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Apr 6, 2021

उदंती.com, अप्रैल- 2021

वर्ष- 13, अंक- 7

दूसरों के जीवन में शामिल होना और दूसरों को अपने जीवन में शामिल करना ही संस्कृति है। 
- दादा धर्माधिकारी

 इस अंक में

अनकहीः  संवेदनाएँ अभी मरी नहीं हैं.... डॉ. रत्ना वर्मा
विश्व धरोहर दिवसः प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ने का एक अवसर
धरोहरः छत्तीसगढ़ के बस्तर में बिखरे हैं ऐतिहासिक पुरावशेष
धरोहरः भगवान विष्णु का नारायणपाल मंदिर
जीवन शैलीः  ...चिंता तो 0.1 प्रतिशत की है - डॉ. सुशील जोशी
लघुकथाः चार हाथ - जानकी वाही
छह कविताएँः -आनन्द नेमा
संस्मरणः अंतिम उपहार - परमजीत कौर रीत’ 
गीतः वो देखें तो! - डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
व्यंग्यः हमरा लोकतंत्र खेला हौबे  - बी. एल. आच्छा
तीन ग़ज़लेंः - डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल  
कहानीः तलहटी -प्रेम गुप्तामानी
काव्यः तस्वीर जूते नहीं उतारती  - डॉ. कविता भट्ट
पुस्तकः  मिट्टी की सोंधी महक से सुवासित-प्रवासी मन - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
हाइकुः  पतझ - डॉ. महिमा श्रीवास्तव
लघुकथाः श्रद्धांजलि - सतीश दुबे
विरासतः पुरातात्विक अध्ययन में नए नज़रिए की ज़रूरत 
खोजः माया सभ्यता का महल खोजा गया -स्रोत फीचर्स
प्रेरकः मीठा-नमकीन -निशांत
जीवन दर्शनः खुशियाँ ढूँढें अपने अंदर - विजय जोशी

Apr 5, 2021

अनकहीः संवेदनाएँ अभी मरी नहीं हैं....

 – डॉ. रत्ना वर्मा

साझा संस्कृति, साझा विरासत और साझा जिम्मेदारी जी हाँ यही विषय था 18 अप्रैल विश्व विरासत दिवस 2020 का। पर कोविड जैसी वैश्विक महामारी के समय में संगठन ने इस साझा संस्कृति को साझा करने का प्रयास तो किया; पर साझा करने का माध्यम बदल दिया, तब इस समझ में न आने वाली बीमारी और लॉकडाउन के चलते, इस दिवस को इंटरनेट के माध्यम से मनाने का निर्णय लेना पड़ा था। विश्व भर के जाने माने पुरातत्त्वविदों ने, इतिहासकारों ने, वैज्ञानिकों नें, तथा विचारकों, विशेषज्ञों आदि ने इंटरनेट के माध्यम से अपनी धरोहर, अपनी संस्कृति और अपनी विरासत को बचाए रखने का साझा प्रयास तो किया;  पर अपने -अपने घरों में रहते हुए।

सबसे बड़ी बात विरासत में प्राप्त अपनी संस्कृति की साझा जिम्मेदारी को पिछले साल सबने भरपूर निभाया; परंतु सोशल मीडिया के माध्यम से विचारों के आदान- प्रदान का यह शुरूआती दौर था;  अतः लोगों को समझने में, जुड़ने में समय लगा। बड़े शहर के बड़े आलीशान पाँच सितारा होटलों में सेमिनार और गोष्ठियाँ आयोजित करके लाखों करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा देने वाले हमारे विश्व भर के आकाओं के लिए भी इस तरह के माध्यम को समझना आसान नहीं था। पर टेक्नॉलॉजी के इस युग में वह सबकुछ संभव है।

हम और हमारे वैज्ञानिक फंतासी की दुनिया में विचरते हुए कभी ऐसा कुछ करने की सोचा करते थे, उसे आज साकार कर दिखाया है। आप सब भी उस दौर को याद कीजि, जब टीवी पर हम और आप स्टारवार नामक विज्ञान फंतासी को बड़े चाव से देखा करते थे। एक जगह से दूसरी जगह सशरीर कैसे पहुँचा जा सकता है, तब यह काल्पनिक भले ही था; पर आज विज्ञान ने इसे संभव कर दिखाया है। आप दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न बैठे हों, इंटरनेट की दुनिया ने सबको बहुत पास ला दिया है। आप अपने देश में बैठे बैठे कई दुनिया के लोगों के साथ जुड़कर सेमिनार आयोजित कर सकते हैं, जहाँ  लोग आपको देख सकते हैं, सुन सकते हैं और आपसे सवाल- जवाब भी कर सकते हैं। आज के दौर में वेबिनार नाम से प्रचलित इस नए शोसल मीडिया ने सबकी राह आसान कर दी है, वह भी बगैर यातायात का खर्च उठाए। यही नहीं पाँच सितारा होटल में  ठहराने, खाने आदि का खर्चा तो अपने आप ही कम हो गया।

