February 13, 2019

इस अंक में

उदंती.com फरवरी 2019

अभी न होगा मेरा अंत
अभी-अभी तो आया है।
मेरे वन में मृदुल वसन्त
अभी न होगा मेरा अन्त।
       -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला


अनकही

भाषा की टूटती मर्यादा...
- डॉ. रत्ना वर्मा
इन दिनों सुबह- सुबह अखबार पढ़ो या टीवी पर समाचार देखो, सब जगह एक ही चर्चा कि अमुख पार्टी के नेता ने दूसरी पार्टी के नेता के लिए अनुचित शब्दों का इस्तेमाल किया। ऐसे शब्दों का प्रयोग करने वालों को हमारे बड़े बुजुर्ग अनपढ़- गँवार, बेअक्ल और न जाने क्या क्या कह कर कोसते हैं, पर आज की राजनीति में नेताओं के एक- दूसरे पर अभद्र भाषा में आरोप- प्रत्यारोप का जैसे दौर ही चल पड़ा है। लोकतंत्र में बोलने की आजादी का यह तो मतलब नहीं होता कि आप अपनी मर्यादा को लाँघ दें और बेलगाम होकर स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल शुरू कर दें। दरअसल पिछले कुछ समय से राजनीति में जिस तरह से अमर्यादित भाषा का उपयोग होने लगा है, वह राजनति के स्तर में आ रही गिरावट को इंगित करता है। स्वस्थ राजनीति न जाने कहाँ गुम हो गई है। इसे राजनीतिक पतन का दौर कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
चुनाव के निकट आते ही आरोप- प्रत्यारोप का यह दौर और अधिक भड़कीला हो जाता है। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का जैसे उन्हें लाइसेंस मिल जाता है । विरोधी को नीचा दिखाने के लिए गड़े मूर्दे उखाड़ना आज के नेताओं के लिए चुनावी मुद्दा बन गया है। कभी राजनीति में एक ऐसा भी दौर था, जब किसी भी पार्टी के लिए जनता, प्रदेश और देश का हित सर्वोपरि होता था। जनहित को ध्यान में रखकर चुनाव लड़े जाते थे ; लेकिन आज विकास के मुद्दे हाशिए पर चले गए हैं और व्यक्ति विशेष के विरुद्ध अनर्गल भाषा का प्रयोग आम हो चला है। कुल मिलाकर राजनीति से ‘नीति’ गायब हो गई है। जन- भावनाओं को भड़काकर हंगामा खड़ा करना, चुनाव जीतना और सत्ता हथियाना बस यही मकसद रह गया है।
वे राजनेता, जिन्हें जनता अपना अमूल्य वोट देकर सत्ता पर आसीन करती है , कभी जनता के लिए आदर्श और सम्माननीय माने जाते थे ; लेकिन आज स्तरहीन भाषा का प्रयोग करके उन्होंने अपना स्तर गिरा लिया है। संसद में बैठकर पूरे देश के लिए नियम- कायदे बनाने वालों के लिए क्या स्वयं के लिए कोई सीमा रेखा नहीं होती? संसद भवन में होने वाली बहसों में भी अब नेता जिस भाषा का उपयोग एक दूसरे के लिए करते हैं ,वह जग- जाहिर है। सारी मर्यादा को लाँघते हुए संसद में आए दिन होने वाले हंगामे से हम सब परिचित हैं। पर अब समय आ गया कि संसद में और संसद के बाहर इस तरह की आपत्तिजनक भाषा, अमर्यादित व्यवहार पर लगाम लगाई जाए। आलोचना और समालोचना की भी एक मर्यादित भाषा, नियम कानून होने चाहिए।
दुःखद तो यह है कि आजकल मीडिया भी उनकी बातों को स्कूप की तरह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करती है। ऐसे में समाचार पत्रों और न्यूज चैनल वालों का दायित्व और अधिक बढ़ जाता है कि अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले बयानों को नजरअंदाज़ करते हुए उनकी आलोचना करें, ताकि आगे से वे अपनी जुबान पर लगाम लगा सकें। अगर किसी पर धोखाधड़ी, कालाबाजारी, भ्रष्टाचार और देशद्रोह का आरोप है, तो सबूत के साथ उसे प्रस्तुत करें ,न कि किसी नेता के एक बयान पर उनके आरोप- प्रत्यारोप को हेडिंग बनाकर सनसनी पैदा करें। झूठ के पाँव ज्यादा दिन नहीं टिकते। न्याय और कानून है, तो उन्हें सजा जरूर मिलेगी। किसी भी संस्था की विश्वसनीयता तभी कायम रहती है, जब आप सच को सामने लाते हैं।
अब तो सोशल मीडिया भी फेक न्यूज फैलाने और एक दूसरे पर छींटाकशी करते हुए चटखारे लेने का बहुत बड़ा माध्यम बन गया है। ऐसे फेक न्यूज पर भी लगाम लगाने की जरूरत है। फेक न्यूज से जनता बहुत जल्दी गुमराह हो जाती है। यह कहावत तो सदियों से प्रचलित है कि एक झूठ को अगर सौ बार बोला जाए ,तो वह सच बन जाता है। सोशल मीडिया का यदि बेहतर तरीके से इस्तेमाल हो, तो यह जन-जाग्रति का सबसे बड़ा माध्यम बन सकता है। वर्तमान स्थिति को युवा पीढ़ी और समाज के लिए आदर्श नहीं कहा जा सकता। जनता को भी सोचना होगा कि वह अपने विवेक और बुद्धि का इस्तेमाल करे, ताकि सही और गलत में अंतर कर सके। अफवाहों पर विश्वास न करे। चुनावी हथकंडों के दाँव-पेंच को समझे।
हमारी भाषा और बोली हमारे व्यक्तित्व का आईना होती है। हम अपनी बातचीत में जिस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, उससे उसके संस्कारी और व्यावहारिक होने का सबूत मिलता है। गाली गलौच का इस्तेमाल करने वाले और बात बात में तू- तू मैं- मैं करने वाले को कभी भी सम्मान के साथ नहीं देखा जाता। उसे अभद्र, अनपढ़ की संज्ञा दी जाती है। मर्यादा में रहकर की कही गई बात का सभी सम्मान करते हैं।
अब चिंतन करने का समय आ गया है कि राजनैतिक मूल्यों में तेजी से आ रही गिरावट के लिए जो जिम्मेदार हैं, उनको किनारे किया जाए ।

पर्व-संस्कृति

राजिम
माघी पुन्नी मेला
कुछ वर्ष पहले तक राजिम में प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक पंद्रह दिनों तक नदी किनारे श्रद्धालुओं का जो समागम होता था वह मेले के स्वरुप में ही होता था। छत्तीसगढ़ राज्य जब अपने अस्तित्व में आया तब वर्ष 2001 से राजिम मेले को राजीव लोचन महोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा, फिर 2005 से इसे कुम्भ का स्वरूप दे दिया गया, और अब 2019 से वर्तमान सरकार ने राजिम के ऐतिहासिक महत्त्व के अनुरूप राजिम माघी पुन्नी मेला करने का निर्णय लिया  है।

राजिम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 45 किलोमीटर दूर गरियाबंद जिले का एक तहसील है। महानदी के तट पर बसे राजिम क्षेत्र का अपना एक अलग ही माहात्म्य है। प्राचीनकाल में इस क्षेत्र को चित्रोत्पला नगरी, कमल क्षेत्र, पद्मावाती एवं पौराणिक आख्यानों में इसे देवपुरी के नाम से जाना जाता था। उत्तर प्रदेश के प्रयाग को गंगा यमुना एवं सरस्वती नदियों का पावन संगम होने के कारण जिस तरह त्रिवेणी संगम कहा जाने लगा, उसी तरह राजिम में महानदी, सोंढूर और पैरी नदियों के संगम के कारण इसे छ्त्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाने लगा। संगम में अस्थि- विसर्जन तथा संगम किनारे पिंडदान, श्राद्ध एवं तर्पण किया जाता है। मंदिरों की महानगरी राजिम की मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक यात्री राजिम की यात्रा नहीं कर लेता। माना जाता है कि भगवान शिव और विष्णु यहाँ साक्षात रूप में विराजमान हैं, जिन्हें राजीवलोचन और कुलेश्वर महादेव के रूप में जाना जाता है।
