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Jan 1, 2026

अनकहीः बौद्धिक स्वतंत्रता अभी बाकी है ...

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

पिछले दिनों एक्सप्रेस समूह के संस्थापक रामनाथ गोयनका की स्मृति में दिए गए अपने व्याख्यान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि ‘भारत की शैक्षिक और सांस्कृतिक नींव को खोखला करने के लिए मैकाले द्वारा किए गए अपराध को 2035 में 200 वर्ष पूरे हो जाएँगे, अतएव आने वाले दस सालों में गुलामी की इस औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने के राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत है।’ उनके इस कथन को केवल राजनीतिक वक्तव्य की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, बल्कि  हम देशवासियों के लिए यह चिंतन और विचार करने का समय है, कि क्या हम इस मानसिक गुलामी में ही जीते रहना चाहते हैं या कि अपनी संस्कृति अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं। 

यह तो आप सब जानते ही हैं कि मैकाले की शिक्षा का उद्देश्य एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना था, जो अपने ही अतीत को पिछड़ा, अपनी भाषा को हीन और अपनी संस्कृति को अवैज्ञानिक समझने लगे। हुआ भी वही, इस शिक्षा प्रणाली ने हमें रोजगार तो दिया, हम कुशल कर्मचारी तो बन गए; लेकिन सजग नागरिक नहीं बन सके। परिणामस्वरूप, हमने ज्ञान को केवल नौकरी, रोजगार और पैसा कमाने का जरिया माना; लेकिन इसके साथ ही अपने ही जीवन-मूल्यों को कहीं बहुत पीछे छोड़ दिया। यही वजह है कि आज हम तकनीकी रूप से तो बहुत आगे निकल गए  हैं; लेकिन सामाजिक रूप से असंवेदनशील बन गए हैं। हम वैश्विक बाज़ार के लिए तो तैयार हैं; लेकिन अपने समाज की समस्याओं के प्रति उदासीन हैं। यह सब उसी शिक्षा का परिणाम है, जो हमें अपने परिवेश से काट देती है।

मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने सबसे गहरा आघात हमारी भाषाओं पर किया। अंग्रेज़ी बोलना प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया और  अपनी ही मातृभाषा को बोलने में झिझक महसूस होने लगी। हम अपने बच्चों को गर्व से कहते हैं- अंग्रेज़ी बोलो; लेकिन  यह कभी नहीं कहते- अपनी भाषा को जानो। नतीजा यह हुआ कि नई पीढ़ी अपने साहित्य, लोककलाओं, दर्शन और इतिहास से कटती चली गई। भाषा के साथ ही सांस्कृतिक स्मृति भी धूमिल होती गई। इतना ही नहीं मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने धर्म को अंधविश्वास और संस्कृति को रूढ़ि के रूप में प्रस्तुत किया। परिणामस्वरूप, हमने अपने पर्व, उत्सव, परंपराएँ और जीवन-पद्धति को पुराना और ग़ैर-आधुनिक मान लिया। पश्चिमी जीवनशैली की नकल को ही  प्रगति समझ लिया। 

विडंबना यह है कि जिन समाजों की नकल हम कर रहे हैं, वे तो अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने में हमसे कहीं अधिक जागरूक और सजग हो गए हैं, जबकि हम अपने ही संस्कारों को बोझ समझने लगे। आप किसी भी दूसरे देश में चले जाइए, वहाँ पहले अपनी ही भाषा में बातचीत की जाती है। जब सामने वाला नहीं समझता तब या तो दुभाषिए की मदद ली जाती है या फिर यदि उन्हें अंग्रेजी आती है, तो वे टूटी फूटी अंग्रेजी से काम चलाते हैं; लेकिन उन्हें कभी इसकी वजह से हीनता का आभास नहीं होता; पर हमारे यहाँ यदि हम अंग्रेजी नहीं जानते तो हम हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं। इतना ही नहीं राजनीतिक मंचों पर भी वे अपनी ही भाषा में वक्तव्य देंगे, दुभाषिया ही उनकी सहायता करते है; लेकिन हम अपनी बोली भाषा को बोलने में छोटा महसूस करते हैं मानो हमसे कोई अपराध हो गया हो।

भले ही हमने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली हो; पर आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने हुए हैं। हमारी सोच तो अब भी उधार की ही है। हम अपने ही परखे और माने हुए  ज्ञान पर संदेह करते हैं और विदेशी मान्यताओं को सहज स्वीकार कर लेते हैं। यह  एक प्रकार की गुलामी ही तो है। यह गुलामी तब और गहरी हो जाती है, जब हम अपने बच्चों को भी वही मानसिकता सौंप देते हैं। बिना प्रश्न किए वही पाठ्यक्रम, वही मूल्य और वही दृष्टिकोण आगे बढ़ते रहता है।

अब प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी शिक्षा की दिशा बदलने के लिए तैयार हैं? क्या हम ज्ञान को रोजगार से आगे जीवन-दृष्टि से जोड़ना चाहते हैं? नई शिक्षा नीति इस दिशा में एक प्रयास है; लेकिन नीति से अधिक जरूरी है मानसिक परिवर्तन। जब तक शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर यह स्वीकार नहीं करेंगे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार और पैसे कमाना नहीं, चरित्र निर्माण भी है, तब तक परिवर्तन अधूरा रहेगा।

अतः हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो आधुनिक हो; लेकिन अपनी जड़ों से जुड़ी हो। जो विज्ञान और तकनीक सिखाए; लेकिन साथ ही दर्शन, साहित्य और नैतिकता भी, जो वैश्विक दृष्टि दे; लेकिन स्थानीय चेतना को मिटाए नहीं। भारतीय ज्ञान, परंपरा, उपनिषद, बौद्ध दर्शन, भक्ति आंदोलन, लोक साहित्य, ये सब केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रासंगिक जीवन-दृष्टियाँ हैं। इन्हें शिक्षा का हिस्सा बनाना पिछड़ापन नहीं, आत्मसम्मान है।

राजनीतिक स्वतंत्रता तो हमने प्राप्त कर ली; लेकिन बौद्धिक स्वतंत्रता अभी पानी बाकी है। मैकाले की शिक्षा प्रणाली को समाप्त करने का अर्थ पाठ्यक्रम बदलना नही; बल्कि सोच बदलना है। प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया यह आह्वान हमें याद दिलाता है कि आने वाले दस वर्ष केवल विकास के नहीं, आत्म- निर्माण का होना चाहिए। यदि हम सचमुच मानसिक गुलामी से मुक्त होना चाहते हैं, तो हमें अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और ज्ञान परंपरा को हेय नहीं, गौरव का विषय बनाना होगा; क्योंकि जो समाज अपने अतीत से कट जाता है, उसका भविष्य भी उज्ज्वल नहीं हो सकता।

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