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Apr 1, 2026

लघुकथाः अदृश्य आघात

  - योगराज प्रभाकर

आज वह ऑफ़िस से देर रात घर लौटी थी-थकी-हारी और चेहरे पर हताशा के भाव लिये। दरवाज़ा खुला मिला। पति भीतर बैठा था-टी.वी. की रोशनी चेहरे पर पड़ रही थी; लेकिन आँखों में कोई प्रतीक्षा नहीं थी।

“आज बहुत देर हो गई।” वह बोली।

“हूँ।” रिमोट पर उँगलियाँ चलते हुए उसने कहा।

“लिफ़्ट ख़राब थी, सीढ़ियों से आना पड़ा। बहुत थक गई हूँ… ऊपर से ये कमर दर्द।”

“थक गई हो, तो जाकर आराम करो।”

“आज दफ़्तर में बहुत कुछ हुआ। मूड बिल्कुल ऑफ़ है…”

“ज़्यादा मत सोचो।”

वह थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “आप एक बार पूछ तो सकते थे कि क्या हुआ?”

“तुम बताना चाहो तो बता दो… मैंने मना किया है क्या?”

वह फिर चुप हो गई। पूरा कमरा शांत हो गया- इतना कि पंखे की आवाज़ भारी लगने लगी।

“मुझे आज बहुत ज़्यादा मेंटली टॉर्चर किया गया…”

पति की नज़रें टी.वी. स्क्रीन से नहीं हटीं।

फिर वह धीरे-से बोली, “नए बॉस ने पूरी टीम के सामने मुझे जानबूझकर नीचा दिखाया।”

“अच्छा!” पति की ठंडी-सी आवाज़ आई।

“पता है, उस वक़्त मैं सिर्फ़ आपको याद कर रही थी कि घर जाकर सब कुछ बताऊँगी।”

वह पलटा नहीं। बोला, “ज़्यादा टेंशन मत लो… ये तो होता है… हर जगह।”

वह उसे देखती रही-जैसे किसी अजनबी से परिचय माँग रही हो।

“तुम्हें पता है… चोट तब नहीं लगती, जब कोई पराया कुछ कहे। चोट तब लगती है, जब कोई अपना ख़ामोश रहे।”

“तो क्या करूँ? जाकर उसका सिर फोड़ दूँ?” पति भड़का।

उसने कोई उत्तर नहीं दिया… बस अपनी नज़रों को पति के चेहरे पर गड़ा दिया। उसे यूँ एकटक ताकते हुए पति ने झुंझलाते हुए पूछा, “क्या देख रही हो?”

 “उसे देख रही हूँ, जो न दुख बाँटता है, न आक्रोश जताता है, न गले लगाता है… बस देखता है… या अनदेखा करता है।”

“पर मैंने तुम्हें कुछ कहा तो नहीं।”

उसने अपने कमरे की ओर जाते हुए वाक्य फेंका, “तुमने कुछ नहीं कहा… तुम्हारी यही ‘कुछ नहीं’ तो सबसे गहरे ज़ख़्म देती है।” ■