- डॉ. आशा पाण्डेय
मैं सुबह से शाम तक
खोजती रही एक शब्द,
कविता लिखने के लिए।
इस बीच,
मेरी खिड़की से
दिखाई देने वाली उस झोपड़ी से
दिखाई देती रही
वह सात-आठ साल की लड़की-
बाल्टी भर-भर कर पानी लाती हुई,
लकड़ियाँ बीनती हुई,
धुएँ से आँखें लाल करके
टेढ़ी- मेढ़ी रोटी बनाती हुई।
भूखे भाई को खिलाती हुई,
रोते भाई को गोद में लेकर
काम पर गई
माँ का इंतज़ार करती हुई
वह लड़की।
मुझे थी तलाश
एक सशक्त शब्द की,
जो डाल दे मेरी कविता में जान,
जिससे मैं झकझोर सकूँ
लोगों के सोए हुए अंतर्मन को।
मैं शब्दकोशों के पन्ने
पलट-पलट कर
खोजती रही एक शब्द,
किन्तु वह लड़की
लिख गई पूरी कविता-
बिना किसी शब्द के।
सम्पर्कः कैंप, अमरावती, महाराष्ट्र, ashapandey286@gmail.com

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