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Apr 8, 2015

दुनिया का कूड़ाघर बनता भारत

           दुनिया का कूड़ाघर  बनता भारत
                        - नरेन्द्र देवांगन

विकसित देश भारत को जिस तरह अपना कूड़ाघर बनाने का प्रयास कर रहे हैं उससे इसकी छवि दुनिया में सबसे बड़े कबाड़ी के रूप में भी उभर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है, तो इसकी वजह यह है कि इस समस्या के प्रति सरकारें उदासीन रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है।
गुजरात के अलंग तट पर विश्व का सबसे बड़ा कबाडख़ाना है। फ्रांस के विमानवाही पोत क्लिमेंचू को यहां पहियों पर चढ़ाकर गोदी तक लाया जाना था जहां गैस कटर से लैस सैकड़ों मजदूर इसके टुकड़े- टुकड़े करते। लेकिन पर्यावरण समूह ग्रीनपीस ने यह चेतावनी दी थी कि इस युद्धक विमानवाही पोत में सैकड़ों टन एस्बेस्टस भरा पड़ा है, जो पर्यावरण के लिए घातक है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और इस जहाज को तट पर ही रोक दिया गया। बाद में फ्रांस के राष्ट्रपति ने जहाज को वापस अपने देश भेजने का आदेश दिया। इसी तरह एक अन्य विषैले निर्यात से भरे नार्वे के यात्री जहाज लेडी 2006 की तुड़ाई पर भी सुप्रीम कोर्ट ने राक लगा दी थी।
15 नवबंर 2009 को कोटा (राजस्थान) के कबाड़ में एक बहुत भीषण विस्फोट हुआ जिसमें तीन व्यक्ति मारे गए व अनेक घायल हुए। आसपास की इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुर्इं। यह विस्फोस्ट कबाड़ में से धातु निकालने के प्रयास के दौरान हुआ। यह हादसा इकलौता हादसा नहीं था। कबाड़ में विस्फोट की अनेक वारदातें हाल में हो चुकी हैं।
पश्चिम के औद्योगिक देशों के सामने अपने औद्योगिक कचरे के निपटान की समस्या बहुत भयानक है। इसलिए पहले वे अपना कचरा जमा करते हैं फिर उस कचरे को किसी कल्याणकारी योजना के साथ जोड़कर रीसाइक्लिंग प्रौद्योगिकी सहित किसी गरीब या विकासशील देश को बतौर मदद पेश कर देते हैं या बेहद सस्ते दामों पर उसे बेच देते हैं।
इराक युद्ध के समय यहां अमरीकी सेना ने बहुत भीषण बमबारी की थी जिसमें बहुत विनाश हुआ था। उसके बाद की घरेलू हिंसा और हमलों से भी बहुत विनाश हुआ। इस विनाश का मलबा बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध होने लगा और व्यापारी इसे भारत जैसे देशों में पहुंचाने लगे क्योंकि यहां इसकी प्रोसेसिंग लुहार या छोटी इकाइयां सस्ते में कर देती हैं। पर उन्हें यह नहीं बताया जाता है कि युद्ध के समय के ऐसे विस्फोटक भी इस मलबे में छिपे हो सकते हैं और कभी भी फट सकते हैं। इन विस्फोटकों की उपस्थिति के कारण ही हाल के वर्षों में कबाड़ के कार्य व विशेषकर लोहे के कबाड़ को गलाने के कार्य में बहुत- सी दुर्घटनाएं हो रही हैं।
अब तो कबाड़ के नाम पर रॉकेट और मिसाइलें भी देश में आने लगी हैं। इससे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक नया खतरा पैदा हो गया है। यह हैरत की बात है कि ईरान से लोड होने के बाद भारत के कई राज्यों से गुजरने, दिल्ली पहुंचने और फिर साहिबाबाद स्थित भूषण स्टील फैक्टरी में विस्फोट होने तक किसी ने ट्रकों में भरे कबाड़ की जांच करने की जहमत नहीं उठाई। दिल्ली में तुगलकाबाद स्थित जिस कंटेनर डिपो में ये ट्रक पहुंचे थे, वह खुद 1991, 1993 और 2002 के कबाड़ में आई ऐसी विस्फोटक सामग्री की मार झेल चुका है। तब भी यह सामग्री पश्चिम एशिया से आई थी और हर बार वहीं से माल लाया जा रहा है। कस्टम विभाग द्वारा बिना जांच के आयातित सामग्री को स्वीकार करने का चलन इसमें सहायक की भूमिका निभा रहा है।
भारत दुनिया का सबसे पसंदीदा डंपिंग ग्राउंड (कबाडग़ाह) है। हम सस्ते मलबे के सबसे बड़े आयातक हैं। प्लास्टिक, लोहा या अन्य धातुओं का कबाड़, ल्यूब्रिकेंट के तौर पर अनेक अन्य धातुओं का कबाड़, ल्यूब्रिकेंट के तौर पर अनेक रासायनिक द्रव और अनेक जहरीले रसायन, पुरानी बैटरियां और मशीनें हमारी चालू पसंदीदा खरीदारी सूची में हैं। जब इन्हें इस्तेमाल के लिए दोबारा गलाया जाता है तो इससे निकलने वाला प्रदूषण न केवल यहां की हवा बल्कि मिट्टी और पानी तक में जहर घोल देता है। उस मिट्टी में उपजा हुआ अनाज दूसरी- तीसरी पीढ़ी में आनुवंशिक समस्याएं पैदा कर सकता है। लेकिन इतनी दूर तक जांच- परख करने की सतर्कता भारत सरकार में नहीं है।
बढ़ते ई- कचरे ने पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए हैं। यह कबाड़ लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है। देश में अनुपयोगी और चलन से बाहर हो रहे खराब कम्प्यूटर व अन्य उपकरणों के कबाड़ से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। कबाड़ी इस कचरे को खरीदकर बड़े कबाडिय़ों को बेच देते हैं। वे इसे बड़े-बड़े गोदामों में भर देते हैं। इस प्रकार जगह- जगह से एकत्र किए गए आउटडेटेड कम्प्यूटर आदि कबाड़ बड़ी संख्या में गोदामों में जमा हो जाते हैं। इसके अलावा विदेशों से भी भारत में भारी मात्रा में कभी दान के रूप में तो कभी कबाड़ के रूप में बेकार कम्प्यूटर आयात किए जा रहे हैं। यह ई-कचरा प्राय: गैर कानूनी ढंग से मंगाया जाता है। आसानी से धन कमाने के फेर में ऐसा किया जाता है। कम्प्यूटर व्यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है कि हमें अपने देश में बेकार हो रहे कम्प्यूटर की अपेक्षा विदेशों से आ रहे ढेरों कम्प्यूटरों से अधिक खतरा है।
भारत की राजधानी दिल्ली में ही ऐसे कबाड़ को कई स्थानों पर जलाया जाता है और इससे सोना, प्लेटिनम जैसी काफी मूल्यवान धातुएं प्राप्त की जाती हैं हालांकि सोने और प्लेटिनम का इस्तेमाल कम्प्यूटर निर्माण में काफी कम मात्रा में किया जाता है। इस ई- कचरे को जलाने के दौरान मर्करी, लेड, कैडमियम, ब्रोमीन, क्रोमियम आदि अनेक कैंसरकारी रासायनिक अवयव वातावरण में मुक्त होते हैं। ये पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अनेक दृष्टियों से घातक होते हैं। साथ ही पर्यावरण के लिए खतरनाक होते हैं। कम्प्यूटर व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयुक्त होने वाला प्लास्टिक अपनी उच्च गुणवत्ता के चलते जमीन में वर्षों यूं ही पड़ा रहता है और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
आयातित कचरे के प्रबंधन के बारे में गठित उच्चाधिकार प्राप्त प्रो. मेनन समिति ने ऐसे जहरीले कचरे के आयात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। इस समिति का गठन भी सरकार ने अपने आप नहीं किया था बल्कि एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में अंतराष्ट्रीय बेसल कन्वेंशन में सूचीबद्ध कचरों का भारत में प्रवेश प्रतिबंधित किया था। इसके बाद सरकार ने खतरनाक कचरे के प्रबंधन के अलग- अलग पहलुओं की जांच करने के लिए मेनन समिति का गठन किया था। मेनन समिति ने न सिर्फ कई कचरों के आयात पर रोक लगाने की सिफारिश की थी बल्कि जो औद्योगिक कचरा देश में है उसके भंडारण और निपटान के बारे में भी कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। लेकिन सरकार ने मात्र 11 वस्तुओं का आयात ही प्रतिबंधित किया, बाकी 19 वस्तुओं को विचारार्थ छोड़ दिया गया। यह उदासीनता तो आयातित कचरे से निकलने वाले जहर से भी खतरनाक है।
इराक युद्ध में अमरीका ने जो बमबारी की थी, उसमें क्षरित युरेनियम का भी उपयोग हुआ था। इस बात को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अब सामान्यत: स्वीकार किया जाता है कि पूरे विश्व में क्षरित युरेनियम युक्त हथियारों का सबसे अधिक उपयोग अभी तक इराक में ही हुआ है। क्षरित युरेनियम वाले बमों से क्षतिग्रस्त टैंक के मलबे में भी क्षरित युरेनियम के अवशेष होते हैं। यदि हमारे देश में बड़े पैमाने पर इस मलबे का आयात होगा तो क्षरित युरेनियम से युक्त धातु हमारे देश में दूर- दूर तक इसके खतरे से अनभिज्ञ लोगों के पास पहुंच जाएगी और वे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं।
जाहिर है विकसित देश भारत को जिस तरह अपना कूड़ाघर बनाने का प्रयास कर रहे हैं उससे इसकी छवि दुनिया में सबसे बड़े कबाड़ी के रूप में भी उभर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है, तो इसकी वजह यह है कि इस समस्या के प्रति सरकारें उदासीन रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। यह सरकारी नजरिया है, जो आयातित कचरे के खतरे को बहुत मामूली करके आंकता है। (स्रोत फीचर्स)

