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Oct 20, 2015

बस्तर का दशहरा

    रावण वध का पर्व नहीं है 
  - लाला जगदलपुरी
बस्तर अंचल में आयोजित होने वाले पारम्परिक पर्वों में बस्तर दशहरा सर्वश्रेष्ठ पर्व है। इसका संबंध सीधे महिषासुर मर्दिनी माँ दुर्गा से जुड़ा है। पौराणिक वर्णन के अनुसार अश्विन शुक्ल दशमी को माँ दुर्गा ने अत्याचारी महिषासुर को शिरोच्छेदन किया था। इसी कारण इस तिथि को विजयादशमी उत्सव के रूप में लोक मान्यता प्राप्त हुई। जाहिर है कि बस्तर अंचल का दशहरा पर्व रावण वध से संबंध नहीं रखता। बस्तर दशहरा की परम्परा और इसकी जन स्वीकृति इतनी विस्तृत एवं व्यापक है कि निरंतर 75 दिन चलता है। यह अपने प्रारंभिक काल से ही जगदलपुर नगर में अत्यंत गरिमा एवं सांस्कृतिक वैभव के साथ मनाया जाता रहा है।

बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का ही प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा की राष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई। आदिवासियों ने इसके प्रारंभिक काल से ही बस्तर के राजाओं को हर प्रकार से सहयोग प्रदान किया। जिसका यह परिणाम निकला कि बस्तर दशहरा का विकास एक ऐसी परम्परा के रूप में हुआ जिसका सिर्फ़ आदिवासी समुदाय ही नहीं समस्त छत्तीसगढ़वासी गर्व करते हैं। इस पर्व में अन्नदान पशुदान और श्रमदान की जो परम्परा विकसित हुई उससे साबित होता है कि हमारे समाज में सामुदायिक भावना की बुनियाद अत्यंत मज़बूत है। भूतपूर्व बस्तर राज्य में परगनिया माझी, माँझी मुकद्दम और कोटवार आदि ग्रामीण दशहरे की व्यवस्था में समय से पहले ही मनोयोग से ही जुट जाया करते थे। प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के लिए परगनिया माझी अपने अपने परगनों से सामग्री जुटाने का प्रयत्न करते थे। सामग्री जुटाने का काम दो तीन महीने पहले से होने लगता था। इसके लिए प्रत्येक तहसील का तहसीलदार सर्वप्रथम बिसाहा पैसा बाँट देता था, जिससे गाँव-गाँव से बकरे सुअर भैंसे चावल दाल तेल नमक मिर्च आदि बड़ी आसानी से जुटा लिए जाते थे। सामग्री के औपचारिक मूल्य को बिसाहा पैसा कहते थे। एकत्रिक सामग्री मंगनी चारडरदसराहा बोकड़ा कहलाती थी। सारी सहयोग सामग्री जगदलपुर स्थित कोठी के कोठिया को सौंप दी जाती थी। भूतपूर्व बस्तर रियासत में टेंपिल व्यवस्था के तहत पूर्णत: सार्वजनिक दशहरा मनाया जाता था। समय बदला परिस्थितियाँ बदलीं, समाज बदला और इसके साथ ही मनुष्य का जीवन भी बदला। शासन ने जन भावनाओं का सम्मान करते हुए, इसमें अपनी रचनात्मक भूमिका निर्धारित की। ऐसी भूमिका कि यह परम्परा लगातार विकसित होती रहे।
एक अनुश्रुति के अनुसार बस्तर के चालुक्य नरेश भैराजदेव के पुत्र पुरुषोत्तम देव ने एक बार श्री जगन्नाथपुरी तक पदयात्रा कर मंदिर में एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ तथा स्वर्ण भूषण आदि सामग्री भेंट में अर्पित की थी। इस पर पुजारी को स्वप्न हुआ था। स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी ने राजा पुरुषोत्तम देव को रथपति घोषित करने हेतु पुजारी को आदेश दिया था। कहते हैं कि राजा पुरुषोत्तम देव जब पुरी धाम से बस्तर लौटे तभी से गोंचा और दशहरा पर्वों में रथ चलाने की प्रथा चल पड़ी। राजा पुरुषोत्तम देव ने फागुन कृष्ण चार दिन सोमवार संवत 1465 को 25 वर्ष की आयु में शासन की बागडोर सँभाली थी।
