मासिक वेब पत्रिका उदंती.com में आप नियमित पढ़ते हैं - शिक्षा • समाज • कला- संस्कृति • पर्यावरण आदि से जुड़े ज्वलंत मुद्दों पर आलेख, और साथ में अनकही • यात्रा वृतांत • संस्मरण • कहानी • कविता • व्यंग्य • लघुकथा • किताबें ... आपकी मौलिक रचनाओं का हमेशा स्वागत है।

Mar 1, 2026

व्यंग्यः रचना - पाठ का कुरता

  - यशवंत कोठारी

जिन्दगी में पहली  बार व्यंग्य– पाठ करने का निमंत्रण आया , सो सोचा एक अदद कुरता तो पाठ करने के लिए होना ही चाहिए। कवि सम्मेलनों में मुशायरों में मैं कई ख्यातनाम शायरों कवियों को महंगे शानदार कुर्तों , शेरबानियों में मंच पर देख चुका था। अचकनों का शानदार समय अब नहीं रहा । मेरा अध्ययन यह भी रहा कि शृंगार का कवि अलग और महँगा कुरता पहनकर आता है, जबकि वीर रस का कवि अपने कुरते में ही आग लगा देने की हिम्मत रखता है, हास्य व्यंग्य का कवि हरे या  लाल रंग के कुरते में जमता है, ऐसा भी महसूस किया। कवयित्रियों के क्या कहने। वे हर मंच को गरबा डांस का मंच समझती भी है और बना भी देती हैं। उनके पहनावे पर कुछ  लिखना  सूर्य को दीपक दिखाना है । अंध भक्त कवि नारंगी कुरते में जमता है, यदि लेडीज दुपट्टा भी गले  में हो तो क्या कहना! क्रान्तिकारी कवि का कुरता समय के अनुसार रंग बदलता रहता है । सत्ता के साथ चलने के  तरीके  कोई मंचीय कवि से पूछे । वैसे जींस पर कम लम्बा कुरता, भारी चश्मा और महँगे जूते हों, तो क्या कहने। कभी राजेश खन्ना ने कुर्तों को फैशन में ला दिया था, बेल बॉटम पर छोटा कुरता खूब चला ।

संचालक का कुरता मज़बूत कपड़े का होना चाहिए  क्योंकि उसकी जेब हर कोई फाड़ने को उतावला रहता है । सम्मलेन की अध्यक्षता कर रहे कवि का कुरता हमेशा शाल से ढका रहना चाहिए । आयोजक को कुरते  के ऊपर जिरह बख्तर पहनना चाहिए ,ऐसा सयानों का कहना है । प्रगतिशील व जनवादी अपने कुरते से ही पहचान पा जाते हैं ।

लेकिन बात अपने लिए कुरते की है, खादी का कुरता आज कल कौन पहनता है ?और अब खादी भंडार वाले भी वैसे नहीं रहे जैसे  गाँधी जी के ज़माने में थे ।

मैंने पुराने वीडियो देखे , परसाई जी बंद गले के कोट में जमते थे। गोपाल प्रसाद व्यास भी कुरता धारण करते थे । शरद जोशी ने हमेशा पेंट बुशर्ट पहनकर ही व्यंग्य पढ़ा और कवियों से भारी लिफाफा प्राप्त किया। के पी भाई ने भी कुरते के बजाय रचना पर ध्यान दिया। कभी कभी सूट टाई भी लगा ली ।  नया कोई अन्य गद्य पढ़ने वाला याद नहीं आ रहा ।

कुर्तों के अध्ययन में यह भी पता चला कि कुरते पूरी बाह का, आधी बाह का, बाह पर बटन वाला  ऊँची कालर वाला  या केवल चौड़ी पट्टी  वाले हो सकते हैं । कुर्तों का रंग मौसम और राजनीति के मिजाज़ के अनुसार बदल सकते हैं। सब से बड़ी बात यह कि आप के श्रोता  और दर्शकों को कुरता चाहिए या अच्छा व्यंग्य , वैसे हिंदी में सब चल जाता है । एक मित्र से सलाह ली – उसने कहा आजकल लम्बे कुर्तों का फैशन है। तुम लम्बा कुरता  सिलवा लो। उसने आगे राय  दी- व्यंग्य छोटा पढ़ना नहीं तो हूट हो जाओगे, कुरता लम्बा चल सकता है; व्यंग्य लम्बा नहीं चलता । मुझे उसकी बात जम गई। वैसे कुरते में जेब होने से  दर्शकों से प्राप्त अंडे टमाटरों को भी रखा जा सकता है ।  

नयी पीढ़ी की एक कवयित्री से पूछा तो बोली –‘‘बूढी घोड़ी लाल लगाम, आप कुछ भी पहन लो। महफ़िल तो मैं ही लूटूँगी।“” और वास्तव में उनके लटके झटकों के सामने  हम सब फीके।  

जैसा की रिवाज़ है आदमी अंत में अपनी घरवाली से भी अनुमति लेता है, उसने लम्बे कुरते की ही  ताईद की, यह भी कहा कि उसके नीचे एक ठो पाजामा भी होना चाहिए , ताकि आप की इज्ज़त ढकी रहे । घरवाली की बात भी सही थी मेरे व कुरते के कारण  व्यंग्य  की इज्ज़त ख़राब न हो, इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए ।  सस्ते से सस्ता कुरता भी भाई साब चार अंकों की कीमत  में था और व्यंग्य पाठ निःशुल्क था। समझ में यह आया कि कुरते के स्थान पर पुराने  पेंट कमीज़ से ही काम चलाया जाए।  वैसे भी व्यंग्यकार के कुरते में नहीं व्यंग्य में दम होना चाहिए ।

सम्पर्कः 701, SB-5 , GOLDEN FORTUNE भवानी सिंह  रोड ,बापू नगर ,जयपुर -302015  मो. -94144612 07


No comments:

Post a Comment