाहिश से कि सिन्धी साहित्य हिन्दी के अदब और अदीबों के बीच पनपता रहे और हम बिन प्रांत के सिन्धी भाषी एक जुट होकर अपनी भाषा और पुरातन साहित्य को हिंदी साहित्य की धारा में सुरक्षित रख पाएँ।

Mar 1, 2025

संस्मरणः ममता का मूल्यांकन

  - देवी नागरानी 

मुझसे दो दशक छोटी पर सोच के विस्तार में उसका किरदार मुझसे दो क़दम आगे और ऊँचा।  ऐसी ही एक मानवी ने जब रिश्तों के निर्वाह पर निकली बात पर अपने रिश्ते को लेकर आप- बीती सुनाई, तो सच मानिए, दो तीन दिन तक मैं उस मानसिकता के बाहर न आ पाई।                                     

उसका कथन- “मैं पाँच बजे काम से रुखसत पाकर छह-साढ़े छह के बीच जब घर पहुँचती हूँ, तो लगता है सभी मेरे इंतजार में मायूस सन्नाटों को जी रहे होते हैं: घर के दर-दरीचे, बिस्तर पर लेटे मेरे अपाहिज पिता, माँ की देखभाल करने वाली अम्मा और मेरी माँ, जिसकी आँखें निरंतर चारों ओर घूम ने की आदी होकर जाने क्या कुछ ढूँढते हुए जब मुझपर आकर टिकती है, तो वह कह उठती है- “आ गई कमली!” और तत्पश्चात वह सुकून से सो जाती है।  “पर तुम्हारा नाम तो बीबा है न ?” -मैंने विस्मय में पूछा                                                                            

 “हाँ मेरी माँ का नाम कमला है, और वह अपनी इस अविकसित अवस्था में मुझको कमली के नाम से पहचानती है।’’

सुनकर एक अजीब- सी सिहरन शरीर में लहरा उठी, लगा कहीं दिमाग में बिजली कौंध उठी.  माँ अपने बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करते करते ममत्व को साधना की हदों तक ले जाने की अवस्था में अपने आप को इस कद्र भूल जाती है कि उसे अहसास मात्र नहीं रहता कि उसका अपना वजूद बच्चों में समावेश कर गया है।

मैं इस समय यहाँ A.I.R स्टेशन में सिन्धी रिकॉर्डिंग की इन्चार्ज मिस बीबा के केबिन में बैठी रिश्तों की उन गूढ़ रहस्यमय स्थिति के बारे में सोचती रही।  कभी लगता है- हमारी सोच भी किन हदों में जकड़ी हुई है, जिसका हमें इल्म ही नहीं. विकसित- अविकसित अवस्थाओं से परे अंतःकरण में भी कई गुफाएँ हैं जो हमें हर बंधन से, हर सीमा से पार करते कराते हमें अपने आप से जोड़ती है. और इन बातों का महत्त्व सिर्फ बीबे जैसे बेटी ही समझ सकती, जिसने माता-पिता की देखरेख के लिए अब तक शादी नहीं की है.

‘‘रिश्ता वो ही निभाएगा ‘देवी’ जिसको रिश्ता समझ में आया है।’’ 

सोच को ब्रेक देते हुए मैंने बीबा से पूछा- “इस अवस्था में माँ कितने दिन से है?”   

“कुछ एक साल के क़रीब हुआ है और उनकी यह प्रतिक्रिया- मुझे कमली कहकर पुकारना, और उस रूप में ढूँढना, सामने देखकर राहत महसूस करना, खुद मुझे हैरत में डाल देती है। उनके मनोभावों को जानते हुए जैसे ही मैं घर में पाँव रखती हूँ, उनके सामने जाकर खड़ी हो जाती हूँ, जब तक वह अपनी आँखें घुमाते हुए मुझ पर टिकाकर यह नहीं कहती- “कमली तू आ गई!” 

कुछ पल रुककर बीबा कहने लगी- “अपने आपे- से बाहर की अवस्था और खुद से भीतर जुड़ने की अवस्था का नाम ही शायद ममता है और वह है मेरी माँ कमली।”                                    

उसके कहने और मेरे सुनने के बीच का वक़्त जैसे ठहर गया। मैं कितनी सदियाँ पीछे लाँघ आई थीं, यह मैंने तब जाना जब उसकी आवाज़ ने मुझमें चेतना लौटाई- “ मैडम जी आपकी चाय ठंडी हो रही है।’’

मैं याद के भूल - भुलैया में खो जाती हूँ।  शायद वे मेरे ज़हन में अपना स्थान बना बैठी हैं. बारी -  बारी वे इन झरोखों से सांस लेने आ जाती है.

अब तो सिर्फ यही, बाकी कुछ और याद आने पर...

dnangrani@gmail.com


Feb 3, 2024

संस्मरणः एक खूबसूरत तस्वीर

 - देवी नागरानी

बचपन की यादों में शामिल है उस कॉन्वेंट स्कूल के दिन, जहाँ क्रिश्चियन माहौल में चारों ओर शिक्षिकाओं के स्थान पर वहाँ स्थापित मठवासिनी महिलाएँ हमें दो तीन बार गिरिजाघर ले जातीं, जहाँ हम स्कूल के कार्यक्रम के बीच प्रतिदिन दो बार घुटने टेककर, सभी दिशाओं में हाथों को माथे और छाती से लगाते हुए प्रार्थना करते। यह आदत दिल में इस कदर समा गई कि बाद में यह दिल की धड़कन के साथ घुलमिल गई। 

आज 6 अप्रैल 2018 को, ‘होली नेम’ अस्पताल के cardiac थेरेपी सेंटर की ओर से मुझे ले जाने वाली गाड़ी की मेडिकल एस्कॉर्ट ड्राइवर ने वही किया, जब हम एक चर्च को पार कर रहे थे। उसकी आँखों की चमकीली नज़र और गाड़ी चलाते समय शांतिपूर्ण हावभाव ने मेरा ध्यान खींचा और मैं उसके साथ बातचीत करने के लिए लालायित हो उठी।  मैं उसकी ड्राइविंग सीट के बगल में बैठी थी। 

‘क्या मैं आपका नाम जान सकती हूँ?’ मैंने गुफ्तगू का आगाज़ किया। 

इडेलका ... मुस्कुराते हुए उसने मेरी तरफ देखा।

यह एक भारतीय नाम ‘अलका’ की तरह लगता है’ ... मैंने बातचीत को लंबा करने के इरादे से कहा।

ओह, आप भारत से हैं। आप अच्छी अंग्रेजी बोल लेती हैं’। उसने मेरी ओर देखते हुए कहा। 

ओह धन्यवाद। इतना कहकर मैं कुछ देर चुप रही।

  cardic थेरेपी सेंटर का रास्ता करीब 18 मिनट का था। इसलिए मेरे पास उस महिला से बात करने और उसके बारे में और जानने का समय था। मौन के छोटे से अंतराल को तोड़ते हुए मैंने एक प्रश्न के साथ शुरुआत की….

