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Dec 18, 2017

अगले जनम मोहे मास्टर न कीजो

अगले जनम मोहे मास्टर न कीजो


-डॉ. गीता गुप्त
वे दिन अब लद गए, जब गुरुओं की प्रशंसा में कशीदे काढ़े जाते थे। ‘सद्गुरु की महिमा अनत, अनत किया उपगार’ और ‘गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय’ जैसी उक्तियों से प्रेरित होकर कइयों ने मास्टर बनने का स्वप्न सँजोया होगा। शायद उसी दौर में किसी महिमामण्डित शिक्षक ने निबन्ध लिखा होगा- ‘अगले जनम भी मास्टर बनूँ।’  मुझे पूर्ण विश्वास है कि जिस समय यह निबन्ध लिखा गया होगा, उस समय लोकतन्त्र नहीं रहा होगा। वर्तमान प्रजातान्त्रिक युग में कोई भी समझदार व्यक्ति मास्टर बनने का ख्वाब नहीं देख सकता। कौन बेवकूफ़ ऐसी बात सोचना चाहेगा भला? जबकि सभी जानते हैं कि इस देश में मास्टरों की औक़ात दो कौड़ी की भी नहीं है। आँखें फोड़-फोड़कर पढ़ाई करने के बाद तो डिग्री मिलती है, फिर जाने कितनी एडिय़ाँ रगडऩे के बाद मास्टरी मिल पाती है, वह भी टेम्परेरी। लोग तब भी मास्टर बनने का हौसला रख पाते हैं, यही क्या कम है ? इस देश में तो मास्टरों की अनगिनत श्रेणियाँ बन गई हैं। संविदा शिक्षक, अध्यापक, गुरुजी, शिक्षाकर्मी वर्ग-एक, शिक्षाकर्मी वर्ग-दो इत्यादि-इत्यादि। इस छोटी-सी अस्थायी नौकरी के लिए भी मोटी फ़ीस चुकाकर प्रतियोगी परीक्षा देनी पड़ती है। जो परीक्षार्थी इसमें सफल हो जाते हैं, उनकी छाती ख़ुशी से फूल उठती है। उन्हें ऐसा लगता है मानो एवरेस्ट पर पताका फहरा आये हों।
 जाने कितने स्कूल-कॉलेज खुल गए हैं, कुकुरममुत्तों की तरह। किसी नेता या मन्त्री के दिवंगत होते ही उनके नाम से भी संस्थान खोल दिये जाते हैं। फिर भी बेरोज़गारी कम नहीं हो रही। सरकार परेशान है। जनसंख्या दिनोंदिन कीट-पतंगों की भांति बढ़ती ही जा रही है। सबके लिए शिक्षा का प्रबन्ध भी करना ही होगा। सो, मास्टरों की भर्ती आवश्यक है। लेकिन सरकारें जानती हैं-अति सर्वत्र वर्जयेत् लोग ज़्यादा पढ़-लिख लेंगे तो लोकतन्त्र के लिए ख़तरा उत्पन्न हो जाएगा इसलिए गली-गली में स्कूल भले ही खोल दिये गए हों किन्तु शिक्षकों की संख्या सीमित रखी गई है। इस देश में हज़ारों स्कूल ऐसे हैं जो एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। यह शिक्षक विद्यार्थियों को अकेले ही ज्ञान देगा और तमाम सरकारी पचड़े भी निपटाएगा।
 लोकतान्त्रिक सरकार को यह बिल्कुल पसन्द नहीं कि गुरु की महिमा नेता से बड़ी हो। इसे ध्यान में रखते हुए उसने बहुत ठोक-बजाकर नियम-क़ानून बना दिये हैं। दो कौड़ी का मास्टर क्या खाकर नेताओं से टक्कर लेगा? वह तो अपनी नौकरी पक्की करवाने के लिए ही आजीवन चप्पलें घिसता रहेगा। कभी प्राचार्य उसकी गोपनीय चरित्रावली बिगाड़ देंगे, कभी विद्यार्थी उसपर उत्पीडऩ का आरोप लगाकर जीवन दूभर कर देगा। सरकार के सामने सीधे खड़े होने की हिम्मत उसमें कभी नहीं होगी। सच मानिए, मास्टरों के कंधों पर इतनी ज़िम्मेदारियों का बोझ लाद दिया गया है कि वे स्वतन्त्र होकर कुछ सोच ही न सकें। उन्हें पूरे देश की जनगणना करवानी है, एक-एक बच्चे की सेहत का ध्यान रखना है। उन्हें पोलियो की दवा पिलवानी है, स्कूल में भरपेट पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाना है। ग्राम-पंचायत और नगरीय निकाय से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक के चुनावों का जिम्मा उन्हीं के सिर पर है। ईमानदारीपूर्वक मतदाता सूची बनवाने से लेकर मतदान और मतगणना तक का कार्य उन्हें अपने माथे पर बिना कोई शिकन लाए निपटाना है। यदि इन कामों में तनिक भी ग़लती हुई तो नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा। उस नौकरी से, जिसके स्थायी होने के इन्तज़ार में पूरी उम्र भी निकल सकती है।
 तमाम गुरूजियों की हवा निकाल दी है सरकार ने। बहुत फूले-फूले फिरते थे। स्थायी नियुक्तियाँ ही बन्द कर दीं। शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर सेमेस्टर पद्धति लाद दी गई सो अलग। विद्यार्थियों की परीक्षा का तनाव ख़त्म कर दिया गया। कोई आत्महत्या न करे इसीलिए पढ़ाई आसान कर दी गई। अब एक साल में दो सेमेस्टर होंगे, दो मुख्य परीक्षाएँ और चार सतत् मूल्यांकन परीक्षाएँ होंगी। सतत् मूल्यांकन में शिक्षक किसी को अनुत्तीर्ण नहीं कर सकता, न किसी विद्यार्थी को अनुपस्थित दर्शा सकता है। सरकार का स्पष्ट आदेश है- ''विद्यार्थी जब तक उत्तीर्ण न हो, तब तक उसकी परीक्षा ली जाए। ऐसे में भला क्या मास्टर को पागल कुत्ते ने काटा है जो पहली ही बार विद्यार्थी को उत्तीर्ण न कर अनन्त काल तक उसकी परीक्षाएँ लेता रहेगा? यदि नियमों की बदौलत विद्यार्थियों की ‘बल्ले-बल्ले’  हो गई तो शिक्षक ने अपने  ‘बल्ले-बल्ले’  का रास्ता ख़ुद ही निकाल लिया। इसे कहते हैं- ‘तू डाल-डाल तो मैं पात-पात।’