प्राचीन समय से राजिम अपने पुरातत्व और प्राचीन सभ्यता के लिए प्रसिद्द है। राजिम मुख्य रूप से भगवान श्री राजीव लोचन जी के मंदिर के कारण प्रसिद्ध है।
कमल दल से आच्छादित भू-भाग बाद में पद्म क्षेत्र के नाम से प्रसिद्द हुआ। प्राचीन काल में राजिम अथवा कमल क्षेत्र पद्मावती पुरी दक्षिण कौशल का एक वैभवशाली नगर था। छत्तीसगढ़ अंचल में इस पद्म क्षेत्र की प्रदक्षिणा का विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक महत्त्व है। पुन्नी मेला के पंद्रह दिन पहले ही भक्तगण पैदल ही पंचकोशी की यात्रा प्रारंभ कर देते हैं।
राजिम में इस परम्परागत वार्षिक मेले का आयोजन माघ पूर्णिमा को होता है। पूर्णिमा जिसे छत्तीसगढ़ी में 'पुन्नी’ कहते हैं। पुन्नी मेलों का सिलसिला छत्तीसगढ़ में लगातार चलता रहता है, जो भिन्न-भिन्न स्थानों में नदियों के किनारे सम्पन्न होते हैं। सामाजिक मेल मिलाप और सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में मेलों का अपना महत्त्व है। अब तो सड़कें बन गई हैं यातायात के साधन उपलब्ध हो गए हैं अन्यथा छत्तीसगढ़ के ग्रामीण युगों से इन मेलों में पैदल, घोड़ा गाड़ी, बैल गाड़ी जैसे साधनों से आते-जाते रहे हैं और अपने मित्रों, रिश्तेदारों से मिलते हैं। पुराने समय में इन मेलों में ही अपने बच्चों के लिए वर-वधू तलाशने की परंपरा भी रही है।
कुलेश्वरनाथ मंदिर
महानदी, पैरी और सोढुर नदी के तट पर लगने वाले इस मेले में मुख्य आकर्षण का केंद्र संगम के मध्य में स्थित कुलेश्वर महादेव का विशाल मंदिर स्थित है, कुलेश्वर महादेव को पहले उत्पलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता था। पाश्चात्य पुरातत्तववेत्ता वेलगर ने इस मंदिर को 8वीं-9वीं शताब्दी का मन्दिर माना है। ।
यह स्थापत्य का बेजोड़ नमूना होने के साथ-साथ प्राचीन भवन निर्माण तकनीक का जीवंत उदाहरण है। इसका निर्माण बड़ी सादगी से किया गया है। मन्दिर के पास 'सोमा’, 'नाला’ और कलचुरी वंश के स्तम्भ भी पाए गए हैं। मंदिर का आकार 37.75 गुना 37.30 मीटर है। इसकी ऊंचाई 4.8 मीटर है। मंदिर का अधिष्ठान भाग तराशे हुए पत्थरों से बना है। रेत एवं चूने के गारे से चिनाई की गई है।
इसके विशाल चबूतरे पर तीन तरफ से सीढिय़ां बनी है। इसी चबूतरे पर पीपल का एक विशाल पेड़ भी है। चबूतरा अष्टकोणीय होने के साथ ऊपर की ओर पतला होता गया है। मंदिर निर्माण के लिए लगभग 2 कि.मी. चौड़ी नदी में उस समय निर्माताओं ने ठोस चट्टानों का भूतल ढूँढ निकाला था। बरसात के दिनों में बाढ़ का पानी कई-कई दिनों तक मंदिर को डुबोए रखता है लेकिन मंदिर को कभी कोई नुकसान नहीं पहुँचा।
इसमें कोई दो मत नहीं कि कुलेश्वर मंदिर प्राचीन काल की इंजीनियरिंग का अद्भुत प्रमाण है। त्रिवेणी संगम पर पंचेश्वर महादेव और भूतेश्वर महादेव के मंदिर हैं, वे भी कलचुरी काल की स्थापत्य कला के अनुपम उदाहरण हैं।
राजीव लोचन मंदिर
राजिम का प्रमुख मन्दिर राजीवलोचन है। राजीव लोचन मंदिर में भगवान विष्णु प्रतिष्ठित हैं। इस मन्दिर में बारह स्तम्भ हैं। स्तम्भों पर अष्ट भुजा वाली दुर्गा, गंगा- यमुना और विष्णु के विभिन्न अवतारों, जैसे- राम, वराह और नरसिंह आदि के चित्र बने हुए हैं। यहाँ से प्राप्त दो अभिलेखों से ज्ञात होता है कि इस मन्दिर के निर्माता राजा जगतपाल थे। इनमें से एक अभिलेख राजा वसंतराज से सम्बंधित है, किंतु लक्ष्मणदेवालय के एक दूसरे अभिलेख से विदित होता है कि इस मन्दिर को मगध नरेश सूर्यवर्मा (8वीं शती ई.) की पुत्री तथा शिवगुप्त की माता 'वासटा’ ने बनवाया था। राजीवलोचन मन्दिर के पास 'बोधि वृक्ष’ के नीचे तपस्या करते बुद्ध की प्रतिमा भी है।
मन्दिर के स्तंभ पर चालुक्य नरेशों के समय में निर्मित नरवराह की चतुर्भुज मूर्ति उल्लेखनीय है। वराह के वामहस्त पर भू-देवी अवस्थित हैं। शायद यह प्रदेश में प्राप्त सबसे प्राचीनतम मूर्ति है।
राजीवलोचन मंदिर राजिम के सभी मंदिरों में सबसे पुराना है। यह स्थान शिव और वैष्णव धर्म का संगम तीर्थ है। राजीव लोचन मंदिर के बारे में भी यह माना जाता है कि इसे भगवान विश्वकर्मा ने खुद बनाया था।
पंचकोसी यात्रा
इस क्षेत्र के आसपास अनेक स्वयंभू लिंग हैं जैसे कि कोपरा में कोपेश्वर महादेव, फिंगेश्वर में फणेन्द्र महादेव, चम्पारण में चम्पेश्वर महादेव, पटेवा में पटेश्वर महादेव, ब्रह्मनी में ब्रह्मनेश्वर महादेव यह स्थल पंचकोशी नाम से जाना जाता है। और भक्त जन अपनी पंचकोशी यात्रा का शुभारम्भ कुलेश्वर महादेव के मन्दिर से करते हैं और यात्रा का समापन भी इसी मन्दिर में होता है। माघी पुन्नी से महाशिवरात्रि पर्व तक इस क्षेत्र का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। यहाँ प्रतिवर्ष मेला लगता है। श्रद्धालु जन संगम तीर्थ में स्नान कर पुण्य प्राप्त करते हैं। मेला की शुरुआत कल्पवाश से होती है पखवाड़े भर पहले से श्रद्धालु पंचकोशी यात्रा प्रारंभ कर देते है पंचकोशी यात्रा में श्रद्धालु पैदल भ्रमण कर दर्शन करते है तथा धुनी रमाते है, इस तरह 101 कि? मी? की यात्रा का समापन होता है
पंचकोसी यात्रा के बारे में भी एक किंवदंती प्रचलित है-
एक बार विष्णु ने विश्वकर्मा से कहा कि धरती पर वे एक ऐसी जगह उनके मंदिर का निर्माण करें, जहाँ पाँच कोस के अन्दर कोई शव न जला हो। अब विश्वकर्मा जी धरती पर आए, और ढूंढ़ते रहे, पर ऐसा कोई स्थान उन्हें दिखाई नहीं दिया। उन्होंने वापस जाकर जब विष्णु जी यह बात बताई तब विष्णु जी ने एक कमल का फूल धरती पर ऊपर से छोड़ दिया और विश्वकर्मा जी से कहा कि- यह फूल जहाँ गिरेगा, वहीं मंदिर का निर्माण होगा। कमल फूल का परागकण जहाँ पर गिरा वहाँ पर विष्णु भगवान का मन्दिर है और पंखुडिय़ाँ जहाँ जहाँ गिरी वहाँ पंचकोसी धाम बसा हुआ है।
पटेश्वर महादेव (पटेवा गाँव) सबसे पहले पटेश्वर महादेव के दर्शन करने पटेवा गाँव जो राजिम से 5 कि.मी. दूर है की ओर प्रस्थान करते हैं। पटेवा का प्राचीन नाम पट्टनापुरी है। यहाँ पटेश्वर महादेव की अन्नब्रह्म के रुप में पूजा की जाती है। इनकी अद्र्धांगिनी हैं भगवती।
चम्पकेश्वर महादेव (चम्पारण्य) अगला पड़ाव होता है चम्पारण्य। राजिम के उत्तर की ओर 14 कि.मी. पर चम्पारण ग्राम है जहाँ चम्पकेश्वर महादेव का मंदिर है। 18 एकड़ में फैले इस गाँव में चम्पा फूल के पेड़ों की बहुतायत थी इसीलिए इसका नाम चम्पारण्य पड़ा । चम्पकेश्वर महादेव को तत्पुरुष महादेव भी कहा जाता है। यहाँ उनकी अद्र्धांगिनी हैं कालिका (पार्वती)। यहाँ शिव की उपासना प्राण रूप में की जाती है।