Oct 22, 2013

मूर्ति विसर्जन से प्रदूषित होते हमारे जल स्रोत

मूर्ति विसर्जन से प्रदूषित होते हमारे जल स्रोत
- नरेन्द्र देवांगन
 आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन अब पर्यावरण पर भारी पड़ रहा है। हर साल हमारे देश में कई स्थानों पर ज़ोर-शोर से गणेशोत्सव मनाया जाता है और उसके बाद जगह-जगह दुर्गा -पूजा का आयोजन होता है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल लगभग दस लाख मूर्तियाँ नदी, तालाबों और झीलों के पानी के हवाले की जाती हैं और उन पर लगे वस्त्र, आभूषण भी पानी में चले जाते हैं। ज़्यादातर मूर्तियाँ पानी में अघुलनशील प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी होती हैं और उन्हें विषैले एवं अघुलनशील नॉन बॉयोडिग्रेडेबल रंगों से रंगा जाता है। इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी की जैविक ऑक्सीजन माँग तेज़ी से बढ़ जाती है जो जलचर जीवों के लिए कहर बनता है। चंद साल पहले मुंबई से वह विचलित करने वाला समाचार मिला था कि मूर्तियों के धूमधाम से विसर्जन के बाद जुहू तट पर लाखों की तादाद में मरी मछलियाँ पाई गई थीं।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिल्ली में यमुना नदी का अध्ययन इस सम्बन्ध में आँखें खोलने वाला रहा है कि किस तरह नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। बोर्ड के मुताबिक नदी के पानी में पारा, निकल, जस्ता, लोहा, आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का अनुपात दिनोंदिन बढ़ रहा है। दिल्ली के जिन-जिन इलाकों में मूर्तियाँ बहाई जाती हैं वहाँ के पानी के सैंपल्स के अध्ययन में बोर्ड ने पाया कि मूर्तियाँ बहाने से पानी की चालकता, ठोस पदार्थों की मौज़ूदगी और जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग बढ़ जाती है और घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है। पाँच साल पहले बोर्ड ने अनुमान लगाया था कि हर साल लगभग 1800 बड़ी मूर्तियाँ दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बहाई जाती हैं और उसका निष्कर्ष था कि इस कर्मकाण्ड से नदी की अपूरणीय क्षति हो रही है और प्रदूषण फैल रहा है।
सबसे ज़्यादा जल प्रदूषण प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी मूर्तियों के विसर्जन से होता है। इन मूर्तियों में प्रयुक्त हुए रासायनिक रंगों से भी जल प्रदूषण होता है। पूजा के दौरान उत्पन्न ऐसा कचरा, जिसकी रिसाइकलिंग नहीं की जा सकती है, उससे भी जल प्रदूषण होता है।
पिछले कई सालों से यह बात प्रकाश में आई है कि जल प्रदूषण सबसे ज़्यादा प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के विसर्जन से होता है। ये सभी मूर्तियाँ झीलों, नदियों एवं समुद्रों में बहाई जाती है, जिससे जलीय वातावरण में समस्या सामने आती है। प्लास्टर ऑफ पेरिस ऐसा पदार्थ है जो नष्ट नहीं होता है। इससे वातावरण में प्रदूषण की मात्रा के बढ़ने की संभावना बहुत अधिक है। प्लास्टर ऑफ पेरिस दरअसल कैल्शियम सल्फेट हेमी हाइड्रेट होता है। दूसरी ओर, ईकोफ्रेण्डली मूर्तियाँ चिकनी मिट्टी से बनती हैं, जिन्हें विसर्जित करने पर वे आसानी से पानी में घुल जाती हैं। लेकिन जब इन्हीं मूर्तियों को रासायनिक रंगों से रंगा जाता है तो ये रंग जल -प्रदूषण को बढ़ाते हैं।
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस सम्बन्ध में मार्गदर्शिका तैयार की है,जिसके अनुसार मूर्तियों का निर्माण प्राकृतिक पदार्थों से किया जाना चाहिए। इनमें प्राकृतिक मिट्टी के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। मूर्तियों पर विषैले एवं जैविक रूप से नष्ट न होने वाले रंगों एवं पेंटों का उपयोग प्रतिबंधित है। प्राकृतिक, अविषाक्त एवं जल में घुलनशील रंगों का उपयोग किया जाना चाहिए। प्रतिमाओं को सुशोभित करने वाले गहने, फूल, वस्त्र एवं अन्य सजावटी वस्तुओं को विसर्जन के पूर्व हटा लेना चाहिए। इनमें से फूल आदि जैविक रूप से नष्ट होने वाले पदार्थों की कंपोस्टिंग की जानी चाहिए एवं अन्य सामग्री जैसे प्लास्टिक, थर्मोकोल आदि का पुनर्चक्रण किया जाना चाहिए। फल, नारियल, वस्त्र आदि को गरीबों में बाँट दिया जाना चाहिए जबकि अनुपयोगी सामग्री को लैंडफिल के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इस सम्बन्ध में व्यापक जन जागरूकता की आवश्यकता है, ताकि लोग पवित्र जल स्त्रोतों को प्रदूषण से बचा सकें।
जिन स्रोतों पर प्रतिमा विसर्जन किया जा रहा है वहाँ विसर्जन के पूर्व संश्लेषित शीट्स बिछा कर, विसर्जन के पश्चात शेष बचे हुए पदार्थों को किनारों पर ला कर उनका आवश्यकतानुसार उपयोग या निपटान किया जाना चाहिए।
स्थानीय निकायों और जि़ला प्रशासन के सहयोग से नदियों एवं अन्य जल स्रोतों में विसर्जन बिंदुओं को चिह्नांकित किया जाना चाहिए तथा वहाँ अनावश्यक भीड़ जमा न हो, ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए। इन स्रोतों के किनारे विसर्जन के दौरान उत्पन्न ठोस अपशिष्ट को जलाने पर प्रतिबंध होना चाहिए। विसर्जन के 48 घंटे के भीतर समस्त सामग्री, मलबे आदि को किनारे ला कर उसका उचित निष्पादन किया जाए।
नदियों, तालाबों या झीलों में प्रतिमा विसर्जन के पूर्व इनके किनारे अस्थायी सीमांकित पोखर बनाए जाएँ जिनमें 'संश्लेषित लाइनिंग बिछाई जाए  एवं इनमें प्रतिमाओं का विसर्जन करवाया जाए। इन अस्थायी पोखरों के ऊपरी पानी को आंशिक रूप से उपचारित करने के लिए चूना मिलाया जा सकता है ताकि पानी में उपस्थित गंदगी को अवक्षेपित किया जा सके एवं उसकी उदासीनता बनाए रखी जा सके। इस आंशिक उपचार के उपरांत ऊपरी जल को जल स्रोतों में बहने दिया जा सकता है तथा मलबे एवं गंदगी को पृथक् कर सम्पूर्ण जल स्त्रोत को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। इस सम्बन्ध में मूर्ति निर्माण से लेकर विसर्जन तक की गतिविधियों में संलग्न लोगों को जागरूक करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना है ,ताकि हम वांछित लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।

प्रतिमा निर्माण एवं विसर्जन के समय थोड़ी-सी सावधानी रखकर अपने पवित्र जल स्रोतों को, जो वास्तव में हमारे जीवन का आधार भी हैं, प्रदूषित होने से बचा सकते हैं। रीति-रिवाज़ों, मान्यताओं, का पालन करें, शास्त्र -सम्मत विधि से प्रतिमाओं की स्थापना और पूजा-अर्चना करें तथा साथ ही पर्यावरण के प्रति सजगता के साथ समस्त विधान सम्पन्न करें ताकि ये खूबसूरत धरती और इसके संसाधन चिरकाल तक हमें प्राकृतिक और स्वच्छ रूप में उपलब्ध होते रहें। जल अमृत है इसे किसी भी प्रकार से प्रदूषित न होने दें। स्रोत फीचर्स)