विज्ञान ने भले ही यह सब पहले ही हासिल कर लिया था,  पर अमल में लाना सिखाया कोरोना नामक इस माहामारी ने। हमारे देश ने और दुनिया ने तरक्की तो हासिल कर ली है;  पर तरक्की का सही उपयोग कैसे करना है,  यह या तो वे जानते नहीं थे या जानना नहीं चाहते थे या जानबूझकर लोगों में एक भ्रमजाल फैलाकर रखना चाहते थे;  ताकि सबकी रोजी- रोटी चलती रहे। परंतु कहते हैं न- समय सबकुछ सिखा देता है, तो इस जानलेवा माहामारी ने मनुष्य को वह सब कुछ सिखा दिया, जो वो हमेशा से जानते तो थे;  पर उसपर अमल करना नहीं चाहते थे।

अब जबकि इस महामारी के साथ जीते हुए हमने पूरा साल बिता दिया। अतः अब अतीत मात्र को सँजोकर रखने का समय नहीं रह गया है, अतीत के साथ साथ वर्तमान को भी बचाकर रखने का समय आ गया है। तो अब मामला केवल पुरखों द्वारा निर्मित इमारतों, सदियों से चली आ रही कला- संस्कृति जैसी अमूल्य विरासत को ही बचाए रखने का नहीं है;  बल्कि अब तो समूची मानव- विरासत को ही बचाकर रखने का समय आ गया है। यदि हम अपने को ही सुरक्षित नहीं रख पाएँगे, तो बाकी सबको कैसे बचा पाएँगे। अब जबकि मनुष्य ही खतरे में है तो जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

पिछले वर्ष जब कोरोना वायरस ने हमला किया तब लोग बेहद घबराए हुए थे और अपने जीवन के प्रति वे सजग हो गए थे। देश की सरकार ने इससे बचाव के जो भी निणर्य लिये, सबने उसका पालन किया। सबने अपनी जीवन -शैली बदल ली। खान-पान से लेकर रहन-सहन सबमें चमत्कारिक रूप से बदलाव आया।  सम्पूर्ण लॉकडाउन के दौरान न केवल पूरा परिवार;  बल्कि पूरा मोहल्ला, पूरा शहर और पूरा देश एकजुट हो गया। लोग सच कहते हैं संकट की घड़ी में ही सच्ची मानवता के दर्शन होते हैं।

एक सत्य यह भी है कि मनुष्य में धैर्य की कमी होती है जैसे- जैसे समय बीतता गया और नियमों में ढील मिलती गई वैसे- वैसे लोगों का इस भयानक बीमारी के प्रति खौफ़ भी जाता रहा। साल बीतते बीतते इससे बचाव के वेक्सिन भी आ गए, फिर तो लोगों को लगा- जैसे वे पूरी तरह सुरक्षित हो गए। पहला टीका लगते ही उन्हें लगने लगा कि अब उन्हें कोरोना छू भी नहीं सकता, लेकिन यह उनकी बहुत बड़ी गलतफहमी थी। जब एक से एक धुरंधर विकासशील और आधुनिक कहलाने वाले देश बचाव का कोई कारगर रास्ता नहीं तलाश पाए, तो फिर धीरे धीरे विकास की ओर बढ़ते देशों की कौन कहे। यह बात अलग है कि जनसंख्या में इतना विशाल होते हुए भी भारत ने संयम का दामन नहीं तोड़ा और वे आज भी इससे डटकर लड़ रहे हैं। धैर्य रखने की एक सीमा होती है, तो भारतवासियों का भी धैर्य का बाँध टूटते नजर आ रहा है। पर उम्मीद है दूसरे दौर के इस हमले को भी हम सब समझेंगे और पिछले वर्ष की तरह आगे आने वाले इस मुसीबत का भी  शांति के साथ मुकाबला करेंगे। जब तक पूरा देश और विश्व इस बीमारी माहामारी से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक एक दूसरे का सम्बल बने रहकर अपनी साझा जिम्मेदारी को निभाएँगे।

कुछ दशकों से यह महूसस किया जाने लगा था कि मनुष्य की संवेदनशीलता अब मरती जा रही है, वह सिर्फ मैं बनकर जीवन जी रहा है, स्वार्थ, धनलोलुपता, र्ष्या - द्वेष मानवता पर हावी होते जा रहे हैं;  लेकिन इस संकट के दौर ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया और यह बता दिया कि जब तक धरती पर मनुष्य है , उसकी संवेदनाएँ मर नहीं सकती।

तो आइए 18 अप्रैल विश्व विरासत दिवस के दिन अपने स्मारकों और विरासत स्थलों को बचाने के साथ- साथ मानव विरासत को बचाने का प्रण लेते हुए कुछ ऐसा करें कि सदियों तक यह दशक मानवीय संवेदना के उच्चतम रूप के लिए याद किया जाए।

18 अप्रैलः विश्व धरोहर दिवस- प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ने का एक अवसर