काछिनगादी
बस्तर दशहरा का प्रथम चरण है। काछिनगादी का अर्थ होता है काछिन देवी को गद्दी देना। काछिनदेवी की गद्दी होती है काँटों की। काछिन देवी रणदेवी भी कहलाती हैं। काँटों की गद्दी पर बैठकर काँटों को जीतने का संदेश देती हैं। काछिन देवी बस्तर के मिरगानो की कुलदेवी हैं। अश्विन मास की अमावस्या के दिन काछिनगादी का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस कार्यक्रम के लिए राजा अथवा राजा का प्रतिनिधि संध्या समय धूमधाम के साथ जुलूस लेकर जगदलपुर के पथरागुड़ा मार्ग पर स्थिन काछिनगादी में पहुँच जाता था। आज दंतेश्वरी के पुजारी द्वारा इस कार्यक्रम की अगुवाई की जाती है। मान्यता के अनुसार काछिन देवी धन-धान्य की वृद्धि एवं रक्षा करती हैं। एक परमभक्त सिरहा आवाहन करता है। देवी के आगमन पर झूलेपर सुलाकर उसे झुलाते हैं। फिर देवी की पूजा अर्चना की जाती है और उससे दशहरा मनाने की स्वीकृति प्राप्त की जाती है। काछिन देवी से स्वीकृति सूचक प्रसाद मिलने के पश्चात बस्तर का पारम्परिक दशहरा समारोह बड़ी धूमधाम के साथ प्रारंभ हो जाता है।
नवरात्र जोगी बिठाई
आश्विन शुक्ल 1 से बस्तर दशहरा अपना नवरात्रि कार्यक्रम आरंभ करता है। इस अवसर पर प्रात: स्थानीय दंतेश्वरी मंदिर में सर्वप्रथम कलश स्थापन होता है। इसके अंतर्गत संकल्प पाठ होता है। चंडी हनुमान बगलामुखी और विष्णु आदि देवी देवताओं के जप और पाठ नवरात्र भर चलते रहते हैं। इसी दिन सिरासार प्राचीन टाउन हॉल में जोगी बिठाई की प्रथा पूरी की जाती है। कहा जाता है कि पहले कभी दशहरे के अवसर पर एक कोई वनवासी दशहरा निर्विघ्न संपन्न होने की कामना लेकर अपने ढंग से योग साधना में बैठ गया था। तभी से बस्तर दशहरा के अंतर्गत जोगी बिठाने की प्रथा चल पड़ी है। जोगी बिठाने के लिए सिरासार के मध्य भाग में एक आदमी की समायत के लायक एक गड्ढा बना है। जिसके अंदर हलबा जाति का एक व्यक्ति लगातार 9 दिन योगासन में बैठा रहता है। जोगी इस बीच फलाहार तथा दुग्धाहार में रहता है। जोगी बिठाई के समय पहले एक बकरा और 7 माँगुर मछली काटने का रिवाज था। अब बकरा नहीं काटा जाता केवल माँगुर माछ ही काटे जाते हैं।
रथ परिक्रमा
जोगी बिठाई के दूसरे दिन से रथ चलना शुरू हो जाता है। अश्विन शुक्ल 2 से लेकर लगातार अश्विन शुक्ल 7 तक चार पहिए वाला यह रथ पुष्प सज्जा प्रधान होने के कारण फूलरथ कहलाता है। इस रथ पर आरुढ़ होने वाले राजा के सिर पर फूलों की पगड़ी बँधी होती थी। राजा रथ पर केवल देवी दंतेश्वरी का केवल छत्र ही आरुढ़ रहता है। साथ में देवी का पुजारी रहता है। रथ प्रतिदिन शाम एक निश्चित मार्ग को परिक्रम करता हाँ और राजमहलों के सिंहद्वार के सामने खड़ा हो जाता है। पहले-पहले 12 पहियों वाला एक विशाल रथ किसी तरह चलाया जाता था। परंतु चलाने में असुविधा होने के कारण एक रथ को आठ और चार पहियों वाले दो रथों में विभाजित कर दिया गया। क्योंकि जन श्रुति है कि राजा पुरुषोत्तम देव को जगन्नाथ जी ने बारह पहियों वाले रथ का वरदान दिया था। दशहरे की भीड़ में गाँव-गाँव से आमंत्रित देवी देवताओं के साज बाज आज भी