May 22, 2013

डिस्पोज़ेबल वस्तुओं से फैलता संक्रमण

डिस्पोज़ेबल वस्तुओं से फैलता संक्रमण

-नरेन्द्र देवांगन

 प्लास्टिक के बर्तनों में खाद्य पदार्थ तो आम बात है। प्लास्टिक से निर्मित थैलियों, बर्तनों, कंटेनरों, बोतलों में औषधियाँ तक पैक की जाती हैं। यहाँ तक कि खून की बोतलें भी प्लास्टिक की बनी होती हैं। दावा किया जाता है कि यह प्लास्टिक विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी नियमों के अनुसार मेडिकल तौर से जीवाणुरहित है। किंतु चूक हर कहीं होती है।
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संयुक्त राष्ट्र एड्स विरोधी अभियान में एड्स से बचने के लिए जीवाणु मुक्त सुई का प्रयोग करने की सलाह दी गई है। आजकल डॉक्टर इंजेक्शन लगाने के लिए डिस्पोज़ेबल सिरिंज का ही उपयोग करते हैं। सिरिंज प्लास्टिक की बनी होती है तथा सुई स्टेनलेस स्टील की बनी होती है। इसका दोबारा उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। एक व्यक्ति को लगाने के बाद इसे तोड़कर फेंक देना चाहिए। इससे संक्रमण नहीं फैलता।
दो-तीन दशक पहले सभी चीज़ें पुन: उपयोग की जाती थीं। परंतु आज कई ऐसी वस्तुएं पुन: उपयोग की जा रही हैं, जिन्हें दोबारा उपयोग नहीं करना चाहिए। वैसे तो आज हर प्रकार के डिस्पोज़ेबल उपलब्ध हैं। जैसे ग्लास, चम्मच, प्लेट, कप, दस्ताने, सिरिंज व सुई। दो दशक पहले इंजेक्शन लगाने के लिए बहुत सारे झंझट करने पड़ते थे। जैसे सिरिंज एवं सुई को उबालना, चिमटी से पकडऩा ताकि संक्रमण न हो। उस समय ये सिरिंज काँच की एवं सुई धातु की बनी होती थी। धीरे-धीरे जीवाणुरहित डिस्पोज़ेबल प्लास्टिक सिरिंज एवं सुई का आगमन हुआ।
शुरुआती दौर में ये महंगी होने की वजह से बहुत कम उपयोग की जाती थीं। परंतु प्रतिस्पर्धा के चलते इनके दाम कम होने तथा चिकित्सक व मरीज़ दोनों के लिए सुविधाजनक होने से धड़ल्ले से उपयोग में लाई जाने लगी हैं। फिर इन डिस्पोज़ेबल वस्तुओं का दोबारा, तिबारा एवं निरंतर उपयोग होने लगा।
जैसा कि सभी जानते हैं, प्लास्टिक की चीज़ों को नष्ट करना आसान नहीं है। मगर इन सिरिंजों का भी पुन: चक्रण किया जाता है। कबाडिय़ों के भंडार से प्लास्टिक, लोहा, काँच, कागज़ आदि वस्तुएं विभिन्न कारखानों में पहुँच जाती हैं, जहाँ उनका पुन: चक्रण किया जाता है। लोहा आदि धातुओं को तो फिर से उच्च ताप पर पिघलाकर पुन: उपयोग किया जाता है, जिससे इनमें विषाणु के रहने की आशंका नगण्य ही होती है। लेकिन प्लास्टिक कूड़े को अल्प ताप पर पिघलाकर पुन: उपयोगी बनाया जाता है, जिसमें जीवाणुओं के मौजूद रहने का खतरा भरपूर रहता है। इससे अधिक ताप पर प्लास्टिक जल जाता है। जलकर प्लास्टिक भयंकर विषैली गैस में बदलता है जो वातावरण के लिए अत्यंत हानिकारक है। दूरदर्शन पर इन सिरिंजों तथा सुइयों के व्यापार पर एक कार्यक्रम में दिखाया गया था कि इन्हें खरीदकर फिर से पैक करके बेच दिया जाता है। यहीं से शुरुआत होती है इन डिस्पोज़ेबल वस्तुओं द्वारा आपको डिस्पोज़-ऑफ (नष्ट) करने की।
उबालकर जीवाणुमुक्त करने की प्रक्रिया अत्यंत प्राचीन एवं वैज्ञानिक है। यह शताब्दियों से आज तक प्रचलित है तथा श्रेष्ठ है। इन काँच की सिरिंजों एवं धातु की सुइयों को मात्र कुछ मिनट उबाल लेने से ही ये पूर्णत: जीवाणु एवं विषाणु रहित हो जाती हैं। यहाँ तक कि जानलेवा एड्स वायरस एवं खतरनाक हेपेटाइटिस-बी वायरस भी इससे नष्ट हो जाते हैं। डिस्पोज़ेबल सिरिंज एवं सुई के साथ यह स्थिति नहीं होती। विशेषत: जब ये दोबारा उपयोग में लाई जाती हैं।
प्लास्टिक के बर्तनों में खाद्य पदार्थ तो आम बात है। प्लास्टिक से निर्मित थैलियों, बर्तनों, कंटेनरों, बोतलों में औषधियाँ तक पैक की जाती हैं। यहाँ तक कि खून की बोतलें भी प्लास्टिक की बनी होती हैं। दावा किया जाता है कि यह प्लास्टिक विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी नियमों के अनुसार मेडिकल तौर से जीवाणुरहित है। किंतु चूक हर कहीं होती है। अनेक मामलों में अधिकांश सप्लायर्स द्वारा इनमें प्रयोग किया जाने वाला प्लास्टिक भी पुन: चक्रित होता है।
सामान्यत: तो डिस्पोज़ेबल सिरिंज एवं सुई दोबारा उपयोग नहीं की जानी चाहिए। यदि किसी कारणवश की भी जाती है, तो उन्हें गामा किरणों के द्वारा पूर्णत: जीवाणुमुक्त करना चाहिए। इन प्लास्टिक सिरिंजों को उबालने पर प्लास्टिक पिघलता है तथा इन पर कई प्रकार के पदार्थ चिपक जाते हैं। यदि ये किसी संक्रामक रोगी के लिए इस्तेमाल की गई हों तो उसका संक्रमण दोबारा उपयोग के वक्त दूसरे मरीज़ में प्रवेश कर सकता है, जिसकी वजह से एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। यह खतरा उन नशेडिय़ों में और भी अधिक हो गया है, जो इंजेक्शन द्वारा नशा लेते हैं तथा एक ही इंजेक्शन एवं सुई को कई व्यक्ति उपयोग में लाते हैं।
इन डिस्पोज़ेबल वस्तुओं से बीमारियों के फैलने का खतरा इसलिए भी बढ़ता जा रहा है क्योंकि इन डिस्पोज़ेबल्स को डिस्पोज़ (नष्ट) करने का आसान तरीका उपलब्ध नहीं है और न ही इन्हें नष्ट करने के लिए चिकित्सक, नर्सिंग होम एवं स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा कोई ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। आज अधिकतर शासकीय एवं अशासकीय अस्पतालों में इन डिस्पोज़ेबल उपकरणों एवं अन्य संक्रामक पदार्थों जैसे टी.बी. मरीज़ का बलगम, उनके फेफड़ों से निकाला गया संक्रमित पानी, हैज़े के मरीज़ का मल एवं संक्रमित ड्रेसिंग नष्ट करने की कोई स्थाई व्यवस्था, जैसे इन्सीनरेटर (जिसमें यह सब उच्च तापमान पर नष्ट हो जाएँ) नहीं है। व्यवस्था है तो बस इतनी कि इन्हें या तो दूर फेंक दिया जाता है या फिर नाली में बहा दिया जाता है, जहाँ से ये नए संक्रमणों को जन्म देते हैं। कोई अति उत्साही हुआ, तो इन्हें जला देता है।
डिस्पोज़ेबल्स एवं संक्रमित वस्तुओं को नष्ट करने के लिए जल्दी ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो एड्स एवं हेपेटाइटिस बी जैसी बीमारियों के द्वारा ये डिस्पोज़ेेबल पलटवार करेंगे। इन बीमारियों का फैलाव रोकने एवं डिस्पोज़ेेबल के बारे में कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:
- डिस्पोज़ेबल सिरिंज एवं सुई का दोबारा उपयोग न करें। उपयोग के बाद इन्हें नष्ट कर दें।
- उबालकर किया गया स्टरलाइज़ेशन आज भी श्रेष्ठ है। इसी का उपयोग करें।
- प्रत्येक नर्सिंग होम या चिकित्सालय में इनको नष्ट करने के लिए इन्सीनरेटर या अन्य वैकल्पिक व्यवस्था हो।
- डिस्पोज़ेबल एक वरदान है, सुविधा है। इसका दुरुपयोग कर इसे अभिशाप न बनाएँ। (स्रोत फीचर्स)