किसी
भी देश के लिए उसकी धरोहर उसकी अमूल्य संस्कृति होती है। किसी भी देश की पहचान
, वहाँ की सभ्यता की जानकारी इन धरोहरों से ही पता चलती है। आज देश का गौरव बढ़ाने का काम यह धरोहरें ही कर रही हैं। जिन्हें देखने के लिए देश-विदेश से लाखों पर्यटक प्रत्येक वर्ष एक देश से दूसरे देश, एक राज्य से दूसरे राज्य जाते हैं। यदि यह धरोहर यह विरासत ना हो तो हम कभी किसी का इतिहास नहीं जान पाएँगे। अतीत हर व्यक्ति, हर देश के लिए बहुत जरूरी है। इतिहास में कब, क्या, कहाँ घटित हुआ यह जानना अति आश्यक है। इन्हीं घटनाओं, सभ्यताओं और इतिहास की संस्कृति को जीवित रखने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 18 अप्रैल को पूरे विश्व में विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। आईसीओएमओएस (स्मारकों और स्थलों के लिए अंतर्राष्ट्रीय परिषद) ने 18 अप्रैल 1 9 82 को ट्यूनीशिया में एक संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें यह सुझाव दिया गया कि सभ्यता को बचाकर रखने के लिए और इन धरोहरों के संरक्षण के लिए एक विशेष दिन चुनना आवश्यक है, ताकि जनता को जागरुक कर सकें। जिसके परिणाम स्वरुप 18 अप्रैल का दिन चुना गया। जिसे प्रत्येक वर्ष विश्व धरोहर दिवस के रुप में मनाया जाता है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी सभ्यता और इतिहास से भली भांति परिचित हो सके।

विश्व धरोहर दिवस का इतिहास 

विश्व विरासत दिवस सर्वपर्थम 18 अप्रैल, 1982 को ट्यूनीशिया में इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ मोनुमेंट्स एंड साइट्सद्वारा मनाया गया था। एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन ने 1968 में विश्व प्रसिद्ध इमारतों और प्राकृतिक स्थलों की रक्षा के लिए एक प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र के सामने 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान रखा गया, जहाँ य प्रस्ताव पारित हुआ। इस तरह विश्व के लगभग सभी देशों ने मिलकर ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों को बचाने की शपथ ली।

इस प्रकार यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर अस्तित्व में आया। 18 अप्रैल, 1978 में पहले विश्व के कुल 12 स्थलों को विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया गया। इस दिन को तब विश्व स्मारक दिवस के रूप में मनाया जाता था। लेकिन यूनेस्को ने वर्ष 1983 नवंबर माह में इसे मान्यता प्रदान की और इस दिवस को विश्व विरासत या धरोहर दिवस के रूप में बदल दिया। वर्ष 2011 तक सम्पूर्ण विश्व में कुल 911 विश्व विरासत स्थल थे, जिनमे 704 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक, 180 प्राकृतिक और 27 मिश्रित स्थल हैं। इस दिन पूरी दुनिया में विरासत की विविधता का जश्न मनाती है।

कैसे किया जाता है धरोहरों का संरक्षण

किसी भी धरोहर को संरक्षित करने के लिए दो संगठनों अंतरराष्ट्रीय स्मारक एवं स्थल परिषद और विश्व संरक्षण संघ द्वारा आकलन किया जाता है। फिर विश्व धरोहर समिति से सिफारिश की जाती है। समिति वर्ष में एक बार बैठती है और यह निर्णय लेती है कि किसी नामांकित संपदा को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित करना है या नहीं। विश्व विरासत स्थल समिति चयनित खास स्थानों, जैसे-वन क्षेत्र, पर्वत, झील, मरुस्थल, स्मारक, भवन या शहर इत्यादि की देख-रेख यूनेस्को से सलाह करके करती है।

भारत की विश्व विरासत

भारत एक ऐसा देश है जिस पर विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि जैसे आर्य, गुप्त, मुगल और अंग्रेज इत्यादि के शासकों द्वारा शासन किया गया है और उन सभी ने स्मारकों और स्थलों के रूप में भारतीय मिट्टी पर अपने निशान छोड़े हैं। चाहें वो शाहाजहाँ द्वारा बनाया गया प्रेम का प्रतीक ताजमहल हो या लालकिला, कुतुबद्दीन द्वारा बनाया गया कुतुबमीनार हो या चारमीनार, हुमायू टोंब हो या छत्रपति शिवाजी टर्मिनल यह सब धरोहरें हमें भारत की प्राचीन संस्कृति से परिचित कराती हैं। इनके संरक्षण के कारण ही यह अब तक सुरक्षित व पुनर्जीवित हैं। विश्व धरोहर दिवस इन विभिन्न सभ्यताओं से जुड़ने का एक अवसर उपलब्ध कराता है। भारत के तो हर रोहर के पीछे एक बड़ा इतिहास छिपा है। जो भारत को विश्व के सामने स्वयं को प्रस्तुत करने का अवसर उपलब्ध कराता है। 