वैष्णव सम्प्रदाय की शुरुआत करने वाले महाप्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली चम्पारण्य ही है। वल्लभाचार्य के कारण चम्पारण एक वैष्णव पीठ के रुप में भी प्रतिष्ठित है। जो शैव एवं वैष्णव सम्प्रदायों के संगम स्थल के रुप में एकता का प्रतीक बन गया है। वल्लाभाचार्य ने तीन बार पूरे देश का भ्रमण किया। वे अष्टछाप के महाकवियों के गुरु थे। सूरदास जैसे महाकवि को उन्होंने ही दिशा देकर कृष्ण की भक्ति काव्य का सिरमौर बनने हेतु प्रेरित किया। राजिम मेले के अवसर पर चम्पारण्य में भी महोत्सव का आयोजन होता है।
ब्रह्मकेश्वर महादेव (ब्राह्मनी गाँव) तीसरा पड़ाव होता है ब्राह्मनी गाँव में जहाँ ब्रह्मकेश्वर महादेव की पूजा अर्चना करते हैं। चम्पारण से 9 कि.मी. दूरी पर उत्तर पूर्व की ओर ब्रह्मनी नामक गाँव है जो ब्रह्मनी नदी या बधनई नदी के किनारे बसा हुआ है। बधनई नदी के किनारे एक कुंड है जिसके उत्तरी छोर पर ब्रह्मकेश्वर महादेव का मन्दिर है। इस कुंड के जलस्रोत को श्वेत या सेतगंगा के नाम से जानते हैं। कहते हैं ब्रह्मकेश्वर महादेव को जो एक बार जान जाता है वह कभी भयभीत नहीं होता।
फणिकेश्वर महादेव (फिंगेश्वर) ब्रह्मकेश्वर महादेव की पूजा करने के बाद यात्री फिंगेश्वर नगर की ओर बढ़ते हैं। राजिम से 16 कि.मी. (पूर्व दिशा) की दूरी पर है बसा है फिंगेश्वर नगर। यहाँ स्थित फणिकेश्वर महादेव का मंदिर, फणिकेश्वर महादेव में है शम्भू की ईशान नाम वाली मूर्ति। इनकी अद्र्धांगिनी हैं अंबिका। फणिकेश्वर महादेव शुभगति देने वाले देवता माने जाते हैं।
कर्पूरेश्वर महादेव (कोपरा गाँव) यहाँ से यात्री चल पड़ते हैं राजिम से 16 कि.मी. की दूरी पर कोपरा गाँव की ओर। यहाँ है कर्पूरेश्वर महादेव या कोपेश्वर नाथ का मंदिर। यह पंचकोसी यात्रा का आखरी पड़ाव। कोपरा गांव के पश्चिम में दलदली तालाब है, उसी तालाब के भीतर, गहरे पानी में यह मंदिर हैं। इस तालाब को शंख सरोवर भी कहा जाता है। कर्पूरेश्वर महादेव में शम्भू की वामदेव नाम की मूर्ति है। उनकी पत्नी भवानी हैं। यह आनंद के देवता के रुप में जाने जाते हैं।
किंवदंतियाँ
कुलेश्वरनाथ मंदिर के शिवलिंग की उत्पत्ति के संबंध में एक जन-श्रुति यह है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ वन गमन काल में यहाँ आये थे और उन्होंने यहाँ कुछ समय व्यतीत किया था। सीता जी स्नान करने के बाद इष्ट देव शिव जी की पूजा-अर्चना किया करती थीं। उन्हें जब यहाँ शिव की कोई मूर्ति दिखाई नहीं दी तो उन्होंने महानदी की रेत से शिवलिंग का निर्माण किया औऱ कालान्तर में यही शिवलिंग कुलेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुआ। यह भी कहा जाता है कि सीता जी ने रेत से बने शिवलिंग पर जैसे ही जल चढ़ाया तो उनकी अँगुलियों के बीच से जल की पंच धारायें निकलने लगीं और शिवलिंग ने पंचमुखी शिवलिंग का रूप धारण कर लिया
किम्बदन्तियों का अन्त नहीं है। यह भी कहा जाता है कि महानदी के बीच जो कुलेश्वर मन्दिर है, उसे राजा मोरध्वज के पुत्र ताम्रध्वज ने बनवाया था और जो भी इस शिव क्षेत्र में आता था, उसकी मनोकामना पूर्ण होती थी। यहाँ तक की यदि को गर्भवती स्त्री यहाँ आती तो वह पुत्रवती होकर ही वापिस लौटती थी। चम्पारण में महाप्रभुवल्लभाचार्य के जन्म की कथा को भी इस किम्वदन्ती के साथ जोड़कर देखा जाने लगा।
मामा-भांजे का मंदिर- नदी के किनारे पर एक ओर महादेव मंदिर है, जिसे मामा का मंदिर कहा जाता है। कुलेश्वर महादेव मंदिर को भांजे का मंदिर कहते हैं। किवदंती है कि बाढ़ में जब कुलेश्वर महादेव का मंदिर डूबता था तो वहां से आवाज आती थी, मामा बचाओ। इसी मान्यता के कारण यहाँ आज भी नाव पर मामा-भांजे को एक साथ सवार नहीं होने दिया जाता है। नदी किनारे बने मामा के मंदिर के शिवलिंग को जैसे ही नदी का जल छूता है उसके बाद बाढ़ उतरनी शुरू हो जाती है।
राजीव लोचन मंदिर के संबंध में एक जनश्रुति है कि राजीम नाम की तेलिन महिला प्रति दिन अपना तेल का पात्र भर कर बेचने जाया करती थी। एक दिन की बात है कि वह कुछ समय विश्राम के लिए बैठ गई और उसने अपना तेल से भरा पात्र वहीं पास में औंधी पड़ी एक शिला पर रख दिया।
कुछ देर विश्राम करने के बाद उसने अपना तेल भरा पात्र उठाया और पुन: तेल बेचने के लिए चल पड़ी। उसने पात्र का पूरा तेल बेचकर पात्र खाली कर दिया, किन्तु उसने देखा और वह आश्चर्यचकित रह गई कि तेल का पात्र पुन: पूरा भर गया है। उसने यह घटना अपनी सास एवं अन्य सदस्यों को बतलाई, किन्तु उसकी बात पर किसी को सहज विश्वास नहीं हुआ। दूसरे दिन राजीवा तेलिन की सास तेल बेचने निकली और उसने भी अपना तेल का पात्र उसी शिला पर रख दिया और स्वयं विश्राम करने लगी। थोड़ी देर विश्राम करने के बाद वह भी तेल बेचने निकल पड़ी और उसके साथ भी वही घटना घटी और बेचने के बाद भी पूरा पात्र तेल से भर गया। राजीवा तेलिन के परिवार वालों ने इस शिला को अपने घर ले जाने की योजना बनाई और ले जाने के लिए जैसे ही उस औंधी पड़ी शिला को सीधा किया तो कोई साधारण सी शिला नहीं थी, बल्कि यह शिला विष्णु जी की प्रतिमा थी, कहा जाता है कि दुर्ग जिले के नरेश जयपाल को स्वप्न में उस प्रतिमा के दर्शन हुए और उनके मन में एक भव्य मंदिर का निर्माण कर उसमें उस प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा करने की प्रबल इच्छा जाग्रत हुई और उसने राजीवा तेलिन से उस प्रतिमा की माँग की, किन्तु राजीवा तेलिन उस प्रतिमा को देने के लिए तैयार नहीं हुई और उसने शर्त रख दी कि वह मूर्ति तभी देगी जब उस मन्दिर और मूर्ति के साथ कहीं न कहीं उसका नाम भी जुड़ा होगा। कहा जाता है कि तभी से इसे 'राजीव-लोचन’ मंदिर कहा जाने लगा और कालान्तर में अपभ्रंश के रूप में राजीव के स्थान पर राजिम शब्द का उपयोग होने लगा और यह 'राजिम-लोचन’ मन्दिर के नाम से सुविख्यात हुआ। मन्दिर के विशाल प्रांगण में एक स्थान राजीवा तेलिन के लिए भी सुरक्षित कर दिया गया। राजीवा तेलिन विष्णु भगवान की अनन्य भक्त हो गयी थी और कहा जाता है कि जब उसने अपने जीवन की अन्तिम साँस ली तो वह टकटकी बाँधे हुए विष्णु जी की प्रतिमा को ही भाव-विभोर हो देख रही थी और वह भगवान विष्णु को निहारते हुए ही सदा-सदा के लिए चिर निद्रा में लीन हो गई थी।

विष्णु जी की मूर्ति के संबंध में भी जनश्रुति है कि काँकेर के कंडरा राजा ने नगर ध्वस्त करने के बाद सोचा कि वह जहाँ जाएगा अपने साथ मूर्ति भी ले जायेगा, किन्तु मूर्ति ले जाते समय उसे मार्ग में कुछ अशुभ संकेत मिले और वह मूर्ति को रास्ते में औंधी फेंककर स्वयं आगे बढ़ गया। कहा जाता है कि वह वही मूर्ति है जो राजीवा तेलिन को औंधी पड़ी मिली थी।

राजीव लोचन नाम के संदर्भ में यह भी कहा जाता है कि भगवान के नेत्र राजीव के समान हैं। अत: इसका नाम राजीव लोचन पड़ गया जिसका अपभ्रंश राजीव से राजिम हो गया।
