- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
ईमानदारी और पद! भला ईमानदारी और पद का क्या रिश्ता है? हाँ जी है! बड़े पद पर आसीन बड़े-बड़े घपले कर सकता है; क्योंकि यह उसका जन्मसिद्ध नहीं, पदसिद्ध अधिकार है। एक गरीब और भूखा आदमी रोटी चुराए, तो चोर कहलाएगा। बड़े पद पर बैठा व्यक्ति दूसरों का धन चुराए, लेखन चुराए, गबन करे, तो कर सकता है। इससे उसकी इज़्जत पर बट्टा नहीं लगता है। चोर के समर्थन में न्याय और शास्त्रों की दुहाई देने वाले उसके धत् कर्म की निन्दा न करके, जिसका माल चुराया है, उसे मामले को ठण्डे बस्ते में डालने की नसीहत देने लगेंगे। वह छाती ठोंककर चोरी स्वीकार कर लेगा। मामला खत्म! फेसबुक से लेकर विश्वविद्यालयों के भीतर तक बड़े पद पर बैठे छोटे कद वाले लोग कीचड़ में सने मिलेंगे। कोई उनको छेड़ेगा, तो वे उसके ऊपर कीचड़ उछालने से बाज नहीं आएँगे।
बहुत सारे शब्दों का इस दौर में घोर अवमूल्यन हुआ है। उनमें दो शब्द प्रमुख हैं- इण्टरनेशनल और विश्व। गली मुहल्ले के स्कूल भी इण्टरनेशनल नाम रखकर मोटी फीस वसूलकर गर्व से सीना फुलाए हुए हैं और शिक्षा के नाम पर जाने कितने नौनिहालों का भविष्य चौपट कर रहे हैं। जेबी संस्थान के साथ विश्व शब्द का दुरुपयोग करके कितने ही ऐसे लोग रातों-रात अन्तरराष्ट्रीय होने का मुगालता पाले हुए हैं। इनके संस्थान में कुछ दीजिए और बदले में आपको एक प्रमाणपत्र मिल जाएगा। आप बिना कुछ किए धरे अन्तरराष्ट्रीय हो जाएँगे। इनके मंच पर आने के पैसे, मंच पर लंच के पैसे, प्रमाण-पत्र के पैसे। कितना अच्छा है कि कोई भी अनाम गली से निकलकर इनके हाथों सम्मानित होकर रातों-रात अन्तरराष्ट्रीय हो जाएगा। सौदा एकदम सस्ता है।
शैतान की आँत की तरह लम्बी कविता, कहानी कुछ भी लिखिए, बस रिकार्ड आपके नाम दर्ज हो जाएगा। श्रीमान् बुभुक्षित हर वर्ष कुछ महीनों के लिए देश- विदेश के दौरे पर निकलते हैं। वे कभी खाली हाथ नहीं लौटते। कुक्कुरमुत्ता की तरह फैली संस्थाओं के कई प्रमाण-पत्र उनके हाथों में होंते हैं।
प्रचार की भूख आदमी का विवेक छीन लेती है। किसी मंच पर बुलाकर अगर उनको दुलत्ती भी मार दी जाए, तो अगले दिन अखबार में छपा मिलेगा कि उनको अमुक संस्था ने सम्मानित किया है। किसी ने उनको गलती से अपना बैग भी थमा दिया, तो वे सम्मानित महसूस करेंगे। वह भी अखबार में जाकर सम्मान की खबर बन जाएगी। एक ऐसी ही खबर पर मैने श्री बेहया जी को टोका, तो गुर्रा उठे, ‘‘आप मुझसे जलते हैं। आपको धेले की अक्ल नहीं। मुझे कवि गोष्ठी में तहसीलदार साहब ने सम्मानपूर्वक बुलाया था, तो क्या यह मेरा सम्मान नहीं था? क्या मैं उनके बुलाने से सम्मानित नहीं हुआ?’’
'सम्मान' शब्द के अर्थ-अपकर्ष की जानकारी मिलने से मेरा ज्ञान बढ़ा। निरुत्तर होने के अलावा मेरे पास कोई उपाय नहीं था।
आह और वाह का अंतर! मंच पर कुछ अच्छे कवियों के बीच में वानर की तरह उछलकूद करने वाले कवि हर कहीं मिल जाएँगे। ये सड़े हुए चुटकुले सुनाकर काव्य की दुर्गति करने में कभी पीछे नहीं रहते। ताली बजाने की भीख माँगते ये कवि मंच के प्रपंच को भली प्रकार समझते हैं। पत्नी से लेकर मुहल्ले वाली और साली का, यहाँ तक कि किसी दिव्यांग की असमर्थता का उपहास करने में भी नहीं चूकते। चुटकुले को भी कविता का दर्जा देने का अभियान भी ये जोरों से चलाए हुए हैं। गम्भीर श्रोताओं पर भी ये अपनी ऊल-जलूल तुकबन्दी का ढेला फेंकने से बाज नहीं आते। 'वाह-वाह' न सुनें तो इनका चेहरा दयनीय हो जाता है, जबकि अच्छी कविता को सुनकर 'वाह-वाह' नहीं, बल्कि रसविभोर होकर 'आह!' निकलती है कि क्या खूब कहा है! ये वानर कवि मंच से बाद में उतरते हैं, इनकी कविता उससे भी पहले कला-कवलित हो जाती है।
चलते-चलते एक बात और कि किसी का लिखा पढ़ने की बजाय कुछ की रुचि केवल अपना पढ़वाने तक सीमित है। आप उनका लिखा सब पढ़िए, उन पर लिखिए. वे न आपका लिखा कुछ पढ़ेंगे, न आपके बारे में कुछ लिखेंगे; लेकिन सावधान! आप उनको अनपढ़ न कह देना! वे बड़े लेखक हो गए हैं।
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