धरोहरों का महत्त्व और सरंक्षण

विश्व विरासत दिवसका प्रत्येक व्यक्ति के लिए बड़ा ही महत्त्व है। विश्व धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त स्थलों के महत्त्व, सुरक्षा और संरक्षण के प्रति जागरुकता फैलाने के मकसद से ही यह विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। दरअसल यह एक मौका है जब हम लोगों को बताएँ कि हमारी ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाए रखने के लिए कितनी कोशिश हो रही है। साथ ही यह दिन यह भी बताता है कि हमारी यह धरोहरों को अब कितने रख-रखाव की जरूरत है। हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए निशानी के तौर पर तमाम तरह के मंदिर, मक़बरा, मस्जिद और अन्य चीज़ों का सहारा लिया, जिनसे हम उन्हें आने वाले समय में याद रख सकें; लेकिन वक्त की मार के आगे कई बार उनकी यादों को बहुत नुकसान पहुँचा। किताबों, इमारतों और अन्य किसी रूप में सहेज कर रखी गई यादों को पहले स्वयं हमने भी नजरअंदाज किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारी अनमोल विरासत हमसे दूर होती गईं और उनका अस्तित्व भी संकट में पड़ गया। इन सब बातों को ध्यान में रखकर और लोगों में ऐतिहासिक इमारतों आदि के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से ही विश्व विरासत दिवसकी शुरुआत की गई। विश्व धरोहर या विरासत सांस्कृतिक महत्त्व व प्राकृतिक महत्त्व के वह स्थल होते है जो बहुत ही जरूरी होते हैं। कई ऐसे स्थल जो ऐतिहासिक व पर्यावरण के रूप में जरूरी माने जाते हैं। इन स्थलों का अंतरराष्ट्रीय महत्त्व भी होता हैं व साथ ही इन्हें बचाने के लिए लगातार कोशिश किए जाते हैं। ये धरोहर हमारी संस्कृति को दर्शाती हैं व हमारे इतिहास के बारे में जानकारी देती हैं।

हमारे इतिहास या हमारी विरासत को बचाने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाना जरुरी हैं। विश्व धरोहरों की जरुरतों और उन्हें सरंक्षण देने की आवश्यकता को समझते हुए आज उनकी देखभाल अच्छे से की जा रही है। हम अपनी संस्कृति तो खो ना दें इस उद्देश्य से अब पुरानी हो चुकी जर्जर इमारतों की मरम्मत की जाने लगी है, उजाड़ भवनों और महलों को पर्यटन स्थल बनाकर उनकी चमक को निखारा गया है। किताबों और स्मृति चिह्नों को संग्रहालय में जगह दी गई है; लेकिन फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अपनी इन धरोहरों की कद्र नहीं कर रहे हैं वो इन पर संदेश लिखकर इनकी सुंदरता को खराब कर रहें हैं। पान, गुटखा इत्यादि खाकर इन पर थूक कर गन्दगी के निशान छोड़ रहें है। वे नहीं जानते कि हमारी ये धरोहरें बहुत अमूल्य हैं हमें इनका सम्मान करना चाहिए। 


भारत की विरासत

कोई भी धरोहर किसी भी राष्ट्र का इतिहास, उसके वर्तमान और भविष्य की नींव होता है। जिस देश का इतिहास जितना गौरवमयी होगा, वैश्विक स्तर पर उसका स्थान उतना ही ऊँचा माना जाएगा। वैसे तो बीता हुआ कल कभी वापस नहीं आता, लेकिन उस काल में बनीं इमारतें और लिखे गए साहित्य उन्हें हमेशा सजीव बनाए रखते हैं। विश्व विरासत के स्थल किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और उसकी प्राचीन संस्कृति के महत्त्वपूर्ण परिचायक माने जाते हैं। दुनियाभर में कुल 1052 विश्व धरोहर स्थल हैं। इनमें से 814 सांस्कृतिक, 203 प्राकृतिक और 35 मिश्रित स्थल हैं।  भारत में फिलहाल 27 सांस्कृतिक, 7 प्राकृतिक और 1 मिश्रित सहित कुल 35 विश्व धरोहर स्थल हैं।