देखने को मिल जाते हैं। उनके छत्र डंगइयाँ घंटे बैरक घंटे शंख तोडिय़ाँ आदि सब अपनी अपनी जगह ठीक ठाक हैं, आज भी लोग श्रद्धा भक्ति से प्रेरित होकर रथों की रस्सियाँ खींचते हैं। रथ के साथ-साथ नाच गाने भी चलते रहते हैं। मुंडा लोगों के मुंडा बाजे बज रहे होते हैं। उनका 'मारÓ (लोक-नृत्य) धमाधम चल रहा होता है। नाइक पाइक माझी कोटवार आदि तो आज भी चल रहे होते हैं, पर पहले सैदार बैदार पडिय़ार और राजभवन के नौकर चाकर भी अपने अपने राजसी पहनावे में चलते रहते हैं। रथ चालन के समय व्यवस्था में अनेक लोग साह के साथ हिस्सा लेते हैं। पहले रथ प्रतिदिन सीरासार चौक से ठीक समय पर चलकर शाम को एक निश्चित समय पर सिंह द्वार के सामने पहुँच जाता है। पहले बस्तर दशहरा में इस रथयात्रा के दौरान हल्बा सैनिकों का वरचस्व रहता था। आज भी उनकी भूमिका उतनी ही जीवंत एवं महत्त्वपूर्ण है। अश्विन शुक्ल 7 को चार पहियों वाले रथ की समापन परिक्रमा चलती है। तत्पश्चात दूसरे दिन दुर्गाष्टमी मनाई जाती है। दुर्गाष्टमी के अंतर्गत निशाजात्रा का कार्यक्रम होता है। निशाजात्रा का जलूस नगर के इतवारी बाज़ार से लगे पूजा मंडप तक पहुँचता है।
जोगी उठाई मावली पर घाव
मावली पर घाव का अर्थ है देवी की स्थापना। अश्विन शुक्ल 9 को संध्या समय लगभग 5 बजे जगदलपुर स्थित सिरासार में बिठाए गए जोगी को समारोह पूर्वक उठाया जाता है। फिर जोगी को भेंट देकर सम्मानित करते हैं। इसी दिन लगभग 9 बजे रात्रि में मावली पर घाव होता है। इस कार्यक्रम के तहत दंतेवाड़ा से श्रद्धापूर्वक दंतेश्वरी की डोली में लाई गई मावली मूर्ति का स्वागत किया जाता है। मावली देवी को दंतेश्वरी का ही एक रूप मानते हैं। नए कपड़े में चंदन का लेप देकर एक मूर्ति बनाई जाती है और उस मूर्ति को पुष्पाच्छादित कर दिया जाता है। यही है मावली माता की मूर्ति। मावली माता निमंत्रण पाकर दशहरा पर्व में सम्मिलित होने जगदलपुर पहुँचती हैं। पहले इनकी डोली को राजा कुँवर राजगुरु और पुजारी कंधे देकर दंतेश्वरी मंदिर तक पहुँचाते थे। आज भी पुजारी राजगुरु और राजपरिवार के लोग श्रद्धा सहित डोली को उठा लाते हैं।
विजयादशमी भीतर रैनी
विजयादशमी तथा अश्विन शुक्ल 11 को जगदलपुर में दशहरे की भीड़ पहले अपनी चरमावस्था को पहुँच जाती थी। पर भीड़ अब उतनी नहीं होती। विजयादशमी के दिन भीतर रैनी तथा एकादशी के दिन बाहिर रैनी के कार्यक्रम होते हैं। दोनों दिन आठ पहियों वाला विशाल रथ चलता है। भीतर रैनी अर्थात विजयादशमी के दिन यह रथ अपने पूर्ववर्ती रथ की ही दिशा में अग्रसर होता है। इस रथ पर झूले की व्यवस्था रहती है। जिस पर पहले रथारुढ़ शासक वीर वेश में बैठा झूला करता था। विजयदशमी की शाम को जब रथ वर्तमान नगर पालिका कार्यालय के पास पहुँचता था तब रथ के समक्ष एक भैंस की बलि दी जाती थी। भैंसा महिषासुर का प्रतीक बनकर काम आता था। तत्पश्चात जलूस में उपस्थित राजमान्य नागरिकों को रुमाल और बीड़े देकर सम्मानित किया जाता था। विजयादशमी के रथ की परिक्रमा जब पूरी हो चुकती है तब आदिवासी आठ पहियों वाले इस रथ को प्रथा के अनुसार चुराकर कुमढ़ाकोट ले जाते हैं।
बाहिर रैनी
