November 03, 2020

उदंती.com, नवम्बर 2020

वर्ष 13, अंक 3 

जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना, 

अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।   

-गोपालदास नीरज 

इस अंक में

अनकहीः हम सबको आलोकित करें... - डॉ. रत्ना वर्मा

जीवन दर्शनः लक्ष्मी: क्यों न चंचला होय -विजय जोशी

आलेखः मीठे होते रिश्ते -डॉ. महेश परिमल

पर्व संस्कृतिः दीपोत्सव और प्रवासी मन -शशि पाधा

व्यंग्यः दिवाली पर बल्ले-बल्ले! उर्फ किस्सा मुफ़्तेश्वर जी का -गिरीश पंकज

कहानीः एक थी बिन्नी -अनिता मंडा

दो ग़ज़लेः 1.नन्ही-सी लौ, ओस की बूँदों में -डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल

कविताः ज्योति जगाएँगे -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु

व्यंग्यः वैक्सीन आ रहा है ! -जवाहर चौधरी

लघुकथाः 1. अनपढ़ माँ, 2. छुटकारा, 3. पेंशन -कृष्णा वर्मा

कविताः दीपावली मनाएँ कैसे -डॉ. शिवजी श्रीवास्तव

संस्मरणः नन्ही-सी परी -प्रगति गुप्ता

कविताः 1. प्रथम अनिवार्य प्रश्न-सा, 2. झरोखे से -डॉ. कविता भट्ट

आलेखः ... महिलाओं को मजबूत करना है रूरी -देवेंद्र प्रकाश मिश्रा

व्यंग्यः प्यार और व्यापार -तर अली

कविताः औरत- गाथा -प्रेम गुप्ता मानी

लघुकथाः दिवाली की सफाई -महेश राजा

किताबेंः छत्तीसगढ़ी का प्रथम ताँका संग्रह -डॉ. सुधीर शर्मा

प्रेरकः दिन की शुरुआत किस काम से करनी चाहिए? -निशांत

अनकहीः हम सबको आलोकित करें...


  - डॉ. रत्ना वर्मा

हम भारतवासियों के लिए उत्साह, उमंग और खुशियों के साथ मिल-जुलकर मनाने वाला, साल का सबसे बड़ा सांस्कृतिक पर्व है -दीपावली। कोरोना के साए में पिछले सभी पर्व- त्योहार हमने सावधानी बरतते हुए, अकेले- अकेले यह कहते हुए मना लिये कि दीवाली तक तो सब कुछ सामान्य हो ही जाएगा, तब उजालों के इस महापर्व को हम सब मिल-जुलकर एकसाथ मनाएँगे। यह तो आप सब मानेंगे कि धैर्य और साहस के साथ हर मुसीबत का सामना करते हुए सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण और धर्म है।  से बहुत ही जिम्मेदारी से प्रत्येक भारतीय नागरिक ने अब तक निभाया है और आगे भी निभाएँगे।

 लेकिन फिर भी हम मनुष्य ही तो हैं , जब विपदा आती है, तो कुछ लोग कमज़ोर पड़ जाते हैं और निराशा के अंधकार में डूब जाते हैं , ऐसे समय में किसी का भी धैर्य न टूटे बस इसका ही तो ध्यान रखना है, क्योंकि कहते हैं न जब पानी सर से ऊपर चला जाता है, तो फिर कोई बाँध उको बिखरने से रोक नहीं सकता। आज इस अनिश्चितकालीन वैश्विक आपदा की घड़ी में हम सबको एक दूसरे का संबल बनकर, सबको साथ लेकर चलना है। पिछले कई महीनों से हम अपने आस-पास देख ही रहे हैं कि इस वायरस ने असंख्य अपनों को, असंख्य लोगों के  सुनहरे पनों को, असमय छीन लिया है। किसी के लिए भी यह अपूरणीय क्षति है इस दुःख से उबरना उनके लिए बहुत मुश्किल है। यह तब और अधिक दुःखदायी हो जाता है , जब इस महामारी की चपेट में आए अपने परिजन को उनका परिवार कंधा तक नहीं दे पाता। पारम्परिक संस्कारों से बँधा परिवार कितनी सघन पीड़ा सहने को मजबूर है; यह शब्दों से बयाँ  नहीं किया जा सकता। ऐसे समय में भावनात्मक संबल ही सबसे बड़ा सहारा बनता है।