भारत के विश्व धरोहर स्थल

आगरा का किला (1983)
अजंता की गुफाएँ (1983)
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (1985)
केओलादेओ नेशनल पार्क (1985)
नालंदा महाविहार (नालंदा विश्वविद्यालय), बिहार (2016)
साँची बौद्ध स्मारक (1989)
कंचनजुंगा राष्ट्रीय उद्यान (2016)
एलिफेंटा की गुफाएँ (1987)
एलोरा की गुफाएँ (1983)
चंपानेर-पावागढ़ पुरातात्विक पार्क (2004)
हुमायू का मकबरा, दिल्ली (1993)
लाल किला परिसर (2007)
खजुराहो में स्मारकों का समूह (1986)
नंदा देवी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान (1988)
सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान (1987)
बोध गया में महाबोधि मंदिर परिसर (2002)
छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (पूर्व में विक्टोरिया टर्मिनस) (2004)
गोवा के चर्च और कॉन्वेंट्स (1986)
फतेहपुर सीकरी (1986)
ग्रेट लिविंग चोल मंदिर (1987)
हम्पी में स्मारकों का समूह (1986)
महाबलिपुरम में स्मारक समूह (1984)
पट्टडकल में स्मारक समूह (1987) 
राजस्थान में पहाड़ी किला (2013)
माउंटेन रेलवे ऑफ इंडिया (1999)
कुतुब मीनार और इसके स्मारक, दिल्ली (1993)
रानी-की-वाव पाटन, गुजरात (2014)
भीमबेटका के रॉक शेल्टर (2003)
सूर्य मंदिर, कोणार्क(1984)
ताज महल (1983)
ला कॉर्ब्युएर का वास्तुकला कार्य (2016)
जंतर मंतर, जयपुर (2010)
हिमालयी राष्ट्रीय उद्यान संरक्षण क्षेत्र (2014)
मानस वन्यजीव अभयारण्य (1985)
पश्चिमी घाट (2012) 

(संकलित)

धरोहरः छत्तीसगढ़- परंपरा और धरोहरों का बेजोड़ संगम बस्तर


छत्तीसगढ़
एक ऐसा प्रदेश है जो हरियाली और धरोहरों से भरा है।  छत्तीसगढ़ अंचल ने अनगिनत पीढ़ियों से क्षेत्र की प्राकृतिक
, सांस्कृतिक और पुरातात्विक धरोहरों को सहेज कर रखा है। ये धरोहर इस क्षेत्र की पहचान हैं , जो देश-विदेश के सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। यह पूरा प्रदेश घने जंगलों, वन्य प्रजातियों,
आदिवासी समुदाय के लिए जाना जाता है। बस्तर के जंगल इतने घने हैं कि कि सूरज की रोशनी भी इन्हें भेद नहीं पाती। छत्तीसगढ़ में बस्तर के
बारे में बात करें तो- देश का सबसे बड़ा जलप्रपात चित्रकूट यहीं है, जिसे भारत का नियाग्रा प्रपात भी कहा जाता है। बस्तर जिले में स्थित इस चित्रकूट प्रपात में पानी
100 फुट की ऊंचाई से गिरता है। इस जलप्रपात में इंद्रावती, हसदेव, शिओनाथ और महानदी आदि नदियों और उनकी सहायक नदियों का पानी मिलता है, जो आपस में मिल कर देश का सबसे बड़ा और खूबसूरत जलप्रपात बनाता है। दूसरा प्रपात है तीरथगढ़। दूधहा प्रपात के नाम से मशहूर तीरथगढ़ में हमेशा सफेद रंग का झाग दिखाई देता है मशहूर कोटुमसर गुफा  और प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर भी बस्तर में ही है। 
अब बात की जाए बस्तर के कुछ महत्त्वपूर्ण धरोहरों के बारे में -

 बस्तर में बिखरे हैं ऐतिहासिक पुरावशेष
 बारसूर

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित एक गाँव है बारसूर। बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में बसे गाँव बारसूर को पुराअवशेषों का गाँव कहें तो अनुचित नहीं होगा। किसी समय में बारसूर एक सौ सैंतालिस मंदिर और लगभग इतने ही तालाबों वाला नगर कहलाता था। बारसूर जगदलपुर से गीदम होकर 116 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बारसूर छिंदक नागवंशी राजाओं की राजधानी रही है। छिंदक नागवंशियों ने 10 वीं शताब्दी से लेकर 14 वीं शताब्दी् तक बस्तर में शासन किया था। बारसूर नागकालीन प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। उस समय बस्तर के अधिकांश भाग चक्रकूट या भ्रमरकूट के नाम से जाना जाता था। बस्तर के नाग शासकों ने जो भी मंदिर बनवाए उनमें नाग का अंकन बहुतायत से देखने मिलता है।

कोई इस नगर को दैत्य वाणासुर की नगरी कहता है तो कोई अतीत का बालसूर्य। बालसूर्य धीरे धीरे बारसूर बन गया।  बस्तर के समृद्धशाली इतिहास में बारसूर का विशेष स्थान है। बस्तर के कई राजवंशों के उदय और पतन की गाथाएँ इतिहास के पन्नों में मिल जाती है। एक मान्यता के अनुसार बारसूर का नामकरण बाणासुर के नाम पर हुआ। बस्तर की इस पुरातात्विक नगरी में बत्तीसा मंदिर, मामा भाचा मंदिर, युगल गणेश प्रतिमा, चंद्रदित्येश्वर मंदिर के अलावा सोलह खम्भा मंदिर, पेदम्मा गुड़ी, हिरमराज मंदिर आदि प्रमुख मंदिर हैं जिनके संरक्षण की आवश्यकता है 

