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Jul 1, 2026

दो लघुकथाएँः

  - आनंद हर्षुल

1- ईश्वर की खाँसी

       ईश्वर खाँस रहा है और पृथ्वी हिल रही है। मनुष्य हजारों हजार बरसों से महसूस कर रहा है कि ईश्वर जब भी खाँसता है तो पृथ्वी हिलने लगती है।

    इधर, ईश्वर लगभग रोज खाँसने लगा है और पृथ्वी रोज हिल रही है…ईश्वर के खाँसने से मनुष्य ईश्वर की खाँसी से परेशान है।

मनुष्य, पानी पी रहा है, और अचानक ईश्वर को आ जाती है खाँसी, ईश्वर की खाँसी से हिलने लगती है पृथ्वी, पानी छलक पड़ता है…मनुष्य के चेहरे पर, मनुष्य खा रहा है खाना और हिलने लगती है पृथ्वी खाना बिखर जाता है धरती पर, मनुष्य कई बार चलते-चलते गिर पड़ता है, हिलती पृथ्वी के साथ, वह अपना संतुलन नहीं बना, रख पाता है। खेत की निंदाई, कोड़ाई, जोताई…सभी मुश्किल लगती है, जब ईश्वर की खाँसी से हिलती है पृथ्वी, दरअसल, ईश्वर की खाँसी से इन दिनों मनुष्य की  दैनंदिन की सभी क्रियाएँ प्रभावित हो रही है। पानी से पेशाब तक भोजन से मल त्याग तक प्रेम से संयोग तक।

   बहुत बूढ़ा हो गया है ईश्वर, ईश्वर, इतना बूढ़ा हो गया है कि एक बूढ़े मनुष्य से ज्यादा बूढ़ी हो चुकी है- बूढ़े ईश्वर की खाँसी, हजारो-हजार बरस पुराना है ईश्वर ईश्वर के फेफड़े हैं, हजारों हजार बरस पुराने। ईश्वर के पुराने फेफड़े अब जवाब दे गए हैं। खाँस रहे हैं लगातार।

लगातार हिल रही है पृथ्वी…ईश्वर की खाँसी से पुराने और जर्जर फेफड़ों की, यह इतनी भयावह खाँसी है कि मनुष्य को डर लग रहा है कि ईश्वर की खाँसी से हिलते-हिलते, कहीं नष्ट न हो जाए यह पृथ्वी।

2- बच्चों की आँखें

    बहुत बड़ा बगीचा है। बगीचे में बहुत से पेड़ है पेड़ों पर बहुत सी चिड़ियाँ है। पौधे है। बहुत से फूल हैं, पौधों पर फूलों पर बहुत सा पराग है, पराग पर, बहुत सी तितलियाँ हैं। इन सब के साथ, बहुत से बच्चे हैं बगीचे में। हरी बेंचों पर  बैठे, बैठे, एक दूसरे से सटे-सटे एक-एक हरी बेंच पर, चार-चार पाँच-पाँच बगीचे में जितनी हरी बेंच हैं, यहाँ-वहाँ छिटकी-सी रखी, उन पर यहाँ-वहाँ छिटके से बैठे हैं बच्चे सिर झुकाए सबके हाथों में मोबाइल है, मोबाइल की स्क्रीन पर एक गेम चल रहा है, जिसमें जंगल में युद्धरत एक योद्धा है-चपल ओर तीव्र अपने आस-पास का, सबकुछ तहस-नहस करता योद्धा। बगीचे की बेंचों पर बैठे सारे बच्चे युद्धरत है जंगल में। मोबाइल की स्क्रीन के जंगल में, भटक रहे हैं सारे बच्चे। सारे बच्चे मोबाइल-स्क्रीन के भीतर युद्धरत हैं।

     मोबाइल-स्क्रीन के जंगल में, नकली पेड़ हैं, चिड़ियाँ है, नकली, नकली पौधे हैं, नकली, नकली तितलियाँ है, फूलों पर पराग हैं नकली, जंगल में नकली घास है जो युद्धरत नकली योद्धा के पैरों तले, बार-बार कुचली जा रही है।

   मोबाइल स्क्रीन में उभर रही सारी नकली चीजों को देखतेी, बच्चों की आँखें भर असली हैं। असली आँखों से, वे मोबाइल की स्क्रीन में, रची गई नकली दुनिया को देख रहे हैं।

            बगीचे में बैठे बच्चों के जीवन में अनुपस्थित है वह बगीचा, जिसमें बैठे हैं बच्चे, बगीचे के असली, पेड़ पौधे, चिड़ियाँ तितलियाँ, फूल….दुखी हैं कि उनके लिए नहीं है बच्चों की आँखें।

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