कुमढ़ाकोट राजमहलों से लगभग दो मील दूर पढ़ता है। कुमढ़ाकोट में राजा देवी को नया अन्न अर्पित कर प्रसाद ग्रहण करते थे। बस्तर दशहरे की शाभा यात्रा में कई ऐसे दृश्य हैं जिनके अपने अलग-अलग आकर्षण हैं और जनसे पर्याप्त लोकरंजन हो जाता है। राजसी तामझाम के तहत बस्तर दशहरे के रथ की प्रत्येक शोभायात्रा में पहले सुसज्जित हाथी घोड़ों की भरमार रहती थी। मावली माता की वह घोड़ी याद आती है जिसे चाँदी के जेवरों से सजाया जाता था। उसके पावों में चाँदी के नूपुर बजते रहते थे और माथे पर चाँदी की झूमर झूलता था। उसकी पीठ के नीचे तक एक ज़रीदार रंगीन साड़ी झिलमिलाती रहती थी। विगत दशहरे में एक सुसज्जित घोड़े पर सवार मगारची नगाड़े बजा- बजा कर यह संकेत देता चलता था कि पुजारी समेत देवी दन्तेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ होने या उतारने में कितना समय और शेष है। पहले भीतर रैनी और बाहिर रैनी के कार्यक्रमों में धनु काँडेया लोगों की धूम मची रहती थी। भतरा जाति के नवयुवक धनुकाँडेया बनते थे। उनकी वह पुष्प सज्जित धधारी देह सज्जा देखते ही बनती थी। धनु काँडेया रथ खींचने के लिए आदिवासियों को पकड़ लाने के बहाने उत्सव की शोभा बढ़ाते थे। वे रह-रह कर आवाज़ करते, इधर उधर भागते फिरते नजऱ आते थे। बाहिर रैनी का झूलेदार रथ कुम्हड़ाकोट से चलकर धाने की ओर से सदर रोड होते हुए सदर प्राथमिक शाला के निकट के चौराहे से गुज़रता है। सिंह द्वार तक पहुँचते पहुँचते उसे रात हो जाती है।
मुरिया दरबार
अश्विन शुक्ल 12 को प्रात: निर्विघ्न दशहरा संपन्न होने की खुशी में काछिन जात्रा के अंतर्गत काछिन देवी को काछिनगुड़ी के पासवाले पूजामंडप पर पुन: सम्मानित किया जाता है। इसी दिन शाम को सीरासार में लगभग 5 बजे से ग्रामीण तथा शहराती मुखियों की एक मिली जुली आसंभा लगती थी। जिसमें राजा प्रजा के बीच विचारों का आदान प्रदान हुआ करता था। विभिन्न समस्याओं के निराकरण हेतु खुली चर्चा होती थी। इस सभा को मुरिया दरबार कहते थे। बस्तर दशहरे का यह एक सार्थक कार्यक्रम था। वैसे आदिवासी दरबार आज भी चल रहा है। इसी के साथ गाँव-गाँव से आए देवी देवताओं की विदाई हो जाती है।
ओहाड़ी
और अंत में अश्विन शुक्ल 13 को प्रात: गंगा मुणा स्थित मावली शिविर के निकट बने पूजा मंडप पर मावली माई के विदा सम्मान में गंगा मुणा जात्रा संपन्न होती है। इस कार्यक्रम को ओहाड़ी कहते हैं। पहले बस्तर दशहरा के विभिन्न जात्रा कार्यक्रमों में सैकड़ों पशुमुंड कटते थे जात्रा का अर्थ होता है यात्रा अर्थात महायात्रा (बलि)। बस्तर अंचल शाक्तों (शक्तिपूजकों) का अंचल है। पर आज यह प्रथा बंद हो गई है।
बस्तर दशहरा बहु आयामी है। धर्म, संस्कृति, कला, इतिहास और राजनीति से इसका प्रत्यक्ष संबंध तो जुड़ता ही है साथ-साथ परोक्ष रूप से बस्तर दशहरा समाज की उच्च एवं परिष्कृत सांस्कृतिक परम्परा का साक्षी भी बनता है। आज का बस्तर दशहरा पूर्णत: दंतेश्वरी का दशहरा है। बस्तर दशहरे की यह एक तंत्रीय पर्व प्रणाली आज के बदलते जीवन मूल्यों में भी दर्शकों को आकर्षित करती चल रही है। यह इसकी एक बड़ी बात है। कहना न होगा आज का जो बस्तर दशहरा हम देख रहे हैं वह हमें अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ता है। एक ऐसा अतीत जो बस्तर के आदिवासियों की अमूल्य धरोहर है किंतु जिस पर संपूर्ण भारतवासी गर्व करते हैं।