पुरातत्व विभाग के द्वारा अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार किया गया है और ये कार्य सतत् जारी है। एक छोटे से संग्रहालय में शिव-पार्वती, विष्णु, काली, भैरव, चामुण्डा, ब्रम्हा, लक्ष्मी, गणेश, दिकपाल आदि की प्रतिमाएँ सुरक्षित रखी गई है।

गणेश प्रतिमाएँ

बारसूर में स्थित बलुआ पत्थर से बनी दो गणेश मूर्तियाँ प्राप्त जानकारी के अनुसार दुनिया की तीसरी विशालकाय प्रतिमाएँ हैं। एक की ऊँचाई सात फीट तो दूसरी की पाँच फीट है। ये दोनों मूर्ति एक ही चट्टान पर बिना किसी जोड़ के बनाई गई हैं। बड़ी गणेश मूर्ति के ऊपर के दाहिने हाथ में परशु, नीचे के हाथ में टंक, उपर के बायें हाथ में सर्प तथा नीचे के हाथ में मोदक रखा हुआ है। इस गणेश मूर्ति ने मुकुट धारण किया है, यज्ञोपवीत, कंकण तथा पादवलय स्पष्ट उकेरे हुए नजर आते हैं

पास में रखी दूसरी छोटी गणेश की मूर्ति ने दाहिने उपरी हाथ में सर्प, दाहिने निचले हाथ में परशु, बाएँ ऊपर के हाथ में आयुध, जो खण्डित हो गया है तथा बाएँ नीचे हाथ में मोदक है। इस गणेश मूर्ति ने भी मुकुट, यज्ञोपवीत, कंकण तथा पादवलय स्पष्ट उकेरे गए हैं।  प्रतिमा के ठीक नीचे उनके आसन के अग्र भाग में मूषक भी अंकित किया गया है।

सुरक्षा की दृष्टि से इन विशालकाय मूर्तियों को लोहे की जंगले से घेर दिया गया है। इन गणेश मूर्तियों के बारे में एक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं कि इनका आकार दिन प्रतिदिन बड़ा हो रहा है। यही कारण है कि यह स्थान क्षेत्रीय आदिवासियों के लिए एक तीर्थ स्थल से कम नहीं है। लोग बड़ी संख्या में इनके दर्शन करने आते हैं।  इन मूर्तियों को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ कभी भव्य मंदिर रहे होंगे। इस परिसर में आस- पास बिखरे भग्नावशेष से लगता है कि आसपास छोटे बड़े तीन मंदिर रहे होंगे।

बत्तीसा मंदिर

बत्तीसा मंदिर का निर्माण भी बलुआ पत्थर से हुआ है। बारसूर का बत्तीसा मंदिर बस्तर के सभी मंदिरों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। यह मंदिर पत्थर के 32 स्तंभों पर टिका है। एक हजार साल पुराने इस मंदिर को बड़े ही वैज्ञानिक तरीके से पत्थरों को व्यवस्थित करके बनाया गया है।  इस मंदिर में शिव एवं नंदी की प्रतिमाएँ हैं। यहाँ प्राप्त शिलालेख के अनुसार इसका र्निर्माण 1030 ई में छिन्दक नागवंशीय नरेश सोमेश्वर देव ने अपनी रानी के लिए करवाया था। यह मंदिर बस्तर में एक मात्र दो शिवालयों वीर सोमेश्वरा एवं गंगाधरेश्वरा नाम के संयुक्त मंडपयुक्त मंदिर हैं।  जहाँ राजा और रानी शिव की अलग-अलग आराधना किया करते थे l दो गर्भगृह वाले इस मंदिर में दो शिवलिंग स्थापित है।

मंडप में प्रवेश करने के लिए तीनों दिशाओ में द्वार है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख है जो कि तीन फूट ऊँची जगती पर निर्मित है।  मंदिर में दो आयताकार गर्भगृह है। दोनों गर्भगृह में जलहरी युक्त शिवलिंग है। शिवलिंग त्रिरथ शैली में है। शिवलिंग की जलहरी को पकड़ पूरी तरह से घुमाया जा सकता है।

गर्भगृहों के दोनों द्वार शाखाओं के ललाट बिंब में गणेशजी का अंकन है। दोनों गर्भगृहों के सामने काले पत्थर से बनी अलंकृत नंदी स्थापित है। मंदिर के चारों तरफ प्रदक्षिणा पथ है। मंदिर का शिखर नष्ट हो चुका है। मंदिर की दिवारों सादी हैं जिस पर किसी प्रकार का कोई अंकन या नही है।

मंदिर में प्राप्त शिलालेख के अनुसार सोमेश्वरदेव की पट्ट राजमहिशी गंगामहादेवी द्वारा दो शिवमंदिरों का निर्माण कराया गया जिसमें एक शिवालय अपने पति के लिए, जिसे सोमेश्वर,देव के नाम पर वीर सोमेश्वरा शिवालय एवं दूसरा स्वयं के नाम पर जिसे गंगाधरेश्वरा शिवालय के नाम से जाना जाता है। शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण दिन रविवार फाल्गुन शुक्ल द्वादश शक संवत 1130,  1209 लिखा हुआ है।

