- डॉ. रत्ना वर्मा
पिछले दिनों एक्सप्रेस समूह के संस्थापक रामनाथ गोयनका की स्मृति में दिए गए अपने व्याख्यान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि ‘भारत की शैक्षिक और सांस्कृतिक नींव को खोखला करने के लिए मैकाले द्वारा किए गए अपराध को 2035 में 200 वर्ष पूरे हो जाएँगे, अतएव आने वाले दस सालों में गुलामी की इस औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने के राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत है।’ उनके इस कथन को केवल राजनीतिक वक्तव्य की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, बल्कि हम देशवासियों के लिए यह चिंतन और विचार करने का समय है, कि क्या हम इस मानसिक गुलामी में ही जीते रहना चाहते हैं या कि अपनी संस्कृति अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं।
यह तो आप सब जानते ही हैं कि मैकाले की शिक्षा का उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना था, जो अपने ही अतीत को पिछड़ा, अपनी भाषा को हीन और अपनी संस्कृति को अवैज्ञानिक समझने लगे। हुआ भी वही, इस शिक्षा प्रणाली ने हमें रोजगार तो दिया, हम कुशल कर्मचारी तो बन गए; लेकिन सजग नागरिक नहीं बन सके। परिणामस्वरूप, हमने ज्ञान को केवल नौकरी, रोजगार और पैसा कमाने का जरिया माना; लेकिन इसके साथ ही अपने ही जीवन-मूल्यों को कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया। यही वजह है कि आज हम तकनीकी रूप से तो बहुत आगे निकल गए हैं; लेकिन सामाजिक रूप से असंवेदनशील बन गए हैं। हम वैश्विक बाज़ार के लिए तो तैयार हैं; लेकिन अपने समाज की समस्याओं के प्रति उदासीन हैं। यह सब उसी शिक्षा का परिणाम है, जो हमें अपने परिवेश से काट देती है।
मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने सबसे गहरा आघात हमारी भाषाओं पर किया। अंग्रेज़ी बोलना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया और अपनी ही मातृभाषा को बोलने में झिझक महसूस होने लगी। हम अपने बच्चों को गर्व से कहते हैं- अंग्रेज़ी बोलो; लेकिन यह कभी नहीं कहते- अपनी भाषा को जानो। नतीजा यह हुआ कि नई पीढ़ी अपने साहित्य, लोककलाओं, दर्शन और इतिहास से कटती चली गई। भाषा के साथ ही सांस्कृतिक स्मृति भी धूमिल होती गई। इतना ही नहीं मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने धर्म को अंधविश्वास और संस्कृति को रूढ़ि के रूप में प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप, हमने अपने पर्व, उत्सव, परंपराएँ और जीवन-पद्धति को पुराना और ग़ैर-आधुनिक मान लिया। पश्चिमी जीवनशैली की नकल को ही प्रगति समझ लिया।
विडंबना यह है कि जिन समाजों की नकल हम कर रहे हैं, वे तो अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने में हमसे कहीं अधिक जागरूक और सजग हो गए हैं, जबकि हम अपने ही संस्कारों को बोझ समझने लगे। आप किसी भी दूसरे देश में चले जाइए, वहाँ पहले अपनी ही भाषा में बातचीत की जाती है। जब सामने वाला नहीं समझता तब या तो दुभाषिए की मदद ली जाती है या फिर यदि उन्हें अंग्रेजी आती है, तो वे टूटी फूटी अंग्रेजी से काम चलाते हैं; लेकिन उन्हें कभी इसकी वजह से हीनता का आभास नहीं होता; पर हमारे यहाँ यदि हम अंग्रेजी नहीं जानते तो हम हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। इतना ही नहीं राजनीतिक मंचों पर भी वे अपनी ही भाषा में वक्तव्य देंगे, दुभाषिया ही उनकी सहायता करते है; लेकिन हम अपनी बोली भाषा को बोलने में छोटा महसूस करते हैं मानो हमसे कोई अपराध हो गया हो।
