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Jun 1, 2026

कविताः पीछे मुड़कर देखा जो मैंने

 - रमेश बिल्लौरे

फुरसत के समय

पीछे मुड़कर जो देखा

हुआ अवाक्

देख वह राह

चला जिस पर

हुआ विस्मय

देख उन मोड़ों को

मुड़ा जिन पर

लगा जैसे मैं देख रहा जो

पीछे मुड़ वो मेरी नहीं

किसी और की थी जिन्दगी

जो बीत गयी

जिसमें सब कुछ

अनियोजित

अव्यवस्थित

अनिश्चित!

हर बार जब मैं चौराहे पर ठहरा

तय करने के लिए कि

आगे जाना किधर

जाने-अनजाने

मैंने वही राह ली जो औरों ने नहीं ली

जो थी अपरिचित

मगर मुझे जरा भी 

नहीं हुआ अफ़सोस इस पर

आखिर अनजानी ही सही

मैं पहुँचा वहीं

जहाँ मुझे जाना था

और देख पाया तो

 कुल मिलाकर खूबसूरत ही रहा सफ़र!

(29 सितंबर 2005)