‘आपको गाड़ी चलाना, लोगों को अलग- अलग जगहों से लेना, फिर उन्हें वापस छोड़ना, कभी-कभी उनकी मदद करने का यह काम कैसा लगता है? इस ठंड के मौसम में यह आसान नहीं है?’

‘हाँ मुझे पता है। मेरे पास एक पूर्णकालिक नौकरी है और यह मेरी अंशकालिक नौकरी है, सप्ताह में तीन बार, मंगलवार, गुरुवार और शनिवार। इसका मुझे अच्छा भुगतान मिल जाता है, इसलिए…’

‘फिर तो आप यकीनन घर देर से पहुँचती होंगी?’ मैंने अचानक यह अनुमान लगाना बंद कर दिया कि वह घुसपैठ करना पसंद नहीं कर सकती। 

‘जी सच कहा’,  पर हम परिवार के सब लोग मिलजुलकर सँभाल लेते हैं।  

मैंने महसूस किया कि इस देश में सबको व्यस्त रहना अच्छा है,  क्योंकि यह एक मजबूत वित्तीय स्थिति, अनुभव और नई चीजें सीखने के अवसर भी देता है।

‘क्या एक नौकरी से काम नहीं चल पाता?’ मैंने सवालिया नज़रों से उसकी ओर देखा। 

‘जी नहीं, मुझे अपने परिवार और बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, इसलिए यह पार्ट टाइम कार्य कर रही हूँ।’

‘आपके कितने बच्चे हैं?’ मैंने एक तरह से माँ के दिल को छुआ।

‘छह बेटियाँ' और वह रहस्यमय ढंग से मुस्कुराई।

‘छह बेटियाँ...1’ मेरी प्रतिक्रिया पर उसने गर्दन मोड़कर मेरी ओर देखा।

‘हाँ... तीन अपनी और तीन गोद ली हुई ...’

‘दिलचस्प है... गोद ली हुई बेटियाँ?’  मैंने आँखों में तैरते कई सवालों के साथ उसकी ओर देखा। मेरी हैरान करने वाली प्रतिक्रिया को एक स्पष्ट पारदर्शी जवाब मिला, जब उसने कहा- “बस उन लड़कियों को अपनाना चाहती थी, जो अनाथ थीं या फिर जिनके सौतेले पिता थे।’

मेरा दिमाग पूरी तरह से असमंजस में था, उसके स्पष्ट जवाबों के बावजूद भी सीधे सोच नहीं पाई।

‘यह निर्णय आपका रहा या अपके पति का?’

‘मेरा…।’

‘उनका रिएक्शन क्या रहा उस समय?’ 

‘वे बिल्कुल भी तैयार नहीं थे, इस तथ्य के साथ कि हमारी अपनी बेटियाँ हैं, गोद क्यों लें? इसके अलावा वह इस कारण से बहुत अनिच्छुक थे कि इससे उनके खर्च और बच्चों की ज़रूरत से जुड़ी हर चीज़ की माँग बढ़ जाएगी।’

‘फिर...’

‘मैं अडिग थी और कुछ समय में हमने मिलकर तीन लड़कियों को अपनाया। पहले कुछ मुश्किल हुआ; लेकिन बाद में उन्होंने मुझे उन सभी कामों में मदद करनी शुरू कर दी, जो एक पिता को करनी चाहिए । 

‘वाह…. मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि आज की दुनिया में, जब अपने चार या अधिकतम पाँच लोगों के परिवार का पालन-पोषण करते हुए हम थक से जाते हैं, इस जोड़े ने स्वेच्छा से यह जिम्मेदारी अपने कँधों पर ले ली।’ 

‘आपकी उम्र क्या है?’

‘मैं चालीस साल की हूँ और मेरे पति बयालीस साल के हैं।‘

‘और अब आप छह बेटियों की माँ हैं... अविश्वसनीय... फिर भी विश्वास करना पड़ता है।’ 

‘थैंक्यू…. वह शान से बड़बड़ाई।’

‘इसलिए आप उनकी देखभाल, उन्हें स्कूल भेजने और घर के काम के अलावा ये दो नौकरियाँ कर लेतीं हैं। आफरीन है आपको।’

‘हाँ बिलकुल सही। मैं कड़ी मेहनत करती हूँ, दो काम करती हूँ।’ वह मेरी तरफ मुड़ी और मेरी आँखों में झाँका, शायद मेरी प्रतिक्रिया देखना चाहती थी। अपनी बात जारी रखते हुए उसने कहा- ‘मैं सुबह पाँच बजे उठती हूँ और वह सभी काम करती हूँ ,जो मुझे करने की जरूरत है और फिर आठ बजे अपनी पूर्णकालिक नौकरी के लिए जाती हूँ।’

‘माई गॉड, आप यह सब कैसे मैनेज कर लेती हैं?’ मैं हैरान होते हुए अपने भाव प्रकट किए। 

‘मेरे पति के सहयोग से, जो स्थिति के अनुरूप बन पाया है। वह रात में काम करता है और दिन में लड़कियों को स्कूल से लाता है, कभी-कभी खाना बनाता है… और कुछ अन्य काम जैसे खरीदारी, कपड़े धोने का काम भी करता है।’

‘आपकी बेटियाँ कितने साल की हैं?’

‘मेरी सबसे बड़ी दत्तक पुत्री अब 19 वर्ष की है, कॉलेज जा रही है। शाम को जब मैं घर लौटती हूँ, तो सभी मेरी मदद करने की कोशिश करतीं हैं। 

‘मुझे उनके सभी कार्य करते हुए देखकर वे सभी भी मेरा हाथ बँटाते हैं, मुझे प्यार करते हैं, मेरी देखभाल करते हैं, जैसे कोई अन्य बच्चा करता है।

‘ वाह अति उत्तम ...कार्य ...-कहकर मैं मुस्कराई।

‘हाँ….’ और वो बिना मेरी ओर देखे ही मुस्कुरा दी।

‘अविश्वसनीय... क्या मैं आपका फोन नंबर ले सकती हूँ और अगर मैं आपकी बेटियों और आपके परिवार के संबंधों के तथ्यों के बारे में अधिक जानना चाहूँ तो क्या मैं आपको कॉल कर सकती हूँ?