May 16, 2014

दो लोककथाएँ , दो बाल गीत

1. भेड़े की भिड़न्त
 -लाला जगदलपुरी 
  
1      भेड़ा जा रहा था। सियार गूलर के पेड़ पर चढ़ा हुआ था। पेड़ पर बहुत से फल लगे थे। भेड़ा फलों को देख वहाँ रुक गया। उसने सियार से कहा, 'मित्र! एक फल मेरे लिए भी तोड़ कर गिरा दो। मैं गूलर का स्वाद लेना चाहता हूँ। देखूँ तो, कैसा लगता है?’
सियार ने भेड़े के लिए एक कच्चा फल तोड़ कर नीचे गिरा दिया। कच्चा फल देख कर सियार की धूर्त्तता पर गुस्सा आया, किन्तु क्या करता! विवश था। बोला, 'मेरे लिए तूने कच्चा फल गिराया। मैं भी देख लूँगा तुझे।और वहाँ से चल दिया।
समीप के गाँव में कहीं से एक राक्षसी आई। डर के मारे गाँव के लोग बाल-बच्चों सहित प्राण बचाने के लिए जहाँ-तहाँ भाग खड़े हुए। राक्षसी ने एक अच्छे से मकान में डेरा जमाया और इधर-उधर से स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ लाकर वहाँ जमा करती गई।
एक दिन की बात। राक्षसी कहीं बाहर घूमने गई  हुई थी। उसके सूने घरमें भेड़ा आया और उसके मकान में घुस गया। भेड़े ने वहाँ स्वादिष्ट वस्तुएँ देखीं। फिर क्या था! भेड़ा खाने में जुट गया। वह चबा-चबाकर चबैने खा रहा था। उसी समय राक्षसी लौटी। उसे घर में किसी के होने की आहट मिली। चबैनों के चबाए जाने की आवाज़ साफ़ सुनाई  दे रही थी। राक्षसी ने जोर से आवाज दी, 'कौन हे रे, मेरे मकान में?’
भेड़े ने उत्तर दिया, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार!’ यह सुन कर राक्षसी काँप उठी। तुरन्त भागी वहाँ से। रास्ते में उसे एक नाग मिला। राक्षसी को बेतहाशा भागते देख कर नाग ने उसे रोक कर भागने का कारण पूछा। इस पर राक्षसी ने बताया कि मेरे घर में जाने कौन घुस गया! कहता है, ‘मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार!’ साँप ने उसे ढाढ़स दिया। कहा, 'घबराने की ज़रूरत नहीं है। चलो, मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। मैं उसे डस लूँगा। उसके प्राण निकल जाएँगे।‘
फिर दोनों वहाँ से रवाना हुए। पहुँचे। राक्षसी ने दरवाजे पर से ही आवाज़ लगाई, 'कौन है, मेरे मकान में?’ उत्तर मिला, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार! नाग साँप को पकड़ कर छड़ी बनाने वाला भेड़-कुमार!’