मामा-भांजा मंदिर

मामा-भांजा मंदिर दो गर्भगृह युक्त मामा-भांजा मंदिर के मंडप आपस में जुड़े हुए हैं। इतिहासकार एवं शिक्षाविद डॉ. के. के. झा के अनुसार यह नगर प्राचीन काल में वैश्वत पुर के नाम से जाना जाता था। इस मंदिर के गर्भगृह में तथा द्वार पर गणेश की मूर्ति ही स्थापित है। मंदिर द्वार पर चतुर्भुजी गणेश विराजमान हैंइस गणेश मूर्ति के हाथों में भी परशु, गदा, मोदक हैं। नीचे मूषक महाराज भी हैं जाहिर है बारसूर में गणेश मंदिरों का बाहुल्य है। मंदिर के एक ओर द्विभुजी गणेश की मूर्ति है। इनके भी  दाहिने हाथ में परशु तथा बाएँ हाथ में मोदक है। यज्ञोपवीत तो संभवतः यहाँ प्राप्त सभी गणेश की मूर्तियों ने धारण किया हुआ है। इस मूर्ति की बाईं तरफ नरसिंह भगवान की मूर्ति स्थापित है।

मामा -भांजा मंदिर गंग राजाओं द्वारा ही निर्मित है। कहते हैं कि राजा का भांजा उत्कल देश से कारीगरों से इस मंदिर का निर्माण करवा रहा था। मंदिर बहुत ही भव्य और खूबसूरत बन रहा था उसकी सुन्दरता देख राजा के मन में भांजे को लेकर जलन पैदा हो गई कि भला भांजा इतना अच्छा मंदिर कैसे बनवा सकता है बस फिर क्या था दोनों में लड़ाई छिड़ गईअंततः मामा की इस युद्ध में हार हुई और भाँजे ने पत्थरों से मामा का सिर बनवाकर मंदिर के बाहर लगवा दिया और मंदिर के भीतर स्वयं की मूर्ति बनवा कर रखवा दी।

मामा- भांजा मंदिर के बारे में एक और किंवदंती प्रचलित हैं कि  मामा और भांजा दो शिल्पकार थे, जिन्हें इस मंदिर को सिर्फ एक दिन में में पूरा  करने  का काम  मिला था  और उन  दोनों  ने ये मंदिर सिर्फ एक  दिन  में बना  भी दिया था। 

चन्द्रादित्य मंदिर 

चन्द्रादित्य मंदिर  का निर्माण नाग राजा चन्द्रादित्य ने करवाया था उन्हीं के नाम पर इस मंदिर की पहचान है। यह मंदिर भी एक शिव मंदिर है। 

चन्द्रादित्य मंदिर के पास ही मूर्तियों का एक संग्रहालय है। जहाँ बारसूर और आस- पास से प्राप्त मूर्तियों को इकट्ठा करके रख दिया गया है। जिसमें जाहिर है अनेक मूर्तियाँ गणेश की हैं अन्य मूर्तियों में भैरवी कंकालिन देवी के साथ अन्य कई देवियों की मुर्तियाँ हैं

पेदम्मागुड़ी मंदिर

बारसूर जाने पर पेदम्मागुड़ी मंदिर के बारे में पर्यटकों को अधिक जानकारी नहीं दी जाती। संभवतः सड़क मार्ग न होने और रख- रखाव के अभाव में खंडहर की तरह उपेक्षित यह मंदिर उतना ही अद्भुत है,  जितना बारसूर के अन्य मंदिर।  इस मंदिर के बारे में बहुत ही विस्तार से लिखा है आमचो बस्तर और बस्तरनामा जैसी बहुचर्चित किताबों के लेखक राजीव रंजन प्रसाद  ने। वे लिखते हैं-

दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा जिला) के बारसूर को बिखरी हुई विरासतों का नगर कहना ही उचित होगा। एक दौर में एक सौ सैंतालिस तालाब और इतने ही मंदिरों वाला नगर बारसूर आज बस्तर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। कोई इस नगरी को दैत्य वाणासुर की नगरी कहता है तो कोई अतीत का बालसूर्य नगर। यदि इस नगर के निकटस्थ केवल देवी प्रतिमाओं की ही बात की जाए, तो बारसूर के देवरली मंदिर में अष्टभुजी दुर्गा, लक्ष्मी, भैरवी, वाराही आदि; दंतेवाड़ा में महिषासुरमर्दिनी की अनेक प्रतिमायें; भैरमगढ में चतुर्भुजी पार्वती की प्रतिमा, समलूर में गौरी की प्रतिमा तथा स्थान स्थान पर सप्तमातृकाओं की प्रतिमा आदि प्राप्त हुई हैं जो यह बताती हैं कि बस्तर भी नागों के शासन समय में देवीपूजा का महत्त्वपूर्ण स्थल रहा है।