 इस दौर में अनेक परिवार अलग- अलग भी हो गए हैं। जिनके बच्चे बाहर नौकरी कर रहे हैं, वे अपने माता- पिता के पास नहीं आ पा रहे हैं, आ भी रहे हैं तो एक दूरी बनाकर उनसे मिलने जाते हैं । बुजुर्ग माता- पिता के लिए यह एकाकीपन झेलना बहुत भारी हो गया है। स्कूल –कॉलेज बंद हैं, तो बच्चे घर के भीतर कैद हो कर रह गए हैं। युवाओं में एकाकीपन और नकारात्मकता घर करती जा रही है। घर में रह कर घर- बाहर, पति, बच्चे सबको संभाल रही महिलाएँ जिस प्रकार का तनाव झेल रही हैं, उनकी व्यथा का तो बखान ही नहीं किया जा सकता। असंख्य परिवार आर्थिक रूप टूट चुके हैं । इस प्रकार अनेक पारिवारिक, सामाजिक और मानसिक समस्याएँ इस दौर में उभर कर आ रही हैं । हम इन सबसे किस प्रकार बाहर निकल सकते हैं, टूटे- बिखरे लोगों को फिर से किस प्रकार से सक्षम बना सकते हैं, समाज की मुख्य धारा में पूर्व की तरह उन्हें  किस प्रकार से शामिल कर सकते हैं, यह गंभीरता से सोचना होगा;  ताकि उनके भीतर उभर रहे नकारात्मक सोच को निकालकर सकारात्मक ऊर्जा भर सकें।

इस दौर में बहुतों को अपने उद्योग और व्यापार में नुकसान हुआ है , पिछले कई महीनों से उनका कारोबार प्प हो गया है और उनसे जुड़े असंख्य कर्मचारी भी बेकार हो गए हैं, जिनके लिए चाहकर भी वे कुछ नहीं कर पा रहे, ऐसे में बेकार हो चुके मजदूर और कर्मचारियों को जीवन के आवश्यक संसाधन जुटाना मुश्किल हो रहा है, उन्हें अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए दूसरे रोजगार के साधन अपनाने पड़ रहे हैं ऐसे कई परिवारों की लोगों ने सहायता भी की है, ताकि वे अपना रोजगार फिर से खड़ा कर सकें, यही सबसे बड़ा मानव धर्म है। इस मामले में सोशल मीडिया ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है, जो काबिले- तारी है।   

आधुनिक जगत् में दिनचर्या में आनेवाले कई प्रकार के दबाव और तनाव भरी जिंदगी में सुख और शांति पाने के लिए जरूरी है हमारा दृष्टिकोण सकारात्मक हो, तभी हम इस आपदा के साथ आगे बढ़ सकते हैं। जो सब दृष्टि से सबल हैं, वे आगे आकर इस संकट की घड़ी में मानव सेवा करके अपने जीवन को सार्थक मोड़ दे सकते हैं। हमारी संस्कृति में सेवा को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है।सेवा परमो धर्मःकी बात कही जाती है। सेवा के अंदर दान, त्याग तथा समर्पण का भाव छुपा होता है। रूरतमंद की सेवा करके आप अपनी भी सेवा करते हैं; क्योंकि आप जितना दोगे, उससे कई गुना पाओगे। अपने लिए तो सब जीते हैं, एक बार दूसरों के लिए जीकर देखिए ;कितनी आत्मिक शांति मिलती हैं यह आप जान जाएँगे!

