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Aug 3, 2014

दो ग़ज़लें

मन की पीड़ा
- ज़हीर कुरैशी

1

मन को तैयार कर नहीं पाए,
वक्त पर वार कर नहीं पाए।

अपने बचपन के दोस्त को..हम भी,
शत्रु स्वीकार कर नहीं पाए।

जो परिष्कार करने आये थे,
वो परिष्कार कर नहीं पाए।
खींच दी है लकीर रिश्ते ने,
हम जिसे पार कर नहीं पाए।

वो मिसाइल के कुल केहैं लेकिन,
दूर तक मार कर नहीं पाए।

स्वप्न को देखते रहे के वल,
स्वप्न साकार कर नहीं पाए।

लोग अपने अहम् के कारण भी,
मन का उपचार कर नहीं पाए।

2
वो जो मुश्किल में डाल जाता है,
हाँ, वहीं हल निकाल जाता है।

साल में एक बार बेटा ही,
खुद मुझे देख-भाल जाता है।

उसका हँसना तो है बड़ी पीड़ा,
मुस्कुराना भी साल जाता है।

अपना अधिकार मान कर मुझ पर,
रोज अस्मत खँगाल जाता है।

जब भी ज्वालामुखी फटा कोई,
पूरा गुस्सा निकाल जाता है।

उनका अनुरोध मुस्कुराते हुए,
वो मुहब्बत से टाल जाता है।

मैं उन्हें याद भी नहीं... शायद,
मेरा जिन तक खयाल जाता है।


सम्पर्क: 108 त्रिलोचन टावर, संगम सिनेमा के सामने, गुरूबक्श की तलैया, स्टेशन रोड, भोपाल-462001 म.प्र. मो. 09425790565

Mar 14, 2014

दो ग़ज़लें

किस कदर

-ज़हीर कुरैशी

किस कदर अहतियात करते हैं,
कूट- भाषा में बात करते हैं!
दूसरों को परास्त करने में,
हम स्वयं को भी मात करते हैं।
ये गुरिल्लों की युद्ध-शैली है,
लोग पीछे से घात करते हैं!
ऐसे छाए हैं द्वंद्वके बादल,
दोपहर में ही रात करते हैं।
प्यार से बात भी नहीं करते,
प्यार अक्सर बलात् करते हैं।
चाह कर भी न झील कर पाई,
काम जो जल-प्रपात करते हैं!
हर सुबह सैर पर निकलते ही,
सबसे हम शुभ प्रभात करते हैं।

संहार
झूठ पर धार कर नहीं पाए,
सच का संहार कर नहीं पाए!
जो चमत्कार करने आए थे,
वो चमत्कार कर नहीं पाए।
बढ़ रही है दरार रिश्तों में,
ठोस आधार कर नहीं पाए।
लोग साँपों के साथ रह कर भी,
विष का व्यापार कर नहीं पाए!
मन में भाटा-सा उठ रहा है कहीं,
हम उसे ज्वार कर नहीं पाए।
कूप-मंडूक, चाह कर भी...कभी,
देहरी पार कर नहीं पाए।
मन के मंदिर में बैठी मूरत को,
हम निराकार कर नहीं पाए!
सम्पर्क: 108, त्रिलोचन टॉवर, संगम सिनेमा के सामने, गुरुबख्श की तलैया, स्टेशन रोड, भोपाल- 462001 (म.प्र.), मो.09425790565, Email- poetzaheerqureshi@gmail.com

Sep 26, 2013

दो ग़ज़लें

                      1.आँसू बचाए नहीं ?

                                                    - ज़हीर कुरैशी

                      जिन्दगी में जो आए नहीं,
               हम उन्हें भूल पाए नहीं।

                         सात फेरों के पश्चात् भी,
                         आप दिल में समाए नहीं।

               ऐसे महलों के मालिक हैं हम,
               जो कभी जगमगाए नहीं।

                          वो है मित्रों में सबसे सफल,
                          जिसने मौके गँवाए नहीं।

               खुल के रोने को... एकान्त में,
               तुमने आँसू बचाए नहीं?

                         सच- बयानी के कारण भी, यार,
                         हम किसी को सुहाए नहीं।

               पूरी उसकी दुआ हो गई,
               हाथ जिसने उठाए नहीं।

                    2.याद-दर-याद

                        दूर तक... भीनी खुशबू भी है,
                चाँदनी रात है, तू भी है।

                          कितनी मुश्किल से बरसों के बाद,
                          साथ लैला के मजनू भी है।

               चाँद को चूमने के लिए,
               कल्पना का पखेरू भी है।

                         आँसुओं की घटा है, मगर,
                         भावनाओं पे काबू भी है।

             तोलकर बोलने के लिए,
             मन के अंदर तराजू भी है।

                        बात होती नही उसके बाद-
                        प्यार चुप्पी का जादू भी है।

                     फिल्मी की रील-सा है अतीत,
                      याद-दर-याद की 'क्यू’  भी है।

सम्पर्क:  108, त्रिलोचन टॉवर, संगम सिनेमा के सामने, गुरूबख्श की तलैया, स्टेशन रोड, भोपाल-462001 (म.प्र.), मो. 09425790565, Email-poetzaheerqureshi@gmail.com