 कलियुग में शिक्षक मन्त्रियों के स्टाफ़ में तैनात किये जाते हैं। सचिव और सहायक के तौर पर मन्त्रियों की पहली पसन्द शिक्षक ही होते हैं क्योंकि वे स्वभाव से कायर, डरपोक, विनम्र और दीन-हीन होते हैं। समाज में उनकी कोई पूछ-परख नहीं है। यह मान्यता हो गई है कि जो सर्वाधिक तुच्छ हैं, वही अब शिक्षक बन जाते हैं क्योंकि उनमें कुछ और बनने की योग्यता नहीं होती। ब्याह के बाज़ार में भी उनके दाम बहुत कम हैं। लिपिक और भृत्य के दाम उनसे अधिक हैं क्योंकि उनके पद स्थायी होते हैं और यह सर्वविदित है कि वर्तमान में ज़बरदस्त राजनीतिक पहुँच वाला प्रत्याशी ही ऐसे पदों को सुशोभित कर सकता है। अब मास्टर तोताराम को ही ले लीजिए। वे एक आदर्श शिक्षक रहे हैं। समाज में उनकी प्रतिष्ठा भी है। अपने तीन-तीन बेटों में से एक को भी उन्होंने मास्टर नहीं बनाया। बड़े बेटे को खेती-बाड़ी में लगाया। दूसरे को किराने की दुकान खुलवा दी और तीसरे को कम उम्र में ही एक नेता का चमचा बनवा दिया।
 तोतारामजी ने हाल ही में एक पुस्तक लिखी है जिसके कारण इस छोटे-से शहर में उनकी ख़ूब चर्चा हो रही है। उनकी पुस्तक को पुरस्कार मिलने की भी ख़बर है। उन्हें सड़क पर, बाज़ार में और घर पहुँचकर बधाई देने वालों की ख़ासी तादाद है। वे कभी प्रसन्न तो कभी संकुचित मुद्रा में दिखाई देते हैं। कल तो आश्चर्यजनक बात हुई। एक विद्यार्थी ने तोताराम से कहा- ‘मास्टरजी, मैं भी आप जैसा बनना चाहता हूँ। मुझे आशीर्वाद दीजिए।’  उन्होंने तत्काल पलटकर कहा- ‘नहीं वत्स, मास्टर नहीं। नेता बनने की सोचो। मास्टर बनकर जीवन भर कष्ट भोगना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं। पढ़-लिखकर लांछित होना असह्य होता है। नेता बनो, इसके लिए पढऩे-लिखने की कोई ज़रूरत नहीं। दादागिरी सीखो, दुष्टों-दुराचारियों की सोहबत में रहो। कोई बड़ा अपराध करके जेल की हवा खा आओ। अख़बार में फ़ोटो-वोटो छप जाएगी तो थोड़ा नाम हो जाएगा। फिर कोई-न-कोई राजनीतिक पार्टी तुमसे स्वयं हाथ मिला लेगी। भविष्य में टिकट देकर चुनाव में भी उतार सकती है। सम्भव है कि तब तुम मन्त्री भी बन जाओ। तुम्हारी सात पीढिय़ाँ तर जाएँगी। इष्ट-मित्रों, सगे-सम्बन्धियों और तुम्हारे परिजनों का भविष्य भी सँवर जाएगा।’
  ‘लेकिन मास्टरजी, लोग क्या कहेंगे?’  विद्यार्थी ने साश्चर्य पूछा। ‘किन लोगों की बात कर रहे हो तुम ? राजनेता और मन्त्री आम जन की परवाह नहीं करते। वे सिर्फ़ देश की चिन्ता करते हैं। उन्हें तो ज़मीन पर पाँव रखने की भी फुर्सत नहीं होती। वे सूरज और चाँद तक नहीं देख पाते। आरामदेह कुर्सी पर बैठे-बैठे उनका पूरा जीवन हवाई यात्राओं, वातानुकूलित भवनों, सेवकों और सुरक्षाकर्मियों की फ़ौज के बीच अलौकिक सुख भोगते हुए बीत जाता है। उस आनन्दमय जीवन की गति इतनी तीव्र होती है कि पाँच वर्षों तक पता ही नहीं चलता कि समय कैसे बीत गया? जब पाँच साल बाद पुन: चुनाव होते हैं तभी उन्हें कुछ दिनों के लिए धूल भरी सड़कों पर पैदल चलकर वोट माँगना पड़ता है, ग़रीबों के सिर पर आश्वासन भरा हाथ फेरना पड़ता है, मन्दिरों में भगवान और पुजारी से आशीर्वाद लेना पड़ता है, स्कूल के शिक्षकों के प्रति भी विनम्रता प्रदर्शित कर उन्हें अपना मार्गदर्शक स्वीकारना होता है। यह सब तो तुम पहले चुनाव में ही सीख जाओगे, फिर हर पाँचवें बरस इसे दोहराना होगा, बस। तुम भी किसी मास्टर को अपना सचिव बना लेना। वह सब कुछ नोट करके रखेगा और समय पर याद दिलाता रहेगा।’
  यह सब सुनकर विद्यार्थी हैरान-परेशान था। तोताराम से वह बहुत प्रभावित था। वह उनके पास दिशानिर्देश के लिए बड़ी उम्मीद लेकर आया था। उसके पास उच्च शिक्षा के लिए पैसे नहीं थे। अपने उज्ज्वल भविष्य की चिन्ता उसे खाये जा रही थी। पर मास्टरजी ने कहा- ‘तुम्हारा क़सूर यह है कि तुम अनुसूचित जाति, जनजाति या अल्पसंख्यक के घर पैदा नहीं हुए अन्यथा सरकार तुम्हें उच्च शिक्षा और नौकरी-दोनों में सहर्ष आरक्षण देती। तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल हो जाता। लेकिन ऊँची जाति में ग़रीब माँ-बाप के घर जन्म लेकर तुम डॉक्टर-इन्जीनियर नहीं बन सकते। ऐसे में उज्ज्वल भविष्य का एक ही मार्ग है, जो मैंने तुम्हें बता दिया।’  वे दूरभाष पर वार्तालाप में व्यस्त हो गए।
  इस वर्ष चुनाव के दौरान हृदयाघात के कारण वे ड्यूटी नहीं कर पाए इसलिए आजकल निलम्बित चल रहे थे। उनका बेटा छुटकू कह चुका है कि अब उन्हें स्कूल में पाँव रखने की ज़रूरत नहीं। वे सेवा में ससम्मान वापस लिये जाएँगे, पर अब मास्टरी नहीं करेंगे। उन्हें किसी मन्त्री के स्टाफ़ में नियुक्त किया जाएगा। जिस नेता ने छुटकू को यह आश्वासन दिया था, उसी ने साँठ-गाँठ कर तोताराम की पुस्तक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिलवाया है।
  तोतारामजी पान चबाते हुए बोले- ‘बेटा, याद रखो कि इस देश में नेता ही भगवान है। सब लोग उसी की पूजा कर अपना जीवन धन्य बनाते हैं। उससे बड़ा कोई नहीं हो सकता। समझ गए न? तुम इस देश के भविष्य हो। आज मुबारक मौक़े पर आये हो। मेरी ओर से यह भेंट लो और जाओ। सदैव प्रसन्न रहो।’
  घर पहुँचकर विद्यार्थी ने उपहार का बण्डल खोला। उसमें तोताराम की पुस्तक थी, जिसका शीर्षक था- ‘अगले जनम मोहे मास्टर न कीजो।’


