April 16, 2019

इस अंक में

उदंती.com, अप्रैल- मई  2019

अगर आपने कभी किसी का भला किया हो तो उसे हमेशा के लिए भूल जाना चाहिए। वहीं अगर कभी किसी ने आपके साथ बुरा किया हो तो उसे भी भूल जाना चाहिए। तभी मनुष्य शांत रहकर अपना जीवनयापन कर सकता है। -महावीर स्वामी

संयुक्तांक

अनकही

लोकसभा चुनाव- वादे और इरादे...   
- डॉ. रत्ना वर्मा
पाँच साल में होने वाले चुनावों में जनता किस आधार पर वोट देती है, अब इसका चुनावी विश्लेषण शुरू हो गया है। बड़े- बड़े विशेषज्ञ अपनी अपनी राय जाहिर करके अपना मत रखते हैं। इनके मत का अपना महत्व तो है पर सही मायनों में जनता का मत ही असली मत होता है। चुनाव पूर्व ये चाहे जितना आंकलन कर लें नतीजे तो जनता के वोट ही तय करते हैं। ऐसे में असली विश्लेषण आम जनता के मन का करना चहिए।
तो आम जनता क्या चाहती है? जाहिर हैवे मुलभूत सुविधाएँ जिनके बिना जीवन असंभव है। यानी कम शब्दों में रोटी कपड़ा और मकान। पर यह इतना छोटा शब्द भी नहीं है। यह  छोटा -सा शब्द पूरे देश का आईना होता है। रोटी यानी देश का कोई भी व्यक्ति भूखा न रहे और वह तभी भूखा नहीं रहेगा, जब प्रत्येक  हाथ में काम होगा, कोई बेरोजगार नहीं होगा। जाहिर है जब कोई बेरोजगार नहीं होगा तो उसे अच्छा कपड़ा मिलेगा यानी उसकी जिंदगी में जीवन में वे सभी सुख सुविधाएँ होंगी, जिसकी उन्हें व उनके परिवार को जरूरत है। मकान यानी छत। थक हार कर जब वह घर लौटे तो अपने परिवार को हँसता मुस्कुराता सुरक्षित पाए और वह स्वयं भी सुकून की नींद ले पाए।
 पर यह सब कैसे संभव हैतब ना जब जनता देश की कमान उस व्यक्ति के हाथों में सौंपे हो, जो अपने देश के सभी परिवार को ऐसी खुशहाल जिंदगी दे सके। इस  खुशहाल जीवन के साथ और भी कई सुख- सुविधाएँ जुड़ी होती हैं जैसे शुद्ध पानी, शुद्ध हवा, आवागमन के पर्याप्त साधन, अच्छी सड़कें, स्वास्थय सुविधाएँ और न जाने ऐसी कितनी अनगिनत  सुविधाएँ जुड़ी हैं, जो देश की जनता सरकार से चाहती हैं। पर ऐसी सुख- सुविधायुक्त देश के बारे में सोचना तो अब किस्से कहानियों की बात और सपना देखने जैसा लगता है। आज देश में जिस प्रकार से राजनैतिक उठापटक, जोड़- तोड़, आरोप प्रत्यारोप के साथ सिर्फ जीत हासिल करने के लिए उल्टे सीधे दांव- पेंच का उपयोग किया जाता है, गड़े मुर्दे उखाड़े जाते हैं वहाँ एक निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद करना दिए को रोशनी दिखाने के समान लगता है। देखा तो यही जा रहा है कि देश में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। देश के अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब। राजनेता भी जनता की भलाई के पहले अपना भला सोचते हैं। विकास की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं। जनता से कभी न पूरे होने वाले वादे किए जाते हैं।
ऐसे में  मतदाता अपना मन किसी के पक्ष या विपक्ष में तभी बनाते हैं जब पार्टी की नीतियाँ स्पष्ट हों, देश तथा जनता के हित में सही सोच रखती हों. साथ ही प्रत्याशी की छवि भी साफ सुथरी हो।  कई बार यह भी देखा गया है कि जनता का रूझान किसी एक पार्टी के पक्ष में होने के बाद भी उन्हें वोट इसलिए नहीं मिल पाता क्योंकि प्रत्याशी उनके मन के अनुकूल नहीं होता। ऐसे में बहुत बड़ा नुकसान पार्टी को झेलना पड़ सकता है। तो पार्टियों का पहला काम सही  प्रत्याशी का चयन और जनता का मन टटोलना होना चाहिए। आजकल विभिन्न  ऐजेंसियों द्वारा चुनाव पूर्व सर्वेक्षण कराने का चलन हो चला है। मीडिया भी बहुत शोर- शराबा करते हुए चुनावी नतीजों का पूर्व आंकलन करके अपना पक्ष रखती है। कई बार जिसके पक्ष में हवा बह रही हो या कहना चाहिए माहौल बना दिया गया हो तब भी नुकसान दूसरे सही प्रत्याशी को उठाना पड़ता है। ये बात अलग है कि माहौल जैसा भी  हो  कमान तो अंतत: जनता के हाथ में होती है।
