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Jul 1, 2026

कविताः आषाढ़ के बादल

 -  अर्चना अनुपम

क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम ?

गर्जना घनघोर कर रहे, 

करता है जैसे समंदर 

गर्जन-नाद..

चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं.. 


क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम? 

जो भी हो.. 

हम केवल पुरुष ही माने तुम्हें ! 

चिड़िया चीं चीं यह बतियाती हैं.. 


हाँ, आषाढ़ के बादल! 

तुम पुरुष हो..

सावन तो बरस पड़ेगा, 

भादो बनकर किंतु छिप जाओगे

शरद- शिशिर में.. 

आषाढ के बादल तुम! 

चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं.. 


क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम? 

क्या, अव्यक्त कुछ कहते हो..?

चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं..! 


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