हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी के विषय में कहा जाता है कि देवनागरी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। इस लिपि की अनेक विशेषताएँ हैं। इसकी एक विशेषता है संयुक्त वर्णों अथवा व्यंजनों का होना जैसे श्र, प्र, क्र, ग्र, द्र, म्र आदि। जब दो व्यंजन मिलाकर लिखे जाते हैं, तो उनमें भी एक विशेषता उत्पन्न हो जाती है। संयुक्त व्यंजनों में पहला वर्ण आकार में प्रायः पूर्ववत अर्थात् अपरिवर्तित रहता है लेकिन उसमें जुड़ने वाला वर्ण आकार में बहुत छोटा हो जाता है। मज़े की बात ये है कि जो वर्ण पूरा नज़र आता है वो आधा अथवा हलंत होता है और जो छोटा नज़र आता है, वह पूरा, सस्वर अथवा स्वरसहित होता है। ऐसे वर्ण जो किसी वर्ण के नीचे के भाग अथवा पैर की तरफ़ लगाए जाते हैं पदेन वर्ण कहलाते हैं। स्थान पैरों में लेकिन रुतबा अथवा प्रभाव पैरों वाले से अधिक। उपर्युक्त स्थिति वर्णों अथवा व्यंजनों पर ही लागू नहीं होती; अपितु हम सब पर भी लागू होती है। जब हम किसी के पैरों के पास बैठ जाते हैं तो कुछ अधिक बड़े हो जाते हैं।
सुनने में यह अविश्वसनीय अथवा विचित्र लग सकता है लेकिन ये सच है क्योंकि पैरों के पास बैठना साधना अथवा तपस्या जैसा होता है जो बहुत बड़ी बात है। किसी के पैरों के पास बैठने के लिए व्यक्ति को झुकना पड़ता है। झुकना अथवा किसी के पैरों के पास बैठना सरल नहीं होता; क्योंकि ये केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं अपितु मनुष्य के जीवन की एक अत्यंत विकसित अवस्था होती है। इसके लिए व्यक्तित्व में तरलता अनिवार्य है। केवल शरीर में ही लोच नहीं होनी चाहिए अपितु विचारों में भी लचीलापन व सकारात्मकता होनी चाहिए। जब तक हम क्षुद्रता का त्याग करके स्वयं में दूसरों को महत्त्व देने की योग्यता अथवा क्षमता विकसित नहीं कर लेते तब तक हम दूसरों को महत्त्व नहीं दे सकते। दूसरों के सामने छोटा बनकर उन्हें महत्त्व देने का अर्थ है कि हम उन्हें अपने अनुकूल बना रहे हैं। जब तक कोई व्यक्ति हमारे अनुकूल नहीं होता उसके साथ अच्छे संबंध बनाना भी संभव नहीं होता। इस प्रकार से दूसरों को महत्त्व देने का अर्थ है अच्छे संबंधों का विकास। और संबंध अच्छे हों तो छोटे-बड़े का भेद भी समाप्त हो जाता है।
जब तक हममें किसी भी दृष्टि से बड़े होने का दंभ बना रहता है, हम किसी के पैरों के पास नहीं बैठ सकते अतः बड़े नहीं हो सकते। जब हम किसी के सामने झुक जाते हैं तो हम छोटे नज़र आने लगते हैं लेकिन वास्तव में झुकने अथवा छोटा होने पर ही हम बड़े हो जाते है। बड़े होने की इस प्रक्रिया में हम स्वतः अहंकार से मुक्त हो जाते हैं। अहंकार के साथ-साथ दूसरे विकार भी तिरोहित हो जाते हैं। जब हम किसी के साथ जुड़ते हैं अथवा साथ रहते हैं या उनके साथ मिलकर काम करते हैं तब हमें उनके सामने स्वयं को बड़ा न मानकर उन्हें अधिक महत्त्व देना चाहिए। इससे हमारा महत्त्व अथवा बड़प्पन कम नहीं होगा अपितु हम जिनके साथ जुड़े हैं वे भी न केवल सहजता से हमारे साथ जुड़ जाएँगे अपितु उनका पूरा सहयोग भी हमें मिलना प्रारंभ हो जाएगा। जब हम किसी के सामने छोटे होकर उसको महत्त्व देंगे तो हम छोटे होकर भी महत्त्वपूर्ण ही नहीं अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित भी हो जाएँगे। आध्यात्मिक ही नहीं भौतिक उन्नति के लिए भी यह अनिवार्य है।