ओह ज़रूर... इतना कहकर उसने अपना नंबर मुझे बताया।

मैंने एक कागज के टुकड़े पर लिखा

Idelka, फोन: 201 354 8501 (6 अप्रैल 2018)

मैं तब चुप थी, आधुनिक दिनों में इस तरह के महान कार्य के सभी आयामों और संभावनाओं के बारे में सोचकर अपने विचारों में खो गई ...

‘मेरे तीन बच्चे हैं और तीन गोद लिए हैं।”

 एक झटके में कई सवाल उठ खड़े हुए कि उसने एक लड़के को गोद क्यों नहीं लिया, जैसा कि आम भारतीय मानसिकता वाले जोड़े करते हैं। लेकिन छह कन्याओं का विचार ही अब कृपा के सार का प्रसार कर रहा था, विचार की पवित्रता से दुनिया को और सुंदर बना रहा था, अनाथों को और सौतेले पिता के कुव्यवहार से एक महफूज़ छत के तले आश्रय देना... मैं बस चुपचाप इडेलका को देखने लगी। 

‘क्या मैं आपसे एक और सवाल पूछ सकती हूँ इडेलका?’ मैं और अधिक अनौपचारिक हो गई । यह एक माँ की दूसरी माँ के बीच की की बात थी। 

ज़रूर..

‘बेटा गोद लेने के बारे में क्यों नहीं सोचा...’

‘अरे नहीं, बिलकुल नहीं… आप जानती हैं, इसका मतलब यही है, कि लड़कियों के साथ लड़कियाँ सुरक्षित रह पाती हैं।’ 

मैं मन ही मन उसके विचारों की पारदर्शिता व बातों की शालीनता की प्रशंसा करती रही।  तुरंत ही उसकी शिष्टता ने मुझे मदर टेरेसा से जोड़ दिया, जिन्होंने ऐसे कई बच्चों, अनाथों, बीमार बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी अपनी कन्धों पर ले ली थी और कुछ शहरों के विभिन्न हिस्सों में ऐसी कैथोलिक संस्थाएँ स्थापित करते हुए सेवाएँ देने के केंद्र खोले थे। मैं एक दो बार मुंबई के ‘विले पार्ले’ में स्थित एक केंद्र में एक दोस्त के साथ जा चुकी हूँ, जो एक बच्चा गोद लेना चाहती थी।

  बच्चों को पालने में देखना वास्तव में दिल में सवालों के समंदर में गोते खाने वाला परिदृश्य है, जो मन को झकझोरने लगता है कि वे बच्चे वहाँ क्यों है जब उन्हें अपने माता-पिता की नर्म गोद में सुरक्षित और अपने घर के प्यार भरे वातावरण में उनसे लोरी सुनना चाहिए । 

ऐसा क्यों है कि उन्हें अस्वीकार कर दिया जाता है और कभी-कभी अनाथालय केंद्रों के दरवाजे पर, कचरे के डिब्बे के पास, या किसी बगीचे के एकांत कोने में बेंच पर छोड़ दिया जाता है। ये अज्ञात बच्चे रोते हैं, चीखते हैं, पर जन्म देनी वाली माएँ उन आवाजों को अनसुना कर देती हैं। मानवता का निर्मम चेहरा! एक माता-पिता बच्चे को खुले क्षेत्र में छोड़ने के लिए इतने पत्थर-दिल कैसे हो सकते हैं, कि वह उन्हें  मातृत्व के प्यार से, देखभाल से एवं गोद की आनंदमय पनाह से वंचित कर दे।

‘आपका नाम क्या है ?’  इडेलका की आवाज ने अचानक मुझे मेरे विचारों के जाल से बाहर निकाल दिया...

‘देवी’…..मैंने कहा

अच्छा नाम है, याद रखने में आसान।

‘थैंक्सस इडेलका। मुझे खुशी है कि मैं तुमसे मिली और खुश हूँ सब जानकर। अगर मैं आपको किसी दिन फोन करूं तो चौंकना मत।

आपका स्वागत है देवीजी। 

और एक कोमल झटके के साथ उसने वैन को चिकित्सा केंद्र के मुख्य द्वार के सामने रोक दिया। उसने मेरे लिए दरवाजा खोला और मुझे सुरक्षित उतारने में मदद की और प्रवेश द्वार तक ला छोड़ा। 

थैंक्सस इडेलका ..मैंने हाथ मिलाया और एक बार फिर उससे किसी दिन उससे बात करने की अनुमति माँगी।

ओह ज़रूर लेकिन 7-30 के बाद। आपसे बात करके खुशी होगी।

मैं फिर भौतिक चिकित्सा के लिए नियत कमरे की ओर चल पड़ी।                                                

                                    21 दिसंबर 2021

आज 6 अप्रैल 2018 के साढ़े तीन साल के लंबे अंतराल के बाद, मैंने उसके फोन नंबर के साथ इडेल्का के बारे में कुछ पुराने कागजात देखे। एक फ्लैश में यादें ताज़ा हो गयीं। और छह बढ़ती लड़कियों के बारे में और जानने की मेरी उत्सुकता हर दिन की कार्य सूची में सर्वोच्च प्राथमिकता पा गई। 

शाम को मैंने उसे फोन करने की कोशिश की। उसने फोन तो उठाया लेकिन नामालूम नंबर समझ कर डिस्कनेक्ट कर दिया। मेरे अगले प्रयास में उसने 'हैलो' कहा और मैंने उससे जुड़ने के लिए तुरंत ही कहा- क्या मैं इडेल्का से बात कर सकती हूँ?

‘बोल रही हूँ...’

‘हाय इडेलका, मैं देवी बोल रही हूँ। याद है आपने मुझे ‘होली नेम’ अस्पताल के कार्डियक थेरेपी सेंटर में जाते हुए नंबर दिया था। बहुत समय पहले की बात है। हमने आपके परिवार और आपकी छह लड़कियों के बारे में बात की, जिनमें से तीन आपने में गोद ली थी। भगवान का शुक्र है कि इसने मुझे आपसे जोड़ा। क्या तुम्हें याद है?

ओह, एक मिनट रुको, मैं याद करने की कोशिश कर रही हूँ। हाँ मुझे याद है। क्या हाल है? बहुत दिनों बाद आपकी आवाज़ सुनकर बहुत अच्छा लगा देवीजी। 

मैं ठीक हूँ, इलाज के बाद मेरा दिल अच्छी तरह से काम कर रहा है और अब मैं न्यू जर्सी से न्यूयॉर्क आकर बसी हूँ। 

ओह....