ऐसी भी मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में भगवान विष्णु के नाभि से निकला कमल यहीं पर स्थित था और ब्रह्मा जी ने यहीं से सृष्टि की रचना की थी। इसीलिये इसका नाम कमलक्षेत्र पड़ा। एक यह भी जन-श्रुति है कि विष्णु जी की नाभि से एक कमल प्रस्फुटित हुआ और इसी कमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और जब यह कमल मुरझा कर झडऩे लगा तो इसके पत्तों से शिव की मूर्तियाँ प्रकट होने लगीं और वे चम्पेश्वर, वानेश्वर, फिंगेश्वर, कोपेश्वर और पाटेश्वर के रूप में विख्यात हुए। (संकलित)

प्रयाग कुंभ मेला

मकर संक्रांति से शिवरात्रि तक
प्रयागराज में प्रतिवर्ष चलने वाले कुंभ मेले में 6 प्रमुख स्नान तिथियाँ होती हैं, जो मकर संक्रांति से लेकर महा शिवरात्रि तक चलती हैं।
कुंभ की शुरुआत मकर संक्रांति के दिन पहले स्नान से होती है। इसे शाही स्नान और राजयोगी स्नान भी कहा जाता है। इस दिन संगम, प्रयागराज पर विभिन्न अखाड़ों के संत की पहले शोभा यात्रा निकलती है और फिर स्नान। माघ महीने के इस पहले दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, इसलिए इस दिन को मकर संक्राति भी कहते हैं। लोग इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ दान भी करते हैं।
मान्यताओं के अनुसार पौष महीने की 15वीं तिथि को पौष पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन चाँद पूरा निकलता है. इस पूर्णिमा के बाद ही माघ महीने की शुरुआत होती है।
माना जाता है कि जो व्यक्ति इस दिन विधिपूर्ण तरीके से सुबह स्नान करता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। वहीं, इस दूसरे स्नान से सभी शुभ कार्यों की शुरुआत कर दी जाती है। वहीं, इस दिन संगम पर सुबह स्नान के बाद कुंभ की अनौपचारिक शुरुआत हो जाती है। इस दिन से कल्पवास भी आरंभ हो जाता है।
कुंभ मेले में तीसरा स्नान मौनी अमावस्या के दिन किया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन कुंभ के पहले तीर्थाकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और संगम के पवित्र जल में स्नान किया था। मौनी अमावस्या के दिन कुंभ मेले में बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ उमड़ती है।
पंचाग के अनुसार बसंत पंचमी माघ महीने की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। बसंत पंचमी के दिन से ही बसंत ऋतु शुरू हो जाती है। कड़कड़ाती ठंड के सुस्त मौसम के बाद बसंत पंचमी से ही प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। वहीं, हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। पवित्र नदियों में इस चौथे स्नान का विशेष महत्त्व है। पवित्र नदियों के तट और तीर्थ स्थानों पर बसंत मेला भी लगता है।
बसंत पंचमी के बाद कुंभ मेले में पांचवाँ स्नान माघी पूर्णिमा को होता है। मान्यता है कि इस दिन सभी हिन्दू देवता स्वर्ग से संगम पधारे थे। वहीं, माघ महीने की पूर्णिमा (माघी पूर्णिमा) को कल्पवास की पूर्णता का पर्व भी कहा जाता है। क्योंकि इस दिन माघी पूर्णिमा समाप्त हो जाती है। इस दिन संगम के तट पर कठिन कल्पवास व्रतधारी स्नान कर उत्साह मनाते हैं। इस दिन गुरु बृहस्पति की पूजा की जाती है।
कुंभ मेले का आखिरी स्नान महा शिवरात्रि के दिन होता है। इस दिन सभी कल्पवासी अंतिम स्नान कर अपने घरों को लौट जाते हैं। भगवान शिव और माता पार्वती के इस पावन पर्व पर कुंभ में आए सभी भक्त संगम में डुबकी जरूर लगाते हैं। मान्यता है कि इस पर्व का देवलोक में भी इंतज़ार रहता है।

संस्मरण

वसंत का अग्रदूत
-अज्ञेय
'निराला' जी को स्मरण करते हुए एकाएक शांतिप्रिय द्विवेदी की याद जाए, इसकी पूरी व्यंजना तो वही समझ सकेंगे जिन्होंने इन दोनों महान विभूतियों को प्रत्यक्ष देखा था। यों औरों ने शांतिप्रियजी का नाम प्राय: सुमित्रानंदन पंत के संदर्भ में लिया है क्योंकि वास्तव में तो वह पंतजी के ही भक्त थे, लेकिन मैं निरालाजी के पहले दर्शन के लिए इलाहाबाद में पंडित वाचस्पति पाठक के घर जा रहा था तो देहरी पर ही एक सींकिया पहलवान के दर्शन हो गए जिसने मेरा रास्ता रोकते हुए एक टेढ़ी उँगली मेरी ओर उठाकर पूछा, ''आपने निरालाजी के बारे में 'विश्वभारती' पत्रिका में बड़ी अनर्गल बातें लिख दी हैं।'' यह सींकिया पहलवान, जो यों अपने को कृष्ण-कन्हैया से कम नहीं समझता था और इसलिए हिंदी के सारे रसिक समाज के विनोद का लक्ष्य बना रहता था, शांतिप्रिय की अभिधा का भूषण था।
जिस स्वर में सवाल मुझसे पूछा गया था उससे शांतिप्रियता टपक रही हो ऐसा नहीं था। आवाज तो रसिक-शिरोमणि की जैसी थी वैसी थी ही, उसमें भी कुछ आक्रामक चिड़चिड़ापन भरकर सवाल मेरी ओर फेंका गया था। मैंने कहा, ''लेख आपने पढ़ा है ?''
''नहीं, मैंने नहीं पढ़ा। लेकिन मेरे पास रिपोर्टें आई हैं! ''
''तब लेख आप पढ़ लीजिएगा तभी बात होगी,'' कहकर मैं आगे बढ़ गया। शांतिप्रियजी की 'युद्धं देहि' वाली मुद्रा एक कुंठित मुद्रा में बदल गई और वह बाहर चले गए।
यों 'रिपोर्टें' सही थीं। 'विश्वभारती' पत्रिका में मेरा एक लंबा लेख छपा था। आज यह मानने में भी मुझे कोई संकोच नहीं है कि उसमें निराला के साथ घोर अन्याय किया गया था। यह बात 1936 की है जब 'विशाल भारत' में पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी निराला के विरुद्ध अभियान चला रहे थे। यों चतुर्वेदी का आक्रोश निरालाजी के कुछ लेखों पर ही था, उनकी कविताओं पर उतना नहीं (कविता से तो वह बिलकुल अछूते थे), लेकिन उपहास और विडंबन का जो स्वर चतुर्वेदीजी की टिप्पणियों में मुखर था उसका प्रभाव निरालाजी के समग्र कृतित्व के मूल्यांकन पर पड़ता ही था और मेरी अपरिपक्व बुद्धि पर भी था ही।
अब यह भी एक रोचक व्यंजना-भरा संयोग ही है कि सींकिया पहलवान से पार पाकर मैं भीतर पहुँचा तो वहाँ निरालाजी के साथ एक दूसरे दिग्गज भी विराजमान थे जिनके खिलाफ भी चतुर्वेदीजी एक अभियान चला चुके थे। एक चौकी के निकट आमने-सामने निराला और 'उग्र' बैठे थे। दोनों के सामने चौकी पर अधभरे गिलास रखे थे और दोनों के हाथों में अधजले सिगरेट थे।
उग्रजी से मिलना पहले भी हो चुका था; मेरे नमस्कार को सिर हिलाकर स्वीकार करते हुए उन्होंने निराला से कहा, ''यह अज्ञेय है।''
निरालाजी ने एक बार सिर से पैर तक मुझे देखा। मेरे नमस्कार के जवाब में केवल कहा, ''बैठो।''
मैं बैठने ही जा रहा था कि एक बार फिर उन्होंने कहा, ''जरा सीधे खड़े हो जाओ।''