Nov 24, 2012

मान्यताओं का मारा बेचारा उल्लू




मान्यताओं का मारा बेचारा उल्लू  
-नरेन्द्र देवांगन
प्रकृति और पर्यावरण के साझा अस्तित्व में धरती पर मौजूद हर परिंदा खूबसूरत कविता के समान है। इस सच्चाई के बावजूद मनुष्य की रूढि़वादी/प्रगतिशील सोच ने हजारों पक्षी प्रजातियों के अस्तित्व पर तलवार लटका दी है। पिछले दो-तीन सालों से अंबाला-कालका राष्ट्रीय राजमार्ग पर निर्माण में बाधा बने करीब एक लाख पेड़ों की कटाई के दौरान मारे गए परिंदों की संख्या लाखों में है। लेकिन इस दौरान करीब चार दर्जन विभिन्न प्रजातियों के उल्लुओं के शव इस लिहाज से चौंकाने वाले थे कि गिद्धों की भांति ही अब उल्लू भी अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं।
धरती पर मौजूद 2500 पक्षी प्रजातियों में से 1500 का अस्तित्व करीब तीन दशक पहले ही समाप्त घोषित किया जा चुका है। उल्लुओं के सामूहिक संहार की यह घटना भी उस समय प्रकाश में आई जब मई 2009 में अंतर्राष्ट्रीय पक्षी दिवस के अवसर पर दुनिया भर के पक्षी विज्ञानी अमरीका में जुटे थे।
उल्लू के अस्तित्व पर मंडराते खतरे पर इटली और स्वीडन के पक्षी वैज्ञानिकों द्वारा हाल में की गई खोजों में साफ तौर से चेतावनी दी गई है कि यदि धरती से उल्लू जैसे बहुपयोगी परिंदे का अस्तित्व समाप्त हो गया तो पूरी दुनिया में अंधाधुंध गति से बढ़ती चूहों की फौज खाद्यान्न संकट की नई समस्या पैदा कर देगी। चूहों की बढ़ती फौज न केवल अन्न संकट पैदा करेगी बल्कि प्लेग जैसी घातक बीमारी भी दोबारा अस्तित्व में आ सकती है।
उल्लू की शक्ल देखने में कुछ भयानक तो अवश्य लगती है, मगर इस बेहद चतुर और अक्लमंद पक्षी को मूर्ख मानना तथ्यों से परे है। इसके शरीर की बनावट सुंदर नहीं होती मगर देखने और सुनने की क्षमता में यह इंसानों से कहीं आगे है। उल्लू फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों जैसे चूहों, चमगादड़ों, टिड्डियों, सांप, छछूंदर व खरगोश आदि का सफाया करके फसलों को बचाता है। शुद्ध मांसाहारी जीव होने के कारण इससे फसलों के नुकसान की तो कृपना भी नहीं की जा सकती। वास्तव में उल्लू के घर में बैठने, उसे देखने, छूने या बोलने से जुड़ी अपशकुन की बातें बेबुनियाद हैं। उल्लू व अन्य परिंदों के खात्मे के दर्जनों कारण हैं।
इसमें मोबाइल फोन की भी भूमिका है। शहरों, कस्बों से लेकर गांव-गांव में लगे मोबाइल फोन के बेशुमार टावरों से निकलने वाली तरंगों ने पक्षियों के अस्तित्व पर प्रश्न चिंह लगा दिया है। उल्लुओं की प्रजातियों को विलुप्ति के कगार तक पहुंचाने में पुराने वृक्षों की कटाई भी जिम्मेदार है क्योंकि आम तौर पर उल्लू पचास-साठ साल पुराने वृक्षों के कोटरों में ही अंडे देना पसंद करते हैं। अमरीका में जमा हुए पक्षीविदों ने इस बात पर गंभीर चिंता जाहिर की है कि गगनचुंबी इमारतें तमाम परिंदों के लिए मौत का पैगाम साबित हो रही हैं। दरअसल पूरी दुनिया में गगनचुंबी इमारतों में शीशे का प्रचलन बढऩे से पक्षियों के लिए समस्या खड़ी हो गई है, क्योंकि पक्षी इन शीशों में वृक्षों का प्रतिबिंब देखकर भ्रमित हो जाते हैं। वे प्रतिबिंब को ही पेड़ समझकर उनमें शरण लेने आते हैं और खिड़कियों से टकराकर मारे जाते हैं।
हरियाणा के वन्य प्राणी विभाग के मुख्य संरक्षक डॉ. परवेज अहमद बताते हैं कि भारत सहित कुछ एशियाई देशों में उल्लू को लेकर प्रचलित अंधविश्वास, ओझाओं और तांत्रिकों के अनगिनत मनगढ़ंत किस्से-कहानियों में उल्लू को अशुभ और मनहूस करार दिए जाने की वजह से उल्लुओं की संख्या तेजी से घट रही है। यही वजह है कि उत्तरी राज्यों में उल्लू की घटती संख्या की वजह से चूहे हर साल इतना अनाज नष्ट कर डालते हैं जो पूरे उत्तर प्रदेश की सवा अठारह करोड़ की आबादी के लिए पर्याप्त होगा।
डॉ. परवेज के अनुसार स्ट्रिगाडी कुल का पक्षी उल्लू एकांतवासी, बेहद चतुर, तेज-तर्रार और सटीक शिकारी है। यह शिकारी परिंदा घोर अंधकार में भी किसी युवक की तुलना में सौ गुना अधिक देख और सुन सकता है। करीब सत्तर साल तक जीवित रहने वाला उल्लू जीव जगत में ऐसा अकेला अपवाद है जिसकी बड़ी-बड़ी और गोल आंखें इंसानों की तरह ठीक सामने होती हैं। इस कारण उल्लुओं को अन्य परभक्षियों और प्रतिद्वंद्वी शिकारी पक्षियों से ज़्यादा खतरा नहीं होता है।
जीव वैज्ञानिक परमिंदर कौर की राय में रूढि़वादी परंपराओं से हटकर देखें तो उल्लू इस धरती पर सबसे सुंदर और श्रेष्ठ निशाचर पक्षी है जिसकी लचीली आंखें 360 डिग्री कोण पर भी आसानी से घूम जाती हैं। उल्लू अपनी आंखों में उपस्थित कुछ खास किस्म के रिफ्लेक्टरों की मदद से अपने शिकार को बड़ी दूर से देख सकता है। इंसान से भी बड़ी आंखों के चलते वह मामूली प्रकाश में भी बड़ी आसानी से अपने शिकार को देख सकता है। आंखों के समान ही उल्लू के कान भी बेहद संवेदनशील होते हैं। ये अति संवेदी कान उल्लू की दिन में कम दिखाई देने की खामी को बड़ी आसानी से पूरा कर देते हैं।
उत्तर भारत के प्रसिद्ध वन्य जीव छायाकार संत अरोड़ा पच्चीस सालों से उल्लू जैसे निशाचर पक्षियों की गतिविधियों को अपने कैमरे में कैद कर रहे हैं। वे चेतावनी भरे लहजे में कहते हैं कि आज तक कभी यह नहीं सुना कि उल्लू ने किसी इंसान को नुकसान पहुंचाया हो, इसके विपरीत इंसान ने उल्लू को विलुप्ति के कगार तक पहुंचा दिया है। संत अरोड़ा पंचकूला में 2 मार्च 2009 की एक घटना का हवाला देते हुए कहते हैं कि सेक्टर 9 में ठगी की वारदात में पुलिस ने जब एक तांत्रिक बाबा अजमल खान बंगाली पर मुकदमा दर्ज किया तो उसने खुद कबूल किया कि उसने अनिष्ट निवारण की तांत्रिक क्रिया में सात उल्लुओं की बलि चढ़ाई थी। इसके लिए सरकारी नियमों को जिम्मेदार ठहराते हुए संत अरोड़ा कहते हैं कि, उदाहरण के तौर पर, जब भी जीव हत्या का कोई मामला सामने आता है, तो हरियाणा प्रदेश के वन्य प्राणी विभाग को दोषियों को हिसार स्थित एकमात्र वन्य प्राणी अदालत में पेश करना पड़ता है। लिहाजा स्टाफ कर्मियों के अभाव और कोर्ट के चक्कर से बचने के लिए वन्य प्राणी विभाग ज़्यादातर मामलों को ले-देकर रफा-दफा कर देता है।
1972 के संशोधित वन्य प्राणी अधिनियम के तहत उल्लू को संरक्षित और संकटग्रस्त प्रजाति घोषित किया गया है। इसके बावजूद पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में हर साल 15 से 20 हजार उल्लू तांत्रिक क्रियाओं की बलि चढ़ जाते हैं। हरियाणा के जींद में स्थित कामाख्या देवी के कालीबाड़ी आश्रम के मुखिया रामनारायण द्वारा किया गया खुलासा काफी चौंकाने वाला है। वे बताते हैं कि उल्लू के शरीर का तापमान हर मौसम में स्थिर रहने की वजह से ही तंत्र साधना में उल्लू के शरीर का हर अंग काम आता है। इसके पंखों को हासिल करने के लिए इसका शिकार किया जाता है। कितने मामलों में तो उल्लू के बच्चे आंखें खोलने से पहले ही काल के मुंह में चले जाते हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में बहेलिया प्रजाति के लोग उल्लुओं के बच्चों को उनके कोटरों से निकालकर उन्हें 3 से 7 हजार रुपए प्रति उल्लू के हिसाब से तांत्रिकों के हवाले कर देते हैं। एक तांत्रिक के अनुसार धन-वैभव की प्रतीक लक्ष्मी को खुश करने, जमीन के नीचे के धन का पता लगाने, मृत्यु का पूर्वाभास, दूसरे की स्त्री को वश में करने तथा मारक वशीकरण जैसी मिथ्या और मनगढ़ंत तंत्र क्रियाएं उल्लू की बलि चढ़ाए बिना कभी भी संपूर्ण नहीं होतीं। इसके अलावा दीवाली के अवसर पर उल्लू के पंख जलाने, उल्लू के शरीर से तैयार भस्म को आंखों में लगाने और बच्चों को बुरी नजर से बचाने वाली ताबीजों के नाम पर मक्कार तांत्रिक आम लोगों को बेवकूफ बनाकर अपनी जेबें भर रहे हैं।
दीवाली के दिन पूजन और तांत्रिक अनुष्ठान के लिए पश्चिम बंगाल के जंगलों में उल्लू की एक प्रजाति बार्न बाउल का शिकार और उनकी तस्करी बढ़ गई है। धार्मिक मान्यताओं के अलावा इस उल्लू की आंखों, चमड़े और पंखों का इस्तेमाल दवाइयां बनाने में होता है, खासकर, म्यांमार और चीन में। यूनानी और चीनी दवाइयों में उल्लू की आंखों का खूब प्रयोग किया जाता है। युरोप के कुछ देशों में भी बंगाल में पाए जाने वाले इस उल्लू की विशेष मांग है।
उल्लू को मारने की एक वजह यह है कि इसके नाखून और चोंच को जलाकर एक प्रकार का तेल तैयार किया जाता है जो गठिया के रोगियों की मालिश में काम आता है। वहीं देसी पद्धति से दवा तैयार करने वालों का यह भी दावा है कि इसके मांस का उपयोग यौन उत्तेजक दवा तैयार करने में किया जाता है। कुछ तांत्रिक विधानों में इनकी बलि से पुत्र प्राप्ति, बीमारी के उपचार, वशीकरण, नपुंसकता जैसी समस्याओं के निदान का दावा किया जाता है जिससे छोटे कस्बों व शहरों की मंडियों में इनकी मांग अधिक रहती है। उल्लू की आंख व अंडे की मांग तांत्रिक क्रियाओं में सबसे अधिक होती है। तांत्रिक साधनाओं की किताब उल्लू तंत्र में उल्लू की बलि द्वारा 150 तांत्रिक विधियों का उल्लेख है। इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि तांत्रिक क्रियाओं की वजह से मंडियों में उल्लुओं की कितनी अधिक मांग है। भारत में मिलने वाली 33 उल्लू प्रजातियों में बार्न आउल को लुप्तप्राय घोषित कर दिया गया है। लेकिन बंगाल के जंगल बहुल इलाकों, खासकर बांग्लादेश की सीमा से सटे करीमपुर, नदिया के चापरा व मुर्शिदाबाद के जलंगी, मालदा, पूर्व मेदिनीपुर के हल्दिया व अन्य इलाकों में उल्लू की यह प्रजाति खूब पाई जाती है। ये गांव तस्करों का पसंदीदा इलाका बने हुए हैं और स्थानीय ग्रामीणों के लिए इन उल्लुओं का शिकार रोजगार का एक माध्यम।
उल्लू के गैर कानूनी बाजारों में सामान्यत: रॉक ईगल, ब्रााउन फिश, डस्की ईगल, बॉर्न आउल, कोलार्ड स्कॉप्स, मोटल्ड वुड आदि प्रजातियों के उल्लुओं की अधिक मांग होती है।
तस्कर उल्लुओं को नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते अरब देशों को भेज देते हैं, जहां उसे बड़े चाव से खाया जाता है। भारत के अलावा, नेपाल, बांग्लादेश, मलेशिया, थाईलैंड व म्यांमार में इनके गैर कानूनी व्यापार के रैकेट सक्रिय हैं। विका प्रकृति निधि द्वारा 2008 में जारी रिपोर्ट के अनुसार पिछले 6 सालों में उल्लू की कीमतों में दस गुना वृद्धि हुई है जिससे गैर कानूनी व्यापार में भी इजाफा हुआ है। अंधविश्वास की भेंट चढ़ता यह पक्षी अब अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। (स्रोत फीचर्स)