‘कैसी हैं आपकी बेटियाँ? लड़कियों के बारे में और जानना चाहता थी। मुझे लगता है कि वे अब तक 19 से 22-23 की उम्र के बीच की हुई होंगी। कृपया मुझे उनके बारे में और बताएँ।’

 ‘हाँ, वे ठीक हैं और सब खुश हैं। दो की पिछले साल शादी हुई, एक की अरेंज मैरिज और दूसरी की लव मैरिज। दो लड़कियाँ कार्यरत हैं और अन्य दो हाईस्कूल में हैं। मेरे पति को भी काम पर पदोन्नति मिली है; इसलिए सभी ने मुझे अपनी अंशकालिक अस्पताल की नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर किया है। अब मैं हास्पिटल का काम नहीं करती।’

‘इडेलका मेरा एक अनुरोध है, क्या आप मुझे लड़कियों के साथ अपनी फैमिली फोटो भेज सकती हैं। यदि आप बुरा न मानें, तो इस लेखन में संलग्न करना चाहती हूँ।’

‘अरे! कोई दिक्कत नही। मैं तुम्हें कल भेजूँगी; बल्कि मैं अपनी बड़ी बेटी को भेजने के लिए कहूँगी, क्योंकि वह तकनीकी रूप से अधिक कुशल है।’

‘धन्यवाद इडेलका। मेरे साथ सब साझा करने और मेरे कॉल का जवाब देने के लिए धन्यवाद। भगवान आपको परिवार सहित खुश रखे। शुभ रात्रि !’ 

‘सुश्री देवी जी आपको भी शुभ रात्रि !’

एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हुए संवाद सम्पूर्ण करना एक सुखद अहसास था।

उसने मुझे ग्रुप फोटो भेजा, लेकिन इसे प्रकाशन न करने का अनुरोध भी किया। और मैं उसके प्रति ईमानदार होने के लिए बाध्य हूँ। 

