- रविन्द्र गिन्नौरे
"धनी से अपने लिए धन लेने वाले का मुँह यदि काला हो, तो क्या विचित्रता है कि दूसरों के लिए भी समुद्रों से जल लेने वाले मेघ पूरा का पूरा ही काला हो जाता है-
“स्वार्थ धनानि धनिकात् प्रतिगृह्रतो यत् आस्यं, भजेन्मालिनता किमिद विचित्रम, गृहणः परार्थमपि वारिनिधेः पयोऽपिं, मेघोऽयमेति सकलोऽपि च कालिमान्म।"
पौराङ्गनाएँ कटाक्षों से मेघ के साथ विलास करती हैं। उज्यियिनी की उन्मादिनियाँ मेघ दर्शन से उन्मन्त हो जाती हैं। जनपद की वधुएँ कामपुरुष मेघ के अभिराम रूप का पान करती हैं, किन्तु यह सब निरर्थक नहीं है, उनका लक्ष्य कृषि फल प्राप्ति है। मेध कृषि प्रवर्तक हैं, यदि इनके आगमन में विलंब हो जाये तो संपूर्ण वन प्रकृति विस्फारित नेत्रों से आकाश की ओर एकटक निहारने लगती है। मेघ का सुधावर्षण उनके लिए प्राणद है। मेघदूत में कालिदास ने इसलिए ही कहा है-
"त्वरयत्यायतकृषिफलमिति भूविलासानभिज्ञैः
प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूधूलिचनैः पीयमानः।।"
मानसून के आते ही विरहणी की दशा कैसी हो जाती है उनके विरह को संस्कृत कवियों ने चित्रित किया है। विरहणी वर्षा की शोभा को कातर दृष्टि से देख अपनी सखी से कहती है, "देखो आषाढ़ आ गया है, दसों दिशाओं में मेघ आच्छादित हो चुके हैं। कजरारे बादलों के साथ हवाएँ कैसी अठखेलियाँ कर रही हैं, पर है सखी मेरी आशा मुझे केवल धोखा दे रही है-
आषाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाशास्ते ।
प्रिय सखि मम पुनराशा भ्रमयति भूरि ॥
वैसे वर्षा का अनूठा सौंदर्य किसका मन नहीं मोह लेता है। पृथ्वी पर फैली हरियाली और काली घटाओं के बीच रह रह कर प्रदीप्त होती चपला बिजली की चमक अद्भुत दिखती है। फूलते हुए कदम्ब के पेड़ पर नाचते मोरों की थिरकन को देखने इंद्रवधू भी घरा पर आ उतरती है। कविवर नंददास ने अत्यंत सूक्ष्मता से बरसात के मौसम का हृदयग्राही चित्र अपनी काव्य पंक्तियों के माध्यम से दिखाया है-
घन होति हरीरी मही को लखै, निरखै घन जो घनज्योति छटा ।अवलोकति इन्द्रवधू की पत्यारी,विलोकति है खिन कारी घटा ।
ताकि डार कदंबन की बरसे दरसे, उत नाचत मोर अटा ।
अधऊरध आवत जात भयो, चित नागरि को नर कैसो बटा ।।
उमड़ते घुमड़ते बरसते काले बादलों के बीच चंचला बिजली रह रह कर थिरक उठती है, कहीं जल-वृष्टि के बाद निष्प्रभ हो श्वेत हो जाना, कैसा सुन्दर व्यतिरेक है। जिसको देख विरही पपीहा बोल उठता है ,कोयल कूक उठती हैं। कलरव करते पक्षियों के साथ दादुर भी सुर मिलाते हैं। विरही का मन इन आवाज़ों को सुन कम्पित हो उठता है। तारों की चमक देख विरहिणी कहती है कि मैं प्रीतम को मना करती रही, जिसके बिना मेरा तन विरह से जल रहा है। सावन के ये बादल मेरी विरहाग्नि को और बढ़ा रहे हैं।
कविवर मतिराम ने विरहिणी की विषम व्यथा को उकेरते हुए कहा है-
उमड़ि घुमड़ि धन छोड़त अखंड धार, चंचला उठति तामें तरजि तरजि कै।
बरही, पपीहा, भेक, पिग, खग टेरत हैं, धुनि सुनि प्राण प्राण उठे लरजि लरजि कै ।
कहै कवि राम लखि चमक खदोतन की, प्रीतम को रही मैं तो बरजि बरजि बरजि कै।
लगे तन तावन बिना री मनभावन कै, सावन दुक्न आयो गरजि गरजि कै।।
ग्रीष्म की भीषण ज्वाला को, वर्षा की सौंदर्यमयी अद्भुत छटा अपने आगोश में ले लेती है। धूल के बवंडर बरसात की श्वेत चाँदी सी बूँदों में मिल एकाकार हो जाते हैं। घरा पर सोंधी महक और शीतल प्राणद वायु से चहुंओर हर्षोल्लास हो उठता है। वर्षा जल ग्रहण करने के लिए चातक स्वाति नक्षत्र की प्रतीक्षा करता है। मेंढ़क बादल गर्जना से होड़ लिये टर्राने लगते हैं। स्याह बादलों के बीच कौंधती बिजली क्षण भर को दसों दिशाओं को प्रकंपित कर देती है। पहली वर्षा में बगुले भी पंक्तिबद्ध हो आकाश में विचरते बागों का सौंदर्य निहारने उड़ान भरने लगते हैं। ऋतुओं का वर्णन करने वाले कवि पद्माकर ने वर्षा का अनूठा चित्रण किया है-दौरत ददेरी देत दादुर सूँ दू़दै दीह,
दामिनी दमंकत दिसान में दसा की है,
पहलन बूँदन बिलोक बगुलान बाग.
बंगलान बेगिन बहार बरषा की है।
घने काले बादल चारों ओर से उमड़ते घुमड़ते बरस घिर आए हैं, कविवर द्विजदेव की नायिका अपनी सखी से कहती है, सखी! ऐसी वर्षा मुझे विरह में विष बूँद- सी लगती है। वह उलाहना देते कहती है कि पापी पपीहा तुझे मेरी सौगंध, ऐसी छटा में अपना दाँव मत चूक, जो बार बार प्रीतम की टेर लगाए हुए मुझे सुना रहा है,
बादलों को संदेश वाहक बनाते समय कालिदास का मन कितना व्यथित होगा! इस की कल्पना करना सहज नहीं है। कालिदास की इन्हीं भावनाओं पर कवि नागार्जुन ने मर्म कटाक्ष करते के हुए कहते हैं-
वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका,
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का,
रोया यक्ष कि तुम रोए थे,
कालिदास, सच-सच बतलाना।
ravindraginnore58@gmail.com




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