Sep 27, 2012

आकाश से टपकता सौंदर्य हिमकण

आकाश से टपकता सौंदर्य हिमकण

- नरेन्द्र देवांगन
हिमकण प्रकृति की अनंतता के प्रतीक हैं। ये गिरते हैं, हवा में तैरते हैं और फिर पिघल जाते हैं, दुबारा अनेकानेक रूप बदलकर वापस आने को। कहते हैं कि विल्सन बैंटली मानते थे। 

लड़कपन में विल्सन बैंटली ने एक हिमकण को सूक्ष्मदर्शी से देखा और उन्होंने जो कुछ देखा उसने उनकी जीवन की धारा का रुख ही मोड़ दिया, सर्दियों के प्रति उनका दृष्टिकोण ही बदल गया। बिना किसी से फोटोग्राफी सीखे या विज्ञान पढ़े, पेशे से किसान बैंटली ने अकेले ही तुषार कणों का अध्ययन आरंभ किया। उन्हें एक काले पटल पर रखकर पिघलने से पहले ही वे उनके फोटो उतार लेते। वरमोंट की कड़ाके की 46 सर्दियों में अकेले ही एक झोपड़ी में उन्होंने हिमपात की सुंदरता और रहस्यों पर विचार कर उन्हें कैमरे में कैद कर लिया। 1931 में अपनी मृत्यु तक उन्होंने हिमकणों के और कुछ नहीं तो 6 हजार फोटो खींचे। बैंटली का यह कार्य पत्र-पत्रिकाओं में क्रमबद्ध रूप से छपने से मौसम विज्ञान की एक नई शाखा का जन्म हुआ। जौहरियों ने आभूषणों के लिए नए-नए नमूनों के तौर पर उनके चित्रों को खरीदा और बच्चे उनके चित्रों के आकार-प्रकार में कागज के हिमकण काटने लगे।
हिमकण, जिन्होंने बैंटली को इतना अचंभित किया, प्रकृति की विशिष्ट सृजन शक्ति के उत्कृष्ट नमूने हैं। तुषार के ये कण किसी स्फटिक सदृश होते हैं और अनेक स्फटिकों के समूह भी। ये स्फटिक वायुमंडल के अत्यंत ऊंचे स्थानों पर बनते हैं। तापमान जहां अधिक होता है, वहां यही हिमकण पिघल कर वर्षा की बूंद बन जाते हैं। पर जहां अत्यधिक ठंड हो वहां स्फटिक का कोमल स्वरूप बना रहता है। 
धूल, ज्वालामुखी की राख या प्रदूषण का कोई भी कण 'बीज रूप में' स्फटिक का केंद्रक बन जाता है और आसपास के पानी के अणुओं को आकर्षित कर लेता है, जो उसकी सतह पर जम जाते हैं। हवा के कंधों पर सवार यह कण तापमान तथा आर्द्रता की विभिन्न परतों में मंडराता रहता है और हर परत इसे विविध आकार देती रहती है। ऐसे कण बार-बार एक दूसरे से टकराते भी हैं जिससे उनके आकार और स्वरूप बदलते रहते हैं।
हालांकि हम आमतौर पर हिमकणों को 6 कोनों वाला सितारा मात्र समझते हैं, परंतु इंटरनेशनल कमीशन ऑन स्नो एंड आइस के पास हिमकणों की अनेक श्रेणियां हैं और इनमें से प्रत्येक का निर्माण विभिन्न परिस्थितियों में होता है। मसलन, हल्के आर्द्र तूफान में हवा की तेजी कम हो, तो इससे वृक्षों के आकार के त्रिआयामी हिमकण बनते हैं जबकि अधिक ठंडे, शुष्क बादल सूई नुमा विन्यास वाले तुषार कणों को जन्म देते हैं। परंतु हर कण तापमान तथा आद्र्रता का अनूठा उत्पाद होता है, वायुमंडलीय परिस्थितियों की प्राकृतिक छाप।
हिमकणों के प्रति एक प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। क्या कोई भी दो हिमकण सचमुच एक-से नहीं होते? आंकड़े इसके विरुद्ध हैं। आधे मीटर मैदान को 25 सेंटीमीटर हिमपात से ढंकने के लिए एक ही बर्फानी तूफान में 10 लाख से अधिक हिमकणों की आवश्यकता होती है। ऐसे में हर कण बेजोड़ हो, संभव नहीं लगता। तो भी अनुमान है कि वायुमंडल में विभिन्न तापमान तथा आर्द्रता वाली कम से कम 10 लाख परतें संभव हैं, जिससे 10 की संख्या पर 50 लाख घात के बराबर विविधता की सृजन क्षमता पैदा होती है। किन्हीं दो हिमकणों को हर लिहाज से एक जैसा होने के लिए एक से 'बीजों' को एक ही समय जीवन आरंभ करके एक-सी परिस्थितियों से एक ही कालावधि तक गुजरते हुए नीचे गिरते समय एक जैसे टकरावों से गुजरना होगा। फिर उन दो तुषार कणों को एक ही वैज्ञानिक द्वारा उठाए जाकर सत्यापित होना होगा। इन मुश्किलों के मद्देनजर हिमकणों के अनूठेपन की अवधारणा शायद बनी ही रहेगी। इसके अलावा हम सब यह विश्वास सीने से लगाए हैं, कि प्रकृति के पास ऐसा अपार खजाना है कि वह अनगिनत संख्या में ये मोती आकाश से बरसाती रह सकती है।
हिमकण प्रकृति की अनंतता के प्रतीक हैं। ये गिरते हैं, हवा में तैरते हैं और फिर पिघल जाते हैं, दुबारा अनेकानेक रूप बदलकर वापस आने को। कहते हैं कि विल्सन बैंटली मानते थे, कि हिमकण 'आकाश से टपकता एक विचार है, अतुल सौंदर्य का खंड जो एक बार खो गया तो सदा के लिए खो गया।' यह अद्भुत संयोग है कि एक हिमकण में हमें क्षणभंगुरता और अमरत्व दोनों की झलक मिलती है। इसी ने बैंटली को भी वर्षों तक ठिठुरने पर विवश किया था। (स्रोत फीचर्स)