 लेखक परिचय- डॉ. गीता गुप्त, शासकीय हमीदिया महाविद्यालय भोपाल में हिन्दी की प्रोफ़ेसर। हिन्दी की विभिन्न विधाओं यथा- कहानी, कविता, व्यंग्य एवं समसामायिक मुद्दों पर नियमित लेखन। देश की विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। हाल ही में समसामयिक लेखों पर दो पुस्तकें- 1.कुछ विचार कुछ प्रश्न 2. धरा हमारी कहती है। लेखन के साथ  पर्यटन, पर्यावरण-संरक्षण, योग एवं हिन्दी के विकास हेतु कार्य।  समाज सेवा में रूचि। आकाशवाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण। सम्पर्क: ई- 182/2, प्रोफ़ेसर्स कॉलोनी, भोपाल- 462002, मोबाइल- 9424439324, Email- drgeetabpl@gmail.com

Aug 15, 2014

भारत माता का एक पत्र देशवासियों के नाम!

भारत माता का एक पत्र

देशवासियों के नाम!

 - डॉ.गीता गुप्त

 मेरे प्यारे बच्चो,

आज मेरी आज़ादी की वर्षगाँठ है। तुम सब खुशी मनाओगे, बधाइयाँ दोगे, मुझे याद करोगे। मेरी भी इच्छा हुई कि इस बार तुम्हें पत्र लिखकर अपने हृदयोद्गार व्यक्त करूँ। दरअसल देश की स्थितियों ने मुझे बहुत खिन्न कर दिया है। तनिक स्मरण करो वह दिन। कितने लम्बे संघर्षों के बाद मेरी पराधीनता की बेडिय़ाँ टूट सकीं ? भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद और न जाने कितने युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर मुझे आज़ाद कराया। वह संघर्ष-गाथा अद्भुत रोमांचकारी और अविस्मरणीय है जिसका इस देश के बच्चे-बच्चे को ज्ञान होना चाहिए। लेकिन कलियुगी अभिभावकों ने ही वह गाथा नहीं पढ़ी, तो वे अपने बच्चों को कैसे बताएँगे और उनके हृदयों में 'स्वाधीनता’और 'स्वतन्त्रता’के प्रति सम्मान और राष्ट्र प्रेम कैसे जाग्रत होगा? मेरी मुक्ति का उल्लास-पर्व मनाने के लिए वर्ष भर में दो बार जलसे का आयोजन मात्र ही राष्ट्रप्रेम का प्रतीक नहीं है।
मेरी चिन्ता यह है कि 67 वर्षों बाद भी यह देश महात्मा गाँधी, सुभाषचंद्र बोस और भगत सिंह जैसे महान नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का भारत नहीं बन पाया। कहने को तो यह देश 'स्वाधीन’हो गया पर हमारे नीति-निर्माता अभी भी इसे गुलाम बनाये रखना चाहते हैं। तभी तो आज तक अंग्रेजी शिक्षा पद्धति, अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी खान-पान, रहन-सहन और परिपाटियों को ढोये जा रहे हैं। जबकि समय काफ़ी बदल चुका है। सन् 1947 की 33 करोड़ आबादी अब सवा अरब से भी अधिक हो चली है। लोग 'वैश्विक मानव’बनने की होड़ में हैं। लेकिन वे पहले 'भारतीय’तो बनें; क्योंकि जो अपनी जड़ों से न जुड़ा हो, वह कहीं भी स्थापित नहीं हो सकता है।
आज़ादी मिलते ही नेताजी ने कहा था-'गुलामी के कारण देश में कई समस्याएँ पैदा हो गई हैं; जो धीरे-धीरे ही दूर होंगी। इसके लिए उसी एकजुटता के साथ सबको मिलकर कोशिश करनी होगी, जो आज़ादी के संघर्ष के दौरान दिखाई दी थी।पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी स्वतन्त्रता-प्राप्ति के तत्काल बाद आराम की बजाय काम और कठिन परिश्रम की आवश्यकता पर बल दिया था। इन दोनों नेताओं के कथन आज भी प्रासंगिक हैं;  किन्तु उनका अनुशीलन कहीं दिखाई नहीं देता। राजनीति, समाज, धर्म, न्याय, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में अराजकता बढ़ती जा रही है। राजनेता अपने आचरण से लोकतंत्र के मंदिर को कलंकित कर रहे हैं। संसद और विधान सभाओं को उन्होंने अख़ाड़ा बना दिया है और 'सत्ता की कुर्सी’के लिए दण्ड पेल रहे हैं। राष्ट्र-हित को भूलकर वे अपना स्वार्थ साधने में मग्न हैं। अपने शासकीय भवन को ऐशगाह बनाने, हवाई यात्राएँ करने और अपनी अजन्मी पीढ़ी तक का भविष्य सुरक्षित करने के लिए वे देश का खज़ाना खाली किये दे रहे हैं। आम जनता भूखों मर रही हैं, वे भूख पर पाँच सितारा होटलों में बैठकर राजनीति कर रहे हैं। राजनीति भी कैसी? एक-दूसरे को नीचा दिखाने की या गड़े मुर्दे उखाडऩे की।