भले ही हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो; पर आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए हैं। हमारी सोच तो अब भी उधार की ही है। हम अपने ही परखे और माने हुए ज्ञान पर संदेह करते हैं और विदेशी मान्यताओं को सहज स्वीकार कर लेते हैं। यह एक प्रकार की गुलामी ही तो है। यह गुलामी तब और गहरी हो जाती है, जब हम अपने बच्चों को भी वही मानसिकता सौंप देते हैं। बिना प्रश्न किए वही पाठ्यक्रम, वही मूल्य और वही दृष्टिकोण आगे बढ़ते रहता है।
अतः हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो आधुनिक हो; लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी हो। जो विज्ञान और तकनीक सिखाए; लेकिन साथ ही दर्शन, साहित्य और नैतिकता भी, जो वैश्विक दृष्टि दे; लेकिन स्थानीय चेतना को मिटाए नहीं। भारतीय ज्ञान, परंपरा, उपनिषद, बौद्ध दर्शन, भक्ति आंदोलन, लोक साहित्य, ये सब केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रासंगिक जीवन-दृष्टियाँ हैं। इन्हें शिक्षा का हिस्सा बनाना पिछड़ापन नहीं, आत्मसम्मान है।
राजनीतिक स्वतंत्रता तो हमने प्राप्त कर ली; लेकिन बौद्धिक स्वतंत्रता अभी पानी बाकी है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली को समाप्त करने का अर्थ पाठ्यक्रम बदलना नही; बल्कि सोच बदलना है। प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया यह आह्वान हमें याद दिलाता है कि आने वाले दस वर्ष केवल विकास के नहीं, आत्म- निर्माण का होना चाहिए। यदि हम सचमुच मानसिक गुलामी से मुक्त होना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और ज्ञान परंपरा को हेय नहीं, गौरव का विषय बनाना होगा; क्योंकि जो समाज अपने अतीत से कट जाता है, उसका भविष्य भी उज्ज्वल नहीं हो सकता।


बेहतरीन आलेख, राष्ट्र सर्वोपरि है। हमारे गौरव को शिक्षा में स्थान मिलने पर ही हम बौद्धिक स्तर पर स्वतंत्र हो सकेंगे। अभियान को गति देने का समय है।
ReplyDeleteशुभकामनाएँ।
आपकी सारगर्भित और प्रेरक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद सोनी जी।
ReplyDeleteनिश्चय ही, राष्ट्रगौरव को शिक्षा के केंद्र में स्थान दिए बिना बौद्धिक स्वतंत्रता संभव नहीं।
यह समय केवल विमर्श का नहीं, संगठित प्रयास और अभियान को गति देने का है।
आपकी शुभकामनाएँ हमारे संकल्प को और दृढ़ करती हैं।
सादर 🙏
यह लेख केवल मैकाले या औपनिवेशिक शिक्षा की आलोचना नहीं करता, बल्कि हमें अपने वर्तमान मानसिक ढाँचे पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करता है। यह सही रूप से रेखांकित करता है कि शिक्षा ने हमें तकनीकी रूप से सक्षम तो बनाया, लेकिन सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक रूप से अपनी जड़ों से काट दिया। भाषा, इतिहास और परंपराओं से दूरी ने आत्मगौरव के स्थान पर हीनभावना पैदा की। लेख का मूल आग्रह यही है कि आज ज़रूरत शिक्षा-पद्धति बदलने से अधिक दृष्टि बदलने की है—ताकि आधुनिकता के साथ अपनी संस्कृति, भाषाओं और मूल्यों का संतुलित पुनर्संयोजन हो सके। यह प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि आत्ममंथन का आमंत्रण है।
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Deleteइस व्यव्स्था को एक साथ 3 पीढ़ियां देख रहीं है औऱ अलग अलग तरीके से समझ पा रहीं है....जो बीच की जवान पीढी है उनको सबसे ज्यादा जरूरत है इस विषय को पढ़ने और समझने की..क्या वो अपने बुज़ुर्गों की बात को सुन पाने का धैर्य तथा अपने बच्चों को समझने का वक़्त निकाल पायेंगे ? सबसे बड़ा प्रश्न है क्या युवा पीढ़ी धीरज रख करआने वाले कठिन परिस्थिति का सामना करते हुए अपने आप को व नए बचपन को सम्भालने की जिम्मेदारी को लेकर सजग है?
