“मम्मी, आज स्कूल से आऊँगी, तब तक मेरा वो सफेद फ्रॉक तैयार रखना।”
“सफेद फ्रॉक? वो नीली लेस वाला?” मैंने जान बूझकर “नीली लेस” पर जोर दिया। जानती थी, वह थोड़ी हैरान होगी। कितनी मुश्किल से मैने शटल की वह लेस बुनी थी, और फ्रॉक भी सिला था, एकदम सफेद झक। लेकिन उसने “ये तो किसी डिटर्जेण्ट पाउडर की एड जैसा लगता है।” कहकर उसे पहनना टाला ही था।
“हाँ ना मम्मी। आप बस उसे निकाल देना बाहर,” कहकर बिटिया स्कूल चली गई।
आज पता नही क्यों इसे याद आ गया वह फ्रॉक? मैं उधेड़बुन में अपना काम निपटाती रही। बीच- बीच में आकर उसके बिस्तर पर रखे उस फ्रॉक की लेस पर जतन से हाथ फेरती रहती। स्कूल से लौटकर उसने बिना कोई हल्ला- गुल्ला किये सब समेटा, फिर नीली लेस वाला सफेद फ्रॉक पहनकर, बड़े ज़िम्मेदारी के से भाव ओढ़कर कहने लगी, “मम्मी, मैं और मिनी थोड़ी देर से आते हैं। आज पिंकी से मिलने जाना बहुत ज़रुरी है।” और वह निकल गई। मैंने ज़रा बाहर जाकर टोह लेनी चाही, तो मिनी भी, खूब सोच समझकर एक सफेद पोषाक पहने हुए, दुःखी चेहरे से बिटिया का इंतज़ार करती खड़ी दिखी। दोनों ने आपस में संक्षिप्त बातचीत की और किसी मिशन पर जाने समान चाल से पिंकी के घर चली गई। पिंकी हमारी कामवाली बाई की बिटिया है। हमउम्र होने के नाते आना – जाना और खेल कूद साझे थे। लेकिन ऎसे कभी उसके घर जाने का कार्यक्रम बनने लायक अपनापा तो नहीं था।
खैर उसकी वापसी तक मन बहलाती रही।
ज़्यादा प्रतीक्षा नही करनी पड़ी मुझे। घंटे भर में ही हमेशा की तरह उछलती कूदती, शोर मचाती बिटिया घर में दाखिल हो चुकी थी। आनन फानन में कमरे में जाकर अपनी पसंदीदा बदरंग सी पोषाक पहनकर बाहर आई और सामने रखे नाश्ते पर टूट पड़ी। अब मैडम को खेलने जो जाना था।
“लेकिन किया क्या पिंकी के घर जाकर? वो भी सफेद फ्रॉक में!” मेरे सब्र का बाँध टूट चुका था।
“अरे मम्मी, कल ना पिंकी का पिल्ला शेरू एक गाड़ी के नीचे आकर मर गया था। मैं और मिनी उसके घर बैठने गए थे। आखिर वो दुःखी थी ना! फिर ऎसे दुःख में तो सफेद ही पहनते हैं ना?”
बिटिया की भोली बातें सुनकर, हाल ही में पड़ोस में हुई एक असमय मृत्यु, उनके दुख बाँटने को लेकर हमारा बैठने जाना और सफेद वस्त्रों का रहस्य मेरी समझ में आने लगा।
पिंकी के पिल्ले के न रहने पर उसका दुःख और बिटिया की संवेदनाएँ मुझे अंदर तक भिगो गई।
बिटिया तो खेलने जा चुकी थी। उसके कमरे में जाकर देखा, तो वह सफेद फ्रॉक बेतरतीब सा पड़ा था। दरी पर बैठने के कारण थोड़ा धूल- धुसरित भी था। पता नही किस झोंक में आकर मैंने उस भींचकर गले लगा लिया और दो आँसू गिर पड़े। मेरे हाथों में वह फ्रॉक नही, बिटिया की उजली दुनिया जो थी।

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