मुझे सरदार पटेल याद आ रहे हैं जिन्होंने देश की अखंडता के लिए राजनीति की। आज तो नेता मेरे टुकड़े-टुकड़े करके सत्ता का सुख भोगने के लिए लालायित हैं । मुझे शास्त्रीजी भी स्मरण आते हैं जिन्होंने 'जय जवान-जय किसान’का नारा देकर भूमि-पुत्रों को अधिकाधिक अन्न उगाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने समूचे देश को एक दिन व्रत (निराहार) रखवाकर खाद्यान्न की कमी से जूझने का स्वाभिमानी मार्ग भी अपनाया था। आज नेताओं की उपेक्षाओं के कारण किसान आत्महत्या कर रहे हैं और खाद्यान्न संकट गहराता जा रहा है।
जनसंख्या-वृद्धि पर विधिसम्मत नियंत्रण नेता ही नहीं चाहते। यदि दो से अधिक संतान वालों का राजनीति में प्रवेश निषिद्ध कर दिया जाए तो बढिय़ा हल निकल सकता है लेकिन नेता ऐसा होने नहीं देंगे। अलबत्ता कन्या-जन्म पर नियंत्रण हो गया है। कैसी विडम्बना है यह ! जीवन की धुरी मानी जाने वाली स्त्री कोख में ही मारी जा रही है, जन्म लेने पर भी सताई जा रही है, अपनी योग्यता के बल पर कोई मुकाम हासिल करने के बाद पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने की सजा भुगत रही है।
देश का प्रत्येक बच्चा विद्यालय की देहरी पर अब तक कदम नहीं रख सका है। युवा पीढ़ी को दिशाहीन शिक्षा ने दिग्भ्रमित कर दिया है। वे चरित्र, अनुशासन और सदाचार की शिक्षा से कोसों दूर रहकर मात्र 'डिग्री’प्राप्त कर रहे हैं जिसके बूते पर यूरोप पहुँचकर भारी भरकम वेतन वाली नौकरी और भौतिक ऐश्वर्य जुटा सकें। नयी पीढ़ी की यह सोच मुझे दु:ख पहुँचाती है। गाँधीजी ने हमें बुनियादी शिक्षा की योजना दी थी, ताकि युवा पढ़-लिखकर सादे सच्चे, ईमानदार, सच्चरित्र और अनुशासित नागरिक बन सकें। वे शिक्षा प्राप्त करके हाथ न फैलाएँ बल्कि अपने अन्दर हुनर पैदा करके अपने लिए धन और देश के लिए यश अर्जित कर सकें ; लेकिन अंग्रेजी शिक्षा और आधुनिकता के मोह ने उस योजना पर धूल डाल दी। यहाँ तक कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रतिष्ठित संस्था-जहाँ कला, साहित्य, रंगमंच के कलाकार, प्रखर वैज्ञानिक और नोबल पुरस्कार विजेता पैदा होते थे, उसकी भी अवहेलना की गई। इसलिए आज हमारे युवा वाणिज्य और व्यवसाय प्रबंधन पढ़कर मोटे पैकेज वाली नौकरी के लिए विदेश पलायन कर रहे हैं। आरक्षण की आग ने भी उनके भविष्य को झुलसा दिया है; अतएव मेरी गोद छोड़कर वे पराई धरती पर अपमान-जनक जीवन जीने के लिए सहर्ष तत्पर हैं।
समाज की कुरीतियों को देखकर मुझे पीड़ा होती है। धर्म, जाति, प्रान्त, भाषा आदि के नाम पर भेदभाव सर्वथा अनुचित है। आरक्षण, क्षेत्रीयता, न्याय में विलम्ब, बच्चों और स्त्रियों के प्रति अमानवीय व्यवहार की समस्याएँ मेरे लिए चिंताजनक हैं। अब तो शुद्ध हवा, पानी और भोजन की समस्या भी विकराल रूप ग्रहण करती जा रही है। प्रकृति से सहज रूप में प्राप्त जल तथा भोजन को मानवाधिकार घोषित करना एक गम्भीर संकेत है। एक अत्यधिक महत्त्वपूर्ण बात यह कि विकास या उन्नति के नाम पर पश्चिम से आयातित जिस सांस्कृतिक प्रदूषण ने यहाँ जड़ें जमा ली हैं वह सचमुच लज्जास्पद है। बिना वैवाहिक बंधनों में बँधे युवा मातृत्व और पितृत्व प्राप्त कर रहे हैं, वृद्धों को घर से बेदखल किया जा रहा है, संयुक्त परिवार का विघटन हो रहा है, स्त्रियों को विज्ञापन और उपभोग की वस्तु मान लिया गया है और जीवन का लक्ष्य भोग-विलास मात्र रह गया है। ये सारे आयाम भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल हैं। पश्चिम की उन्मुक्तता हमारी सांस्कृतिक विशेषताओं को आघात पहुँचाती है।
मैं सिर्फ खामियों की बात नहीं करना चाहती। आजादी के बाद सूचना-तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टि से तुमने सचमुच बहुत प्रगति की है। बड़े-बड़े उद्योग-धंधे, कल-कारखाने और तकनीकी संस्थान स्थापित हुए। लोगों की जीवन-शैली बदल गई। मेरे रूप में भी निखार आया। मेरे बेटों के साथ अब मेरी रक्षा के लिए सरहद पर बेटियाँ भी तैनात हैं। यदि सचिन, अभिनव, विश्वनाथन और कलाम जैसे बेटे मेरा गौरव बढ़ा रहे हैं तो किरण बेदी, साइना, प्रतिभा, मीरा जैसी कई बेटियाँ मेरा नाम रोशन कर रही हैं। तुम सबको मेरी अस्मिता की चिंता है। मुझपर तनिक भी आँच न आए, इसके लिए तुम हरसम्भव प्रयास करते हो। मेरी समृद्धि के लिए तुमने संचार-माध्यम, आवागमन के साधनों और व्यापार-व्यवसाय की नई तकनीक को अपने जीवन का अंग बना लिया है। यह अर्थ-व्यवस्था की मजबूती में सहायक है। यह गर्व की बात है कि विदेशी कम्पनियाँ यहाँ निवेश करने हेतु आतुर हैं। पूरी दुनिया तुम्हारी मेधा और मेहनत का लोहा मानती है। सारे यूरोप में तुम्हारी प्रतिभा का डंका बज रहा है। यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय होगा।