नलों-नागों के पश्चात् बहुत कम प्रतिमाएँ अथवा मंदिर काकतीय/चालुक्य शासकों द्वारा निर्मित किए गए अंत: देवीस्थान के रूप में माँ दंतेश्वरी के अतिरिक्त मावली माता के अनेक मंदिर तो महत्त्व के हैं ही उनके कालखण्ड की अनेक अन्य भूली बिसरी पुरातात्विक सम्पदाएँ भी हैं, इनमें से एक है पेदाम्मागुडी। बारसूर पहुँच कर युगल गणेश प्रतिमा, सोलह खम्भा बंदिर, चन्द्रादित्य मंदिर आदि तक आसानी से पहुँचा जा सकता है चूंकि ये मंदिर तथा प्रतिमाएँ  पर्यटकों के मुख्य आकर्षण का केन्द्र बन गई  हैं। मुझे पेदम्मागुडी को खोजने में कठिनाईयाँ हुई क्योंकि यह मंदिर अल्पज्ञात है तथा बारसूर के पर्यटन नक्शे पर प्रमुखता से नहीं दर्शाया गया है। सड़कों से अलग हट कर तथा बहुत- सी झाड़ियों से लड़ते-झगड़ते हुए ही इस प्राचीन देवी स्थान तक पहुँचा का सकता है।

 अन्नमदेव ने नाग शासकों का वर्ष 1324 में जब निर्णायक रूप से पतन कर दिया तब बारसूर नगरी का वैभव भी धीरे धीरे अतीत की धूल में समा गया। अन्नमदेव के दौर की निशानी माना जाता है, यहाँ अवस्थित पेदम्मागुड़ी मंदिर को। इस मंदिर को ले कर दो मान्यताएँ हैं- पहली यह कि इस मंदिर का अंशत: निर्माण बस्तर में चालुक्य वंश के संस्थापक अन्नमदेव ने करवाया जहाँ, उन्होंने अपनी कुलदेवी की प्रथमत: स्थापना की और बाद में उन्हें दंतेवाड़ा ले गए। इससे इतर लाला जगदलपुरी अपनी पुस्तक बस्तर लोक कला संस्कृति प्रसंगमें पेदम्मागुड़ी के विषय में लिखते हैं - बारसूर की प्राचीन दंतेश्वरी गुड़ी को नागों के समय में पेदाम्मागुड़ी कहते थे। तेलुगु में बड़ी माँ को पेदाम्मा कहा जाता है। तेलुगु भाषा नागवंशी नरेशों की मातृ भाषा थी। वे दक्षिण भारतीय थे। बारसूर की पेदाम्मागुड़ी से अन्नमदेव ने पेदाम्माजी को दंतेवाड़ा ले जाकर मंदिर में स्थापित कर दिया। तारलागुड़ा में जब देवी दंतावला अपने मंदिर में स्थापित हो गई , तब तारलागुड़ा का नाम बदलकर दंतावाड़ा हो गया। लोग उसे दंतेवाड़ा कहने लगे। वस्तुत: बस्तर के इतिहास को ले कर खोज इतनी आधी- अधूरी है कि किसी भी निर्णय पर पहुँचना जल्दीबाजी होगी।

प्रमुख बात यह है कि यह प्राचीन मंदिर अपने अलगे हिस्से में तो पूरी तरह ध्वस्त हो गया है;  किंतु पेदाम्मागुड़ी का पिछला हिस्सा आज भी सुरक्षित है तथा उसकी भव्य बनावट देखने वाले को मंत्रमुग्ध कर देती है। आंचलिकता तो धरोहरों का सम्मान करती ही है और अपने तरीके से उसे संरक्षण भी प्रदान करती है, यही कारण है कि आज भी पेद्दाम्मागुडी में वार्षिक जात्रा के अवसर पर बलि दी जाती है। जन-मान्यता के अनुसार पेद्दाम्मागुडी मंदिर में नि:संतान दम्पती भी अपनी मन्नत माँगने आते हैं। लाला जगदलपुरी सहित अन्य इतिहासकार जिस तरह दंतेश्वरी मंदिर और पेदाम्मागुडी का सम्बन्ध स्थापित करते हैं , इससे संरक्षण की दृष्टि से भी आवश्यक हो गया है कि पुरातत्त्व विभाग इसे बचाने की पहल में आगे आए। यहाँ योजनाबद्ध रूप से इतिहास को खोजने और उसे सहेजने की आवश्यकता है। पहल तो इस बात पर होनी चाहिए कि जो भग्न मंदिर अथवा इमारतें हैं, उन्हें सही तरह से सहेज लिया जाए। जिस तेजी से बारसूर में आबादी फैलती जा रही है, आने वाले समय में चाह कर भी पुरात्त्व विभाग यहाँ उत्खनन सम्बन्धी कार्य नहीं कर सकेगा। ( संकलित)