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Mar 1, 2026

व्यंग्यः पाला बदलने की कला

  - डॉ. हरि जोशी

मेरे गाँव से उठकर दुनिया भर में कबड्डी खेल पाँव पसार चुका है। पाला बदलना दुनिया का दुनिया का सबसे लाभदायी खेल हो गया है। कबड्डी से ही पाला बदलने वाली सीख दुनिया भर में ली गई है। इधर उखड़ रहे हों तो पाला बदला कर उधर जम जाएँ।

कबड्डी भारत के गाँवों से चलकर विश्व स्तरीय खेल कैसे बना, और क्यों ? इस एक खेल में अनेक खेल जो निहित रहते हैं? टंगड़ी मार सकते हैं, इकलंगा या कैंची भी लगा सकते हैं।

थोड़ी बहुत राजनीति सीखकर प्रत्येक खिलाड़ी येन केन प्रकारेण पाला मारना सीख ही लेता है। मेरे गांव में फसलों को अधिक ठण्ड पड़े तब ही पाला मारता है। नै नै

नैतिकता की, स्वस्थ समाज की, अनुशासन की फसल, भले ही चौपट हो जाए, राजनीति के खिलाड़ियों को क्यों चिंता करना,वे तो धन की गर्मी सहित गर्म रहते हैं, उन्हें तो पाला मारना है ।

देश भी बेचारा क्या करे, ऐसे ही लोगों से उसका पाला पड़ता है।

  कबड्डी में आधे खेल के बाद एक बार पाला बदलना अनिवार्य होता है । इसमें एक दो खिलाड़ी सदस्य नहीं, पूरी की पूरी टीम पाला बदलती है। आजकल जो घाघ खिलाड़ी होता है वह टीम से छिटककर खुद या एक दो को साथ लेकर पाला बदलता है। इस तरह बार- बार पाला बदलने का रिवाज़ शुरू हो गया है । जिधर मलाई दिखी उधर का पल्ला पकड़ा। तब टीम का कोई चतुर से चतुर खिलाड़ी भी, बीच में, दल बदलकर इधर से उधर नहीं जाता था। अब शिक्षा बढ़ गई है, मेरी एक कविता है, “पहली से दूसरी योजना में शिक्षा बढ़ी , हम सब की लूटने खसोटने की इच्छा बढ़ी।”

साहित्य के अनेक खिलाड़ी भी पाला मारने में उस्ताद हैं, बिना कुछ काम किए बड़े- बड़े सम्मान हस्तगत कर पुरस्कृत होते रहते हैं।

पाला बदलकर अच्छे अच्छों को खो कर देने की कला में कई विश्व स्तरीय घाघ  निपुण हैं।

आज कई खिलाड़ी या कलाकार विश्वास में लेकर अपने हितैषी को ही टंगड़ी मार देते हैं ? अच्छा अवसर देखते ही इधर से उधर कूद जाते, पाला बदल लेते हैं । सही  कलाकार या सचमुच के खिलाड़ी, उसी टीम में घुसते हैं जो हमेशा जीतती ही है। विजयी टीम के खिलाड़ी होने में जिस गर्व की अनुभूति होती है, वह पराजित टीम में रहने से कहाँ? कुछ भी करना पड़े, जीतना ही है? विजयी टीम को सम्मान, पद, पैसा, मलाई सब उपलब्ध जो रहते हैं।

रमानाथ अवस्थी की पंक्तियाँ जीवन में क्यों उतारें “हार जीत तो जीवन भर के साथ है, इसमें रोने धोने की क्या बात है?”

यह सोच चिंतन या साहित्य का हो सकता है, राजनीति के खिलाड़ी को तो येन केन प्रकारेण हमेशा जीतना ही है। कुछ भी ऊला- ढाला करना पड़े, पाला बदलना पड़े, जीतकर ही मानेंगे । एक संसद से पूछा गया- आप सत्ताधारी दल में क्यों आए? उन्होंने उत्तर दिया- चुनाव होने वाला था, जिस पुराने दल में था उसके जीतने की सम्भावना नहीं थी; इसलिए मैं इस दल में आ गया, और देखिए मेरा निर्णय ठीक रहा, मैं संसद सदस्य हूँ। हर खेल में राजनीति, हर राजनीति में खेल। राजनीतिज्ञ कभी हार नहीं मानते । लफंगई करें, लट्ठ चलाए, मतदाता को रिश्वत बाँटें पर हमेशा जीती हुई टीम का पल्लू पकड़े रहेंगे। जिधर बम उधर हम, क्यों पालें नैतिकता का वहम ?

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