मानसरोवर यात्रा के दौरान दिल्ली से अल्मोड़ा, घारचूला, मांगटी, गाला, मालपा व लमारी होते हुए बुधि पहुँचते हैं। बुधि से गुंजी का सफ़र शुरू होता है। कभी गर्मी लगती है तो कभी ठंड। रास्ते के पहले भाग में खड़ी चढ़ाई है। पहले कुछ यात्रा पैदल तय की उसके बाद की कुछ यात्रा घोड़े पर सवार होकर। इतनी खड़ी चढ़ाई है कि घोड़े पसीना-पसीना हो जाते हैं। वैसे हमें क्या हक़ है कि हम निरीह पशुओं पर इतना अत्याचार करें वो भी धार्मिक यात्राओं के दौरान। पशुओं से काम लेने की भी एक सीमा होनी चाहिए। कल मैंने घोड़े की आँखों में ज़बरदस्त गुस्सा देखा था। लगता था विद्रोह करने ही वाला है। मैं सहम सा गया था। मैंने साथ चल रहे घोड़े के स्वामी परदेसी से घोड़े की आँखों में व्याप्त गुस्से का ज़िक्र किया।
परदेसी ने बतलाया कि साथ वाले घोड़े-घोड़ियाँ आगे चले गए हैं और ये अकेला पीछे रह गया है इसी से गुस्से में है; लेकिन मैं स्पष्ट रूप से अनुभव कर रहा था कि उसका गुस्सा मुझ पर भी था। इन ख़तरनाक रास्तों पर घोड़े, खच्चर आदि जानवरों का चलना ही मुश्किल है पीठ पर सवारी बिठाकर अथवा बोझ लादकर चलना तो बहुत ही कष्टप्रद है इसमें संदेह नहीं। ख़ैर चलते-चलते छियालेख पहुँच जाते हैं। छियालेख पहुँचकर वहाँ हमने सबसे पहले पूरी-छोले खाई और चाय पी। छियालेख के बाद रास्ता कुछ ठीक है; लेकिन चढ़ाई-उतराई का क्रम समाप्त हो गया। ऐसी कोई बात नहीं; लेकिन कुछ रास्ता अपेक्षाकृत कम ऊँचा-नीचा था। यहाँ के लोगों के लिए तो ऐसा रास्ता समतल मैदान जैसा ही समझो। इसके बाद फूलों की घाटी आती है। छियालेख और गर्ब्यांग के बीच स्थित है यह फूलों की घाटी।
इसे फूलों की घाटी ही कहा जाता है; लेकिन यह वो फूलों की घाटी नहीं है जो पर्यटन के लिए विश्व प्रसिद्ध है और जो उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में बद्रीनाथ के पास पुष्पावती नदी के समीप राज्य के चमोली ज़िले में पड़ती है। यह फूलों की घाटी उत्तराखंड से होकर गुज़रने वाली कैलाश-मानसरोवर यात्रा के मार्ग में पड़ती है जो राज्य के कुमाऊँ मंडल के पिथौरागढ़ ज़िले में स्थित है। उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में स्थित फूलों की घाटी एक विश्व प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है जो नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क का एक भाग है और ये यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित है। कुमाऊँ मंडल में छियालेख स्थित फूलों की घाटी एक स्वतंत्र पर्यटक स्थल नहीं है जहाँ पर्यटक इसे देखने के लिए आते हों और इसका कारण है मार्ग का अति दुर्गम होना। गढ़वाल मंडल में स्थित विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी तक पहुँचने के लिए गोविंद घाट से घंघरिया तक 16 किलोमीटर की यात्रा पैदल अथवा घोड़ों पर की जा सकती है। गोविंद घाट से घंघरिया तक हेलिकॉप्टर सेवा भी उपलब्ध है, जबकि कुमाऊँ मंडल में छियालेख स्थित इस दुर्गम फूलों की घाटी तक पहुँचने के लिए लंबी ट्रैकिंग अपेक्षित है। पहले यहाँ तक पहुँचने के लिए तीन दिन की ट्रैकिंग अपेक्षित थी; लेकिन अब यहाँ पास तक सड़कें बनाई जा रही हैं। लोग बतलाते हैं कि सड़कें बनाने से यहाँ के फूलों और औषधीय पौधों और दूसरी वनस्पतियों को नुकसान भी पहुँच रहा है। इस फूलों की घाटी को भी विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित फूलों की घाटी की तरह ही संरक्षित किया जाना चाहिए। मुझे इन दोनों ही फूलों की घाटियों को देखने का सुअवसर मिला है। दोनों का अपना-अपना विशिष्ट सौंदर्य है।
छियालेख उच्च हिमालय का प्रवेश द्वार है क्योंकि यहीं से उच्च हिमालय का प्रारंभ होता है। यहाँ से चलने के कुछ देर बाद फूलों की घाटी आती है। अगस्त-सितंबर के महीनों में लगभग चार किलोमीटर क्षेत्र में फैली छियालेख घाटी सैकड़ों प्रजातियों के मनमोहक फूलों से महक उठती है; क्योंकि यहाँ सामान्य पर्यटकों का आना असंभव है अतः केवल कैलाश-मानसरोवर यात्री अथवा स्थानीय व्यक्ति ही अपनी यात्रा के दौरान इस घाटी के अद्वितीय सौंदर्य का आनंद उठा सकते हैं। पहाड़ों की निचली ढलानों पर तथा घाटी से गुज़रने वाले रास्ते के आसपास विभिन्न प्रकार के असंख्य नन्हे-नन्हे फूल रंग-बिरंगी चादर-सी बिछी दिखलाई पड़ रही है। विविध आकार और वर्ण के फूल चारों और दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ऐसे-ऐसे रंग के फूल कि पहले कभी भी कहीं देखे ही नहीं। नीले, पीले, सफ़ेद, बैंगनी और न जाने कितने रंगों के ख़ूबसूरत फूल।
कुछ फूलों का रंग तो ऐसा पारदर्शी नीला, कि लगता हैं मानो अभी-अभी नील मिले पानी में डुबोकर निकाले गए हों। सभी रंगों के फूलों में पर्याप्त विविधता है; लेकिन नीले रंग के फूलों में इतनी अधिक विविधता है कि रंगों की सूची बनाना भी संभव नहीं। इनमें से अनेक प्रजातियाँ औषधीय गुणों से भी युक्त हैं। फूल तो फूल उनके पौधों की पत्तियाँ भी विविधता व विशिष्टता लिए हुए ही हैं। एक बात ज़रूर है और वो ये कि फूल अपेक्षाकृत छोटे आकार के हैं।
बुधि कैंप में भी डेलिया व होलीहॉक्स व अन्य कई क़िस्म के फूलों के पौधे लगे हुए थे; लेकिन ये पूर्ण विकसित बड़े आकार के थे।
फूलों की घाटी और अन्य पेड़-पौधे व वनस्पतियाँ यात्रा मार्ग को अविस्मरणीय बना देती हैं।
सम्पर्कः ए.डी. 106 सी., पीतमपुरा, दिल्ली – 110034, मोबा- नं. 9555622323, Email : srgupta54@yahoo.co.in




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