- रविन्द्र गिन्नौरे
मक्खी नाना कहते ही एक ऐसी कद काठी का अक्स सामने उभर आता है, जिसे भुला पाना मुश्किल है। इकहरी काया उस पर लमतोरा सपाट झुर्रीदार चेहरा, खल्लवाट पर लहराते लंबे लंबे कुछ खिचड़ी बाल, आँखें मानों गहरे कुएँ में धँसी हों मगर होठों पर हमेशा अलमस्त मुस्कान बिखेरे रहते हैं मक्खी नाना।
हमेशा एक जैसा पहनावा जिन्हें दूर से देख कर जाना जा सकता है कि वो मक्खी नाना हैं। आधी बाहों की सफेद सी शर्ट और नीचे पतला लाल गमझा लपेटे हुए, जिसमें उनका लंगोट झलक जाता है। ऐसे हैं हमारे मक्खी नाना।
हम बचपन में उन्हें 'मक्खी नाना' कह चिढ़ाते और मज़ा लिया करते थे। अब हम चड्डी से पेन्ट शर्ट पहन, दाढ़ी मूँछ बनाने लग गए; मगर मक्खी नाना की सेहत पर मौसम का कोई फर्क नहीं पड़ा। जस के तस रहे, न मरे ना मुटाए। जिन्हें हमने कभी जवां नहीं देखा, न ही बुढ़ापे की छाप उन पर नजर आई।
अलबत्ता अब बच्चे उन्हें चिढ़ाना बंद कर 'नाना' कहने लगे और वे 'जगत नाना' बन गए। नाना के बड़े भाई भौजाई तक उन्हें नाना कहने लगे।
नाना चिर कुँवारे ही रह गए। शादी उनके लिए एक बुरा सपना बन कर रह गई। नाना ने अपनी शादी के लिए बड़े अरमान पाले थे। बहुत पापड़ बेले, कि कोई लड़की 'हां' तो कह दे! शादी के लिए राजी हो जाए। जिस लड़की को देखने जाते वह नाना को देखते ही बिदक उठती थी। यह बात आज तक समझ में नहीं आई।
नाना जब पहली पहली बार लड़की देखने जाने वाले थे, तब खूब तैयारी की, बड़े सजे-धजे थे। तंग मोहरी का चटख नीले रंग का फुलपेन्ट और पूरी बाहों वाली सफेद कमीज़ इन कर उस पर चौड़ा बेल्ट ऐसा खींच कर बाँधा था कि उनकी पतली क़मर अलग से उभर पड़ी। चमड़े का नोंकदार चमचमाता काला जूता पहना था। सजे संवरे इतने कि उन्हें देख कर लोग 'मक्खी नाना' कहना ही भूल गए। जाने से पहले आधा गाँव का चक्कर लगा आए और सबको बता आए कि लड़की देखने जा रहें हैं भई। फिर कई दिनों तक नाना नजर नहीं आए। बाद में पता चला कि लड़की ने नाना को नापसंद कर दिया। नाना कई बार लड़की देखने गए। जहाँ भी लड़की होने की खबर मिलती, नाना किसी को साथ लेकर पहुँच जाते।
लड़की देखने नाना जाते! लेकिन फिर क्या हुआ यह जानने की उत्सुकता सभी को बनी रहती थी। उसके बाद नाना कई दिनों तक घर से बाहर नहीं निकलते, फिर किसी दिन चाय की दुकान पर दिख पड़ते और अपनी आप बीती खुद बताते। कि कैसे लड़की ने इनकार कर दिया! आखिरी में नाना बताते कि हम ही ने ना कर दिया। लड़की और उसके परिवार वालों के कई नुक़्स निकालते और पूछ बैठते कि "बताओ" ! भाई ऐसी लड़की से हम शादी कैसे कर लेंगे।"
नाना की शादी नहीं हुई, इसकी क्या वजह हो सकती है ? ऐसे में नाना ने अपनी मर्दानगी सिद्ध करने के लिए कई जौहर दिखाए। हर बार नाना मुँह की खाते और लुटे-पिटे आते और फिर से नई तैयारी में जुट जाते। अलबत्ता मर्दानगी के जौहर में नाना कभी शहीद नहीं हुए। नाना से जुड़ी ऐसी अनेक घटनाएँ घटी जिसे लोग सुन सुनाकर खूब मजा लेते। नाना से जब कोई पूछता, तो वह खिसिया जाते और कहते,
"यह कोई शोभा वाली बात थोड़ी है जो बताई जाए"।
शादी नाना के भाग्य में नहीं थी। कोई लड़की अर्धांगिनी नहीं बनी, तो ना सही। वैसे नाना अपने नाम के एक थे अपनी रोटी वो खुद थोप लेते थे। जब उनकी भौजी परलोक सिधारी तो उनके बड़े भैया ने दो बच्चों सहित पूरी गृहस्थी का बोझ नाना पर डाल दिया। नाना बाप तो बन नहीं सके लेकिन अपने भतीजों के नाना बन जरूर बन गए। दोनों बच्चों को गोद में उठा कर घुमाते लोगों को बताते कि ये उनके नाती हैं।
नाना कभी ठलहे नहीं रहे, ना ही उन्होंने मुफ्त की रोटी तोड़ी। धंधे बहुत किए। सेल्समैनशिप के गुर सीखना हो तो नाना से सीख ली जा सकती है। बीड़ी बेचने से लेकर जमीन दलाली तक करते। नाना की लच्छेदार बातों में दम दिखता था। जिधर नाना हो उधर पलड़ा भारी दिखता था। बात के धनी, इनाम के पक्के नाना ने कभी पैसे की परवाह नहीं की, जितना मिला उसी से संतोष कर लिया। गप्प सड़ाका मारने में नाना का कोई जवाब नहीं! प्रेम प्यार की कोई बात हो या कोई वारदात, नाना उस में इतना रस घोलते कि उनका पूरा किस्सा सुने बिना उठने का मन ही नहीं होता। पोलपट्टी खोलने में नाना उस्ताद थे। लोगों की पोल खोलने बैठते तो उसके सात पुरखों के नाम पर पानी फेर देते थे। चाय सुड़कते हुए नाना जब कभी किसी की पोल खोलने बैठते तो लोगों के कान उधर लग जाते थे और तब चाय का मजा दुगना हो जाता था।
कुछ भी हो, नाना सबके काम में पहले आगे आते थे। जिसका कोई नहीं उसके लिए नाना हरदम तैयार रहते थे। चाहे जैसा काम हो, सारा भार उठा लेते थे। जिंदा दिल इंसान कैसा हो? उसकी साक्षात मिसाल थे नाना, जो किताब के पन्ने से निकले नायक जैसे हमारे बीच रहे।
नाना के झुर्रीदार चेहरे पर कानों तक खींची मुस्कान उन्हें जीवन्त बनाएँ रखती, ऐसी ही प्रेरणा उनसे कोई ले मगर यह संभव नहीं है।
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