तो आइ
, उजाले के इस पर्व पर मन का अँधेरा मिटाएँ और सबके दिलों में रोशनी के दीप जलाएँ। बाहरी चमक-दमक से नुकसान ही होता है, यह इस कोरोना काल ने सबको अच्छे से बता दिया है, तो क्यों न मिट्टी के दिये जलाकर बिना शोर- शराबे के प्रदूषण मुक्त दीवाली मनाकर एक नया उदाहरण सबके सामने रखें। अपने घरों को बिजली के लट्टुओं से जगमग करने के बजा
उसपर खर्च होने वाले पैसे से किसी एक गरीब के घर को रोशन करें, अर्थात् उन्हें आथिर्क रूप से संबल बनाएँ। कानफोड़ू पटाखों पर लाखों खर्च करके आप अपने ही स्वास्थ्य के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं। बच्चों को एक बार कह कर तो देखिए कि इन पटाखों पर जितना पैसा तुम एक दिन में खर्च कर रहे हो उससे किसी एक परिवार का सात दिन का भोजन आ सकता है? ऐसा नहीं है कि हम प्रदूषण मुक्त दीपावली की बात पहली बार कर रहे हैं, हर साल करते हैं , सरकार भी अपने स्तर पर प्रतिबंध लगाने की बात करती है; पर कभी सफलता नहीं मिलती।  लेकिन प्रयास तो हम सबको मिलकर ही करना होगा। बस एक बार दृढ़ निश्चय करने की आवश्यकता है, फिर देखिए कैसे खुशियों से रोशन हो जाएगी आपकी ही नहीं,  हम सबकी दीवाली।

हम सबको आलोकित करें, तो हम स्वयं भी आलोकित होंगे। दीप पर्व की असंख्य शुभकामनाओं के साथ-

जहाँ तक हो सके हमदर्दियाँ बाँटो माने में,
मीं को सींचते रहने से दरिया कम नहीं होता।
 ( डॉ .गिरिराज शरण अग्रवाल)

जीवन दर्शन- लक्ष्मी: क्यों न चंचला होय

- विजय जोशी

(पूर्व ग्रुप महाप्रबंधक, भेल , भोपाल)

शास्त्रों के अनुसार  धर्म की परिभाषा है- धारयति इति धर्मं अर्थात् जीवन में जो भी धारण करने योग्य है वही धर्म है। हम सब ने बाल्यकाल से यही तो सुना है कि सत्यं वद यानी सदा सच बोलना, प्राणिमात्र पर दया करना, किसी को धोखा न देना इत्यादि इत्यादि हमारा धर्म है। लेकिन धर्म रूपी इस साफ्टवेयर का परित्याग कर लोगों ने उसे हार्डवेयर अर्थात अनुष्ठानों, परपम्पराओं व संकीर्ण सोच के दायरे में सिमटा दिया। वस्तुत: धर्म तो एक जीवन संहिता है। सुचारु, स्वस्थ तथा सामयिक जीवन जीने की यात्रा का अचूक मंत्र। यह तो हुई एक बात।

     दूसरी यह कि धर्म कोई भी हो सब में संदेश एक ही है। सार्थक परहितकारी जीवन जीते हुए अंतत: परमात्मा से मिलन, जो एक है और परम पिता  कहलाता है। याद रखि ईश्वर एक और केवल एक है एवं जीवन यात्रा का अंतिम सोपान है। उपासना, पूजा, आराधना कैसी भी हो सकती है साकार, निराकार या अन्य कुछ पर उद्देश्य एक ही है। जहाँ अन्य धर्मों में ईश्वर की परिकल्पना हेतु सख़्त आदेश या नियमावली है, वहीं हिन्दू धर्म में इसे लचीला रखते हुए बकलम संत डोंगरेजी जीव की भिन्न भिन्न अभिरुचि के दृष्टिगत परमात्मा  अनेक स्वरूपों में प्रकट है, किन्तु जिस तरह हर प्रवाहमान नदी का गंतव्य समुद्र ही है, उसी तर्ज पर इसमें भी एको ब्रह्मो द्वितीयो नास्ति का उद्घोष किया गया है।

        तीसरी बात भारतीय दर्शन में स्त्री पुरुष के सम्मिलित स्वरूप को एक इकाई माना गया है और इस तरह प्रकृति में निरंतरता या सृजन के क्रम को सुनिश्चित किया गया है। वस्तुत: नारी प्रथम पूज्या है,  फिर भले ही वह मृत्युलोक हो या देवलोक। यही कारण है कि ज्ञान की देवी सरस्वती तो संपत्ति और अर्जन की देवी  लक्ष्मी की पूजा का प्रावधान किया गया है क्रमशः बसंत पंचमी तथा दिवाली पर।