चुनाव में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आजकल तो मीडया अपनी टीआरपी के चक्कर में सनसनी फैलाने का काम करती है। जनता को भ्रमित करने में मीडया भी बड़ी भूमिका निभाती है। एक वह भी समय था जब समाचार पत्र की खबरें सच पर आधारित होती थीं। उनकी लिखी बातों पर जनता का अटूट विश्वास होता था। पर समय बदल गया है। चैनलों की बाढ़ लग गई है। सब अपने को सबसे तेज कहलाने के चक्कर में सच्चाई से कहीं दूर चले जा रहे हैं। इसी तरह सोशलमीडिया ने तो सबसे ज्यादा नुकसान किया है। लोगों को जितनी तेजी  से  यह जोड़ता है उससे कहीं सौ गुना तेजी से तोड़ भी देता है। एक झूठी खबर को वायरल होते देर नहीं लगती।
ऐसे में  पार्टियों और  प्रतिनिधियों के लिए यह चिंतन मनन का समय होता है। जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी उनके सिर पर आ जाती है। ऐसे में बहुत जरूरी हो जाता है कि वे केवल जीत हासिल करने के लिए चुनावी वादे न करें।प्रलोभन देकर वोट खरीदने का चलन  इधर कुछ दशकों में बहुत ज्यादा बढ़ गया है। कम्बल और साड़ियाँ  बाँटना आम हो चला है। हाँ अब जागरूक मतदाता इन सब प्रलोभनों में नहीं आता ;परंतु आज भी हमारे देश में आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा पढ़ा-लिखा  नहीं है । उनकी महिलाएँ आज भी अपनी मर्जी से निर्णय लेने की काबिलियत नहीं रखती। या तो वे उनके पति जो कहते हैं वहीं करती हैं या फिर उनका मुखिया जिस  बटन दबाने कहता है वह  बटन दबा देती है। चुनाव के दौरान इस प्रकार के कई अलग अलग तरह की घटनाएँ और अनुभव भी  होते हैं।
अभी हाल ही में सम्पन्न हुए लोकसभा चुनाव में जो कुछ अनुभव मुझे हुआ मैं उसे आप सबके साथ साझा करना चाहती हूँ। घरों का काम करने वाली महिला से जब मैंने पूछा-‘वोट डालने क्यों नहीं जा रही होतो उसका जवाब था दूसरे पहर में जाएँगे समूह की सब महिलाएँ एक साथ। मैंने उसे मजाक में पूछ लिया -किसे वोट दे रही हो, तब उसने जो जवाब दिया वह चौकाने वाला था- उसने कहा हमारे समूह की मुखिया जिसे कहेगी, उसे ही वोट देंगे। उसने यह भी कहा कि अभी तो कोई भी पार्टी हमें साड़ी कम्बल या कुछ भी बांटने  नहीं आई है। तब मैंने पूछा, जो साड़ी देगा क्या उसे ही वोट दोगी। इसपर उसने कहा-  साड़ी भले ही ले लेंगे वोट तो देंगे उसे ही, जिसे हमारा मन करेगा। अब आप समझ गए होंगे कि इस महिला के मन की बात।
लोकसभा चुनाव को लेकर एक धारणा यह भी है- खासकर मध्यम और उच्च वर्ग मेंकि जनता किसे वोट देगीइसका फैसला वह प्रदेश की सरकार को देखकर नहीं करती। भले ही उसने प्रदेश में किसी एक पार्टी को चुना है, जरूरी नहीं है कि केन्द्र में भी वह उसी पार्टी को देखना चाहे। केन्द्र के मुद्दों को वह अलग ही नजरिए से देखती है, केन्द्र का चुनाव पूरे देश के विकास से जुड़ा होता है। चाहे वह देश की सुरक्षा का मामला हो, आर्थिक मुद्दा हो या जनता के हितों का मामला। यही वजह है कि केन्द्र में एक पार्टी का शासन होता है ,तो राज्यों में अलग अलग पार्टियाँ काबिज होती हैं।
कहने को तो चुनाव की कमान हर बार जनता के हाथ होती है। पर जनता को भ्रमित करने की कोशिश प्रत्येक पार्टी करती है। लोक लुभावन वादें चुनाव का प्रमुख हथकंडा होता है। इन दिनों पिछले विधानसभा चुनाव में  जिन पार्टियों ने जीत हासिल  की है ,उन राज्यों की सरकार जनता से किए वादे पूरे करने में लगी है ; ताकि उनकी पार्टी को लोकसभा चुनाव में भी अच्छा रिजल्ट मिले। पिछले विधानसभा चुनाव में कई राज्यों में इतने अप्रत्याशित परिणाम आए हैं कि लोकसभा चुनाव में भी वे इसी तरह अप्रत्याशित परिणाम की आस लागाए हैं। यद्यपि बालाकोट एयरस्ट्राइक और हाल ही में ऐंटी सेटेलाइट मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद तो भाजपा जनता का फैसला अपनी तरफ ही मान कर चल रही है। 
इन चुनावी हथकंडों के बीच अंतत: कमान जनता के हाथों ही होती है। अंतिम फैसला तो उसे ही लेना है बिना किसी दबाव और लालच के। तभी देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में रहेगा। उम्मीद की जानी चाहिए देश की कमान जनता उसे ही सौंपेगी जो जनता के हितों की बात करे।