दिल के आईने में एक खूबसूरत तस्वीर अब भी निखर आती है। 

6, अप्रैल 2022

email- dnangrani@gmail.com  


Jan 28, 2017

घुटन भरा कोहरा

घुटन भरा कोहरा 
-देवी नागरानी  
नैनीताल, 5 जून 2012                                                              प्रिय दीपा,
तुम्हारा ख़त मिला, पढक़र लगा कि तुम मेरे बारे में जानने के लिए ज़्यादा चिन्तित भी हो और उत्सुक भी। क्यों न रहोगी, मैं फिरोज़पुर से अपना सब कुछ रातों-रात समेटकर, तुमसे बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए यहाँ नैनीताल आ गई। यहाँ आकर अब दो महीने हो गए हैं, अपने अतीत से पीछा छुड़ाने की कोशिश में मन किसी हद तक कुछ ठहराव पाने लगा है। मैं पीछे मुडक़र देखना नहीं चाहती, उन यादों की परछाइयों में जीना नहीं चाहती। पर आज फिर तुम्हारे ख़त ने मेरे मन में एक क्रांतिकारी उथल पुथल मचा दी है। बहाव में बह जाने के खौफ से ख़ुद को तेरे साथ बाँटने के लिए क़लम उठा ली है, और यह त...! और फिर हमारा साथ कोई एक दो दिन का नहीं, लगता है बरसों का नाता है। सदियों का, जैसे जन्म-जन्मांतर से हम एक दूसरे से परिचित हैं। ख़ुद को तुम्हारे सामने बेपरदा करने में मुझे अब कोई हिज़ाब नहीं।
तुम तो जानती ही हो, मैं घर में सब से छोटी हूँ।  मेरी दो बड़ी बहनें अब भी घर में बैठे- बैठे बड़ी हो रही हैं। मेरी ज़िद के कारण मुझे आगे पढऩे की अनुमति देने के लिए पिताजी मजबूर हो गए थे। मैंने पाँच साल पढ़ाई करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन करने के लिए विश्वविद्यालय में दखिला ले लिया। अभी तक दोनों बहनें एक आठवीं पास और दूसरी मैट्रिक पास घर में पिछले सात सालों से बैठी जाने किसके इंतिज़ार में अपनी उम्र के साल बढ़ा रही हैं। अब तक पढ़ लिख कर नौकरी पर लग गईं होतीं तो किादगी यूँ ठूँठ -सी नीरस न होती, कुछ अर्थपूर्ण रंगों से ज़रूर रँगी हुई होती।  मुझे वह ज़माना अच्छी तरह याद है और हो भी क्यों न? ख़िर उस वक्त मैं उन्नीस बरस की थी। इस उम्र में तो लड़कियों को पूरा होश होता है और वे काहनी तौर पर लडक़ों से दो कम आगे होती हैं।
 खैऱ, मैं अपनी बात पर आती हूँ।
तुम भी तो कॉलेज पढ़ी हो, वहाँ के माहौल से, वहाँ हो रही गतिविधियों की हलचल से परिचित हो। मैं भी अपरिचित होने का ढोंग नहीं करूँगी। सीधे अपनी बात पर आती हूँ। अब यह निश्चित रूप से जान गई हूँ कि ज़िन्दगी रिश्तों का एक पुलिंदा है, और रिश्ते भी कोई अपने चुनाव के नहीं होते। कुछ प्राकृतिक होते हैं जैसे माँ बाप बहन भाई और कुछ बन जाते है, जैसे अपने-पराए, दोस्त, दुश्मन और फिर पनपते रहने पर उनसे एक लगाव सा हो जाता है, अपने से लगने लगते हैं, अज़ीज़ हो जाते हैं।
 ऐसे ही एक मोड़ पर मुझसे आफ़ताब मिला। मेरा भी उसके साथ नाता जुड़ गया, एक बँधन सा बँध गया। सच कहती हूँ दीपा, जितनी जल्दी वह नाता जुड़ा, उससे कहीं ज़्यादा रफ़्तार से वह अपनी पटरी से उतर भी गया। मैं भी टूटने लगी किसी वारदात की तरह। अब उस रिश्ते को कोई नाम देना ठीक न होगा! शायद इसलिए कि मैंने उस रिश्ते को पहचानने में भूल की।  अब तो उसे भूल कहने का भी कोई अर्थ नहीं। भूल भी कैसी? बस यूँ समझो ख़ुद के लिए सज़ा मुकर्रर की है। यहाँ मैं अपनी कही बात का सुधार करना चाहती हूँ। जिंदगी यूँ वीरान व नीरस न होती, कुछ अर्थपूर्ण रंगों से रंगी हुई होती अगर कोई हमसफर मिल जाता।कहने वाली मैं अब अपनी ज़िदगी को बेरंग करना चाहती हूँ। जिसने मुझे इन्द्रधनुषी रंगों से सजा ख्वाबों का आसमान दिखाया वह अब मेरी ज़िदगी में कहीं नहीं। तुम समझ रही हो न, मैं क्या कह रही हूँ? मैं आफ़ताब की बात कर रही हूँ जो कहा करता था- अपर्णा मैं तुम्हें चाँद-सितारों की ऐसी दुनिया देना चाहता हूँ, जो तुम्हारी माँग में सिँदूर नहीं सितारों की जगमगाहट भर दे....! ‘कब आफ़ताब....?’ मैं कनखियों से उसकी ओर देखते हुए कहती।
जब हमारी पढ़ाई खत्म होगी तब! जब हमें नौकरी मिल जाएगी तब ! जब हम तुम दोनों अपनी जवाबदारी सँभालने के क़ाबिल हो जाएँगे तब!’ 
जवाबदारी से तुम्हारा मतलब..... ?’ 
  ‘अर्पणा क्या ये भी तुम्हें बताना पड़ेगा? जवाबदारी तो जवाबदारी होती है न ? जब कमाएँगे, तब कहीं घर लेकर बस जाएँगे, फिर मियाँ बीबी कहलाए जाने परअम्मी-अब्बू कहलाजाने की ललक तो होगी न? होगी कि नहीं...?’  वह मेरी ओर देखते हुए हँस पड़ता।
मैंने संज़ीदा होते हुए कहा -इस सिलसिले में शादी का तो कहीं ज़िक्र ही नहीं हुआ आफ़ताब ! वह कब करोगे?’
  ‘शादी क्यों होगी, बाकायदा निकाह होगा, पूरी रीति रस्मों के साथ और मैंने तो तुम्हारा नाम भी सोच रखा है- कारीना ! नाम कैसा लगा?’
दीपा सच कहती हूँ मुझे जैसे एक नहीं हजार साँप डस गए। मेरा इस ओर ध्यान केन्द्रित ही नहीं हुआ था कि आफ़ताब इतना कट्टर होगा, इस तरह अपनी धर्म की रवायतों को मुझपर थोपेगा। तब मुझे आफ़ताब पर गुस्सा आने लगा था, प्यार का रंग बातों की कटुता से धीरे-धीरे नहीं, बहुत तेज़ी से उतरने लगा। गलती तो मेरी थी, मैंने ही इश्क मुहब्बत के अनेक किस्सों की तरह इसे भी अपनी सलोनी प्रेम कहानी के रूप में अंजाम देने का स्वप्न देखा था। सोचा था पिता से बगावत करूँगी, प्रेम भरा एक नया संसार सजाऊँगी जहाँ हम दो, हमारे दो होंगे...!
आफ़ताब तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है, पर मैं संजीदा हूँ। मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ यह तो तुम्हें पता है। हमने इस बारे में बात की है और तुमने वादा किया था कि जल्द ही इस बात को घर में छेडक़र कोई हल निकाल लोगे! और आज ये आश्चर्यजनक अनूठी बातें लेकर क्या सिद्ध करना चाहते हो?’ 
 दीपा, एक बात मैं तुम्हें बताना भूल गई कि जब आफ़ताब से मेरी आखें लड़ी थीं, मुझे इस बात का ज़रा भी अनुमान नहीं हुआ कि मैं हिन्दू हूँ और वह मुसलमान। लगा दिल का मामला है, दिलों में सुलझ जाएगा। पर मेरा वह गुमान एक सिद्धांतमय समस्या बन कर सामने आया।
 अचानक मुझे लगा कि मैं खुद को सँभाल नहीं पा रही थी, बदन काँपने लगा था। गुस्से से या डर से, यह उस पल तय नहीं कर पाई। पर जब आफ़ताब का हठीला रवैया देखा तो मुझे यकीन हुआ कि मेरे डर की बुनियाद ठोस थी।
क्यों क्या हुआ अर्पणा, काँप क्यों रही हो?’ 
आफ़ताब तुम्हें मेरे साथ आज ही, अभी शादी करनी होगी। यह क्यों इतना ज़रूरी है तुम अच्छी तरह जानते हो?’
