- अर्चना अनुपम
क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम ?
गर्जना घनघोर कर रहे,
करता है जैसे समंदर
गर्जन-नाद..
चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं..
क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम?
जो भी हो..
हम केवल पुरुष ही माने तुम्हें !
चिड़िया चीं चीं यह बतियाती हैं..
हाँ, आषाढ़ के बादल!
तुम पुरुष हो..
सावन तो बरस पड़ेगा,
भादो बनकर किंतु छिप जाओगे
शरद- शिशिर में..
आषाढ के बादल तुम!
चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं..
क्या हो, आषाढ़ के बादल तुम?
क्या, अव्यक्त कुछ कहते हो..?
चिड़िया चीं-चीं यह बतियाती हैं..!

No comments:
Post a Comment