चिंतन

राजनैतिक बुजुर्गों से...
- भगवानदास केला
प्रस्तुत आलेख मासिक पत्रिका जीवन साहित्यवर्ष-14, अंक-1, जनवरी- 1953 से साभार लिया गया है। इसमें लेखक ने आजादी के बाद सरकार में चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा उपयोग किए जाने वाली आलीशान सुविधाओं पर सवाल उठाने के साथ देश की आर्थिक सामाजिक स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उस दौर के ये सवाल आज की व्यवस्था पर भी सटीक बैठते हैं।
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सन १९१५ से भारतीय शासन और राजनैतिक- से  अधिक समस्याओं की बात करते हुए अब सैंतीस वर्ष बाद अपनी जीवन-संध्या की बेला में मुझे कुछ प्रकाश मिला है। अब हुकूमत की बागडोर सँभालने वालों से राजेंद्रप्रसाद से, श्री नेहरू से, श्री आजाद से, श्री राजगोपालाचारी से, श्री पन्त से और अन्य विविध राजनैतिक बुजुर्गों से कुछ साफ़-साफ़ निवेदन करना जरूरी है। मान्यवर! आपने देश को विदेशी सरकार के जाल  से आजाद करने में जिसे त्याग, साहस और कष्ट-सहन का  परिचय दिया उसके लिए आपको चिर-काल तक आदर- मान और प्रतिष्ठा मिलेगी। परन्तु पीछे आकर आपने जाने या अनजाने कई भूल या गलतियाँ कीं, यदि समय रहते उनका सुधार न किया गया तो उनके लिए इतिहास आपको क्षमा भी नहीं करेगा। आपने शासन के उस शाही, केन्द्रित और खर्चाले ढाँचे को अपनायाजो अंग्रेजों ने यहाँ जनता का शोषण करने और वैभव तथा विलासिता का जीवन बिताने के लिए तैयार किया था और जिसकी आपने समय-समय पर काफी जोशीली और कटु आलोचना की थी।
भारत के नये संविधान के निर्माण की बहुत कुछ जिम्मेदारी आप पर है। अपने ऊँचे पदाधिकारियों के लिए इतने ऊँचे वेतन और भत्ते निर्धारित किये कि उन गद्दियों पर बैठनेवाले आदमी गरीब जनता के सेवक न बन कर मालिक ही बन गए। जितने हजार रुपये मासिक उन्हें देने की व्यवस्था की गई, उतने सौ, अर्थात् दसवां हिस्सा भी यहाँ के साधारण नागरिक को सुलभ नहीं हैं- उस नागरिक को जो भारतीय गणतंत्र के बराबर के भागीदार कहा जाता है और माना जाता है।
आप इंगलैड अमरीका आदि की छाप के तथाकथित लोकतंत्र' और 'पार्लिमेंटरी पद्धति के मोह-जाल में फँसे है, जिसमें होने वाली घातक दलबन्दी, अनीतिपूर्ण निर्वाचनऔर आदि से लेकर अन्त तक के विविध भ्रष्टाचारों से आप अपरिचित नहीं हैं।
क्या आप नहीं जानते कि केन्द्रित शासन-पद्धति में स्वदेशी राज्य भले ही हो, स्वराज्य असम्भव है ? स्वदेशी राष्ट्रपति, स्वदेशी प्रधानमन्त्री, स्वदेशी राज्यपाल और मंत्री और स्वदेशियों की बनी संसद या विधानसभाओं के सदस्य–इन थोड़े से व्यक्तियों से, चाहे इनकी संख्या हजारों तक हो- स्वराज्य नहीं होता। स्वराज्य का अर्थ है, भारत के छत्तीस करोड़ आदमियों का राज्य।
आप बालिग मताधिकार और प्रतिनिधि-शासन की. बात कहकर हमें भुलावे में नहीं डाल सकते। कहाँ भारत की भूखी-नंगी जनता, और कहाँ हजारों रुपये मासिक वेतन और भत्ता पानेवाले, शाही बंगलों में रहने वाले, बिजली के पंखे और खस की टट्टियों का आनन्द लेनेवाले ये प्रतिनिधि !