       और अब हम आते हैं लक्ष्मी को चंचल कहे जाने की प्रथा पर, जिसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि वे विष्णुप्रिया यानी सुखकर्ता दुखहर्ता सर्व लौकेक एक नाथ विष्णु की पत्नी हैं, जिन्हें आरंभ तथा अंत अर्थात् सृजन एवं संहार  के मध्य  प्रजापालक भी कहा गया है। किन्तु देखि होता क्या है युगल यानी पति पत्नी दोनों को एक साथ आमंत्रित करने के बजाय लोग केवल लक्ष्मीजी का आह्वान कर पूजते हैं। आदि देव भगवान विष्णु को पूछते भी नहीं। सब चाहते हैं लक्ष्मी का उनके घर में स्थायी निवास हो, ताकि वे अनंत काल तक पीढ़ी- दर- पीढ़ी सम्पन्न  बने रहने की कामना की पूर्ति  कर सकें और कुछ न साझा करना पड़े। पर यह करते समय वे भूल जाते हैं कि हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पत्नी कभी पति से विलग नहीं होती और कितनी भी श्रद्धा या समर्पण से पूजा की जाए, वे वापिस जाती हैं अपने धाम। इसका  एक कारण संभवतया कलियुग में यह भी हो सकता है कि लोगों में संग्रह का भाव प्रबल होता है और वे विष्णु को आमंत्रित कर संपत्ति की गरीब, निर्धन, असहाय जनों के साथ साझेदारी  की मानसिकता से परे रहना चाहते हैं। व्यक्ति कितना भी संपन्न क्यों न हो; पर लेनेवाले (Taker) से देनेवाला (Giver) नहीं होना चाहता। सोचि यदि लक्ष्मी का वास स्थिर होता तो क्या होताधनी तो निरंतर धनी होता चला जाता परिश्रम को परे रखते हुए। धन पर एकाधिकार से उसके मानस में अहंकार उपज जाता। गरीब के जीवन में कष्टों का अम्बार लग जाता। सामाजिक संतुलन ध्वस्त हो जाता। उन्नति, प्रगति व विकास के लि आवश्यक धन तिजोरियों मे कैद होकर रह जाता। सब ओर त्राहि- त्राहि हो जाती। सर्वनाश। 

   सो इस पवन वेला में निवेदन है कि हम सब इस वर्ष दिवाली के अवसर पर संग्रह के भाव को परे रखते हुए उसे समाज हित में साझा करने तथा पुण्य प्राप्ति हेतु तथा इस लोक के साथ ही साथ परलोक सँवारने के लि माँ लक्ष्मी को भगवान विष्णु सहित पधारने का निमंत्रण दे, जीवन को सार्थक बनाने का उपक्रम पूरे मनोयोग से करें।

            चलते चलते : और अब अंत में एक छोटी सी बात निर्मल मनोरंजन हेतु। एक बार लक्ष्मीजी का वाहन उनसे नारा हो गया और आज्ञा लेकर बोला कि आप तो सब जगह पूजी जातीं हैं, लेकिन लोग मेरे नाम का उपहास करते हैं। मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। बात सही थी, सो लक्ष्मी को जमी भी और उन्होंने तुरंत वरदान दिया कि आज के बाद तुम्हारी पूजा सर्वप्रथम होगी तथा उसके बाद ही मैं पूजा स्वीकार करूँगी। मित्रों हम सबने देखा है कि दीपावली त्योहार हमेशा करवा चौथ के बाद ही आता है। है न मजेदार। यह बात समझ में तो आ ही गई होगी।