गुरु नानक देव जी ने कहा है - नानक नन्हे ही रहो जैसे नन्ही दूब, बड़े बड़े बह जात हैं दूब ख़ूब की ख़ूब। गुरु नानक देव जी का कहना है कि यदि दूब जैसे नन्हे बने रहोगे तो तुम्हारा कभी कुछ नहीं बिगड़ेगा। दूब एक प्रकार की घास होती है जिसकी कई विशेषताएँ होती हैं। दूब नन्ही अथवा छोटी होती है। साथ ही वह कोमल भी बहुत होती है। जब हम उसके ऊपर चलते हैं तो वह चुपचाप दब जाती है और उसके ऊपर से पैर हटते ही वह पुनः उठ खड़ी होती है। आँधी-तूफ़ान, बाढ़ अथवा तेज़ बारिश में बड़े-बड़े पेड़ उखड़कर नष्ट हो जाते हैं लेकिन नन्ही कोमल दूब का कुछ नहीं बिगड़ता। अपने लघु आकार व कोमल स्वभाव के कारण ही दूब कभी नष्ट नहीं होती। दूब इतनी नन्ही होती है कि कोई उससे ईर्ष्या-द्वेष नहीं करता। जब हम दूब की तरह हो जाएँगे तो हमसे भी कोई ईर्ष्या-द्वेष नहीं रखेगा जिससे हमारे हर प्रकार के विकास का मार्ग निर्बाध बना रहेगा।दूब का रंग भी आकर्षक व ताज़गी प्रदान करने वाला होता है। वह आँखों में चुभता नहीं है। दूब को देखकर ही आँखें तृप्त हो जाती हैं। दूब के ऊपर ही नहीं उसके आसपास चलने वालों को भी प्रसन्नता की अनुभूति होती है। ये सब लघुता की विशेषताएँ हैं। दूब इतनी नन्ही होती है कि दूसरों को उसके सामने कुछ बड़ा होने का एहसास बना रहता है। यदि हमारे लघु बने रहने से किसी को बड़ा अथवा महत्त्वपूर्ण बने रहने की ख़ुशी मिल जाती है अथवा हमारे सान्निध्य में कोई महत्त्वपूर्ण अनुभव करता है तो हमारे लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है! यदि बड़ा होना है तो आकार को नहीं आचरण को महत्त्व देना होगा। हमारे आचरण का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है हमारी वाणी अतः हमारी वाणी में भी लघुता होनी चाहिए अर्थात् हमें विनम्र होना चाहिए। हम विनम्र बने रहते हैं तो हम न केवल नष्ट नहीं होते अपितु सीखते भी हैं।
विनम्र हुए बिना कोई कुछ नहीं सीख सकता। कम से कम उदात्त जीवन मूल्य तो नहीं सीख सकता। विनम्रता के अभाव में जीवन जीने की कला नहीं सीखी जा सकती। जिसमें विनम्रता नहीं होती उसे कोई सही व्यक्ति अपने पास नहीं बिठाता। कोई ऐसे व्यक्ति को नहीं सिखाता। जो सिखाने वाले को जितना अधिक मान देता है, जितना उसके सामने विनम्र होकर बैठता है, उतना ही अधिक सीखता है। उर्दू शायर ‘जिगर’ मुरादाबादी ने कहा है - हरीमे-हुस्ने-मानी है ‘जिगर’ काशाना-ए-‘असग़र’, जो बैठो बाअदब होकर तो उठो बाख़बर होकर। जब तक हममें बाअदब अर्थात् विनम्र व शिष्ट होकर गुरु के चरणों में बैठने की योग्यता उत्पन्न नहीं होती, हम बाख़बर अर्थात् अभिज्ञ व ज्ञानवान नहीं हो सकते। नवाज़ देवबंदी ने भी कहा है - जूते सीधे कर दिए थे एक दिन उस्ताद के, उसका बदला ये मिला तक़दीर सीधी हो गई। जिसने उस्ताद के जूते सीधे करने व उनके क़दमों में जगह बना लेने की क़ाबिलियत हासिल कर ली उसकी तक़दीर अथवा ज़िंदगी का सँवरना या सफलता मिलना अत्यंत सरल हो जाता है।■
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