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Mar 1, 2026

लघुकथाः कुत्ते का खाना

  - दर्शन मितवा

आयकर अधिकारी को तीन–चार मातहतों के संग अपनी दुकान की ओर आता देख दुकानदार ने अपनी ऐनक ठीक की और तेजी से गद्दी से उठकर खड़ा हो गया। हाथ जोड़कर उसने नमस्ते की और उनको बिठाने के लिए अपनी धोती के पल्लू से कुर्सियाँ साफ करने लगा। जब तक वे लोग कुर्सियों पर सजे, तब तक खाने के लिए काजू और पीने के लिए फलों का जूस आ गया। खाने- पीने के उपरांत, आयकर अधिकारी ने अपनी मूँछों पर हाथ फिराते हुए दुकानदार से हिसाब- किताब की किताबें लीं और औपचारिकतावश उनको उलटने- पुलटने लगा। एक पन्ने पर उसकी नजर अटक गई। वह हैरान भी हुआ और मुसकुराया भी। उसने वह पन्ना अपने मातहतों को दिखाया। वे भी मुसकुराए बिना न रह सके, ‘‘कैसे–कैसे लोग हैं जो आयकर बचाने के लिए कुत्ते को डाली गई रोटी का खर्च भी किताबों में डाल देते हैं।’

खुले हुए पन्ने पर खर्च वाली लाइन इस प्रकार लिखी हुई थी, ‘‘तारीख 17.2.89 कुत्ते का खाना–पचास रुपये।’’

खर्च की लाइन पढ़कर दुकानदार भी ही- ही करता हुआ उन सबके साथ हँसने लगा।

थोड़ी देर बाद, वे सब चले गए। दुकानदार ने अपने हिसाब- किताबवाली किताब खोली। काजू से लेकर जूस का सारा खर्च जोड़ा और किताब में उसने एक नई लाइन लिखी–तारीख 29.8.89 कुत्तों का खाना- एक सौ पचास रुपये।

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