भेड़े की धमकी का पूरा-पूरा असर दोनों पर हुआ। दोनों भागे वहाँ से। उन्हें भागते देख लिया जंगल के एक बाघ ने। उसने उन्हें रोका। भागने का कारण पूछा। राक्षसी ने उसे भी कारण बताया, क्या बताऊँ, मेरे घर में पता नहीं कौन घुस गया है। मुझे खदेड़ कर खा जाना चाहता है। अब तुम्हीं बताओ कि अब क्या उपाय करें?’
बाघ यह सब सुन कर जोश में आ गया। बोला, 'चलो तो, जरा मैं भी तो देखूँ, कौन है! नानी याद आ जायेगी उसे।’
इस बार तीनों रवाना हुए राक्षसी, साँप और बाघ। दरवाजे के पास खड़े हो कर राक्षसी ने जोर से हाँक लगाई, 'कौन है मेरे मकान में?’
भीतर से फिर उत्तर मिला, 'मैं हूँ भेड़-कुमार! राक्षसी को खदेड़-खदेड़ कर खा जाने वाला भेड़-कुमार! नाग साँप को छड़ी बनाने वाला भेड़-कुमार! बाघ की खाल उतारने वाला भेड़-कुमार!’
बाघ की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई  और वह भागता नजर आया। उसके साथ-साथ राक्षसी और साँप भी भागे। उनके भागते ही भेड़ अब यह सोच कर बाहर निकल आया कि अधिक समय तक भीतर घुसे रहना खतरे से खाली नहीं है। और वह जंगल की ओर चल पड़ा। वह स्वादिष्ट चबैनों का मज़ा लेता हुआ चला जा रहा था। रास्ते में वही जाना-पहचान सियार मिला। वह लालच में आकर भेड़े से बोला, 'क्या खा रहे हो, मित्र? मुझे नहीं दोगे?’
भेड़े ने तुरन्त जवाब दिया, 'उस दिन तुमने मेरे लिए पेड़ से कच्चा गूलर गिराया था, याद है?’
इतने में सियार ने सफाई दी, 'क्या करता मित्र! बच्चों को गूलर कहीं कम न पड़ जायें, इस बात की चिन्ता थी और इसीलिए मैंने कच्चा गूलर गिरा दिया था। मुझे खेद है।’

भेड़ा सियार की दलील सुन कर हँसा और उसने उसे सुझाव दिया, यहाँ से थोड़ी दूरी पर एक आलीशान मकान है। वहाँ बहुत- सी स्वादिष्ट वस्तुएँ रखी हैं। वहाँ कोई नहीं है। वहीं से मैं खाता आ रहा हूँ। साहस हो, तो वहाँ घुसकर तुम भी उन वस्तुओं को खाकर तृप्त हो सकते हो। चलो, मैं तुम्हें वहाँ तक पहुँचा आऊँ। ऐसा कह सियार को ले कर भेड़ा रवाना हुआ। उसे ठिकाने पर पहुँचा और दूर से मकान को दिखाकर लौट आया। सियार खुशी-खुशी बिना सोचे-विचारे अचानक भीतर प्रवेश कर गया। उस समय राक्षसी मकान में पहुँच गई  थी और भोजन बना रही थी। सियार को देखकर राक्षसी के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसकी ऐसी मरम्मत की कि सियार वहीं ढेर हो गया। राक्षसी ने उस दिन सियार के मांस के साथ भोजन किया।