            यह तो हुई एक हल्की- फुल्की बात, किन्तु इसमें भी समाई है एक सीख समस्त पति समुदाय के लि। यह सर्वविदित तथ्य है कि हिन्दू दर्शन में स्त्री को गृह लक्ष्मी का दर्ज़ा दिया गया है, जो परिवार में माँ, पत्नी, बहन, बेटी सहित अनेक रूपों में सबकी सेवा सदैव पूरे समर्पण से कामनारहित होकर करती है। अत: इसके परिप्रेक्ष्य में पूरे स्नेह, दुलार और सम्मान की अधिकारी है। और हम सबका कर्तव्य है उसके मान सम्मान की गरिमा को कायम रखने का, उसमें निरंतर अभिवृद्धि का कृतज्ञता के भाव के साथ। भला कहिये भारत छोड़ पूरे संसार में और कहाँ स्त्री स्वरूपा मातृ रुपेण, शक्ति रूपेण माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों में आराधना, वर्ष में दो बार नौ दिनों तक वर्षों से निरंतर पूरी श्रद्धा एवं समर्पण के साथ की जाती रही है।

जग के मरुथल में जीवन की, 

नारी ज्वलंत अभिलाषा है। 

ममता की त्याग तपस्या की,

यह श्रद्धा की परिभाषा है।

सम्पर्क: 8/ सेक्टर-2, शांति निकेतन (चेतक सेतु के पास), भोपाल-462023, मो. 09826042641,                                       E-mail- v.joshi415@gmail.com

आलेख- मीठे होते रिश्ते

- डॉ. महेश परिमल

अब तक जीवन तो नहीं, पर हम  तेज़ी  से भाग रहे थे। उसी जीवन को अनदेखा करते हुए, जिसके लिए हम जीना चाहते हैं। कई बार ज़िंदगी  ने हमें रोकने की कोशिश की, ज़रा थम जाओ, इतनी  तेज़ी  से कहाँ भागे जा रहे हो। रुक  लो,  साँस ले लो, घर-परिवार की ओर भी एक नर डाल लो। बच्चों से बात कर लो। पत्नी का हाल-चाल पूछ लो। बूढ़े माता-पिता के पास बैठकर अपना बचपन याद कर लो। इन सारी बातों को छोड़कर हम सब भागे जा रहे थे। हम कहाँ भाग रहे थे, हमें खुद ही इसका पता नहीं था। भागना हमारी नियति थी। क्योंकि सभी भाग रहे थे। ज़िंदगी  को छोड़कर किसी बियाबान की तरफ...।

इस भागती ज़िंदगी  पर अचानक कोरोना ने ब्रेक लगा दिया। लगा, सब कुछ थम गया। अचानक आए इस अवरोध के लिए कोई तैयार ही नहीं था। अब क्या होगा, यह सवाल हर कोई एक-दूसरे से पूछ रहा था। जिसका जवाब किसी के पास नहीं था। ज़िंदगी  थम गई, पर नहीं थमी, तो वह थी जिजीविषा। रोजी-रोटी तो चलानी ही थी। इसलिए घर ही सभी का केंद्र बिंदु हो गया। घर में ही रहकर जाना कि घर क्या होता है ? अब तक तो यह हमारे लिए किसी धर्मशाला से कम नहीं था। आपाधापी में हम सब कुछ भूल गए थे।

इस बीच कई त्योहार आए। पहले आया होली, तब सभी ने महसूस किया अपनों के बीच अपनापा। सारी कटुता रंगों में घुल गई। एक नई ज़िंदगी  हमारा इंतजार करने लगी। घर के सदस्यों के बीच वार्तालाप बढ़ने लगा। सभी एक-दूसरे को समझने लगे। जो दूरियाँ थीं, वह सिमटने लगी। कभी हँसी-मजाक भी हो जाता। अपनों की हँसी इतनी निश्छल होती है, यह पहली बार जाना। इस हँसी में घुल गई सारी कटुता। हम सब करीब आए। इसी बीच बच्चे को पता चला कि पापा इतना अच्छा गा भी लेते हैं। पापा का यह रूप तो केवल मम्मी की यादों में ही था। भैया तो बाँसुरी कितनी अच्छी बजा लेता है, किसी को पता है। दीदी की तो न पूछो, वह तो मन्ना डे के शास्त्रीय गाने कितने अच्छे से गा लेती है, किसी को पता है। मम्मी ने तो कथक में एम.ए. किया है, यह तो किसी को भी नहीं पता। सभी जानते हुए भी एक-दूसरे की प्रतिभाओं से अजान थे। पोते को भी पहली बार पता चला कि 75 साल की दादी माँ इतनी सुरीली आवाज में भजन गाती हैं। उनके पोपले मुँह से भजन सुनना कितना आह्लादकारी था, यह किसी ने नहीं जाना था। अरे! सब छोड़ो, मम्मी अकेले ही कितनी अच्छी-अच्छी मिठाइयाँ बनाती हैं, यह किसने जाना था। पता चला कि यदि सभी का थोड़ा-थोड़ा सहयोग मिल जाए, तो मम्मी बहुत-कुछ कर सकती है।

