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Jul 1, 2026

अनकहीः अनुभवों की छतरी और रिश्तों की बारिश

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

तपती हुई धरती पर जब बारिश की पहली बूँद गिरती है, तो मिट्टी से आती वह सोंधी खुशबू आत्मा को भिगो जाती है। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों को पीछे छोड़ते हुए जब मौसम करवट लेता है, तो सुकून और सुरक्षा का अहसास होने लगता है। इस बदलते मौसम में जब भी हम घर से बाहर कदम बढ़ाते हैं, तो हमारी सबसे पहली जरूरत बनकर आती है- एक अदद छतरी। वह छतरी जो हमें आसमान से बरसते पानी से बचाती है और सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुँचाती है।

मौसम की इस छतरी को देखते हुए कभी-कभी सोचती हूँ कि हमारी जिंदगी का ताना-बाना भी तो कुछ ऐसा ही है। जीवन के जंजालों के बीच जब दुखों, जिम्मेदारियों, तनाव और अनिश्चितताओं की मुसलाधार बारिश शुरू होती है, तब हमें एक ऐसी ही छतरी की जरूरत होती है; लेकिन वह छतरी  रंग - बिरंगे कपड़े  से नहीं बनी होती, बल्कि वह हमारे बुजुर्गों के अनुभवों, उनके आशीर्वाद और रिश्तों की आत्मीयता से बनी होती है, जो हमें हर मुश्किल घड़ी में भावनात्मक सुरक्षा देती है। बड़े-बुजुर्गों का हमारे सिर पर हाथ रखना, जिंदगी की किसी भी कड़ी धूप या भारी बारिश में एक मजबूत छतरी की तरह ही तो काम करता है।

कहाँ गया वह दौर, जब हमारे परिवार संयुक्त हुआ करते थे। घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति उस विशाल बरगद की तरह होता था, जिसके नीचे पूरा कुनबा सुरक्षित रहता था। जिंदगी में कोई भी संकट आए, रिश्तों में कोई कड़वाहट घुले, बुजुर्गों के अनुभवों की वह छतरी तुरंत खुल जाती थी। उनके कहे दो शब्द कि -चिंता मत करो, हम हैं न, सब ठीक हो जाएगा- किसी भी मानसिक तनाव को पल भर में सोख लेते थे। वह केवल शब्द नहीं होते थे, बल्कि एक ऐसा सुरक्षा कवच होते थे जो नई पीढ़ी को बिखरने नहीं देते थे। उस दौर में अवसाद, अकेलापन या तनाव जैसे शब्द हमारे शब्दकोश में नहीं थे, क्योंकि हमारे ऊपर अनुभवों की छतरी हमेशा तनी रहती थी।

लेकिन आज के इस आधुनिक और महानगरीय दौर में स्थितियाँ बिल्कुल बदल चुकी हैं। अब तो संयुक्त परिवार   ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते। दादा-दादी और नाना-नानी की छाँव का मिलना तो बहुत दूर की बात हो गई है।  विडंबना देखिए कि आज के परिवारों में माता-पिता तक पीछे छूटते जा रहे हैं। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने, उन्हें बड़ा करने और इस काबिल बनाने में लगा दी कि वे आसमान छू सकें, उनका नाम रोशन करें; लेकिन वही बच्चे पंख उगते ही उनको छोड़कर दूर कहीं उड़ जाते हैं। आज के भारतीय परिवारों में बेहतर करियर और नौकरी के लिए विदेशों में जाकर बसना एक आम बात हो चुकी है। जो देश में रह रहे हैं, वे भी किसी बड़े मेट्रो शहर की अंधी दौड़ का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी मजबूरी कहें या जीवनशैली, वे हर जगह अपने माता-पिता को अपने साथ नहीं ले जा सकते। तब पीछे छूट जाते हैं सूने घर और उन बुजुर्गों की बूढ़ी आँखें, जो सिर्फ त्योहारों पर बच्चों के लौटने का इंतज़ार करती हैं।

यह अलगाव केवल उन बुजुर्गों को अकेला नहीं कर रहा, बल्कि नई पीढ़ी को भी असुरक्षित बना रहा है। जब सिर पर बुजुर्गों की मानसिक सुरक्षा रूपी कवच या उनकी तसल्ली देने वाली छतरी की छाया ही नहीं होगी, बच्चों को दादा- दादी का प्यार और उनके अनुभवों के किस्से- कहानियाँ सुनने नहीं मिलेगी तो वे कैसे एकता, सहयोग, प्रेम और मानवता की भावना को आत्मसात कर पाएँगे। इस तरह तो हमारी यह समृद्ध संस्कृति और परंपराएँ सब पीछे छूटती चली जाएँगी।  भला जड़ों से कटकर कोई भी संस्कृति कोई भी परंपरा जीवित रह सकती है?

यह एक अजीब विरोधाभास है कि आज हम अपनी गाड़ियाँ, अपने बैंक खातों की सुरक्षा के लिए तमाम तरह के इंश्योरेंस और सुरक्षा कवच खरीदते हैं; लेकिन जो हमारा असली और प्राकृतिक सुरक्षा कवच है -हमारे अपने बुजुर्गों का सानिध्य- जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, उसे हमने खुद ही अपने से दूर कर दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि किताबें और गूगल आपको ज्ञान दे सकते हैं; लेकिन जिंदगी को जीने की समझ और संकटों से लड़ने का धीरज केवल बुजुर्ग दे सकते हैं, जिन्होंने अपनी उम्र के कई सावन और पतझड़ देखे हैं। उनका अनुभव कोई किताबी ज्ञान नहीं; बल्कि जिंदगी की भट्टी में तपा हुआ वह सच है जो हमें सही दिशा दिखाता है।

कहना यही चाहती हूँ कि, सावन की इस रिमझिम फुहारों के बीच, खिड़की से बाहर पानी की बूँदों को गिरते हुए जब देखें, तो जरा ठहरकर अपने भीतर अवश्य झांकें- कि जिंदगी की यह मशीनी जैसी दौड़ और दूसरों से आगे निकलने की अंधी प्रतियोगिता हमें किस ओर ले जा रही है। कहा जाता है कि जो पेड़ अपनी जड़ों से कट जाते हैं, वे पहली ही भारी बारिश या तूफान में धराशायी हो जाते हैं। यही बात इंसानी रिश्तों और समाज पर भी लागू होती है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी जिंदगी इस मशीनी युग में भी हरी-भरी और जीवंत बनी रहे, तो हमें अपने घरों में, अपने समाज में अनुभवों की उस छतरी को फिर से सहेजकर खोलना होगा। बुजुर्गों के आशीर्वाद वाले उन हाथों का सम्मान करना होगा; क्योंकि जब तक वह छतरी हमारे सिर पर तनी है,  तब तक चाहे आँधी- तूफान हो या मूसलाधार बारिश, हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

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