    2. असत्य का राज्य
एक साँप पिटारी में बंद पड़ा था। एक राहगीर उधर से निकला। उसकी दृष्टि उस पिटारी पर पड़ी। वह पिटारी के करीब पहुँचा। पिटारी के छेद में से साँप ने भी उसे देख लिया और सहायता के लिये चिल्लाया। राहगीर को साँप की स्थिति पर दया आई । उसने सोचा कि इस बेचारे को पिटारी से मुक्त कर दूँ, ताकि यह खुली हवा में साँस ले सके। ऐसा सोच कर उसने पिटारी खोल दी। पिटारी से निकलते ही साँप ने अपनी धूर्त्तता दिखाई । वह उस राहगीर की ओर बढ़ा। मुसाफिर को उसका इरादा समझते देर न लगी। उसने साँप से कहा, 'अरे! भाई, मैंने तुम्हें पिटारी से मुक्त किया है और तुम मुझे ही काट खाना चाहते हो?’
साँप ने उत्तर दिया, 'झूठ। तुमने मुझे कहाँ मुक्त किया है? क्या तुम्हें नहीं मालूम कि आजकल दुनिया में झूठ का राज्य चल रहा है?’
राहगीर बोला, 'मैं यह नहीं मानता। झूठ की क्या औकात? सत्य का राज्य चल रहा है भाई, सत्य का।’ सामने एक बैल चर रहा था। दोनों उस बैल के पास पहुँचे। उससे पूछा, 'बैल भाई, इन दिनों में संसार में किसका राज्य चल रहा है, झूठ का अथवा सत्य का?’ बैल ने  जवाब दिया, 'आजकल राज्य चल रहा है झूठ का। विश्वासघाती जिसका मन्त्री है। देखो, मैं कितनी मेहनत करता हूँ। जो देते हैं, खा लेता हूँ। बात मानता हूँ फिर भी मुझे डंडे पड़ते हैं। सत्य का राज्य होता तो मुझे मेरी नेकी का उचित परिणाम न मिलता?’
बैल के उत्तर से साँप को गर्व हुआ और वह राहगीर को फिर दौड़ाने लगा। राहगीर प्राण लेकर भागा जा रहा था और साँप बेरहमी से उसका पीछा कर रहा था। जाते-जाते एक फलदार पुराना पेड़ मिला। आदमी ने रुककर उससे भी पूछ लिया, 'क्यों भाई, पेड़! क्या तुम बता सकते हो कि इन दिनों दुनिया में किसका राज्य चल रहा है, सच का या झूठ का?’
पेड़ ने तपाक से कह दिया, 'झूठ का। क्योंकि लोग मेरे बाल-बच्चों को खुले आम मुझसे छीन लेते हैं। उन्हें तराश-तराश कर खा जाते हैं और मुझे भी काट डालते हैं, जला देते हैं। ऐसा अँधेर केवल असत्य के राज्य में ही हो सकता है।
आदमी पेड़ की बात सुन कर फिर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। अन्त में उन्हें एक साधु मिला। उन्हें भागते देख कर बाबाजी ने कहा, 'साँप ठीक ही तो कहता है। असत्य के राज्य में वह सिर क्यों न उठाये? मौके का लाभ न उठाना, बेवकूफी का सबसे बड़ा सबूत है।’ फिर भी साधू ने दोनों को आश्वासन देते हुए कहा, 'हम इसका न्याय अभी किए देते हैं। किन्तु भाई, साँप! जरा यह तो बताओ कि पिटारी में तुम किस तरह बन्द थे?’ यह सोच कर कि बाबाजी उसके पक्ष में ही फैसला देंगे, साँप फिर से पिटारी में घुस गया। साँप के घुसते ही बाबाजी ने पिटारी का मुँह एक मजबूत रस्सी से बाँध दिया और पास के पेड़ में उसे लटका दिया। राहगीर साधु को प्रणाम करके घर चला गया और साधु भी साँप को यह बताकर चल दिया कि, 'भाई साँप! आजकल असत्य का राज्य चल रहा है, इसमें संदेह नहीं। प्रमाण सामने है।’
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बाल गीत
आ जा तितली  
आ जा तितली आ जा तितली
उडऩा हमें सिखा जा तितली
बुला रहे हैं रम्मू-कम्मू
साथी उन्हें बना जा तितली।
खुली हथेली पर तू क्षण भर
बैठ, जरा सुस्ता जा तितली
कितने फूल-कटोरों का तू
पी आई रस ताजा तितली
क्या तू उतरी परी-लोक से
हाँ, तो हाल सुना जा तितली। 