  आपने भारत के नवनिर्माण के लिए विचित्र ढंग  अपनाया है ! पूंजीवाद और केन्द्रीकरण अधिकाधिक बढ़ाया जा रहा है। ग्रामोद्योगों को संरक्षण देकर उनके लिए कोई ऐसा क्षेत्र सुरक्षित नहीं किया जा रहा है, जिसमें उन्हें यंत्रोद्योगों से घातक टक्कर न लेनी पड़े।
आप अरबों रुपये का अन्न विदेशों से मँगाने और करोड़ों रुपये ‘अधिक अन्न उपजाओ आंदोलन में खर्च करने को तैयार रहते हैं, परन्तु यह नहीं सोचते कि जिन बेकारों के पास खरीदने की शक्ति का अभाव है, वे देश में अन्न होते हुए भी भूखे मर सकते हैं और मरते हैं। इसलिए जरूरी है कि जिन ग्रामोद्योगों से लाखों करोड़ों आदमियों को रोजगार मिले, उन्हें यांत्रिक न बनने दिया जाय, उनका ह्रास रोका जाए, और उन्हें यथेष्ट प्रोत्साहन दिया जाए।
अफसोस आपके जमाने में, और आपकी मेहरबानी से अमरीका चुपचाप इस देश पर हावी होता जा रहा है।
आप यहाँ अमरीकी पूंजीवाद और अमरीकी विशेषज्ञों को निमन्त्रण देते जा रहे हैं। भारत की अगली पीढ़ी के लिए यह कैसी विनाशकारी विरासत है ! अमरीकी विशेषज्ञ, जिन्हें अपने यहाँ की शहरी अर्थ-व्यवस्था का अनुभव है, वे हमारी ग्रामीण-व्यवस्था का क्या उद्धार करेंगे । वे मशीनों के आदी हैं और हम जन-शक्ति के धनी हैं। हमारा उनका मेल नहीं बैठता । वे हमारी प्रगति में रोड़े ही अटकाने वाले हैं। अपने शाही वेतन, भत्तों और विशेषाधिकारों या सुविधाओं के कारण ये हमारे गरीब देश के लिए सफेद हाथी हैं, यह बात रही अलग।
हमें अपनी योजनाएँ अपने बल-बूते पर अमल में लानी चाहिए। हमें दूसरों की आर्थिक दासता का शिकार नहीं बनना चाहिए। अमरीका की नकल और अन्धभक्ति करके आप हमें अमरीका की आर्थिक गुलामी में फँसा रहे हैं।
  हमें भारत के उज्ज्वल भविष्य में आशा है। इस देश ने अंगरेजों के साम्राज्यवाद से मुक्ति पाई है, तो यह अमरीका की इस प्रभुता को भी मिटा कर रहेगा। इसके लिए एक महान् क्रांति होगी; वह क्रांति आ रही है, देखनेवालों को वह आती दिखाई दे रही है। अब भी समय है, आप है समय रहते चेत जाए तो अच्छा हैं।
क्या आप मानसिक दृष्टि से इतने बूढ़े हो गए हैं कि विदेशी पूँजीवाद, आर्थिक साम्राज्यवाद, पार्लमेंटरी पद्धति और वर्तमान ढंग के लोकतंत्र के दोषों को जानते हुए भीआप इन्हें बदलने और विकेंद्रित शासन जारी करने लिए कुछ जोरदार कदम नहीं उठा सकते। अगर ऐसा है तो नए नेता आएँगे, नया दृष्टिकोण अपनाएंगे और सच्चा स्वराज्य, सर्वोदय राज स्थापित करेंगे। आप उन्हें आशीर्वाद दीजिए, उनके लिए शुभ कामना प्रकट कीजिए।
इन थोड़ी -सी बातों की ओर, मैं अपनी नई पुस्तक में आपका ध्यान दिला रहा हूँ। आपको स्मरण दिलाने के लिए राष्ट्रपिता के कुछ चुने हुए आदेश भी आपकी भेंट हैं। हमारे राष्ट्रपति, हमारे राज्यपाल, हमारे मंत्री, और अन्य ‘लोकसेवक' उनकी आशा और भावना के कुछ तो- नजदीक आने की कोशिश करें।
(लेखक की पुस्तक 'सर्वोदय राज, क्यों और कैसे?' से । )