Nov 10, 2011

दुनिया का कूड़ाघर बनता भारत

- नरेन्द्र देवांगन

विकसित देश भारत को जिस तरह अपना कूड़ाघर बनाने का प्रयास कर रहे हैं उससे इसकी छवि दुनिया में सबसे बड़े कबाड़ी के रूप में भी उभर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है, तो इसकी वजह यह है कि इस समस्या के प्रति सरकारें उदासीन रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है।
गुजरात के अलंग तट पर विश्व का सबसे बड़ा कबाडख़ाना है। फ्रांस के विमानवाही पोत क्लिमेंचू को यहां पहियों पर चढ़ाकर गोदी तक लाया जाना था जहां गैस कटर से लैस सैकड़ों मजदूर इसके टुकड़े- टुकड़े करते। लेकिन पर्यावरण समूह ग्रीनपीस ने यह चेतावनी दी थी कि इस युद्धक विमानवाही पोत में सैकड़ों टन एस्बेस्टस भरा पड़ा है, जो पर्यावरण के लिए घातक है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और इस जहाज को तट पर ही रोक दिया गया। बाद में फ्रांस के राष्ट्रपति ने जहाज को वापस अपने देश भेजने का आदेश दिया। इसी तरह एक अन्य विषैले निर्यात से भरे नार्वे के यात्री जहाज लेडी 2006 की तुड़ाई पर भी सुप्रीम कोर्ट ने राक लगा दी थी।
15 नवबंर 2009 को कोटा (राजस्थान) के कबाड़ में एक बहुत भीषण विस्फोट हुआ जिसमें तीन व्यक्ति मारे गए व अनेक घायल हुए। आसपास की इमारतें भी क्षतिग्रस्त हुर्इं। यह विस्फोस्ट कबाड़ में से धातु निकालने के प्रयास के दौरान हुआ। यह हादसा इकलौता हादसा नहीं था। कबाड़ में विस्फोट की अनेक वारदातें हाल में हो चुकी हैं।
पश्चिम के औद्योगिक देशों के सामने अपने औद्योगिक कचरे के निपटान की समस्या बहुत भयानक है। इसलिए पहले वे अपना कचरा जमा करते हैं फिर उस कचरे को किसी कल्याणकारी योजना के साथ जोड़कर रीसाइक्लिंग प्रौद्योगिकी सहित किसी गरीब या विकासशील देश को बतौर मदद पेश कर देते हैं या बेहद सस्ते दामों पर उसे बेच देते हैं।
इराक युद्ध के समय यहां अमरीकी सेना ने बहुत भीषण बमबारी की थी जिसमें बहुत विनाश हुआ था। उसके बाद की घरेलू हिंसा और हमलों से भी बहुत विनाश हुआ। इस विनाश का मलबा बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध होने लगा और व्यापारी इसे भारत जैसे देशों में पहुंचाने लगे क्योंकि यहां इसकी प्रोसेसिंग लुहार या छोटी इकाइयां सस्ते में कर देती हैं। पर उन्हें यह नहीं बताया जाता है कि युद्ध के समय के ऐसे विस्फोटक भी इस मलबे में छिपे हो सकते हैं और कभी भी फट सकते हैं। इन विस्फोटकों की उपस्थिति के कारण ही हाल के वर्षों में कबाड़ के कार्य व विशेषकर लोहे के कबाड़ को गलाने के कार्य में बहुत- सी दुर्घटनाएं हो रही हैं।
अब तो कबाड़ के नाम पर रॉकेट और मिसाइलें भी देश में आने लगी हैं। इससे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक नया खतरा पैदा हो गया है। यह हैरत की बात है कि ईरान से लोड होने के बाद भारत के कई राज्यों से गुजरने, दिल्ली पहुंचने और फिर साहिबाबाद स्थित भूषण स्टील फैक्टरी में विस्फोट होने तक किसी ने ट्रकों में भरे कबाड़ की जांच करने की जहमत नहीं उठाई। दिल्ली में तुगलकाबाद स्थित जिस कंटेनर डिपो में ये ट्रक पहुंचे थे, वह खुद 1991, 1993 और 2002 के कबाड़ में आई ऐसी विस्फोटक सामग्री की मार झेल चुका है। तब भी यह सामग्री पश्चिम एशिया से आई थी और हर बार वहीं से माल लाया जा रहा है। कस्टम विभाग द्वारा बिना जांच के आयातित सामग्री को स्वीकार करने का चलन इसमें सहायक की भूमिका निभा रहा है।
भारत दुनिया का सबसे पसंदीदा डंपिंग ग्राउंड (कबाडग़ाह) है। हम सस्ते मलबे के सबसे बड़े आयातक हैं। प्लास्टिक, लोहा या अन्य धातुओं का कबाड़, ल्यूब्रिकेंट के तौर पर अनेक अन्य धातुओं का कबाड़, ल्यूब्रिकेंट के तौर पर अनेक रासायनिक द्रव और अनेक जहरीले रसायन, पुरानी बैटरियां और मशीनें हमारी चालू पसंदीदा खरीदारी सूची में हैं। जब इन्हें इस्तेमाल के लिए दोबारा गलाया जाता है तो इससे निकलने वाला प्रदूषण न केवल यहां की हवा बल्कि मिट्टी और पानी तक में जहर घोल देता है। उस मिट्टी में उपजा हुआ अनाज दूसरी- तीसरी पीढ़ी में आनुवंशिक समस्याएं पैदा कर सकता है। लेकिन इतनी दूर तक जांच- परख करने की सतर्कता भारत सरकार में नहीं है।
बढ़ते ई- कचरे ने पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए हैं। यह कबाड़ लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए एक बड़ा खतरा है। देश में अनुपयोगी और चलन से बाहर हो रहे खराब कम्प्यूटर व अन्य उपकरणों के कबाड़ से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। कबाड़ी इस कचरे को खरीदकर बड़े कबाडिय़ों को बेच देते हैं। वे इसे बड़े-बड़े गोदामों में भर देते हैं। इस प्रकार जगह- जगह से एकत्र किए गए आउटडेटेड कम्प्यूटर आदि कबाड़ बड़ी संख्या में गोदामों में जमा हो जाते हैं। इसके अलावा विदेशों से भी भारत में भारी मात्रा में कभी दान के रूप में तो कभी कबाड़ के रूप में बेकार कम्प्यूटर आयात किए जा रहे हैं। यह ई-कचरा प्राय: गैर कानूनी ढंग से मंगाया जाता है। आसानी से धन कमाने के फेर में ऐसा किया जाता है। कम्प्यूटर व्यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है कि हमें अपने देश में बेकार हो रहे कम्प्यूटर की अपेक्षा विदेशों से आ रहे ढेरों कम्प्यूटरों से अधिक खतरा है।
भारत की राजधानी दिल्ली में ही ऐसे कबाड़ को कई स्थानों पर जलाया जाता है और इससे सोना, प्लेटिनम जैसी काफी मूल्यवान धातुएं प्राप्त की जाती हैं हालांकि सोने और प्लेटिनम का इस्तेमाल कम्प्यूटर निर्माण में काफी कम मात्रा में किया जाता है। इस ई- कचरे को जलाने के दौरान मर्करी, लेड, कैडमियम, ब्रोमीन, क्रोमियम आदि अनेक कैंसरकारी रासायनिक अवयव वातावरण में मुक्त होते हैं। ये पदार्थ स्वास्थ्य के लिए अनेक दृष्टियों से घातक होते हैं। साथ ही पर्यावरण के लिए खतरनाक होते हैं। कम्प्यूटर व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयुक्त होने वाला प्लास्टिक अपनी उच्च गुणवत्ता के चलते जमीन में वर्षों यूं ही पड़ा रहता है और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाता है।
आयातित कचरे के प्रबंधन के बारे में गठित उच्चाधिकार प्राप्त प्रो. मेनन समिति ने ऐसे जहरीले कचरे के आयात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की थी। इस समिति का गठन भी सरकार ने अपने आप नहीं किया था बल्कि एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में अंतराष्ट्रीय बेसल कन्वेंशन में सूचीबद्ध कचरों का भारत में प्रवेश प्रतिबंधित किया था। इसके बाद सरकार ने खतरनाक कचरे के प्रबंधन के अलग- अलग पहलुओं की जांच करने के लिए मेनन समिति का गठन किया था। मेनन समिति ने न सिर्फ कई कचरों के आयात पर रोक लगाने की सिफारिश की थी बल्कि जो औद्योगिक कचरा देश में है उसके भंडारण और निपटान के बारे में भी कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। लेकिन सरकार ने मात्र 11 वस्तुओं का आयात ही प्रतिबंधित किया, बाकी 19 वस्तुओं को विचारार्थ छोड़ दिया गया। यह उदासीनता तो आयातित कचरे से निकलने वाले जहर से भी खतरनाक है।
इराक युद्ध में अमरीका ने जो बमबारी की थी, उसमें क्षरित युरेनियम का भी उपयोग हुआ था। इस बात को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अब सामान्यत: स्वीकार किया जाता है कि पूरे विश्व में क्षरित युरेनियम युक्त हथियारों का सबसे अधिक उपयोग अभी तक इराक में ही हुआ है। क्षरित युरेनियम वाले बमों से क्षतिग्रस्त टैंक के मलबे में भी क्षरित युरेनियम के अवशेष होते हैं। यदि हमारे देश में बड़े पैमाने पर इस मलबे का आयात होगा तो क्षरित युरेनियम से युक्त धातु हमारे देश में दूर- दूर तक इसके खतरे से अनभिज्ञ लोगों के पास पहुंच जाएगी और वे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं।
जाहिर है विकसित देश भारत को जिस तरह अपना कूड़ाघर बनाने का प्रयास कर रहे हैं उससे इसकी छवि दुनिया में सबसे बड़े कबाड़ी के रूप में भी उभर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है, तो इसकी वजह यह है कि इस समस्या के प्रति सरकारें उदासीन रही हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। यह सरकारी नजरिया है, जो आयातित कचरे के खतरे को बहुत मामूली करके आंकता है। (स्रोत फीचर्स)