छत्तीसगढ़ी बाल गीत


सुनव-सुनव रे मुसवा मन









सुनव-सुनव रे मुसवा मन
गुन ला गाही जउने मोर,
साद बुताही जउने मोर
सेवा करिहय जउने मोर
तउने पाहय नवाँ अँजोर
म्याऊँ-म्याऊँ मोर बचन
सुनव-सुनव रे मुसवा मन।
कोनो होवयँ सोन मढ़े
कोनो होवयँ रतन जड़े
फेर मोर ले कोन बड़े
बिलवा बोलिस पड़े-पड़े
मोर घरो-घर सिंहासन
सुनव-सुनव रे मुसवा मन।
भूँकिस कुकुर भों-भों-भों
भागिस बिलवा मरों-जियों
फुटिस ढोल घमंडी के
खुल गे पोल घमंडी के
सुन ले भइया मनराखन।
(सुनो-सुनो हे चूहो तुम। जो गाएगा गुण मेरे, जो पूरी करेगा मेरी साध, जो करेगा मेरी सेवा, वही पायेगा नया उजियारा, म्याऊँ-म्याऊँ मेरे बोल, सुनो-सुनो हे चूहो तुम। हो कोई भी सोने से मढ़ा, हो कोई भी रत्नों से जड़ा, तो भी मुझसे कौन बड़ा? बिल्ला बोला पड़ा-पड़ा, घर-घर में मेरा सिंहासन, सुनो-सुनो हे चूहो तुम। कुत्ता भौंका भों-भों-भों, भागा बिल्ला बचाकर प्राण, फूट गया ढोल घमंडी का, खुल गई  पोल घमंडी की, सुन ले भैया मनराखन।)



  

Sep 26, 2013

ज्जन कितना बदल गया है


सज्जन कितना बदल गया है


- लाला जगदलपुरी

दहकन का अहसास कराता,
चंदन कितना बदल गया है;
मेरा  चेहरा मुझे डराता,
दरपन कितना बदल गया है!

            आँखों ही आँखों में
            सूख गयी हरियाली अंतर्मन की;
            कौन करे विश्वास कि मेरा
सावन कितना बदल गया है! 

पाँवों के नीचे से खिसक-
खिसक जाता-सा बात-बात में;
मेरे तुलसी के बिरवे का
आँगन कितना बदल गया  है!

            भाग रहे हैं लोग मृत्यु के
            पीछे-पीछे, बिना बुलाये;
            जिजीविषा से अलग-थलग यह
            जीवन कितना बदल गया है!

प्रोत्साहन की नयी दिशा में
देख रहा हूँ, सोच रहा हूँ;
दुर्जनता की पीठ ठोंकता
सज्जन कितना बदल गया है!

 ( काव्य-संकलन मिमियाती ज़िंदगी दहाड़ते परिवेश से)