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| चित्रः डॉ. सुनीता वर्मा |
सुधार बूढ़े आदमी नहीं कर सकते। वे तो बहुत ही बुद्धिमान और समझदार होते हैं। सुधार तो युवाओ के परिश्रम, साहस, बलिदान और निष्ठा से होता हैं, जिन्हें भयभीत होना नहीं आता। -भगतसिंह
अनकहीः विरोध प्रदर्शन की यह कैसी परंपरा? - डॉ. रत्ना वर्मा
पर्व- संस्कृतिः स्वच्छता का पर्व है होली - पंकज चतुर्वेदी
आलेखः कृषि और आहार की सनातन संस्कृति - प्रमोद भार्गव
शोधः प्रतिरक्षा प्रणाली को कमज़ोर कर रहे टैटू - स्रोत फीचर्स
धरोहरः भो-रम-देव - तुझमें मेरा मन रमा रहे - राहुल कुमार सिंह
दस क्षणिकाएँ - डॉ. कुँवर दिनेश सिंह
आलेखः ऑनलाइन गेमिंग एक मकड़जाल - डॉ. सुरंगमा यादव
स्वास्थ्यः क्या च्यूइंग गम चबाने से तनाव कम होता है? - ज़ुबैर सिद्दिकी
कविताः तुझसे ही तो मेरी होली - शशि पाधा
कविताः मेरी बहनो! - अनिता मंडा
शब्द चित्रः मक्खी नाना - रविन्द्र गिन्नौरे
कविताः हे ऋतु राज - अपर्णा विश्वनाथ
किताबेंः ज़िन्दगी के लिए विटामिन- विटामिन ज़िन्दगी - रश्मि विभा त्रिपाठी
रेखाचित्रः दादी को चरखो चलाता मालवी दादा... नरहरि पटेल - ज्योति जैन
कविताः किलकारी खामोश हो रही - सतीश उपाध्याय
व्यंग्यः रचना - पाठ का कुरता - यशवंत कोठारी
लघुकथाः कुत्ते का खाना - दर्शन मितवा
कहानीः अकालग्रस्त इलाका - प्रेम गुप्ता ‘मानी’/ प्रियंका गुप्ता

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