मुझे कुछ आश्चर्य तो हुआ, लेकिन मैं फिर सीधा खड़ा हो गया। निरालाजी भी उठे और मेरे सामने खड़े हुए। एक बार फिर उन्होंने सिर से पैर तक मुझे देखा, मानो तौला और फिर बोले, ''ठीक है।'' फिर बैठते हुए उन्होंने मुझे भी बैठने को कहा। मैं बैठ गया तो मानो स्वगत-से स्वर में उन्होंने कहा, ''डौल तो रामबिलास जैसा ही है।''
रामविलास (डॉ. रामविलास शर्मा) पर उनके गहरे स्नेह की बात मैं जानता था, इसलिए उनकी बात का अर्थ मैंने यही लगाया कि और किसी क्षेत्र में सही, एक क्षेत्र में तो निरालाजी का अनुमोदन मुझे मिल गया है। मैंने यह भी अनुमान किया कि मेरे लेख की 'रिपोर्टें' अभी उन तक नहीं पहुँची या पहुँचायी गई हैं।
निरालाजी सामान्य शिष्टाचार की बातें करते रहे-क्या करता हूँ, कैसे आना हुआ आदि। बीच में उग्रजी ने एकाएक गिलास की ओर इशारा करते हुए पूछा, ''लोगे ?'' मैंने सिर हिला दिया तो फिर कुछ चिढ़ाते हुए स्वर में बोले, ''पानी नहीं है, शराब है, शराब।''
मैंने कहा, ''समझ गया, लेकिन मैं नहीं लेता।''
निरालाजी के साथ फिर इधर-उधर की बातें होती रहीं। कविता की बात उठाना मैंने भी श्रेयस्कर समझा।
थोड़ी देर बाद उग्रजी ने फिर कहा, ''जानते हो, यह क्या है ? शराब है, शराब।''
अपनी अनुभवहीनता के बावजूद तब भी इतना तो मैं समझ ही सकता था कि उग्रजी के इस आक्रामक रवैये का कारण वह आलोचना और भर्त्सना ही है, जो उन्हें वर्षों से मिलती रही है। लेकिन उसके कारण वह मुझे चुनौती दें और मैं उसे मानकर अखाड़े में उतरूँ, इसका मुझे कोई कारण नहीं दीखा। यह भी नहीं कि मेरे जानते शराब पीने का समय शाम का होता, दिन के ग्यारह बजे का नहीं! मैंने शांत स्वर में कहा, ''तो क्या हुआ, उग्रजी, आप सोचते हैं कि शराब के नाम से मैं डर जाऊँगा ? देश में बहुत से लोग शराब पीते हैं।''
निरालाजी केवल मुस्कुरा दिए, कुछ बोले नहीं। थोड़ी देर बाद मैं विदा लेने को उठा तो उन्होंने कहा, ''अबकी बार मिलोगे तो तुम्हारी रचना सुनेंगे।''
मैंने खैर मनायी कि उन्होंने तत्काल कुछ सुनाने को नहीं कहा, ''निरालाजी, मैं तो यही आशा करता हूँ कि अबकी बार आपसे कुछ सुनने को मिलेगा।''
आशा मेरी ही पूरी हुई : इसके बाद दो-तीन बार निरालाजी के दर्शन ऐसे ही अवसरों पर हुए जब उनकी कविता सुनने को मिली। ऐसी स्थिति नहीं बनी कि उन्हें मुझसे कुछ सुनने की सूझे और मैंने इसमें अपनी कुशल ही समझी।
इसके बाद की जिस भेंट का उल्लेख करना चाहता हूँ उससे पहले निरालाजी के काव्य के विषय में मेरा मन पूरी तरह बदल चुका था। वह परिवर्तन कुछ नाटकीय ढंग से ही हुआ। शायद कुछ पाठकों के लिए यह भी आश्चर्य की बात होगी कि वह उनकी 'जुही की कली' अथवा 'राम की शक्तिपूजा' पढ़कर नहीं हुआ, उनका 'तुलसीदास' पढ़कर हुआ। अब भी उस अनुभव को याद करता हूँ तो मानो एक गहराई में खो जाता हूँ। अब भी 'राम की शक्तिपूजा' अथवा निराला के अनेक गीत बार-बार पढ़ता हूँ, लेकिन 'तुलसीदास' जब-जब पढ़ने बैठता हूँ तो इतना ही नहीं कि एक नया संसार मेरे सामने खुलता है, उससे भी विलक्षण बात यह है कि वह संसार मानो एक ऐतिहासिक अनुक्रम में घटित होता हुआ दीखता है। मैं मानो संसार का एक स्थिर चित्र नहीं बल्कि एक जीवंत चलचित्र देख रहा हूँ। ऐसी रचनाएँ तो कई होती हैं जिनमें एक रसिक हृदय बोलता है। विरली ही रचना ऐसी होती है जिसमें एक सांस्कृतिक चेतना सर्जनात्मक रूप से अवतरित हुई हो। 'तुलसीदास' मेरी समझ में ऐसी ही एक रचना है। उसे पहली ही बार पढ़ा तो कई बार पढ़ा। मेरी बात में जो विरोधाभास है वह बात को स्पष्ट ही करता है। 'तुलसीदास' के इस आविष्कार के बाद संभव नहीं था कि मैं निराला की अन्य सभी रचनाएँ फिर से पढूँ, 'तुलसीदास' के बारे में अपनी धारणा को अन्य रचनाओं की कसौटी पर कसकर देखूँ।
अगली जिस भेंट का उल्लेख करना चाहता हूँ उसकी पृष्ठभूमि में कवि निराला के प्रति यह प्रगाढ़ सम्मान ही था। काल की दृष्टि से यह खासा व्यतिक्रम है क्योंकि जिस भेंट की बात मैं कर चुका हूँ, वह सन् 36 में हुई थी और यह दूसरी भेंट सन् 51 के ग्रीष्म में। बीच के अंतराल में अनेक बार अनेक स्थलों पर उनसे मिलना हुआ था और वह एक-एक, दो-दो दिन मेरे यहाँ रह भी चुके थे, लेकिन उस अंतराल की बात बाद में करूँगा।
मैं इलाहाबाद छोड़कर दिल्ली चला आया था, लेकिन दिल्ली में अभी ऐसा कोई काम नहीं था कि उससे बँधा रहूँ; अकसर पाँच-सात दिन के लिए इलाहाबाद चला जाता था। निरालाजी तब दारागंज में रहते थे। मानसिक विक्षेप कुछ बढ़ने लगा था और कभी-कभी वह बिलकुल ही बहकी हुई बातें करते थे, लेकिन मेरा निजी अनुभव यही था कि काफ़ी देर तक वह बिलकुल संयत और संतुलित विचार-विनिमय कर लेते थे; बीच-बीच में कभी बहकते भी तो दो-चार मिनट में ही फिर लौट आते थे। मैं शायद उनकी विक्षिप्त स्थिति की बातों को भी सहज भाव से ले लेता था, या बहुत गहरे में समझता था कि जीनियस और पागलपन के बीच का पर्दा काफ़ी झीना होता है- कि निराला का पागलपन 'जीनियस का पागलपन' है, इसीलिए वह भी सहज ही प्रकृतावस्था में लौट आते थे। इतना ही था कि दो-चार व्यक्तियों और दो-तीन संस्थाओं के नाम मैं उनके सामने नहीं लेता था और अँग्रेज़ी का कोई शब्द या पद अपनी बात में नहीं आने देता था;क्योंकि यह मैं लक्ष्य कर चुका था कि इन्हीं से उनके वास्तविकता बोध की गाड़ी पटरी से उतर जाती थी।
उस बार 'सुमन' (शिवमंगल सिंह) भी आए हुए थे और मेरे साथ ही ठहरे थे। मैं निरालाजी से मिलने जानेवाला था और 'सुमन' भी साथ चलने को उत्सुक थे। निश्चय हुआ कि सवेरे-सवेरे ही निरालाजी से मिलने जाया जाएगा- वही समय ठीक रहेगा। लेकिन सुमनजी को सवेरे तैयार होने में बड़ी कठिनाई होती है। पलंग-चाय, पूजा-पाठ और सिंगार-पट्टी में नौ बज ही जाते हैं और उस दिन भी बज गए। हम दारागंज पहुँचे तो प्राय: दस बजे का समय था।
निरालाजी अपने बैठके में नहीं थे। हम लोग वहाँ बैठ गए और उनके पास सूचना चली गई कि मेहमान आए हैं। निरालाजी उन दिनों अपना भोजन स्वयं बनाते थे और उस समय रसोई में ही थे। कोई दो मिनट बाद उन्होंने आकर बैठके में झाँका और बोले, ''अरे तुम !'' और तत्काल ओट हो गए।
सुमनजी तो रसोई में खबर भिजवाने के लिए मेरा पूरा नाम बताने चले गए थे, लेकिन अपने नाम की कठिनाई मैं जानता हूँ इसीलिए मैंने संक्षिप्त सूचना भिजवायी थी कि 'कोई मिलने आए हैं' क्षणभर की झाँकी में हमने देख लिया कि निरालाजी केवल कौपीन पहने हुए थे। थोड़ी देर बाद आए तो उन्होंने तहमद लगा ली थी और कंधे पर अँगोछा डाल लिया था।
बातें होने लगीं। मैं तो बहुत कम बोला। यों भी कम बोलता और इस समय यह देखकर कि निरालाजी बड़ी संतुलित बातें कर रहे हैं मैंने चुपचाप सुनना ही ठीक समझा। लेकिन सुमनजी और चुप रहना? फिर वह तो निराला को प्रसन्न देखकर उन्हें और भी प्रसन्न करना चाह रहे थे, इसलिए पूछ बैठे, ''निरालाजी, आजकल आप क्या लिख रहे हैं?''