चुनाव

नई लोकसभा की तकदीर लिखेंगे युवा
-प्रमोद भार्गव
            देश की सत्रहवीं लोकसभा की तकदीर लिखने में युवाओं की अहम एवं निर्णायक भूमिका होगी। गोया, सभी राजनीतिक दलों की निगाहें युवाओं पर टिकी हैं। बढ़ती बेरोजगारी को लेकर युवा नरेंद्र मोदी सरकार से नाराज़ दिख रहे थे, लेकिन पुलवामा में सुरक्षाबल पर हुए आत्मघाती हमले और फिर बालाकोट में की गई वायुसेना की एयरस्ट्राइक के बाद ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा ने युवाओं के भीतर राष्ट्रवाद को जबरदस्त ढंग उभारा है। सोशल मीडिया ने इस ज्वार को उभारने में तीव्रता की भूमिका निभाई है। बहरहाल, 2019 के आम चुनाव में 8.1 करोड़ ऐसे मतदाता होंगे, जो पहली बार अपने मत का उपयोग करेंगे ? इन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के बीते छह माह के भीतर 18 वर्ष की उम्र पूरी की है। इनमें से अनेक ऐसे भी रहे हैं, जिन्होंने 2018 के अंत में हुए पाँच विधानसभाओं के चुनाव में भी मतदान किया है। यानी अनेक की मतदान की ललक मतदान के पहले अनुभव में तब्दील हो चुकी है।
            2019 के लोकसभा चुनाव की ढपली अब बजने वाली है। इसमें नए मतदाताओं की भूमिका यदि वे विवेक से मतदान करें तो निर्णायक हो सकती है; क्योंकि निर्वाचन आयोग द्वारा जारी किए, ताजा आँकड़ों के मुताबिक 282 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों की किस्मत की कुंजी उन्हीं के हाथ में है। आयोग द्वारा उम्रवार मतदाताओं के वर्गीकरण व विश्लेषण की जो रिपोर्ट आई है, उसके अनुसार इस चुनाव में 8.1 करोड़ नए मतदाता होंगे। ये युवा मतदाता 29 राज्यों की कम से कम 282 सीटों पर चुनावी समीकरणों को प्रभावित करेंगे। प्रत्येक लोकस्सभा सीट पर करीब 1.5 लाख मतदाता ऐसे होंगे, जो पहली बार मतदान करेंगे। रिपोर्ट के मुताबिक 2014 के लोकसभा चुनाव में 282सीटों पर मिली जीत के अंतर के लिहाज से इन मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। 1997 और 2001 के बीच जन्मेइनमें से कुछ युवा मतदाताओं ने विधानसभा चुनाव में मतदान किया है, लेकिन आमचुनाव में वे पहली बार मतदान करेंगे।
            रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न राज्यों में 2015 में हुए विधानसभा चुनावों के नए मतदाताओं से लेकर 2018 तक के विधानसभा चुनावों के नए मतदाताओं की संख्या का औसत निकाला गया है। इसमें पाया गया है कि 12 प्रांतों के नए मतदाताओं की संख्या 2014 के लोकसभा चुनाव में 217सीटों पर जीत के अंतर से कहीं ज्यादा है। इन राज्यों में पश्चिम बंगाल में 32, बिहार 29, उत्तर प्रदेश 24, कर्नाटक 20, तमिलनाडू20, राजस्थान 17, केरल 17, झारखंड13, आंध्र प्रदेश 12, महाराष्ट्र 12, मध्य-प्रदेश 11 व असम 10 सीटें हैं। देश में सबसे ज्यादा 80सीटों वाले उत्तर प्रदेश में नूतन मतदाताओं की औसत संख्या 1.15 लाख है। यह 2014 के चुनावों में यहाँ की लोकसभा सीटों पर जीत के औसत अंतर 1.86 लाख से कम है। तब सपा एवं बसपा ने अलग-अलग रहते हुए चुनाव लड़ा था। किंतु अब अखिलेश यादव और मायावती ने अपने दलों को गठबंधन का रूप देकर वोट के विभाजन को कम करने का काम कर लिया है। फिलहाल इस गठबंधन में कांग्रेस शामिल नहीं है। कांग्रेस भी यदि कालांतर में गठबंधन का हिस्सा बन जाती है तो इस बंटे विपक्ष की ताकत बढ़ जाएगी। बावजूद जरूरी नहीं कि राष्ट्रवाद के ज्वार से व्याकुल युवा इस गठबंधन को वोट दे ही ? क्योंकि राहुल गांधी और मायावती समेत कांग्रेस व विपक्ष के अनेक नेता एयरस्ट्राइक में मरे आतंकवादियों की संख्या और सबूत बताने की जो जिद्द कर रहे हैं, उससे वे नुकसान उठाने की जद में आते जा रहे हैं।
            1997-2001 के वर्षें में जन्मा यह मतदाता 2014 के चुनाव में मतदान के योग्य नहीं था। अब उत्तर-प्रदेश में 24 सीटें ऐसी हैं, जिनके भाग्य का फैसला युवा मतदाता करेगा। यदि 18 से 35 वर्ष के मतदाताओं को युवा मतदाताओं की श्रेणी में रखें तो उत्तर-प्रदेश में इनकी संख्या 12 करोड़ 36 लाख बैठती है। जाहिर है, ये नई लोकसभा की तकदीर लिखने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। वैसे भी सबसे ज्यादा सांसद देने के कारण उत्तर-प्रदेश के साथ यह विशेषण जुड़ा हुआ है कि देश की सरकार और प्रधानमंत्री बनने का रास्ता उत्तर-प्रदेश से ही निकलता है। गोया, युवा ठान लें तो इस परंपरा की एक बार फिर से पुनरावृत्ति हो सकती है।
            बहरहाल, इस लोकसभा चुनाव में युवाओं की मंशा और हवा का रुख जो भी रहे, उसमें युवाओं द्वारा लाए जाने वाले बदलाव की झलक मिलना तय है। ऐसी धरणा है कि युवा मतदाता जब 18 वर्ष की आयु पूरी होने पर पहली बार मतदान करता है तो वह समझ के स्तर पर कमोबेश अपरिपक्व होता है। इसलिए उसमें रूढ़िवादी, साम्प्रदायिक और जातीय जड़ता नहीं होती है। इसलिए वह निर्लिप्त भाव से निष्पक्ष मतदान करता है। यह युवा अभिभावक की इच्छा के मुताबिक भी मतदान करता रहा है। किंतु अब मुठ्ठी में मोबाइल होने के कारण वह धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और हरेक राजनीतिक घटनाक्रम की जानकारी हासिल कर लेता है और अपनी मानसिकता इन प्रभावों के अनुरूप ढाल लेता है। इसलिए वह सोशलसाइटों पर अपनी बेवाक प्रतिक्रिया भी उजागर कर देता है और किस राजनीतिक नेतृत्व के प्रभाव में क्यों है, इस भाव का भी प्रगटीकरण कर देता है। समाचार चैनल उसे प्रभावित तो करते हैं, लेकिन मीडिया के राजनीतिक प्रबंधन की चालाकी को वह समझने में परिपक्व हो गया है। इसलिए फर्जी या उत्सर्जित समाचार और वास्तविक समाचार के अंतर को वह भली-भाँति समझने लगा है। इस असलियत को चित्र व दृश्य के माध्यमों से जानने के उसके पास अनेक स्रोत हैं, इसलिए वह इन्हें देखकर स्वयं तुलनात्मक विश्लेषण करता है और अपनी राय बनाता है।
          