Jan 29, 2011

खतरे में है सुंदरवन

- नरेंद्र देवांगन
आज हर तरफ ग्लोबल वार्मिंग को लेकर बहस चल रही है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से उत्तर व दक्षिण ध्रुवों पर जमी बर्फ बड़े पैमाने पर गल रही है और दुनिया भर के समुद्रों में पानी का स्तर बढ़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने ग्लोबल वार्मिंग से खतरे में पड़े 27 देशों की सूची जारी की है। भारत उनमें से एक है। बंगाल सहित भारत के तटवर्ती प्रदेशों में यह खतरा बढ़ रहा है। इसका असर बंगाल की खाड़ी पर भी पड़ रहा है। आशंका है कि सुंदरवन के बहुत सारे द्वीप डूब जाएंगे।
बंगाल की खाड़ी में फैले सुंदरवन को वल्र्ड हेरिटेज का दर्जा दिया गया है। बंगाल की खाड़ी से जुड़े इलाके का पर्यावरण संतुलन सुंदरवन पर निर्भर करता है। यहां के विश्व प्रसिद्ध रायल बंगाल टाइगर, सुंदरी पेड़ के जंगल या मैन्ग्रोव के जंगल, इलाके के पर्यावरण संतुलन से लेकर मानसून के आगमन तक में इन तीनों का भारी योगदान है। लेकिन इन दिनों सुंदरवन पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।
हो सकता है आने वाले समय में भारत के मानचित्र से विश्व धरोहर सुंदरवन का नामोनिशान ही मिट जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ के एक सर्वे से पता चला है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते सुंदरवन के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच 10 हजार वर्ग कि.मी. में फैला सुंदरवन इस समय दो तरह की समस्याओं से घिरा हुआ है।
पहली समस्या के पीछे धरती का तापमान का बढऩा और ग्लेशियरों का पिघलना जैसे कारण हैं। दूसरी समस्या मानव निर्मित है- प. बंगाल और बांग्लादेश की आबादी बढऩे से डेल्टा क्षेत्र में मैन्ग्रोव के जंगल काटकर रिहाइशी बस्तियों का बसते जाना। अगर इन दोनों समस्याओं से सुंदरवन नहीं उबर पाया तो उसके अस्तित्व को मिटने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा।
आज हर तरफ ग्लोबल वार्मिंग को लेकर बहस चल रही है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से उत्तर व दक्षिण ध्रुवों पर जमी बर्फ बड़े पैमाने पर गल रही है और दुनिया भर के समुद्रों में पानी का स्तर बढ़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने ग्लोबल वार्मिंग से खतरे में पड़े 27 देशों की सूची जारी की है। भारत उनमें से एक है। बंगाल सहित भारत के तटवर्ती प्रदेशों में यह खतरा बढ़ रहा है। इसका असर बंगाल की खाड़ी पर भी पड़ रहा है। आशंका है कि सुंदरवन के बहुत सारे द्वीप डूब जाएंगे। वैसे भी सुंदरवन के कुछ द्वीपों को पहले ही बंगाल की खाड़ी का काला पानी निगल चुका है।
इसके अलावा, सुंदरवन को सीधे तौर पर इंसानों से भी खतरा पैदा हो गया है। यहां पाए जाने वाले सुंदरी पेड़ के कारण इसका नाम सुंदरवन पड़ा। सुंदरी पेड़ के अलावा इसका एक बहुत बड़ा इलाका मैन्ग्रोव जंगलों से घिरा हुआ है। ये मैन्ग्रोव जंगल इस क्षेत्र में एक तरफ बंगाल की खाड़ी पर बांध का काम करते हैं तो दूसरी ओर पर्यावरण को इनसे संतुलन भी मिलता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से सुंदरवन के मैन्ग्रोव के एक बहुत बड़े हिस्से की अवैध रूप से अंधाधुंध कटाई हो रही है।
सुंदरवन इलाके के मूल निवासियों के लिए मछली पकडऩा और जंगल से शहद जमा करना जीविका का प्रमुख साधन है। जीविका के लिए समुद्र और जंगल में गए ज़्यादातर पुरुषों की जान को खतरा होता है रायल बंगाल टाइगर से या समुद्री तूफान में नौका के डूब जाने से या मगर के निगल जाने से। इसी कारण यहां महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या बहुत कम है। महिलाएं यहां जंगलों से शहद जमा करने का काम करती हैं।
पर्यावरण के जानकारों का मानना है कि प्रदूषण के जहर से समुद्रों के अलग- अलग हिस्से में ऑक्सीजन की मात्रा शून्य के करीब जा पहुंची है जहां पेड़- पौधे और वनस्पतियां पैदा नहीं हो सकती। यही स्थिति मृत क्षेत्र बनने की है। गौरतलब है विभिन्न समुद्रों में लगभग 150 मृत क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों की परिधि बढ़ती जा रही है। सुकून की बात यह है कि बंगाल की खाड़ी में अभी तक मृत क्षेत्र नहीं बने हैं मगर बढ़ते प्रदूषण के चलते इस आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
संयुक्त राष्ट्र के सर्वे के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग के कारण बंगाल की खाड़ी का जलस्तर अगले 10 सालों में अगर 45 सें.मी. भी बढ़ता है तो सुंदरवन का 75 फीसदी भाग खाड़ी में समा जाएगा। जाहिर है इससे यहां पनपने वाले मैन्ग्रोव भी खाड़ी में समा जाएंगे। सुंदरवन के मैन्ग्रोव न सिर्फ बंगाल की खाड़ी से उठने वाले तूफान से होने वाली तबाही को रोकते हैं बल्कि मुहाना में नदी के जल को भी परिशोधित करते हैं। मैन्ग्रोव कटने से अब समुद्र का खारा पानी आसानी से तटीय क्षेत्र की ओर बढऩे लगा है। बाढ़ और चक्रवाती तूफान जैसी प्राकृतिक आपदा के समय भी खाड़ी का खारा पानी क्षेत्र की मिट्टी को प्रभावित कर रहा है। इससे कृषि भूमि को नुकसान और भूमि का क्षरण भी हो रहा है। मैन्ग्रोव के वृक्षों से पटे ये जंगल रॉयल बंगाल टाइगर का आश्रय स्थल हैं। इनके नष्ट होने से बाघ अपने भोजन की तलाश में रिहाइशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। सुंदरवन के कई गांव बाघ के उपद्रव से प्रभावित हैं। अभयारण्य से सटे 25 गांवों में हर साल बाघों के हमले में बहुत सारे लोगों की जानें जाती हैं।
राष्ट्र संघ के सर्वेक्षण के बाद बिधानचंद्र राय कृषि विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक राष्ट्रीय सेमीनार में राज्य पर्यावरण विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि धरती का तापमान बढऩे से बंगाल की खाड़ी का जलस्तर बढ़ रहा है, और सबसे अधिक जलस्तर डायमंड हार्बर क्षेत्र में बढ़ा है। जहां भारत के तटीय क्षेत्र में समुद्र का जलस्तर हर साल 1-2 मि.मी. बढ़ा है वहीं डायमंड हार्बर में 5.78 मि.मी. बढ़ा है। कोलकाता तथा आसपास की पूरी आबादी पर भी खतरा मंडरा रहा है।
2050 तक जलवायु में व्यापक परिवर्तन का अंदेशा है। उससे तटीय क्षेत्र में तूफान उठने से गांव के गांव डूब जाने का खतरा है। तबाही के मंजर की एक झलक तूफान आइला में देखी जा चुकी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस डेल्टा क्षेत्र का 5वां हिस्सा, जो कि सुंदरवन के बाघों का अभयारण्य है, जल समाधि ले चुका है।
गर्मी में सुंदरवन की नदियां सूख जाती हैं और खाड़ी का खारा पानी यहां की कृषि को प्रभावित करता है। कुल मिलाकर अब तक 15 फीसदी कृषि भूमि और राष्ट्रीय अभयारण्य का 250 वर्ग कि.मी. क्षेत्र अगले दो साल में खाड़ी में समा जाएगा। कोलकाता विश्वविद्यालय के समुद्र विज्ञान विभाग के एक प्रोफेसर का कहना है कि सुंदरवन में ऊपरी जलस्तर का तापमान हर साल बढ़ रहा है। पिछले तीन दशकों में प्रति दशक यह 0.5 डिग्री सेल्सियम की दर से बढ़ा है। यह ग्लोबल वार्मिंग की दर से भी अधिक है। ग्लोबल वार्मिंग की दर प्रति दशक 0.06 डिग्री सेल्सियस है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में भारतीय डेल्टा क्षेत्र में बारिश की मात्रा भी बढ़ेगी और इसका असर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूरे देश पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्था फ्रेंड्स ऑफ अर्थ के कार्यकारी निदेशक का कहना है कि प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि बंगाल की खाड़ी में कभी भी मृत क्षेत्र बनना शुरू हो सकता है। इससे इस पूरे क्षेत्र का पर्यावरण संतुलन बिगड़ जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