ReplyDeleteआपकी टिप्पणी के लिए हृदय से धन्यवाद।
Deleteतीन पीढ़ियों के बीच की समझ, जिम्मेदारी और धैर्य पर आपने जो प्रश्न उठाए हैं, वे इस विषय के सबसे संवेदनशील और आवश्यक पक्ष को सामने लाते हैं।
यही प्रश्न आज के समय का वास्तविक आत्ममंथन हैं।
किसी राष्ट्र की राष्ट्रीय, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक चेतना की धुरी वहाँ की वह ज्ञान-परम्परा होती है, जिससे शिक्षा पूर्णता प्राप्त करती है। ब्रिटिश हुक्मरानों और उनसे भी सैकड़ों वर्ष पूर्व तक मुगल आक्रांताओं ने भारतवर्ष के समाज-जीवन को नष्ट-भ्रष्ट करने के तमाम प्रयास किए, लेकिन भारतीय जनमानस की ज्ञान-परम्परा में रची-बसी हमारी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक चेतना ने इस राष्ट्र के स्वत्व और स्वाभिमान को अक्षुण्ण बनाए रखा। इस ज्ञान-परम्परा का उत्स भारतीय समाज रहा है, जिसकी समृद्ध परंपराएँ और गहरी आध्यात्मिक चेतना हमें बहुत कुछ सीखने के लिए प्रेरित करती है। इसी ज्ञान-परम्परा में रची-बसी हमारी शिक्षा के इस मर्म को ब्रितानी अफसर मैकाले ने अनुभव किया और उसने अपने आकाओं को बताया कि भारत पर अगर निष्कंटक राज करना है तो ब्रिटिश सरकार को यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर चोट करनी होगी और इसके बाद मैकाले यहाँ की शिक्षा-पद्धति और ज्ञान-परम्परा को नष्ट-भ्रष्ट करने के अपने अभियान में जुट गया। एक तरफ अंग्रेज भारतीयों पर अत्याचार की पराकाष्ठा कर रहे थे, वहीं मैकाले और मैकाले-पोषित पढ़े-लिखे लोगों की हाकिम जमात भारत और उसकी सम्प्रभुता की रक्षा की गौरवशाली गाथाओं को विलुप्त करने में जुट गई। अब इस बौद्धिक दासता की बेड़ियाँ तोड़ने के लिए हम सबको संकल्पित होना ही होगा।
ReplyDeleteसकारात्मक परिवर्तन के लिए निरंतर प्रयास करते रहने से निश्चित रूप से समाज में बदलाव आएगा । उदाहरण के तौर पर युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की कोशिश के कई उदाहरण दिखते हैं
ReplyDeleteआपकी प्रेरक और आशावादी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद।
DeleteBilkul sach likha hai.. aj bhi hum gulam hi hain
ReplyDeleteशुक्रिया श्रीया ❤️ यही एहसास आत्मचिंतन की पहली सीढ़ी है
Deleteमैकाले ने शिक्षा बदली, सोच नहीं छीनी -
ReplyDelete✓ सोच हमने छोड़ी
मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य..
ज्ञान नहीं,....
✓•ऐसे लोग बनाना था जो भारतीय होकर भी
सोच में अंग्रेज़ हों।
दोष केवल मैकाले का नहीं,
समस्या यह है कि...
✓ आज़ादी के बाद भी
हमने शिक्षा को प्रश्न नहीं,
आज्ञाकारिता सिखाने का माध्यम बनाए रखा।
आज भी..
✓• भाषा से बुद्धि तौली जाती है,
✓•डिग्री से विवेक,
और... नौकरी से ज्ञान।
मानसिक गुलामी तब तक रहेगी
जब तक हम यह नहीं पूछेंगे...
“जो पढ़ रहे हैं, वह सोचने की क्षमता बढ़ा रहा है या केवल आदेश मानना?”