  पुलवामा हमले से पहले और उसके बाद आतंकी शिविरों पर की गई एयरस्ट्राइक ने युवाओं के मन को मथने का काम किया है। इन घटनाचक्रों से पहले तक युवाओं के मन में रोजगार का संकट बड़ी समस्या के रूप में घर कर गया था। लेकिन पुलवामा में 44 सैनिकों की शाहादत और फिर अभिनंदन की बहादुरी ने युवाओं के मन में गहरा राष्ट्रीयता का भाव जगाने का काम किया है। इसे कई मतवाद से ग्रस्त पूर्वाग्रही अंध राष्ट्रवाद कहकर इन युवाओं को बुद्धिहीन भी ठहराने की भूल कर रहे हैं। युवा समझ रहा है कि आतंकियों की संख्या बताने के जो बयान विपक्षी नेता दे रहे हैं, वे सिर्फ अपने राजनीतिक हित साधने के लिए हैं। सेना के पराक्रम पर संदेह ज्यादातर युवाओं के मन को बेचैन कर रहा है। ऐसे में यह कश्मकश उनके भीतर उमड़-धुमड़ रही है कि वंशवादी, परिवारवादी और जातिवादी राजनीति के क्या राष्ट्रहित हो सकते हैं? राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद व देश के भीतर ही अलगाववाद की चिंगारी को भड़काने में लगे देशद्रोहियों पर नियंत्रण का शिकंजा कौन कस सकता है? इस तरह के जिन राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर पुलवामा हमले के बाद ज्वार आया हुआ है, वह पारंपारिक राजनीतिक विचारधारा से भिन्न है। नतीजतन यह युवा मतदाता परिवारिक विचारधारा के प्रतिकूल जाकर भी मतदान कर सकता है। दरअसल युवाओं को पता है एयरस्ट्राइक हुई है। ऐसे मामलों में दुनिया का कोई भी देश सरकार और सेना से सबूत नहीं माँगता है। फिर भी अपने ही देश के कुछ नेताओं को एयरस्ट्राइक पर संदेह है ,तो युवा उनकी देशभक्ति पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करने लग गए हैं। इसे सोशलसाइटों पर युवाओं द्वारा की जा रही टिप्पाणियों से आसानी से समझा जा सकता है? फिर भी युवा मतदाता राष्ट्रवाद के ज्वार में बहकर इकतरफा मतदान करेगा, ऐसा मानना भी भूल होगी?  विपक्षी राजनेता यदि अनर्गल प्रलाप से बचते, तो ज्यादा बेहतर होता; क्योंकि इस प्रलाप से जाने-अनजाने युवाओं में यह संदेश गया है कि आतंक से लड़ने की विपक्षी नेताओं में साहस मोदी की तुलना में कम है। इसीलिए पुलवामा हमले के बाद केन्द्र सरकार द्वारा की गई जबाबी कार्यवाही को युवा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दुस्साहसिक पहल मान रहे हैं। गोया इन युवाओं का झुकाव भाजपा के पक्ष में जाता दिख रहा है।
सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीरामकॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224, 09981061100

शताब्दी विशेष

जलियाँवाला बाग़ गोलीकांड’ 
अप्रैल का काला और क्रूरतम दिन
- डॉ. कुँवर दिनेश सिंह

अमेरिकी कवि एलियट की बहुचर्चित उक्ति - "अप्रैल एक क्रूरतम माह है" के बहुत-से मानी निकाले जाते रहे हैं, परन्तु इसका सर्वाधिक मान्य भावार्थ है -दिसम्बर माह में शीत ऋतु में हुई हानि ह्रास का विषाद, जिसकी स्मृति-मात्र अप्रैल में वसन्त के चरम पर भी मानव-मन को खिन्न कर देता है। इसी आशय से एलियट ने अप्रैल को क्रूरतम माह कह दिया। भारतीय इतिहास में यह उक्ति एक अन्य सन्दर्भ में भी चरितार्थ होती है , वह है पराधीन भारत में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में अंग्रेज़ों द्वारा किया गया नरसंहार। आज सौ साल बीत जाने के बाद भी जैसे ही जलियाँवाला बाग़ गोलीकाण्ड का ज़िक्र जाता है, मन में उदासी के साथ-साथ रोष भर आता है, आक्रोश जाता है।
उस दिन बैसाखी थी।  पूरे भारत में बैसाखी का त्योहार मनाया जाता है, परन्तु पंजाब और हरियाणा में इसका विशेष महत्त्व है। किसान रबी की फसल काट लेने के बाद नए साल की खुशियाँ मनाते हैं। बैसाखी के दिन, यानी 13 अप्रैल 1699 को सिक्खों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। इस कारण से भी बैसाखी पंजाब और आस-पास के प्रान्तों में एक बड़े पर्व के रूप में मनाई जाती है। अपने पंथ की स्थापना के कारण सिक्ख इस दिन को सामूहिक जन्मदिवस के रूप में मनाते हैं। अमृतसर में बैसाखी मेला सैंकड़ों सालों से लगता चला रहा था।  उस दिन भी बैसाखी के मेले के लिए दूर-दूर से आए हज़ारों लोग स्वर्ण-मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग़ में एकत्र हुए थे।  इसी बाग़ में रॉलेट एक्‍ट का विरोध करने के लिए भी एक सभा हो रही थी।  1918 में एक ब्रिटिश जज सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में नियुक्त एक सेडीशन समिति  के सुझावों के अनुसार भारत प्रतिरक्षा विधान (1915) का विस्तार कर के भारत में रॉलट एक्ट लागू किया गया था, जो भारतीयों द्वारा स्वतन्त्रता के लिए किए जा रहे आंदोलन पर रोक लगाने के लिए था। इसके अन्तर्गत ब्रिटिश सरकार को ऐसे अधिकार दिए गए थे, जिनसे वह प्रेस पर सेंसरशिप लगा सकती थी, लोगों को बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तार कर सकती थी और बिना मुकद्दमे के जेल में रख सकती थी, उन पर बंद कमरों में अपना पक्ष रखे बिना मुकद्दमा चला सकती थी, इत्यादि। इस कारण इस एक्ट का पूरे भारत में लोग आन्दोलन कर रहे थे और गिरफ़्तारियाँ दे रहे थे। 