यों तो किसी भी लेखक को यह प्रश्न एक मूर्खतापूर्ण प्रश्न जान पड़ता है। शायद सुमन से कोई पूछे ,तो उन्हें भी ऐसा ही लगे। फिर भी जाने क्यों लोग यह प्रश्न पूछ बैठते हैं।
निराला ने एकाएक कहा, ''निराला, कौन निराला? निराला तो मर गया। निराला इज़ डेड।''
अँग्रेज़ी का वाक्य सुनकर मैं डरा कि अब निराला बिलकुल बहक जाएँगे और अँग्रेज़ी में जाने क्या-क्या कहेंगे, लेकिन सौभाग्य से ऐसा हुआ नहीं। हमने अनुभव किया कि निराला जो बात कह रहे हैं वह मानो सच्चे अनुभव की ही बात है : जिस निराला के बारे में सुमन ने प्रश्न पूछा था वह सचमुच उनसे पीछे कहीं छूट गया है। निराला ने मुझसे पूछा, ''तुम कुछ लिख रहे हो ?''
मैंने टालते हुए कहा, ''कुछ--कुछ तो लिखता ही हूँ, लेकिन उससे संतोष नहीं है- वह उल्लेख करने लायक भी नहीं है।''
इसके बाद निरालाजी ने जो चार-छह वाक्य कहे उनसे मैं आश्चर्यचकित रह गया। उन्हें याद करता हूँ तो आज भी मुझे आश्चर्य होता है कि हिंदी काव्य-रचना में जो परिवर्तन हो रहा था, उसकी इतनी खरी पहचान निराला को थी-उस समय के तमाम हिंदी आचार्यों से कहीं अधिक सही और अचूक- और वह तब जब कि ये सारे आचार्य उन्हें कम-से-कम आधा विक्षिप्त तो मान ही रहे थे।
निराला ने कहा, ''तुम जो लिखते हो वह मैंने पढ़ा है।'' (इस पर सुमन ने कुछ उमँगकर पूछना चाहा था, ''अरे निरालाजी, आप अज्ञेय का लिखा हुआ भी पढ़ते हैं?'' मैंने पीठ में चिकोटी काटकर सुमन को चुप कराया, और अचरज यह कि वह चुप भी हो गए- शायद निराला की बात सुनने का कुतूहल जयी हुआ) निराला का कहना जारी रहा, ''तुम क्या करना चाहते हो वह हम समझते हैं।'' थोड़ी देर रुककर और हम दोनों को चुपचाप सुनते पाकर उन्होंने बात जारी रखी। ''स्वर की बात तो हम भी सोचते थे। लेकिन असल में हमारे सामने संगीत का स्वर रहता था और तुम्हारे सामने बोलचाल की भाषा का स्वर रहता है।'' वह फिर थोड़ा रुक गए; सुमन फिर कुछ कहने को कुलबुलाए और मैंने उन्हें फिर टोक दिया। ''ऐसा नहीं है कि हम बात को समझते नहीं हैं। हमने सब पढ़ा है और हम सब समझते हैं। लेकिन हमने शब्द के स्वर को वैसा महत्त्व नहीं दिया, हमारे लिए संगीत का स्वर ही प्रमाण था।'' मैं फिर भी चुप रहा, सुनता रहा। मेरे लिए यह सुखद आश्चर्य की बात थी कि निराला इस अंतर को इतना स्पष्ट पहचानते हैं। बड़ी तेजी से मेरे मन के सामने उनकी 'गीतिका' की भूमिका और फिर सुमित्रानंदन पंत के 'पल्लव' की भूमिका दौड़ गई थी। दोनों ही कवियों ने अपने प्रारंभिक काल की कविता की पृष्ठभूमि में स्वर का विचार किया था, यद्यपि बिलकुल अलग-अलग ढंग से। उन भूमिकाओं में भी यह स्पष्ट था कि निराला के सामने संगीत का स्वर है, कविता के स्वर और ताल का विचार वह संगीत की भूमि पर खड़े होकर ही करते हैं; जबकि स्वर और स्वर-मात्रा के विचार में पंत के सामने संगीत का नहीं, भाषा का ही स्वर था और सांगीतिकता के विचार में भी वह व्यंजन-संगीत से हटकर स्वर-संगीत को वरीयता दे रहे थे। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि 'पल्लव' के पंत, 'गीतिका' के निराला से आगे या अधिक 'आधुनिक' थे। लेकिन जिस भेंट का उल्लेख मैं कर रहा हूँ उसमें निराला का स्वर-संवेदन कहीं आगे था जबकि उस समय तक पंत अपनी प्रारंभिक स्थापनाओं से केवल आगे नहीं बढ़े थे बल्कि कुछ पीछे ही हटे थे (और फिर पीछे ही हटते गए) उस समय का नए से नया कवि भी मानने को बाध्य होता कि अगर कोई पाठक उसके स्वर से स्वर मिलाकर उसे पढ़ सकता है ,तो वह आदर्श सहृदय पाठक निराला ही है। एक पीढ़ी का महाकवि परवर्ती पीढ़ी के काव्य को इस तरह समझ सके, परवर्ती कवि के लिए इससे अधिक आप्यायित करनेवाली बात क्या हो सकती है।
सुमन ने कहा, ''निरालाजी, अब इसी बात पर अपना एक नया गीत सुना दीजिए।''
मैंने आशंका-भरी आशा के साथ निराला की ओर देखा। निराला ने अपनी पुरानी बात दोहरा दी, ''निराला इज़ डेड। आई एम नॉट निराला!''
सुमन कुछ हार मानते हुए बोले, ''मैंने सुना है, आपकी नई पुस्तक आई है 'अर्चना' वह आपके पास है-हमें दिखाएँगे ?''
निराला ने एक वैसे ही खोये हुए स्वर में कहा, ''हाँ, आई तो है, देखता हूँ।'' वह उठकर भीतर गए और थोड़ी देर में पुस्तक की दो प्रतियाँ ले आए। बैठते हुए उन्होंने एक प्रति सुमन की ओर बढ़ायी जो सुमन ने ले ली। दूसरी प्रति निराला ने दूसरे हाथ से उठायी, लेकिन मेरी ओर बढ़ायी नहीं, उसे फिर अपने सामने रखते हुए बोले, ''यह तुमको दूँगा।''
सुमन ने ललककर कहा, ''तो यह प्रति मेरे लिए है ? तो इसमें कुछ लिख देंगे ?''
निराला ने प्रति सुमन से ले ली और आवरण खोलकर मुखपृष्ठ की ओर थोड़ी देर देखते रहे। फिर पुस्तक सुमन को लौटाते हुए बोले, ''नहीं, मैं नहीं लिखूँगा। वह निराला तो मर गया।''
सुमन ने पुस्तक ले ली, थोड़े-से हतप्रभ तो हुए, लेकिन यह तो समझ रहे थे कि इस समय निराला को उनकी बात से डिगाना संभव नहीं होगा।
निराला फिर उठकर भीतर गए और कलम लेकर आए। दूसरी प्रति उन्होंने उठा, खोलकर उसके पुश्ते पर कुछ लिखने लगे। मैं साँस रोककर प्रतीक्षा करने लगा। मन तो हुआ कि जरा झुककर देखूँ कि क्या लिखने जा रहे हैं, लेकिन अपने को रोक लिया। कलम की चाल से मैंने अनुमान किया कि कुछ अँग्रेज़ी में लिख रहे हैं।
दो-तीन पंक्तियाँ लिखकर उनका हाथ थमा। आँख उठाकर एक बार उन्होंने मेरी ओर देखा और फिर कुछ लिखने लगे। इसी बीच सुमन ने कुछ इतराते हुए-से स्वर में कहा, ''निरालाजी, इतना पक्षपात ? मेरे लिए तो आपने कुछ लिखा नहीं और...''
