किसी से पहली मुलाकात हमें हमेशा याद रहती है, चाहे कितने ही वर्ष उसे बात को गुजर जाएँ। मेरे साथ भी यही हुआ जब मेरी पहली मुलाकात जब नरहरि दादा से हुई।
और जैसे ही उन्हें पता चला कि मैं मंदसौर से हूँ।
अरे... वा... वा... वा.. उन्होंने अपने चिरपरिचित अंदाज में जो कहा, वह मैंने पहली बार ही सुना था।
अरे, वा..वा... वा..या तो अपणा मालवा की छोरी है। और उन्होंने बड़े प्रसन्न होकर ढेरों आशीर्वाद से लबालब कर दिया….फिर दूसरी, तीसरी और चौथी मुलाकात...। जब-जब मैं उनसे मिली, उनके एक नए रूप से ही परिचय होता गया।
बात कर रही हूँ मालवा की संस्कृति, कविता, लोक-नाट्य में आकंठ डूबे नरहरि पटेल की यानी दादा की।
जब भी मालवी बोली की बात आती है, तो उनका चेहरा सामने आना लाजमी है। यों कह सकते हैं कि नरहरि पटेल और मालवा एक दूसरे के पर्याय हैं। उनके व्यक्तित्व में मालवा के गाड़ी-गडार, तीज-त्योहार और मान-मनुहार सब सुरभित होते हैं।
मैं लिखने-पढ़ने की दुनिया में सक्रिय होने के बहुत बाद में उनसे मिली; लेकिन उनका वात्सल्य या उनका सान्निध्य जिन-जिनको मिला उनसे दादा के ज्ञान, काव्य-प्रतिभा के बारे में हमेशा सुनती आई, जो उनकी प्रशंसा किए नहीं अघाते। उनमे मेरे पिताजी भी हैं, जो उनसे कई बरसों से परिचित थे।
पहली बार जब दादा को देखा, तो सिर पर से उड़े हुए बाल, माथे की सलवटों पर मानो पूरी..पूरी दुनिया बसी हुई है। या यों कह सकते थे कि उनकी माथे की सलवटों पर पूरा ब्रह्मांड समाया हुआ प्रतीत होता था।
नाक पर बड़ा- सा चश्मा, उनका मफलर लपेटने का अलग अंदाज; क्योंकि मेरी उनसे पहली मुलाकात सर्दियों में हुई थी। और फिर जब उनकी कविताएँ सुनीं, तो वह तो जहन से निकलती ही नहीं; क्योंकि उसको बोलने का उनका अंदाज बिल्कुल जुदा है। सर्वज्ञात है कि दादा न केवल कवि; लेकिन एक ज़माने में आकाशवाणी के नाटकों का खनकता और प्रतिष्ठित स्वर रहे हैं। म.प्र.रंगकर्म परिदृश्य पर भी उनकी उपस्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण रही है।दादी थारो चरखो चले, घरड़... घरड़... घरड़...चरर, मरर, चरर, मरर इस तरह के शब्दों के साथ उनका मालवी रचनाएँ सुनाने का बिल्कुल अलहदा अंदाज है।
जब उनकी रचनाएँ पढ़ने लगी, तो कई जगह ऐसे प्रसंग आते हैं, जो भावुक कर देते हैं। जैसे वे एक गीत सुनाते हैं, जिसमें एक पिता अपने पुत्र की बारात लेकर अपने गाँव लौट रहा है। वह पीछे बैठी नई बहू से कहता है- बेटा अपने मेहंदी लगे हाथ से ज़रा तम्बाकू तो पीस दे , जिससे तुझे हमने अपने घर में बधाने के लिए जो कर्ज़ ले रखा है, उसकी चिंता ज़रा कम हो जाए! या फिर वे कहते हैं कि सूरज दुनिया को जगाता है, पर माँ सूरज को जगाती है। परिवार को लेकर दादा के मूल्य बिल्कुल अलग है, इसीलिए मैं जब-जब उनसे मिलती हूँ, उनको देखती हूँ, मुझे लगता है कि यह व्यक्तित्व बिल्कुल अलग है।
जब वह जीवन के तीनों रूपों को तालाब, नदी और सागर के माध्यम से यानी बचपन, जवानी, बुढ़ापा को पानी के इन स्रोतों के माध्यम से हमारे सामने लाते हैं, तो लगता है कि इनकी सोच, इनके विचार शायद समंदर से भी ज्यादा गहरे हैं।
उनका गीत छोटी- छोटी मच्छी कितरो पाणी.... तो अब एक कवि का गीत होने से आगे बढ़कर मालवा का लोकगीत सा प्रतिष्ठित हो गया है।
जब हम किसी स्त्री को देखते हैं और आमतौर पर उम्र दराज स्त्रियाँ मातृत्व का ही प्रतीक महसूस होती है; लेकिन हर उम्रदराज पुरुष वात्सल्य या पितृत्व का भाव नहीं देता। नरहरि दादा उन गिने- चुने पुरुषों में से हैं, जिनके चेहरे से ही वात्सल्य झलकता है। और ऐसे ही वात्सल्य की मूर्ति नरहरि पटेल का जब हम लेखन पढ़ते हैं, तो लगता है कि यह वात्सल्य और अधिक गहरा जाता है या भीग जाता है या हमें उसे वात्सल्य में भिगो देता है।
उनके जीवन में निराशा का नामोनिशान नहीं है। वे हमेशा सकारात्मक सोचते हैं। वे नब्बे पार कर चुके हैं, और पूरी जीवंतता से नई नस्ल के साथ बतियाते और उनका बिना थके उनका मार्गदर्शन करते नज़र आते हैं। उनके पास मालवी संस्कृति को लेकर स्मृतियों, संस्कारों, साहित्य और रिवाजों का अकूत ख़ज़ाना मौजूद है। वे मालवी कविता के जगमग करते कलश हैं। उनके होने से हमें इत्मीनान है कि हमारे मालवा को किसी की नज़र नहीं लगेगी। जैसे उनकी कविता की एक पंक्ति कहती है….म्हारे घर कोई भी नजर नी लगाए रे भई....।


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