मुक्त वही है
जो सीखता भी है
और सवाल भी करता है।
इस विषय पर मिले सभी विचारपूर्ण और गहन प्रतिक्रियाओं के लिए आभार।उन्हें भी धन्यवाद जिनके नाम प्रकाशित नहीं हुए हैं।
ReplyDeleteये प्रतिक्रियाएँ विमर्श को व्यापक संदर्भ और नई दृष्टि प्रदान करती हैं।
संवाद को आगे बढ़ाने में आप सबका योगदान सराहनीय है।
ReplyDeleteएक बार आपने फिर एक ऐसी समस्या को उजागर किया है ,जो हमें अपने अतीत से दूर ले जा रही है।
भाषा ही हमें अपनी, संस्कृति, साहित्य ,सभ्यता, इतिहास, धर्म, दर्शन से जोड़ती है, लेकिन जब भाषा ही अपनी नहीं होगी तो धर्म में विश्वास नहीं रख पाएँगे, संस्कृति में दोष दिखाई देंगे और फिर हम भागते है उधार ली गई संस्कृतियों की ओर। मृगतृष्णा की तरह, जो अपनी ओर खींचती है पर तृप्ति नहीं। अन्य देशों की तरह हम अपनी भाषा को सम्मान नहीं देते।हमें अपनी सोच बदलनी होगी देश के गौरव को बनाए रखने के लिए इस मानसिक ग़ुलामी के स्थान पर बौद्धिक स्वतंत्रता आवश्यक है और इसके लिए नई शिक्षा नीति अपनानी होगी जो आधुनिक भी हो और हमें अपने अतीत से जोड़ने में भी सक्षम हो। बेहतरीन आलेख के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ। सुदर्शन रत्नाकर
सुदर्शन जी आपके सारगर्भित और संवेदनशील विचार विषय को और अधिक गहराई देते हैं। भाषा, संस्कृति और बौद्धिक स्वतंत्रता पर आपकी स्पष्ट दृष्टि अत्यंत प्रेरक है। इतनी सूझ-बूझ और आत्मीयता से पढ़ने–समझने के लिए हृदय से आपका धन्यवाद एवं आभार। आपकी शुभकामनाएँ हमें संबल देती हैं। 🙏
ReplyDeleteसादर प्रणाम आदरणीय
ReplyDeleteसर्वप्रथम आपको अशेष बधाइयां इतनी सारगर्भित दृष्टिकोण से इस विषय पर प्रकाश डालने हेतु।एक सच्चे राष्ट्रभक्त की चिंता पूरे आलेख में पाठक के सुप्त मानस को झकझोर कर जगा रही है।इस आलेख को कई बार पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया दे रही हूं। भविष्य में भी इस प्रकार के आलेख हम जैसे पाठकों को दिशानिर्देश देते रहेंगे इसी आशा और शुभकामना के साथ
मांडवी
मांडवी जी, आपकी इतनी भावपूर्ण, सूक्ष्म और विचारोत्तेजक प्रतिक्रिया के लिए हृदय से आभार। यह जानकर अत्यंत संतोष हुआ कि अनकही के इस विषय ने आपके मानस को उद्वेलित किया और पुनः-पुनः पढ़े जाने योग्य लगा।
Deleteसजग पाठकों की ऐसी संवेदनशील सहभागिता ही लेखन को सार्थकता प्रदान करती है। आपकी शुभकामनाएँ और अपेक्षाएँ आगे भी दिशा देती रहेंगी—इसी विश्वास के साथ सादर धन्यवाद।
सारगर्भित, विचारणीय एवं अनुकरणीय लेख..भाषा हो या संस्कृति,इनके प्रति सम्मान का भाव ही हमें बौद्धिक गुलामी से मुक्ति दिला सकता है।
ReplyDeleteआपकी इस टिप्पणी के लिए हृदय से आभार डॉ सुरंगमा जी 🙏 भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान का भाव ही बौद्धिक स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करता है—आपकी यह बात अनकही की मूल भावना को और भी सुदृढ़ करती है।
Deleteइस आत्मीय सहभागिता हेतु सादर धन्यवाद।
इस आलेख को पढ़कर एक बार मन फिर से, शिक्षा प्रणाली पर सोचने के लिए हमें जागरूक बनाता है ।इस लेख में समसामयिक मुद्दे को बड़ी सशक्तता और ख़ूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। रत्ना जी आपको हार्दिक बधाइयाँ ऐसे ही लेख में हमेशा ही पढ़ने में आते रहे। शुभकामनाएँ
ReplyDeleteसंवेदनशील और विचारोत्तेजक टिप्पणी के लिए हृदय से आभार सुनीता।यह जानकर प्रसन्नता हुई कि इस विषय ने शिक्षा प्रणाली पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित किया।तुम्हारी शुभकामनाएँ और पाठकीय सहभागिता ही लेखन की सबसे बड़ी प्रेरणा हैं।
ReplyDeleteअत्यंत विचारोत्तेजक आलेख....,हम सभी जो अपनी भाषा और संस्कृति से प्यार करते हैं, विशेष सम्मान देते हैं ,उनके मन की पीड़ा को आपने शब्दशः व्यक्त कर दिया है। ऐसे आलेख और बदल रही शिक्षा प्रणाली शायद भटके हुए देशवासियों को वापिस अपनी जड़ों की ओर ला सकें, तभी हम मानसिक गुलामी से भी मुक्त हों सकेंगे और वास्तविक स्वतंत्रता को महसूस कर सकेंगे। सारगर्भित आलेख के लिए बहुत -बहुत बधाई!!!
ReplyDeleteशीला मिश्रा