May 22, 2013

दो ग़ज़लें

सुख से अनजान

- ज़हीर कुरैशी
  
 वो जो धनवान होते नहीं,
 सुख से अनजान होते नहीं।
            उनसे डरती हैं कठिनाइयाँ,
            जो परेशान होते नहीं।
 वो जो आसान लगते रहे,
 वो भी आसान होते नहीं।
            दान को मत कलंकित करो,
            देख कर दान होते नहीं।
 कैसे कह दूँ कि इंसान के,
 मन में शैतान होते नहीं।
            कोशिशों से ही निकलेंगे हल,
            यूँ समाधान होते नहीं
 हर किसी आदमी के लिए
 मान के पान होते नहीं।
  पत्थर की पूजा
 प्राण की जब प्रतिष्ठा हुई,
 तो ही पत्थर की पूजा हुई।
            प्यार से उनसे मुझको छुआ,
            यूँ भी मन की चिकित्सा हुई
 सबके चेहरों पे उभरा तनाव,
 घर में जब भी समस्या हुई।
            मुस्कुराए कुटिलता से आप,
            शब्द बिन, यूँ भी हिंसा हुई
 स्वप्न में वो था बीमार-सा,
 इसलिए मुझको चिन्ता हुई।
            लोग फँसने लगे द्वैत में,
            जब भी उनकी परीक्षा हुई।
 सिर उठाती मिली वासना,
 भंग जब-जब तपस्या हुई।

संपर्क: 108, त्रिलोचन टावर, संगम सिनेमा के सामने, गुरूबक्श की तलैया, स्टेशन रोड, भोपाल-462001(म.प्र.)मो. 09425790565, Email- poetzaheerqureshi@gmail.com

Dec 28, 2011

दर्द आँसू में ढलता नहीं

दर्द आँसू में ढलता नहीं
-ज़हीर कुरैशी, 
हिम नयन में पिघलता नहीं,
दर्द आंसू में ढलता नहीं।
अनवरत साथ चलते हुए,
वो मेरे साथ चलता नहीं।
मुग्ध है अपनी मुस्कान पर,
फूल के बाद, फलता नहीं।
रंग रितुओं ने बदले, मगर,
मन का मौसम बदलता नहीं।
तुलना बेटी से करने के बाद,
फिर... कली को मसलता नहीं।
द्वंद से वो भी थकने लगा,
वो जो घर से निकलता नहीं।
कितने दिन से शयन-कक्ष में,
एक दीपक भी जलता नहीं।
नींद की मेजबानी
नींद की मेजबानी मिली,
स्वप्न से जब कहानी मिली।
दिन में सूरजमुखी से मिले,
रात भर रातरानी मिली
रंग फसलों ने बदले नहीं,
हर समय फस्ल धानी मिली।
उनको 'लिव इन' सुरक्षित लगा,
प्यार में बुद्धिमानी मिली।
नीम की पत्तियों की तरह,
झूठ से सच बयानी मिली।
हर नदी में समंदर तलक,
जिंदगी की निशानी मिली।
शेर में थी नयी व्यंजना,
किन्तु सज-धज पुरानी मिली।

संपर्क- समीर काटेज, बी-21 सूर्य नगर, शब्द प्रताप आश्रम के पास,
ग्वालियर 474012 (मप्र), मो. 09425790565

Dec 25, 2010

दो ग़ज़लें


-   ज़हीर  कुरैशी
1
नए रास्ते भी मिले एक दिन,
जो खिलते नहीं थे, खिले एक दिन।
पिघलने में हिम को लगे दस बरस,
हुए खत्म शिकवे- गिले एक दिन।
जो रहते थे अपने वचन पर अटल,
वचन से वो अपने हिले एक दिन।
घटा था वो सब उनकी बेटी के साथ,
अधर इसलिए भी सिले एक दिन।
बिना नींव के थे सो गिर भी गये,
बनाये थे हमने किले एक दिन।
जहां भी मरुस्थल में पानी दिखा,
वहीं रूक गये काफिले एक दिन।
जो मेरे ही यत्नों से गतिमान थे,
हुए खत्म वो सिलसिले एक दिन।

2
अपनी भागम- भाग दिनचर्या बदल पाए नहीं,
लोग शहरों में बहुत निश्चिन्त चल पाए नहीं।
उन बहुत गहरे अंधेरों में जले थे रात भर,
नफरतों की आंधियों में दीप जल पाए नहीं।
अपने निश्चित लक्ष्य से पहले भटक जाते हैं तीर,
तीर दिल को चीर कर आगे निकल पाए नहीं।
जब भी हम अनजान रस्ते पर चले तो गिर गए।
हम अचानक ठोकरें खा कर सम्हल पाए नहीं।
उसको देखा तो उन्हें याद आई अपनी लाडली,
वे कली को, इस वजह से भी, मसल पाए नहीं।
भाव तो बाजार में दिन भर उछलते ही रहे,
हम उछलना चाहते तो थे, उछल पाए नहीं।
हैं बहुत से देश, जिनमें रात होती ही नहीं,
चाहकर भी, सूर्य उन देशों में ढल पाए नहीं।
***
जहीर कुरेशी के लेखन की मूल विधा हिन्दी गजल है। वे 1965 से लगातार लिख रहे हैं। अब तक उनके छह गजल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी गजलें विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी शामिल की गईं हैं।
पता- समीर कॉटेज, बी-21, सूर्य नगर,
शब्द- प्रताप आश्रम के पास, ग्वालियर-474012 (मप्र)
मोबाइल- 09425790565