उस दिन अमृतसर पहुँचे बहुत-से लोग ऐसे थे, जो परिवार के साथ मेला देखने और अमृतसर शहर घूमने आए थे, लेकिन सभा की खबर सुन कर हाँ जा पहुंचे थे। जब नेता बाग़ में पड़ी रोड़ी के ढेरों पर खड़े होकर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर हाँ पहुँच गया। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं। आन्दोलनकारी नेताओं ने ब्रिटिश सैनिकों को देखकर वहां मौजूद लोगों से शांत बैठे रहने के लिए कहा। लेकिन सैनिकों ने बाग़ को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं। वहां मौजूद लोगों ने बाहर निकलने की कोशिश भी की, लेकिन अन्दर आने और बाहर जाने के लिए रास्ता एक ही था और बहुत सँकरा था, और डायर के फौजी उसे रोककर खड़े थे। इसी वजह से कोई बाहर नहीं निकल पाया। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआँ भी लाशों से भर गया।  डायर के आदेश पर ब्रिटिश सैनिकों ने बिना रुके लगभग 10 मिनट तक गोलियाँ बरसाईं। करीब 1650 राउंड फायरिंग की गई। बुलेट ख़त्म हो जाने तक फ़िरंगी फ़ौज लगातार फ़ायरिंग करती रही।
अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियाँवाला बाग़ में कुल 388 शहीदों की सूची है। बाग़ में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएँ से ही मिले। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है, जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग़ लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुताबिक 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए। पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी। घायलों को इलाज के लिए भी कहीं ले जाया नहीं जा सका, जिससे  लोगों ने तड़प-तड़प कर वहीं दम तोड़ दिया  
जनरल डायर रॉलेट एक्‍ट का बहुत बड़ा समर्थक था, और उसे इसका विरोध मंज़ूर नहीं था। उसकी मंशा थी कि इस हत्‍याकांड के बाद भारतीय डर जाएँगे, लेकिन इसके ठीक उलट ब्रिटिश सरकार के खिलाफ पूरा देश आंदोलित हो उठा। हत्‍याकांड की पूरी दुनिया में आलोचना हुई। आखिरकार दबाव में भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्‍टेट एडविन मॉन्टेग्यू ने 1919 के अंत में इसकी जाँ के लिए हंटर कमीशन बनाया। कमीशन की रिपोर्ट आने के बाद डायर का डिमोशन कर उसे कर्नल बना दिया गया, और साथ ही उसे ब्रिटेन वापस भेज दिया गया। मुख्यालय वापस पहुँचकर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को टेलीग्राम किया कि उस पर भारतीयों की एक फ़ौज ने हमला किया था, जिससे बचने के लिए उसको गोलियाँ चलानी पड़ीं। ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ड्वायर ने इसके उत्तर में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को टेलीग्राम किया कि तुमने सही कदम उठाया। मैं तुम्हारे निर्णय को अनुमोदित करता हूँ। फिर ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ड्वायर ने अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में मार्शल लॉ लगाने की माँग की, जो अंग्रेज़ सरकार लगा नहीं पाई। हंटर कमीशन की पूछताछ के दौरान डायर ने गोली चलाने का यह कारण दिया: "मैं समझता हूँ मैं बिना फ़ायरिंग के भी भीड़ को तितर-बितर कर सकता था, लेकिन वे फिर इकट्ठा होकर वापिस जाते और हँसते, और मैं बेवक़ूफ़ बन जाता. . ."  और उसने बड़ी निर्लज्जता के साथ यह भी स्वीकार किया कि फ़ायरिंग के बाद उसने घायलों का इलाज नहीं करवाया: "बिल्कुल नहीं। यह मेरा काम नहीं था। अस्पताल खुले थे; वे लोग वहाँ जा सकते थे।" किन्तु विश्वव्यापी निंदा के दबाव में ब्रिटिश सरकार ने उसका निंदा प्रस्ताव पारित किया और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफ़ा देना पड़ा। 23 जुलाई 1927 को पक्षाघात से उसकी मृत्यु हो गई।
जब जलियाँवाला बाग़ में यह हत्याकांड हो रहा था, उस समय ख़ालसा यतीमख़ाने में पला एक सिक्ख युवक,  धमसिंहवहीं मौजूद थे और उन्हें भी गोली लगी थी। इस घटना ने ऊधमसिंह को झकझोर कर रख दिया और उन्होंने अंग्रेजों से इसका बदला लेने की ठानी। हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख एकता की नींव रखने वाले ऊधमसिंह उर्फ राम मोहम्मद आजादसिंह ने इस बर्बर घटना के लिए मायकल ड्वायर को जिम्मेदार माना जो उस समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था, जिसके  आदेश पर ही ब्रिगेडियर जनरल डायर ने जलियाँवाला बाग़ को चारों तरफ़ से घेर कर गोलियाँ चलवाईं। 13 मार्च 1940 को उधमसिंह ने लंदन के कैक्सटन हॉल में लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ड्वायर को गोली चला के मार डाला।  31 जुलाई 1940 को ऊधमसिंह को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने ऊधमसिंह द्वारा की गई इस हत्या की निंदा करी थी;लेकिन उधमसिंह ने फ़ाँसी से पहले लेफ़्टीनेंट गवर्नर को मारने के अपने उद्देश्य के बारे में अदालत में ये शब्द कहे थे: "यही असली मुजरिम था। यह इसी के योग्य थे। यह मेरे देश के लोगों की आत्मा को कुचलना चाहता था; इसलिए मुझे इसे कुचलना ही था।"
इस हत्याकांड ने तब 12 वर्ष की उम्र के भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग़ हुँ गए थे। अंग्रेज़ी हुक़ूमत के ख़िलाफ़ उग्र आन्दोलन करते हुए वे भी भारत की आज़ादी के लिए शहीद हो गए। इस कांड के बाद भारतीयों का हौसला पस्त नहीं हुआ, बल्कि इसके  कारण देश में आज़ादी का आन्दोलन और अधिक उग्र और तेज़ हो गया था। उन दिनों संचार और परस्पर संवाद के साधनों के अभाव में भी इस गोलीकांड की खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई। अब केवल पंजाब नहीं, बल्कि पूरे देश में आज़ादी की जंग शुरू हो गई थी। पंजाब तब तक मुख्य भारत से कुछ अलग चला करता था, लेकिन इस कांड के बाद पंजाब पूरी तरह से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गया। 1920 में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन की नींव भी जलियाँवाला बाग़ का गोलीकांड ही था।