मैंने तो तुमसे कहा था अर्पणा...., पर तुम भी कभी-कभी अड़ जाती हो।
 क्या मतलब? क्या इसकी जवाबदार सिर्फ मैं अकेली हूँ? तुमने तो कहा था हल निकाल लोगे, घर में बात करोगे...!’   ‘की थी, पर अब्बू-अम्मी ज़िद पर अड़ गए हैं- कहते हैं उन्होंने कहीं बान दे रखी है।’  
 ‘मतलब....क्या है आफ़ताब, साफ-साफ बताओ?’ 
वे कहते हैं कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे अपनी जान दे देंगे’  
कैसा नहीं होगा तो, आफ़ताब...?
 ‘अगर मैंने उनकी पसंद की हुई लडक़ी से निकाह नहीं किया तो....!
 सखी, क्या बताऊँ, कैसे बयां करूँ कि उस समय इस अगर मगरको सुनकर मुझपर क्या गुज़ारी? जैसे एक साथ कई ज्वालामुखी मेरे समस्त अस्तित्व की धज्जियाँ उड़ाने के लिए विस्फोटित हुए। मेरा सहमा सहमा वजूद बस नाउम्मीदी से आफ़ताब को देखता रहा।
तो तुम निकाह करोगे...? उसके साथ जिसको तुम जानते ही नहीं, सिर्फ तुम्हारे माता-पिता ने वादा किया है... और मेरा क्या? मेरे पेट में पल रहे इस बच्चे का क्या, उन वादों का क्या जो तुमने मेरे साथ किए ?’                
अर्पणा मैं तुमसे...!’ 
तुमसे क्या आफ़ताब....? अभी अभी जो तुम हम दोनों की जवाबदारी की बात कर रहे थे, उसका क्या? उस जवाबदारी को सँभालने की बात कर रहे थे, उसका क्या? अब तुम अपनी ही कही बात से मुकर रहे हो!’                                                                    उस पल मेरा सारा बदन काँप रहा था, डर से नहीं, बल्कि गुस्से से। दीपा, ऐसा क्यों होता है कि हर जुर्म में मर्द की भी भागीदारी होती है, पर सज़ा अकेली औरत को भुगतनी पड़ती है? क्या आज़ादी सिर्फ मर्दों के हिस्से में आती है कि वे मनमानियों की गंगा में नहाते रहें और गंगा को मैली करते रहें? क्यों संकीर्ण समाज की इन घिसी पिट्टी रिवायतों से औरत को समझौता करना पड़ता है
सखी, फिर जो हुआ उसने तो मेरे सर से प्यार का भूत ही उतार दिया।
बेशर्मी की हर दीवार को फलाँगते हुए एक पाक जज़्बे को नापाक करते हुए उस नामुराद ने क्या कहा, जानती हो? सुनोगी तो जान पाओगी कि दरिंदगी क्या होती है? दानवता का चेहरा कैसा होता है? साफ पन्नों पर काली तहरीरें लिखने वाले नारी के साथ खिलवाड़ करके, बेबसी की हालत में उसे गिरावट की राह पर कैसे छोड़ जाते है
कमबख़्त जवाबदारी से कौन मुकर रहा है अर्पणा? मैं तो तुम्हें अपने सर पर आई हुई मुसीबतों की दास्ताँ बता रहा था, ये अम्मी-अब्बू भी ना...! कुछ समझते ही नहीं औरत जात की परेशानी...!’ 
अपने अम्मी-अब्बू को दोष देने के पहले, अपना चेहरा किसी साफ़ आईने में देख लो। वे तो दिये हुए वादे को भली-भाँति निभाने की रावयत पर मर मिटने की बात कर रहे हैं। शायद तुम ही ज़िन्दगी में रिश्तों की अहमियत नहीं समझ पाये, या समझते हुए नासमझ बन रहे हो। अब तो मुझे तुम्हारी नीयत पर संदेह होने लगा है...!
कैसा संदेह अर्पणा ? मेरे इरादों को यूँ शक की धूल से मटमैला न करोमैं तुम्हें दिलो-जान से चाहता हूँ।
चाहत क्या होती है तुम इस सच से कोसों दूर हो आफ़ताब! अब अपने नापाक इरादों से तुम मुझे और झाँसा नहीं दे सकते। तुम अभी, इसी वक़्त मेरी ज़िन्दगी से अपने इस मनहूस साये के साथ रफ़ा-दफ़ा हो जाओ।’                                                 अर्पणा...!आफ़ताब मिमियाता रहा
तुमने मेरे नाम पर कालिख पोतकर, मेरी इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ाई हैं। एक औरत की किादगी के साथ खिलवाड़ किया है। अब इस बेहयाई से तौबा कर लो...यही बेहतर है।
अर्पणा मुझे कहने का मौक़ा तो दो..!’  
 ‘मुझे अपनी लापरवाहियों का पूरी तरह अहसास है, अब तुम्हारी कोई भी बात मेरे घाव का मरहम नहीं बन सकती। और वैसे भी तजुर्बे बार-बार नहीं किए जाते। बेहतर है अपने अम्मी-अब्बू के दिये हुए वचन को निभाकर एक और किांदगी तबाह होने से बचा लो। अगर ज़िदगी में कभी बाप बनने का सुख हासिल हो तो इस अजन्मे बच्चे की क़सम, मैं तुम्हें बद्दुआ देती हूँ कि तुम्हारा वह सुख भी दुख में बदल जाए!
इतनी कठोर न बनो अपर्णा, मैंने सोच लिया है कि अम्मी-अब्बू की तमन्ना पूरी करके उस लडक़ी को तलाक़ देकर तुम्हें अपना लूँगा। और इस बच्चे को अपना नाम दूँगा।
दीपा, अब उसकी लरती हुई आवाज़ में डर था, अपने महफूज न रहने की बद्दुआ का खौफ झलक रहा था। इन्सान इतना कायर भी हो सकता है, यह पता न था। अपनी सलामती को लेकर कोई इतना ख़ुदगर्ज़ हो जाता है यह उस समय जाना जब आफ़ताब को स्वार्थ की बीन पर नंगा नाच करते हुए पाया। मेरे कोमल जज़्बों को उसने इस कदर कठोर बना दिया कि मेरे हृदय की सारी कड़वाहट ज़हर बनकर शब्दों में प्रवाहमान होने लगी।
 मुझे तुम से अब कोई उम्मीद नहीं। जाने कौन से खंडहरों पर अपने सपनों के महल बनाने के मनसूबे गढ़ते हो, जो तुम्हारे पापी मन में ऐसे ख़याल आ रहे हैं। यही ख़याल हन को तारीक करने के सिवा कुछ नहीं कर पाते। तुम अँधेरे में रहने के आदी हो चुके हो, अब रोशनी तुम्हारे किस काम की? मैं तुम जैसे कायर इन्सान का साया न खुद पर, और न ही न अपने आने वाले बच्चे पर पडऩे दूँगी। एक और बात रूर सुन लो, मुझे न तुम्हारे सहारे की रूरत है और न मेरे बच्चे को तुम्हारे नाम की!
दीपा सच कहती हूँ, उस दिन मैंने उस कायर इन्सान को देखा, जो गुनाह तो डंके की चोट पर करता है और माफ़ी भी माँगता है तो अपना हक समझ कर। पता है फिर क्या हुआ? वह अपनी जगह से उठा, अपनी कमी झटकी और बालों को सँवारता हुआ दो क़दम आगे गया और फिर रुककर कहने लगा...अर्पणा हो सके तो मुझे माफ कर देना।’ 
मानवता जहाँ अपने अर्थों पर पूरी नहीं उतरती शायद वहीं जवाबदारी का अंत हो जाता है। अब भी सोचती हूँ कि क्या उसके साथ जुड़ी हुई ज़िन्दगानियों के साथ भी वह इसी तरह निभाएगा? क्या औरत के आत्म-सम्मान को अपने छल-कपट एवं धूर्तता से स्वाहा करता रहेगा? अपने स्वार्थ के आगे बेगुनाह मासूम, मुस्कराहट को साँस लेने के पहले ही घोंट कर एक बदगुमान ज़िदगी का हक़दार बनाता रहेगा?
ये सवाल बिजली की मानिंद मेरे दिमाग में कौंध उठे, जिनके जवाब आने वाले कल में ये मासूम ज़िन्दगानियाँ हमसे तलब करेंगी। क्या हम उन्हें कोई जवाब दे पाएँगे...!
अब थक गई हूँ दीपा, फिर कभी लिखूँगी।
तुम्हारी सखी
 अर्पणा
सम्पर्क- 9-डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुम्बई 400050,