निरालाजी ने एक-दो अक्षर लिखे थे; लेकिन सुमन की बात पर चौंककर रुक गए। उन्होंने फिर कहा, ''नहीं, नहीं, निराला तो मर गया। देयर इज नो निराला। निराला इज़ डेड।''
अब मैंने देखा कि पुस्तक में उन्होंने अँग्रेज़ी में नाम के पहले दो अक्षर लिखे थे-एन, आई, लेकिन अब उसके आगे दो बिंदियाँ लगाकर नाम अधूरा छोड़ दिया, नीचे एक लकीर खींची और उसके नीचे तारीख डाली 18-5-51 और पुस्तक मेरी ओर बढ़ा दी।
पुस्तक मैंने ले ली। तत्काल खोलकर पढ़ा नहीं कि उन्होंने क्या लिखा है। निराला ने इसका अवसर भी तत्काल नहीं दिया। खड़े होते हुए बोले : ''तुम लोगों के लिए कुछ लाता हूँ।''
मैंने बात की व्यर्थता जानते हुए कहा, ''निरालाजी, हम लोग अभी नाश्ता करके चले थे, रहने दीजिए।'' और इसी प्रकार सुमन ने भी जोड़ दिया, ''बस, एक गिलास पानी दे दीजिए।''
''पानी भी मिलेगा,'' कहते हुए निराला भीतर चले गए। हम दोनों ने अर्थभरी दृष्टि से एक-दूसरे को देखा। मैंने दबे स्वर में कहा, ''इसीलिए कहता था कि सवेरे जल्दी चलो।''
फिर मैंने जल्दी से पुस्तक खोलकर देखा कि निरालाजी ने क्या लिखा था। कृतकृत्य होकर मैंने पुस्तक फुर्ती से बंद की तो सुमन ने उतावली से कहा, ''देखें, देखें...''
मैंने निर्णयात्मक ढंग से पुस्तक घुटने के नीचे दबा ली, दिखाई नहीं। घर पहुँचकर भी देखने का काफ़ी समय रहेगा।
इस बीच निराला एक बड़ी बाटी में कुछ ले आए और हम दोनों के बीच बाटी रखते हुए बोले, ''लो, खाओ, मैं पानी लेकर आता हूँ,'' और फिर भीतर लौट गए।
बाटी में कटहल की भुजिया थी। बाटी में ही सफाई से उसके दो हिस्से कर दिए गए थे।
निराला के लौटने तक हम दोनों रुके रहे। यह क्लेश हम दोनों के मन में था कि निरालाजी अपने लिए जो भोजन बना रहे थे वह सारा-का-सारा उन्होंने हमारे सामने परोस दिया और अब दिन-भर भूखे रहेंगे। लेकिन मैं यह भी जानता था कि हमारा कुछ भी कहना व्यर्थ होगा-निराला का आतिथ्य ऐसा ही जालिम आतिथ्य है। सुमन ने कहा, ''निरालाजी, आप...''
''हम क्या?''
''निरालाजी, आप नहीं खाएँगे,तो हम भी नहीं खाएँगे।''
निरालाजी ने एक हाथ सुमन की गर्दन की ओर बढ़ाते हुए कहा, ''खाओगे कैसे नहीं? हम गुद्दी पकड़कर खिलाएँगे।''
सुमन ने फिर हठ करते हुए कहा, ''लेकिन, निरालाजी, यह तो आपका भोजन था। अब आप क्या उपवास करेंगे ?''
निराला ने स्थिर दृष्टि से सुमन की ओर देखते हुए कहा, ''तो भले आदमी, किसी से मिलने जाओ तो समय-असमय का विचार भी तो करना होता है।'' और फिर थोड़ा घुड़ककर बोले : ''अब आए हो तो भुगतो।''
हम दोनों ने कटहल की वह भुजिया किसी तरह गले से नीचे उतारी। बहुत स्वादिष्ट बनी थी, लेकिन उस समय स्वाद का विचार करने की हालत हमारी नहीं थी।
जब हम लोग बाहर निकले तो सुमन ने खिन्न स्वर में कहा, ''भाई, यह तो बड़ा अन्याय हो गया।''
मैंने कहा, ''इसीलिए मैं कल से कह रहा था कि सवेरे जल्दी चलना है, लेकिन आपको तो सिंगार-पट्टी से और कोल्ड-क्रीम से फ़ुरसत मिले तब तो! नाम 'सुमन' रख लेने से क्या होता है अगर सवेरे-सवेरे सहज खिल भी सकें!''
यों हम लोग लौट आए। घर आकर फिर अर्चना की मेरी प्रति खोलकर हम दोनों ने पढ़ा। निराला ने लिखा था :
To Ajneya,
the Poet, Writer and Novelist
in the foremost rank.
Ni...
18.5.51
सन् '36 और सन् '51 के बीच, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, निरालाजी से अनेक बार मिलन हुआ। उनके 'तुलसीदास' का पहला प्रकाशन 1938 में हुआ था और मैंने उनकी रचनाओं के बारे में अपनी धारणा के आमूल परिवर्तन की घोषणा रेडियो से जिस समीक्षा में की थी उसका प्रसारण शायद 1940 के आरंभ में हुआ था। मेरठ में 'हिंदी साहित्य परिषद्' के समारोह के लिए मैंने उन्हें आमंत्रित किया तो आमंत्रण उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और मेरठ के प्रवास में वह कुछ समय श्रीमती होमवती देवी के यहाँ और कुछ समय मेरे यहाँ ठहरे। होमवतीजी उस समय परिषद् की अध्यक्षा भी थीं और निरालाजी को अपने यहाँ ठहराने की उनकी हार्दिक इच्छा थी। जिस बँगले में वह रहती थीं ,उसके अलावा एक और बँगला उनके पास था जो उन दिनों आधा खाली था और निरालाजी के वहीं ठहरने की व्यवस्था की गई। वह बँगला होमवतीजी के आवास से सटा हुआ होकर भी अलग था, इसलिए सभी आश्वस्त थे कि अतिथि अथवा आतिथेय को कोई असुविधा नहीं होगी- यों थोड़ी चिंता भी थी कि होमवतीजी के परम वैष्णव संस्कार निरालाजी की आदतों को कैसे सँभाल पाएँगे। मेरा घर वहाँ से तीन-एक फर्लांग दूर था और छोटा भी था; सुमन, प्रभाकर माचवे और भारतभूषण अग्रवाल को मेरे यहाँ ठहराने का निश्चय हुआ था।
होमवतीजी ने श्रद्धापूर्वक निरालाजी को ठहरा तो लिया, लेकिन दोपहर का भोजन उन्हें कराने के बाद वह दौड़ी हुई मेरे यहाँ आईं।''भाई जी, शाम का भोजन क्या होगा ? लोग तो कह रहे हैं कि निरालाजी तो शाम को शराब के बिना भोजन नहीं करते और भोजन भी माँस के बिना नहीं करते। हमारे यहाँ तो यह सब नहीं चल सकता। और फिर अगर हम उधर अलग इंतजाम करें भी तो लाएगा कौन और सँभालेगा कौन ?''
यह कठिनाई होने वाली है इसका हमें अनुमान तो था, लेकिन होमवतीजी के उत्साह और उनकी स्नेहभरी आदेशना के सामने कोई बोला नहीं था।
उन्हें तो किसी तरह समझा-बुझाकर लौटा दिया गया कि हम लोग कुछ व्यवस्था कर लेंगे, उन्हें इसमें नहीं पड़ना होगा। संयोजकों में शराब से परिचित कोई हो ऐसा तो नहीं था। शाम को एक अद्धा निरालाजी की सेवा में पहुँचा दिया गया और निश्चय हुआ कि भोजन कराने भी उन्हें सदर के होटल में ले जाया जाएगा।
इधर हम लोग शाम का भोजन करने बैठे ही थे कि होटल से लौटते हुए निरालाजी मेरे यहाँ गए। (मैं दूसरी मंजिल पर रहता था।) पता लगा कि उन्होंने ही सीधे बँगले पर लौटकर मेरे यहाँ आने की इच्छा प्रकट की थी। सुरूर की जिस हालत में वह थे ,उससे मैंने यह अनुमान किया कि ऐसा निरालाजी ने इसीलिए किया होगा कि वह उस हालत में होमवतीजी के सामने नहीं पड़ना चाहते थे। (मैंने दूसरे अवसरों पर भी लक्ष्य किया कि ऐसे मामलों में उनका शिष्ट आचरण का संस्कार बड़ा प्रबल रहता था।) लेकिन यहाँ पर भी मेरी बहिन अतिथियों को भोजन करा रही थीं, इससे निरालाजी को थोड़ा असमंजस हुआ। वह चुपचाप एक तरफ एक खाट पर बैठ गए। हम लोगों ने भोजन जल्दी समाप्त करके उनका मन बहलाने की कोशिश की, लेकिन वह चुप ही रहे। एक-आध बार 'हूँ' से अधिक कुछ बोले नहीं। उनसे जो बात करता उसकी ओर एकटक देखते रहते मानो कहना चाहते हों, ''हम जानते हैं कि हमें बहलाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन हम बहलेंगे नहीं।''
एकाएक निरालाजी ने कहा, ''सुमन, इधर आओ।'' सुमनजी उनके समीप गए तो निराला ने उनकी कलाई पकड़ ली और कहा, ''चलो।''
''कहाँ, निरालाजी ?''