मगर कुछ ऐसी बातें हैं, जो मुझे सर्वाधिक पीड़ा पहुँचाती हैं। आज वह सब सब तुमसे कहना चाहती हूँ। चारों तरफ भ्रष्टाचार के अंधकार ने उन्नति के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है। तुम समाज में व्याप्त भूख, अन्याय, गरीबी, शोषण, असमानता और बेकारी जैसी समस्याओं को समूल नष्ट कर देने की युक्ति क्यों नहीं सोचते? क्यों अब तक आरक्षण की बैसाखी के सहारे अयोग्यता को बढ़ावा दे रहे हो और योग्यता को पलायन करने के लिए विवश कर रहे हो? तुम्हें अपनी भाषा, संस्कृति, वेशभूषा, खानपान और परंपराओं पर गर्व क्यों नहीं होता जबकि वे आध्यात्म और वैज्ञानिकता की कसौटी पर भी खरी उतरती हैं। अधकचरा पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने में तुम्हें क्यों संकोच नहीं होता? तुम क्यों भौतिकता के पीछे पागल हो रहे हो? क्यों यह भूल गये कि भारतीय संस्कृति भोग की नहीं वरन् त्याग, वैराग्य और नि:स्वार्थ परोपकार की है? तुम पर अपने पूर्वजो, माता-पिता, गुरु, मातृभूमि और राष्ट्र का ऋण है, जिससे कभी मुक्त नहीं हुआ जा सकता। आज यहाँ तीनों सेनाओं में सैनिकों और अधिकारियों की बहुत कमी है। फिर भी, पराये देश में तुम अपमान की रोटी खाकर, जीना चाहते हो लेकिन अपने देश में सैनिक बनकर सम्मान नहीं पाना चाहते, मेरी रक्षा नहीं करना चाहते। यह तुम्हारा कैसा राष्ट्रप्रेम है?
तुम गाते हो 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’, लेकिन इसे अच्छा बनाए रखने के लिए क्या करते हो? अपने घर की गंदगी बाहर फेंक देते हो, सड़क पर चलते हुए कहीं भी थूक देते हो, पेड़-पौधों को काट डालते हो, नदियों-तालाबों को प्रदूषित करते हो। वृद्धों को अपमानित करते हो, स्त्रियों और बच्चों के प्रति हिंसा पर उतर आते हो। मामूली-सी बात पर उत्तेजित हो कर तोड़-फोड़, हिंसा और आगजनी करके शान्त हवा में विष घोल देते हो। भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्रीयता को मुद्दा बनाकर आपस में लड़ते-मरते हो। सार्वजनिक संपत्ति को क्षतिग्रस्त करते हो। राष्ट्र के हित में कर नहीं चुकाते, मतदान नहीं करते, समाज और राष्ट्र के बजाय सिर्फ अपने हित की चिंता करते हो। इसीलिए तुम्हें अपने देश पर छाए संकट के बादल नज़र नहीं आते।
मेरे बच्चो, तुम्हें याद दिलाना चाहती हूँ कि स्वतन्त्रता सेनानियों ने समाज का यह वीभत्स रूप देखने के लिए कुर्बानी नहीं दी थी। वे भी स्वामी विवेकानंद की तरह संवेदनशील राष्ट्र के निर्माण की कल्पना करते थे, जिसमें कोई निर्धन, शोषित और उपेक्षित न हो। स्वामी विवेकानंद ने अपने नागरिकों का आह्वान करते हुए पूछा था-'क्या तुम्हें इस बात पर दु:ख होता है कि लाखों मनुष्य आज भूख की ज्वाला से तड़प रहे हैं ?’क्या तुम अनुभव करते हो कि अज्ञानता देश पर सावन-मेघों की तरह छा गई है ? क्या तुम इससे छटपटाते हो ? क्या इससे तुम्हारी नींद उचटती है और क्या तुम्हें इसने लगभग पागल-सा बना दिया है ? यदि ऐसा है तो यह देशभक्ति की प्रथम सीढ़ी है। केवल प्रथम सीढ़ी।’
सचमुच, आज एक संवेदनशील राष्ट्र की आवश्यकता है। जिसके नागरिक सच्चे इंसान हों, जिनमें प्रकृति और प्राणी मात्र के प्रति ममत्व ओर संवेदनशीलता हो। जो अपने पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति पूर्णत: सजग हों। क्या तुम सचमुच मुझे अपनी माता समझते हो? मैं तो ऐसा ही मानती हूँ। इसीलिए कहती हूँ-मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश करो। तुम्हें अपनी 'स्वाधीनता’ 'स्वतन्त्रता’और 'स्वराज्य’के मर्म को समझना चाहिए। अपने सांस्कृतिक मूल्यों को महत्त्व देते हुए तदनुकूल आचरण करना चाहिए। यही हम सबके लिए हितकर होगा। मेरी बात मानो-सत्कर्म करो। सबके साथ प्रेम से रहो और मानवता के मार्ग पर चलकर एक गौरवशाली अध्याय रचो, जिसकी गूँज दिग्दिगन्त तक सुनाई दे।