Jul 18, 2016

कहानी और किरदार

सिंधी कहानी

कहानी और किरदार 
मूलः डॉ. कमला गोकलानी, 
अनुवाद - देवी नागरानी

गौरव बिस्तर पर करवट बदलता रहा। कोशिश के बावजूद भी उसे नींद नहीं आई। साथ में लेटी सीमा ने फिर से जानने की नाकामियाब कोशिश की।
आखिर क्या हुआ है ? इतने परेशान क्यों हो?’ पर गौरव ने बिना जवाब दिए दूसरी तरफ पलटते हुए परमात्मा को प्रार्थना की कि मानसी ने उसके मुत्तल्लक फैसला लेते समय अपने पुराने स्वभाव से काम लिया हो।
उसके सामने क्लास रूम का मंज़र उभर आया। बीस बरसों की नौकरी में उसने ख़ुद को इतना बौना महसूस कभी नहीं किया । बोर्ड ऑफ एज्यूकेशन की ओर से सेन्सर क्लासेज़ की परीक्षा ज़रूरी है। आज उसकी ड्यूटी रूम नं. 4 में रही। उस कमरे में ड्यूटी करने से हर एक इंचार्ज कतराता है। आजकल आम तौर पर शागिर्द अडिय़ल और गैर जिम्मेदार ही हैं, पर रूम नं. 4 का राकेश, कहकर तौबा कर लो!  उसे नकल करने से रोकने वाले का, वह घर-बार डाँवाडोल कर देता है ; इसलि राकेश के मामले में देखा अनदेखा करना पड़ता है गौरव ईमानदारी और इन्तज़ाम का निबाह करने वाला है ; इसलि घर से निकलते वक्त भी सीमा ताक़ीकरती रही कि जानबूझकर विवेक के गुलाम बनकर अनचाही परेशानी न मोल लेना।
जैसे कि आज बोर्ड से चेकिंग के लि खास पार्टी आ रही है, इसलि प्रिन्सिपल ने जान-बूझकर उसकी ड्यूटी रूम नं. 4 में लगाई।
राकेश बेल बजने के 10 मिनट पश्चात् ही क्लास में आता है। आज भी ऐसा ही हुआ, इसलि गौरव ने यह सोचकर कि और शागिर्द को लिखने में बाधा न हो, उसे बिना तलाशी के परीक्षा लिखने दी और उसने सोचा कि चोर को सुरा के साथ पकडऩे का मौका भी मिलेगा।
अभी पाँ मिनट भी नहीं बीते कि चेकिंग पार्टी आ गई। उसके कमरे में पार्टी की कन्ट्रोलर मिस मानसी पहुँची, जो अपने सख्त मिज़ाज़ के लि मशहूर है। वह अक्सर अख़बार और मैग़ज़ीन्स में मानसी के बारे में पढ़ता था कि वह अपनी मेहनत और मज़बूती के बलबूते पर एक आम टीचर से इस अहम ओहदे पर पहुँची है। पर यह जानकारी फ़क़त गौरव को है, कि मानसी के सख्त दिल होने का ज़िम्मेदार वह ख़ुद है। वह तो हँसती, खिलखिलाती मस्त रहने वाली ईज़ि गोइंग लड़की थी।
'टेक इट ईज़ि उसका तकिया क़लाम रहा। इस क़दर कि ज़िन्दगी के अहम संजीदा मोड़ पर भी उसने किसी फ़ैसले को इतनी संजीदगी से नहीं लिया ।
जैसे बाज़ की तेज़ नज़र शिकार पर होती है, वैसे मानसी भी सीधे राकेश के टेबल के पास आ खड़ी हुई। राकेश बेफ़िक्र होकर कागज़ पर से सवालों का जवाब ढूँढ़ रहा था। मानसी ने गुस्से से गौरव से कहा- मास्टर साहब! इतनी गैर जिम्मेवारी से ड्यूटी दे रहे हो ? आपने इस लड़के की तलाशी ली थी ? तुरन्त इसकी तलाशी ली जाए।और फिर राकेश से मुखातिब होकर सख्ती से पूछा – तुम्हारा नाम क्या है ?’
राकेश ने शरारती मुस्कान के साथ कहा – ‘533495’
मानसी ने कहा- अपना डमिशन कार्ड दिखाओ।
            राकेश ने जैसे ही जेब से अपना कार्ड निकाला, तो साथ में एक काग़ज़ ज़मीन पर गिर पड़ा। जाँच करने पर उस कागज़ पर नकल करने वाले मैटर की अनुक्रम सूची थी कि कौन-सा मैटर कहाँ है। इस बीच गौरव ने राकेश की जेब से जवाबों के कुछ काग़ज़ निकाले, पर राकेश पर किसी बात का असर ही नहीं हुआ। इत्मीनान से जेब से कंघी निकाली और मानसी की आँखों में देखते हुए बालों को सँवारने लगा। उसे देखकर गौरव कुछ झेंप गए। मानसी को बीस साल पुराने मंज़र याद आए जब गौरव भी ऐसे ही उसकी आँखों में देखकर बाल सँवारते हुए कहता था- मानू बस ऐसे ही उम्र भर तेरे नयनों में निहारता रहूँ... और मानसी गर्दन झुकाकर शर्माती थी। कुछ पलों में मानसी माज़ी की यादों से बाहर आई, जब गौरव चिल्लाया- अरे इसके जुराबों में रामपुरी चाकू!
राकेश के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई का केस तैयार करने का फैसला प्रिन्सिपल और तमाम टीम ने लिया, शायद यह ज़रूरी था, पर जैसे ही इस गैर जिम्मेवार कार्य के लिए  गौरव को दोषी ठहराते हुए उसके खिलाफ़ रिपोर्ट लिखने की शुरुत मानसी ने की तो प्रिन्सिपल ने हाथ जोड़कर बिनती की- मैडम ! ये ना इन्साफ़ी मत करना। गौरव इस स्कूल का निहायत ही ईमानदार और मेहनती शिक्षक है। मैंने इस साल उसका नाम शिक्षक पुरस्कार के लिए  प्रपोज़ किया है। आपकी रिपोर्ट, उसकी की गई सालों की सेवा को दाग़दार बना देगी। दरअसल राकेश बदला लेने के लिए  किसी भी हद तक गिर सकता है।
            ‘हूँमानसी ने सख़्त लहज़े में कहा- वो लड़का तो मेरे खिलाफ़ भी कदम उठा सकता है, इसका मतलब यह तो नहीं कि गुनहगार को गुनाह करने की छूट दे दी जाए, उसके खिला कोई कार्रवाई ही न की जाए ?’
            इतने में पार्ट एपेपर के खत्म होने पर घण्टी बजी और गौरव भी फ़ारिग होकर ऑफिस पहुँचा और अत्यन्त विनम्रता से कहा- मैडम, आइ एम सॉरी।  दरअसल राकेश के क्लास में देर से आने के कारण मेरे मन में ड्यूटी और परिवार के फर्ज़ के बीच में जंग रही और आप आ गई। सीमा ने चलते-चलते भी कहा था- बच्चों की क़सम, जानबूझकर कोई परेशानी मोल न लेना।