''घूमने।'' सुमन ने बेबसी से मेरी ओर देखा। वह भी जानते थे कि छुटकारा नहीं है और मैं भी समझ गया कि बहस व्यर्थ होगी। नीचे उतरकर मैं एक बढिय़ा-सा ताँगा बुला लाया। निरालाजी सुमन के साथ उतरे और उस पर आगे सवार होने लगे तो ताँगेवाले ने टोकते हुए कहा, ''सरकार, घोड़ा दब जाएगा-आप पीछे बैठें और आपके साथी आगे बैठ जाएँगे।''
निरालाजी क्षण ही भर ठिठके। फिर अगली तरफ़ ही सवार होते हुए बोले, ''ये पीछे बैठेंगे, ताँगा दबाऊ होता है तो तुम भी पीछे बैठकर चलाओ। नहीं तो रास हमें दो-हम चलाएँगे।''
ताँगेवाले ने एक बार सबकी ओर देखकर हुक्म मानना ही ठीक समझा। वह भी पीछे बैठ गया, रास उसने नहीं छोड़ी। पूछा, ''कहाँ चलना होगा, सरकार ?''
निरालाजी ने उसी आज्ञापना भरे स्वर में कहा, ''देखो, दो घंटे तक यह सवाल हमसे मत पूछना। जहाँ तुम चाहो लेते चलो। अच्छी सड़कों पर सैर करेंगे। दो घंटे बाद इसी जगह पहुँचा देना, पैसे पूरे मिलेंगे।''
ताँगेवाले ने कहा, 'सरकार' और ताँगा चल पड़ा। मैं दो घंटे के लिए निश्चिंत होकर ऊपर चला आया।
रात के लगभग बारह बजे ताँगा लौटा और सुमन अकेले ऊपर आए। निरालाजी देर से लौटने पर वहीं सो सकते हैं, यह सोचकर उनके लिए एक बिस्तर और लगा दिया गया था, लेकिन सुमन ने बताया कि निरालाजीसोएँगे तो वहीं, जहाँ ठहरे हैं क्योंकि होमवतीजी से कहकर नहीं आए थे। लिहाजा मैंने उसी ताँगे में उन्हें बँगले पर पहुँचा दिया और टहलता हुआ पैदल लौट आया।
अगले दिन सवेरे ही होमवतीजी के यहाँ देखने गया कि सब कुछ ठीक-ठाक तो है, तो होमवतीजी ने अलग ले जाकर मुझे कहा, ''भैया, तुम्हारे कविजी ने कल शाम को बाहर जो किया हो, यहाँ तो बड़े शांत भाव से, शिष्ट ढंग से रहते हैं।''
मैंने कहा, ''चलिए, आप निश्चिंत हुईं तो हम भी निश्चिंत हुए। यों डरने की कोई बात थी नहीं।''
दूसरे दिन मैं शाम से ही निरालाजी को अपने यहाँ ले आया। भोजन उन्होंने वहीं किया और प्रसन्न होकर कई कविताएँ सुनाईं काश कि उन दिनों टेप रिकार्डर होते-'राम की शक्तिपूजा' अथवा 'जागो फिर एक बार' अथवा 'बादल राग' के वे वाचन परवर्ती पीढिय़ों के लिए संचित कर दिए गए होते। प्राचीन काल में काव्य-वाचक जैसे भी रहे हों, मेरे युग में तो निराला जैसा काव्य-वाचक दूसरा नहीं हुआ।
रघुवीर सहाय ने लिखा है, ''मेरे मन में पानी के कई संस्मरण हैं।'' निराला के काव्य को अजस्र निर्झर मानकर मैं भी कह सकता हूँ कि 'मेरे मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं- अजस्र बहते पानी के, फिर वह बहना चाहे मूसलाधार वृष्टि का हो, चाहे धुआँधार जल-प्रपात का, चाहे पहाड़ी नदी का, क्योंकि निराला जब कविता पढ़ते थे तब वह ऐसी ही वेगवती धारा-सी बहती थी। किसी रोक की कल्पना भी तब नहीं की जा सकती थी- सरोवर-सा ठहराव उनके वाचन में अकल्पनीय था।'
और क्योंकि पानी के अनेक संस्मरण हैं, इसलिए उन्हें दोहराऊँगा नहीं।
उन्हीं दिनों के आसपास उनसे और भी कई बार मिलना हुआ; दिल्ली में वह मेरे यहाँ आए थे और दिल्ली में एकाधिक बार उन्होंने मेरे अनुरोध किये बिना ही सहज उदारतावश अपनी नई कविताएँ सुनाईं। फिर इलाहाबाद में भी जब-तब मिलना होता; पर कविता सुनने का ढंग का अवसर केवल एक बार हुआ क्योंकि इलाहाबाद में धीरे-धीरे एक अवसाद उन पर छाता गया था,जो उन्हें अपने परिचितों के बीच रहते भी उनसे अलग करता जा रहा था। पहले भी उन्होंने गाया था :
मैं अकेला
देखता हूँ रही
मेरी दिवस की सांध्य वेला।
... ...
जानता हूँ नदी झरने
जो मुझे थे पार करने
कर चुका हूँ
हँस रहा यह देख
कोई नहीं भेला।
अथवा
स्नेह निर्झर बह गया है
रेत-सा तन रह गया है
... ...
बह रही है हृदय पर केवल अमा
मैं अलक्षित रहूँ, यह
कवि कह गया है।
लेकिन इन कविताओं के अकेलेपन अथवा अवसाद का स्वर एकसंचारी भाव का प्रतिबिंब है जिससे दूसरे भी कवि परिचित होंगे। इसके अनेक वर्ष बाद के,
बाँधो नाव इस ठाँव, बंधु
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
का अवसाद मानो एक स्थायी मनोभाव है। पहले का स्वर केवल एक तात्कालिक अवस्था को प्रकट करता है जैसे और भी पहले की 'सखि वसंत आया' अथवा 'सुमन भर लिए, सखि वसंत गया' आदि कविताएँ प्रतिक्रिया अथवा भावदशा को दर्शाती है। लेकिन 'अर्चना' और उसके बाद की कविताओं में हताश अवसाद का जो भाव छाया हुआ दीखता है वह तत्कालीन प्रतिक्रिया का नहीं, जीवन के दीर्घ प्रत्यवलोकन का परिणाम है जिससे निराला जब-तब उबरते दीखते हैं तो अपने भक्ति-गीतों में ही :
तुम ही हुए रखवाल
तो उसका कौन होगा।
अथवा
वे दुख के दिन
काटे हैं जिसने
गिन-गिनकर
पल-छिन, तिन-तिन
आँसू की लड़ के मोती के
हार पिरोये
गले डालकर प्रियतम के
लखने को शशि मुख
दु:खनिशा में
उज्ज्वल, अमलिन।
कह नहीं सकता, इस स्थायी भाव के विकास में कहाँ तक महादेवीजी द्वारा स्थापित साहित्यकार संसद के उनके प्रवास ने योग दिया जिसमें निराला के सम्मान में दावतें भी हुईं ,तो मानो ऐसी ही जो उन्हें हिंदी कवि-समाज के निकट लाकर उससे थोड़ा और अलग ही कर गईं। संसद के गंगा तटवर्ती बँगले को छोड़कर ही निरालाजी फिर दारागंज की अपनी पुरानी कोठरी में चले गए; वहीं अवसाद और भक्ति का यह मिश्र स्वर मुखरतर होता गया। और वहीं गहरे धुँधलके और तीखे प्रकाश के बीच भँवराते हुए निराला उस स्थिति की ओर बढ़ते गए जहाँ एक ओर वह कह सकते थे, ''कौन निराला ? निराला इज़ डेड!'' और दूसरी ओर दृढ़ विश्वासपूर्वक 'हिंदी के सुमनों के प्रति' सम्बोधित होकर एक आहत;  किंतु अखंड आत्मविश्वास के साथ यह भी कह सकते थे, ''मैं ही वसंत का अग्रदूत'' सचमुच वसंत पंचमी के दिन जन्म लेनेवाले निराला हिंदी काव्य के वसंत के अग्रदूत थे। लेकिन अब जब वह नहीं हैं तो उनकी कविताएँ बार-बार पढ़ते हुए मेरा मन उनकी इस आत्मविश्वास भरी उक्ति पर अटककर उनके 'तुलसीदास' की कुछ पंक्तियों पर ही अटकता है जहाँ मानो उनका कवि भवितव्यदर्शी हो उठता है- उस भवितव्य को देख लेता है जो खंडकाव्य के नायक तुलसीदास का नहीं, उसके रचयिता निराला का ही है :
यह जागा कवि अशेष छविधर
इसका स्वर भर भारती मुक्त होएँगी
... ...
तम के अमाज्य रे तार-तार
जो, उन पर पड़ी प्रकाश धार
जग वीणा के स्वर के बहार रे