- तुम्हारी प्यारी भारत माता


Sep 27, 2012

पीड़ा अब न सही जाती

पीड़ा अब न सही जाती
- डॉ. गीता गुप्त

अब भी हिन्दी दिवस मनाते हो
लाज तुमको तनिक नहीं आती?
राज करती है अब भी अंगरेजी
तुमको स्वीधीनता नहीं भाती?

वक्त यह आत्मनिरीक्षण का है
राष्ट्रभाषा के संरक्षण का है
तुम मनाते हो समारोह मगर
सोचो, हिन्दी है क्यों सिमटी जाती?

अब भी वर्चस्व क्यों विदेशी का?
क्यों न अब मान है स्वदेशी का?
क्यों न अपनाते हम हिन्दी भाषा?
अपनी हिन्दी किसे नहीं आती?

आत्मसम्मान खो रहे क्यों हम?
अब गुलामी को ढो रहे क्यों हम?
अपनी मां को सता रहे क्यों हम?
क्यों है अंगरेजियत नहीं जाती?

सिर्फ नारे न तुम लगाओ अब
झूठी रस्में न तुम निभाओ अब
देखो आंसू बहा रही है मां
उसकी पीड़ा न अब सही जाती।

न भरो देश प्रेम का दम तुम
कोई पाखंड मत रचो अब तुम
लानतें भेजता है हिन्दी दिवस
हिन्दी अब भी परायी कही जाती।

कर सको आज तो संकल्प करो
राष्ट्रभाषा को ही अपनाएंगे
मान देंगे न उसे बस एक दिन
नित्य हिन्दी दिवस मनाएंगे।

संपर्क-  ई-182/2, प्रोफेसर्स कॉलोनी, भोपाल 462002 (म.प्र.)
        मो. 09424439324