हालात देखते हुए मानसी ने फिलहाल काग़ज़ फाइल में रखे। वह एक बार फिर अतीत की ओर लौट गई। इस सीमा ने ही उसे गौरव से जुदा किया था। कुछ दिन तो वह बेहद मायूस रही, पर जल्द ही ख़ुद को सँभालकर सारा ध्यान कैरियर पर लगा दिया। सोचती रही- आज सीमा के एवज़ वही गौरव के बच्चों की माँ होती तो और क्या चाहती?’
उसे याद आया कि वह और गौरव एक ही स्कूल में शिक्षक थे। हमखय़ाल होने के नाते दोनों का उठना-बैठना साथ होता था। रिसेस के वक़्त, फ्री पीरियड  में भी, जब दूसरे शिक्षक गैर ज़रूरी बातों में वक्त जाया करते थे तब ये दोनों चाय पीते-पीते कभी अदब और कला के बारे में बातें, या बहस करते। किसी नई कहानी या नॉवल पढऩे के पश्चात् उसका पोस्ट मार्टम करते, उसके किरदारों की कमजोरियों और खूबियों पर राय पेश करते। गौरव हमेशा उन नाटकों पर अफ़सोस ज़ाहिर करता ,जिसमें नायक अपनी नायिका को अज़ाबों की गर्दिश में छोड़कर, बुज़दिली से मैदान छोड़कर भाग जाते। बहस करते मानसी उसे समझाने की कोशिश करती कि सच्चा प्यार करने वाले नायक के लिए , ज़रूर कोई ऐसी मजबूरी रही होगी और वह बेहद लाचारी की हालत में प्यार को क़ुर्बाकरते हुए उस राह से मुड़ जाता होगा । सच्चा प्यार तो अमर है, कभी ख़त्म होने वाला नहीं। बड़ी बात तो यह है कि शादी और प्यार का इतना गहरा सम्बन्ध नहीं कि बिना उसके दीवानापन छा जाए। विपरीत इसके शादी के बाद फ़र्ज़ और हक़ों की जंग में ग्रहस्ती की ओढ़ी हुई जिम्मेवारियों की वजह से प्यार का नफ़ीस जज़्बा क़ुर्बा हो जाता है।
पागल है वो नायक जो रात-दिन प्यार-प्यार तो करते हैं, पर वक़्त आने पर पीठ दिखाकर नायिका को सारी ज़िन्दगी रोने के लिए  छोड़ जाते हैं...गौरव बेहद संजीदगी से कहता और मानसी खिलखिलाकर जवाब देती – गौरव! टेक इट  ईज़ि, क्यों सब कुछ सीरियसली लेते हो। कहानी के क़िरदार और हकीकी ज़िन्दगी में बहुत फ़र्क है। लेखक कहानी लिखने के पहले अपने किरदार का अंत तय कर लेता है, जो कभी सुखांत तो कभी दुखांत होता है। पर असली जि़न्दगी में इन्सान हालात के बस होकर सुलह करते हुए फ़ैसला करता है। ऐसे फ़ैसले अज़ादेने वाले और दु;खदायी भी होते हैं, और न चाहते हुए भी ग़लतफ़हमियाँ पैदा करने वाले भी, और फिर दोनों के बीच में लम्बी खामोशी छा जाती थी ।
उनकी गुफ़्तगू अब स्टाफ रूम तक सीमित न रही थी । सुनसान वादियाँ, पहाड़ी-झरने, बहती नदियाँपेड़-पौधे उनकी मुलाक़ात के साक्षी रहे । ऐतिहासिक इमारतों की सैर करते वो दोनों भी ख़ुद को किसी राजा रानी से कम नहीं समझते। कभी-कभी मानसी गौरव से कहती- अगर तुम्हारे माँ-बाप हमारे मेल-मिलाप को बर्दाश्त न कर पाए तो ?’ गौरव बिना किसी सोच के बुलंद आवाज़ में मर्दानगी दिखाते कहता- मानू दुनिया की कोई भी ताक़त तुझको मुझसे छीन नहीं सकती। मैं जल्द ही पिताजी को मनाकर इस रिश्ते को सामाजिक मान्यता दिलाऊँगा।
पर, जब गौरव ने मानसी का जिक्र घर में किया तो गोया तूफ़ान उठ खड़ा हो गया। गौरव को यह पता नहीं था कि घर में उसे एक धड़कते दिल वाला इन्सान न मानकर, एक चीज़समझकर उसके पिता ने उसका सौदा एक साहूकार की बेटी से कर दिया था और उनसे दहेज की बातचीत के आधार पर अपनी दो बेटियों के रिश्ते भी तय कर दि थे। गौरव बहुत ही तड़पा, पर उसके पिता ने उसे लिखे हुए परचे दिखाते हुए कहा कि अगर वह इन्कार करेगा तो उसके माँ-बाप दोनों आत्महत्या कर लेंगे । पागलपन की हदों से गुज़रता हुआ गौरव स्कूल से छुट्टी लेकर घर बैठ गया, शायद मानसी से नज़र मिलाने की उसमें क्षमता न थीं।
आखिर मानसी खुद उसके पास आई और गौरव ने आज जैसी ही लाचारगी से कहा था- मानू, मेरे मन में प्यार और फर्ज़ के बीच...।
मानसी ने शांत मन से कहा – टेक इट ईज़ि प्लीज। हम कोई कहानी के क़िरदार नहीं हैं। मेरी चिंता मत करो, मुझमें यह सदमा बर्दाश्त कर पाने का आत्मबल है।
आज सीमा का नाम सुनते मानसी थोड़ी देर के लिए  डाँवाडोल हुई पर फिर सोचा बेचारी सीमा का क्या दोष? यही कि वह एक धनवान की बेटी है और मानसी की गरीब विधवा माँ में दहेज दे पाने की क्षमता नहीं थी। ये नहीं तो कोई और सीमा गौरव की जीवन संगिनी बन जाती थी । कोई भी औरत किसी और का हक़ छीनकर कहाँ चैन पा सकेगी?
मानसी ने उस स्कूल से अपना तबादला करा लिया था । पर सीमा के बारे में स्टाफ से जानकारी मिली थी कि वह निहायत कोमल हृदय वाली नारी थी। उसे अगर पता होता तो वह ख़ुद ही मानसी के रास्ते से हट जाती। ख़ैर, ज़िन्दगी एक हक़ीकत है कोई कहानी नहीं। यह सोचकर मानसी ने गौरव के ख़िलाफ़ लिखी हुई रिपोर्ट फाड़ दी।

 सम्पर्क:  9-डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुम्बई 400050,  फोन: 9987928358, dnangrani@gmail.com