Oct 24, 2009

60 के पार चुस्त-दुरुस्त रहना हो तो....

- नरेन्द्र देवांगन
वे घर पर पहले की अपेक्षा बेहतर जीवन बिता पा रहे हैं। मानसिक सक्रियता कुछ ऐसी बढिय़ा हो गई है कि वे अपने नाती-पोतों को उनकी छोटी- मोटी उलझनें दूर करने में थकान या परेशानी बिलकुल नहीं महसूस करते। बल्कि वे बड़े मज़े से इन बच्चों को उनके सवालों का हल ढूंढने अथवा शब्दकोश में से शब्दार्थ ढूंढ निकालने में मदद कर सकते हैं।
बढ़ती उम्र का सबसे डरावना लक्षण होता है दिमागी हालत का बिगडऩा। लेकिन यह समस्या या ऐसे लक्षण उन लोगों के पास फटकते भी नहीं जो अपने दिमाग को हमेशा सक्रिय रखते हैं। यह केवल कपोल कल्पना नहीं बल्कि अनुसंधान द्वारा प्रमाणित सत्य है। अध्ययन बताते हैं कि दिमागी कसरतें जारी रखी जाए तो इसका जादुई सकारात्मक असर स्मरण शक्ति पर, तर्क करने की क्षमता पर और जटिल से जटिल विषयों को समझने के मामले में दिखाई देता है। अब तक के ऐसे सबसे बड़े अध्ययन में 65 वर्ष से ऊपर के 2800 बुजुर्गों को शामिल किया गया था। सभी स्वस्थ मानसिक स्थिति वाले थे। कुछ व्यक्ति तो 94 वर्ष से भी ऊपर के थे। पांच सप्ताह तक कंप्यूटर और पेपर-पेंसिल की मदद से इनको एक तरह का प्रशिक्षण दिया गया था और इसके बाद निहायत आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए। इन बुजुर्गों की मानसिक क्षमता तो बढ़ी ही, साथ ही ऐसा महसूस होने लगा मानो इनकी उम्र 7 से 14 वर्ष तक कम हो गई हो। इस तरह के प्रयोग के दौरान यह पाया गया कि ये बुजुर्ग लोग बड़ी जल्दी ही बात को समझकर उस पर अपना मत व्यक्त करने लगे, टेलीफोन बुक में से बहुत जल्दी ही फोन नंबर ढूंढ लेते थे। आसपास की घटनाओं और सूचनाओं को भी बहुत अच्छी तरह और तेज़ी से ध्यान में लेने लगे थे। कुछ अन्य प्रयोगों में यह भी देखा गया कि उम्रदराज़ लोगों की गाड़ी चलाने की क्षमता भी विकसित हुई। प्रशिक्षणों में शामिल बुजुर्ग स्त्री-पुरूषों ने यह स्वीकार किया है कि उनकी मानसिक स्थिति काफी चुस्त-दुरुस्त हुई है। कुछ का कहना है कि वे अब बेहतर तरीके से गाड़ी चलाने लगे हैं जबकि कुछ लोगों ने बताया कि वे घर पर पहले की अपेक्षा बेहतर जीवन बिता पा रहे हैं। मानसिक सक्रियता कुछ ऐसी बढिय़ा हो गई है कि वे अपने नाती-पोतों को उनकी छोटी- मोटी उलझनें दूर करने में थकान या परेशानी बिलकुल नहीं महसूस करते। बल्कि वे बड़े मज़े से इन बच्चों को उनके सवालों का हल ढूंढने अथवा शब्दकोश में से शब्दार्थ ढूंढ निकालने में मदद कर सकते हैं। हालांकि वैज्ञानिक और डॉक्टर्स कहते हैं कि इस तथ्य के प्रमाणीकरण के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध नहीं हैं कि केवल एक विशिष्ट प्रकार का प्रशिक्षण मानसिक अवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाता है लेकिन वे यह ज़रूर मानते हैं कि बुज़ुर्ग लोग ही नहीं बल्कि कोई भी पहेलियां बूझने वाले खेलों से, ताश के ब्रिज जैसे खेलों से, किसी नए विषय को सीखने की रुचि से अपने दिमाग की क्षमता का विस्तार कर सकता है। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि इस तरह की दिमागी कसरतों के ज़रिए हर व्यक्ति का जीवन बेहतर बनाया जा सकता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि दिमाग को सक्रिय रखना, इससे काम लेते रहना ही इसके लिए बेहतरीन कसरत साबित होती है। इस तरह की कसरत नियमित रूप से करनी चाहिए।
प्रमाण ऐसे भी मिले हैं कि वृद्धावस्था में भी दिमाग लचीला ही रहता है बशर्ते कि उसका भरपूर उपयोग किया जाए। बढ़ती उम्र में दिमागी हालत के बिगडऩे अथवा दिमागी बीमारियों का शिकार होने के पीछे सबसे बड़ा कारण यह रहता है कि इसका पर्याप्त रूप से इस्तेमाल नहीं किया जाता। बढ़ती उम्र में दिमाग की कोशिकाएं अगर नष्ट होती हैं तो नई कोशिकाएं बनती भी हैं। और इस प्रक्रियाको और तेज़ किया जा सकता है। इसके लिए दिमागी कसरतों के साथ-साथ शारीरिक कसरत भी नियमित रूप से करने की ज़रूरत होती है। पोषक आहार भी इस प्रक्रिया को सुदृढ़ करने में मददगार साबित होता है। एंटीऑक्सीडेंट्स और कई विटामिनों से युक्त फलों एवं सब्जिय़ों का सेवन बेहतर परिणाम देता है। तनाव से दूर रहना, अच्छी नींद लेना, सामाजिक सक्रियता बनाए रखना वगैरह कुछ ऐसी बातें हैं जो वृद्धावस्था में भी आपको शारीरिक व मानसिक रूप से खूब तन्दुरुस्त रख सकती हैं। उच्च रक्तचाप और मधुमेह (डायबिटीज़) जैसी बीमारियों का तुरंत व समुचित इलाज करवाकर दिमाग को इनके दुष्प्रभावों से बचाया जा सकता है। प्राय: यह देखा गया है कि 60 से 70 की उम्र के आसपास दिमाग की हालत कमज़ोर होने लगती है। लेकिन अगर उपरोक्त बातों का ध्यान रखा जाए तो ऐसी शिकायतों से बचे रहना सभी के लिए संभव है। इस गलतफहमी से मुक्त हो जाएं कि बढ़ती उम्र दिमाग खराब करती है। तात्पर्य यह है कि दिमागी हालत को चुस्त-दुरुस्त रखना है तो दिमाग का जमकर इस्तेमाल करें। तभी यह सक्रिय रहेगा वरना निष्क्रिय हो सकता। (सोत फीचर्स)
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