सब-कुछ नया-नया-सा लगने लगा। इस कोरोना ने जीवन को पूरी तरह से ऊर्जामय कर दिया। कई प्रतिभाएँ सामने आईं। सभी कुछ न कुछ नया करने लगे। बाहर जाने पर बंदिशें थीं, तो घर पर ही अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर मिला। साधन सीमित थे, पर संभावनाएँ अपार थीं। पता चला कि जो चींजे अब तक बाजार से ला रहे थे, उससे अच्छा तो हम बना लेते हैं, भले ही वह पिज्जा, बरगर हो या फिर कुछ और सामान। घर में ही रखे सामान से हमने कुछ ऐसा बना लिया, जो सभी को भला लगा। सृजन के इस आनंद का लाभ सभी ने लिया। अखबार-टीवी से पता चला कि बाकी दुनिया के हाल तो बहुत ही बुरे हैं। विषाद के इन क्षणों में हमारा सृजन- संसार काफी विस्तृत हो गया। हम स्वावलम्बी हो गए। आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया गया हमारा यह कदम हमें किन ऊँचाइयों तक ले गया, इसका हमें पता ही नहीं था। जब अपनों की दृष्टि हमारे सृजन की ओर गई, तब पता चला कि हमारे भीतर का अकुलाता कलाकार बाहर आ गया है। रिश्ते मीठे होने लगे हैं।

अब हम सब अपनी जड़ों की ओर लौटने लगे हैं। उन जड़ों को, जिन्हें हम कब का छोड़ चुके थे। अतीत का हिस्सा बन गई थीं हमारी जड़ें। आज पता चला कि सचमुच कितनी मजबूत हैं हमारी जड़ें। अब जाना कि कितने त्योहार होते हैं, जो अपनों को अपने से मिलाने का काम करते हैं। संकोच की दीवारें टूटीं, लोग खुलकर बतियाने लगे। जिस पापा के घर आते ही सन्नाटा छा जाता था, उसी पापा को बच्चे घोड़ा बना रहे थे। दादा-दादी या फिर नाना-नानी से जाना कि उनका कितना महत्त्व है, हमारे जीवन को चलाते रहने में। जीवन की संतुष्टि देने का काम कर रहे हैं सभी। अब तक जो चीजें कबाड़ की शोभा थीं, वही चीजें नए रूप में हमारे सामने आ गईं। सावन सोमवार, रक्षा बंधन, जन्माष्टमी के अलावा जन्म दिन भी इस बार विशेष लगे। ये सब हमसे कब छूटकर अलग हो गए थे, फिर हमसे आ मिले।

अब हमने जाना कि साफ-सफाई का जीवन में कितना महत्त्व है। घर में जड़ी-बूटियों से बनने वाली जो चीजें हमें नहीं भाती थीं, वही अब जायकेदार लगने लगी हैं। अब जाना कि आखिर दादी और माँ रोज पेड़ों की पूजा क्यों करती थीं। अब जाना कि आँगन में तुलसी का पौधा कितना रूरी है। त्योहार क्यों रूरी है। उसी से हमने पाई ऊर्जा। हममें मिलनसारिता बढ़ गई है। हम सब काफी करीब आ गए हैं, कभी न दूर जाने के संकल्प के साथ। सोचो, यदि कोरोना का यह कहर न होता, तो क्या हमें इस तरह के जीवन के दर्शन होते? आभार कोरोना, मजबूरी में अवसर तलाश करने की शक्ति देने का....