            1920 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा एक प्रस्ताव पारित होने के बाद साइट पर एक स्मारक बनाने के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की गई थी, जिसके तहत 1923 में स्मारक परियोजना के लिए भूमि ख़रीदी गई थी। अमेरिकी वास्तुकार बेंजामिन पोल्क द्वारा स्मारक का डिज़ाइन तैयार किया गया था। 13 अप्रैल 1961 को जवाहरलाल नेहरू और अन्य नेताओं की उपस्थिति में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस स्मारक  का उद्घाटन किया था। बुलेट की गोलियाँ दीवारों और आस-पास की इमारतों में आज भी देखी जा सकती हैं। गोलियों से खुद को बचाने की कोशिश कर रहे  लोग जिस कुएँ में कूद गए थे, वहशहीदी कुआँ आज भी पार्क के अंदर एक संरक्षित स्मारक के रूप में है। 1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी। 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए और उन्होंने विज़िटर्ज़ बुक में ये शब्द दर्ज़ किए: "ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी।"
यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था, तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता जलियाँवाला बाग़ में बसन्त" इस नरसंहार की नृशंसता एवं कुरूपता को बड़े ही करुण और मार्मिक शब्दों में कुछ इस तरह बयान करती है:

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है, /  हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना, / यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना, / दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें, / भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।
लाना संग में पुष्प, हों वे अधिक सजीले, / तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु तुम उपहार भाव कर दिखलाना, / स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर, / कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं, / अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।
कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना, / कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर, / शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना, / यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री विन्स्टन चर्चिल ने इस गोलीकाण्ड को इन शब्दों में बयान किया है: "भारतीयों की ऐसी भीड़ जमा थी कि एक ही बुलेट तीन-चार शरीरों के पार हो रहा था. . . लोग पागलों की तरह यहाँ-वहाँ भागने लगे। जब मध्य में गोलियाँ चलाईं गईं, तो वे किनारों की ओर भाग रहे थे। फिर किनारों पर गोलियाँ चलाईं गईं। बहुत से लोग ज़मीन पर लेट गए। फिर ज़मीन की ओर गोलियाँ चलाईं गईं। ऐसा आठ से दस मिनट तक किया गया, तब तक जब तक कि अस्लाह  ख़त्म नहीं हो गया. . . " उनके विवरण में कहीं कहीं खेद तो है, मगर उस समय, और ही उसके बाद आज तक अंग्रेज़ी सरकार द्वारा इस हत्याकांड की पुरज़ोर भर्त्सना की गई थी। ब्रिटिश उच्चायुक्त डोमिनिक अस्किथ   अमृतसर में जलियाँवाला बाग़ में  पहुँचे  और शहीदों को श्रद्धांजलि दी उन्होंने इस  कांड को शर्मनाक बताकर  खेद भी प्रकट दिया।  इतिहास उन्हें इस बर्बरता के लिए कभी क्षमा नहीं कर सकता; और भारतीयों के लिए 13 अप्रैल 1919 का दिन काला दिन रहेगा। भारत शहीदों की क़ुर्बानी को हमेशा याद रखेगा, सदा उनका ऋणी रहेगा। ¡

लेखक के बारे में-  हिन्दी और अंग्रेज़ी के जाने-माने लेखक, कवि, कथाकार एवं साहित्य-समालोचक हैं। वर्तमान में शिमला के राजकीय महाविद्यालय में अंग्रेज़ी के एसोशिएट प्रोफ़ेसर हैं और साहित्यिक पत्रिका "हाइफ़न" के सम्पादक हैं।  सम्पर्क: #3, सिसिल क्वार्टर्ज़, चौड़ा मैदान, शिमला: 171004 हिमाचल प्रदेश। -मेल: kanwardineshsingh@gmail.com  मोबाइल: +91-94186-26090

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