Jul 25, 2012

आँखें भी थक गयीं


 - डा. गीता गुप्त

वादा किया था आओगे तुम मेरे गांव में
अब धूप भी जा बैठी है देखो छांव में।

हम राह देखते रहें आँखे भी थक गयीं
बेड़ी किसी ने डाल दी लगता है पांव में।

ऐसा तो नहीं राह में ही लूट गये कहीं
रहजन खड़े हैं चारो तरफ ठांव-ठांव में।

सोचा था पांव डालके बैठेंगे झील में
सब भूल गये दुनियाँ की कांव-कांव में।

वादे किये थे कसमें भी खायी थीं इसलिए
हमने लगा दी पूरी जिंदगी ही दांव में।

संपर्क-  ई-182/2, प्रोफेसर्स कालोनी,
भोपाल 462002 (म.प्र.) मो. 09424439324

Feb 17, 2010

वसन्त बहार


- डॉ. गीता गुप्त
जाने क्यों लगा, वसन्त के कदमों की आहट हुई...। मन्द- मन्द बहती शीतल पवन ने सुबह की किरणों के साथ उसका स्वागत किया। पंछियों के कलरव ने मंगलाचार किया। खुले आसमान के नीचे खड़े होकर मैंने बाहें पसार दीं- आओ, आओ स्वागत है तुम्हारा ... मेरे- उपवन में ही नहीं, सृष्टि के रोम- रोम में, जन-जन के मन प्राण में समा जाओ। अपना सौन्दर्य, अपनी सुवास बिखेरो। पौष माह की शीतल लहर से ठिठुरे प्राणियों की नसों में अद्भुत ऊर्जा और ऊष्मा का संचार कर दो...। मैंने प्रार्थना की- वासन्ती बयार पुलकित करे तन-मन को, जीवन को, धरती के कण- कण को महकाए...। पर जाने कहां ठिठका हुआ है वसन्त? सामने नहीं आ रहा।
हमेशा तो ऋतुओं की गली से गुजरता है जीवन। खिलखिलाता है वासन्ती छटा बिखेरते फूलों के संग। बारिश की बूंदों में भीगता हुआ गुनगुनाता है, शीत के झोंकों से सिहरकर प्रियतम के सान्निध्य की ऊष्मा में चहकता है और कालचक्र घूमता चला जाता है अनगिनत संदेश देता हुआ। संकेतों की भाषा में कितना-कितना कुछ कह जाती हैं ऋतुएं? मन तितलियों की तरह भागता रहता है उनके पीछे उन्मुक्त और सौन्दर्यमय क्षणों में कुछ भी नहीं सूझता मधुर सुर-ताल के सिवा...।
क्यों लग रहा है, यह सब गुजरे जमाने की बात हो गयी? इस बरस कहीं दिखाई नहीं दे रहा वसन्त। दरवाजे पर दस्तक ने भ्रमित कर दिया। कदमों की आहट ने भी भरमाया। वह तो जाते हुए शिशिर की पद- चाप थी। दस्तक थी प्रलय-पीडि़त हृदयों की, जो पूछ रही थीं- वसन्त कहां आया? किसके हृदय में हर्षोल्लास का संचार हुआ? नगर तो वीरान हैं, बस्तियों में सन्नाटा है, उजड़े हुए घर की दीवारों-दहलीजों पर उदासी पसरी हुई है और पीड़ा के अथाह समन्दर में डूबा हुआ है विरक्त मन।
जंगल कट गये। हरियाली किताब के पन्नों पर दिखने वाली चीज होती जा रही है। गेंदे या सेवन्ती के पीले फूलों से सजी गोरियां गांवों, कस्बों में होंगी, नगर में कहीं दिखाई नहीं देतीं। वसन्त का राग-रंग, उल्लास की छटा बिखेरती प्राकृतिक सुषमा न जाने कहां विलीन हो गयी? वे नायिकाएं नहीं दिखतीं, जो इस मादक ऋतु में अपने प्रियतम को संदेश भेजती कागा से कहती थीं-
कागा सब तन खाइयो, चुन - चुन खइयो मांस।
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।।
अब न तो कागा की कांव- कांव है, न कोयल की कूक। प्रियतम को संदेस भेजने के लिए आज की मुग्धा नायिकाओं के पास मोबाइल है, एसएमएस और फैक्स है। वे गीतों में अपनी विरह व्यथा गाकर दूसरों को नहीं सुनातीं, सीधे प्रिये को संदेश देती हैं।
कितना बदल गया है समय? न प्रकृति की मोहक छटा है, न जंगल- नदियां, खेत- खलिहान। पपीहे की पिउ- पिउ, न कोयल की कूहू- कुहू। औद्योगीकरण ने निगल लिए सब जंगल, नदियां, बाग- बगीचे, खेत- खलिहान और हरियाली। धरती का सौन्दर्य निहारने के लिए समय नहीं है किसी के पास। आदमी व्यस्त है बहुत। वह मशीन हो गया है। रिश्तों की सुगंध उसके जीवन से गायब हो गयी है। वह अपनी भाषा में संवाद करना भूल गया है। अजनबीयत के दौर में जो रहा है। प्रकृति, मनुष्यता, पशु, पक्षी सबसे अनजान। ऐसे में किसके पास आये वसन्त?
पहाड़ नंगे खड़े हैं, पेड़ कट गये जंगलों से। हरियाली रूठ गयी। पलाश जाने कहां दहकते होंगे अब? पंछी कहां चहकते होंगे? पता नहीं। गमलों में पेड़ उगाने लगे हैं लोग। पशु-पक्षी चिडिय़ाघरों में मनोरंजन का समान हो गये हैं। पेड़- पौधे बोनसाई की शक्ल में प्रदर्शनी की शोभा हो गये। अब कोयल कहां बैठकर गाए? पंछी कहां चहचहाएं?
जिस वसंत की महिमा का गान पन्त, निराला आदि महाकवियों ने किया, मनोहर प्रकृति की गोद में बैठकर आम्र-वृक्षों पर सुशोभित बौर की मादक गंध का पान करते हुए जिसके स्वागत और सम्मान में कभी मैंने भी ललित निबंध लिखे- आज उसके बारे में लिखने के लिए सामग्री का अभाव है। आज कहां है वह वसन्त?
शांति निकेतन में अभी भी होता है वसन्तोत्सव। विद्यार्थी जीवन में हमने भी वनस्थली में खूब वसन्त पर्व मनाए। वासन्ती परिधान में सज-धजकर वसन्त की अगवानी करते हुए ऋतुराज के गीत गाये और परीक्षा के पूर्व पूजा अर्चना कर विद्या बुद्धि की कामना की।
अब नहीं मनाते विद्यालयों-महाविद्यालयों में विद्यार्थी यह पर्व। उन्हें नहीं मालूम कि वसन्त पंचमी गंगावतरण का भी दिन माना गया है कि यह पर्व रति, वेद, विद्या, शारदा, प्रकृति देव और लीलाधर कृष्ण के पूजन के लिए जाना जाता हैं। अब विद्यार्थी नहीं करते आराधना विद्या और वाणी की देवी सरस्वती की, नहीं मांगते बुद्धि-विवेक। वे वेलेन्टाइन डे मनाते हैं। सरस्वती की उन्हें आवश्यकता नहीं। वैज्ञानिक साधनों, अधकचरा पाश्चात्य संस्कृति और दूरदर्शन ने बच्चों की मासूमियत छीनकर उन्हें समय से पहले बालिग बना दिया है। वे फूल-पत्ते, ऋतु, प्राचीन पर्व-त्योहारों, देवी देवताओं को नहीं जानते। वे जानते हैं शक्तिमान को ऐसे कथानायकों और खलनायकों को, जो हथियार चलाते हैं- खून खराबा करते हैं, हिंसा, आगजनी, तोडफ़ोड़ करते हैं और चमत्कारिक शक्ति के स्वामी प्रतीत होते हैं। वहीं उनके आदर्श हैं।
किसी के पास समय नहीं है कि ठहरकर जीवन मूल्यों के बारे में सोचे- ऋतुओं, प्रकृति, सौन्दर्य और प्रेम के बारे में सोचे, जिससे यह जीवन इतना सुन्दर और स्पृहणीय है कि कवि कह उठा-
सुन्दर है विहग, सुमन सुन्दर
मानव तुम सबसे सुन्दरतम।
आज वातावरण में हिंसा, आतंक, भय, घृणा, अपराध और अनाचार व्याप्त है। यांत्रिक जीवन जीने वाले मनुष्य की संवेदना लुप्त हो गयी है। प्रकृति की सुन्दरता उसे नहीं मोहती, फूलों की सुवास नहीं बांधती, प्राकृतिक उपादानों में छिपे मूल्यवान संदेश वह नहीं ग्रहण करता। उसकी आंतरिक कोमलता में परिणत हो गयी है, हृदय-निर्झर सूख गया है। उसका महत्वाकांक्षी मन सदैव कल्पना लोक में विचरण करता है, अपनी सांस्कृतिक चेतना और जीवन-मूल्यों में नहीं रमता। अपनी मिट्टी की सोंधी महक, पानी की मिठास और संबंधों की ऊष्मा भूला बैठा है वह। उसे सब कुछ चाहिए भौतिक समृद्धि की शक्ल में वसन्त नहीं।
मैं लिखना चाहती हूं वसन्त पर। मेरे लिखने से क्या होगा वसन्त का? पढऩे की फुर्सत किसे है? सोचने की जहमत कौन उठाएगा? मेरा उदास मन लौटा लाना चाहता है मनुष्य को प्रकृति के कोमल संसर्ग में जहां माधुर्य है, प्रेम है, संवेदना है और है सरस अनुभूतियों का निस्सीम विस्तार। पांच सितारा संस्कृति के प्रदूषण और पाश्चात्य जीवनशैली के अंधानुकरण में अपनी गौरवपूर्ण सांस्कृतिक पहचान खोकर क्या हासिल होगा उसे?
अपनी अवहेलना बर्दाश्त नहीं कर सकता कोई। शायद इसीलिए वसन्त भी छिप गया है कहीं। औपचारिकता निभाने के लिए भी नहीं आना चाहता। मानव नहीं समझता, संवेदनशून्य हो गया है लेकिन प्रकृति तो संवेदनशील है। इसीलिए आज पुरवैया उदास है, फूल बेरौनक हैं, कोयल चुप है। अनागत वसन्त की प्रतीक्षा में, सन्नाटे में शोर की तरह मेरी व्यथित पुकार गूंज रही है - लौट आओ... लौट आओ, वसन्त...।