सम्पर्कः टी-3 204, सागर लेक व्यू, वृन्दावन नगर, भोपाल- 462022 मोबाइल- 0997727625

पर्व- संस्कृति- दीपोत्सव और प्रवासी मन

- शशि पाधा
विश्व भर में त्योहारों का स्वरूप भिन्न होता है। इन्हें मनाने की विधियाँ अलग हैं; परन्तु इन सभी त्योहारों का मूल उद्देश्य एक है...  समस्त विश्व जन को एक सूत्र में पिरोए रखना। सभी त्योहार लोगों को जीवन के प्रति उत्साह, खुशी व भाई-चारे का संदेश देते हैं। हम प्रवासियों के लिए हमारे त्योहार सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक, हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण  हैं। ये हमारी संस्कृति का गौरव हैं और हमारी पहचान भी।

भारतीय विश्व के विभिन्न देशों में बसे हैं। भिन्न देश, भिन्न दिशाएँ, विभिन्न संस्कृतियाँ, यहाँ तक कि प्राकृतिक एवं भौगोलिक अंतर भी इतना कि इन देशों में कई समुन्दरों की दूरी, दिन और रात का भी अलग-अलग समय, चाँद और सूरज के आने-जाने का भी समय अलग है; किन्तु इन असमानताओं के बावजूद कोई भी विभाजन विश्व संस्कृति को विभाजित नहीं कर सकता। मानव मात्र की कामना, उनकी भावना, उनके सपने एक हैं। सत् चित् आनन्द की प्राप्ति और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विश्वभर में कई प्रकार के पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं।

अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोग हर त्योहार उतने ही उल्लास एवं उत्साह से मनाते हैं, जितना भारत में मनाया जाता है। सच्ची बात कहूँ तो मुझे लगता है कि उत्साह का यह मापदंड कुछ अधिक मात्रा में ही हो जाता है; क्योंकि हर भारतीय परदेस में होने के कारण अपने भारतीय परिवार, भाई- बहन के बिना कुछ कमी महसूस करता है। साथ में उस परिवेश की कमी भी उसे खलती है, जिसमें वह पला बढ़ा है; लेकिन यह सब बातें उसके उत्साह में कोई कमी नहीं होने देती।

 दीपावली का त्योहार मनाने का अमेरिका का अपना ही विशेष ढंग है। यहाँ हमें भारत की तरह सजे हुए बाज़ार तो नहीं दिखाई देते और न ही वो धूमधाम;  लेकिन दिवाली के कुछ दिन पहले ही भारतीय दुकानों में वही सजावट, वही चहल- पहल आरम्भ हो जाती है। लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ, विभिन्न प्रकार के रंग- बिरंगे दीपक, दीवारों पर टाँगने वाले कागज़ के झाड़-फानूस, आरती की थालियाँ, पूजा सामग्री ... यानी दीपावली के दिन प्रयोग में आने वाली हर वस्तु आसानी से उपलब्ध हो जाती है। अब तो  कपड़ों की बड़ी- बड़ी कम्पनियों की दूकानों में  दीवाली के आसपास भारतीय परिधान भी बिक्री के लिए सजाए होते हैं। किसी भी भारतीय वस्तु की कमी नहीं लगती।

 सुना है 70-80 के दशक में भारतीय लोगों को अमेरिका में मिठाई उपलब्ध नहीं थी। उस समय यहाँ की भारतीय गृहणियों ने जैसे-तैसे एक दूसरे से सीख- सीखकर मिठाई बनाकर त्योहारों के चाव पूरे कर लिए। मेरी कुछ मित्र बताती हैं कि केवल हलवा बनाकर ही गुज़ारा हो जाता था। समय बदला, परिस्थितयाँ बदलीं और अब तो दीवाली के कई दिन पहले ही भारतीय दुकानों में हर प्रकार की ताज़ा मिठाई उपलब्ध हो जाती है। लोग मज़े से खरीदते भी हैं और बाँटते भी हैं।

जुलाई की महीने में अमेरिका का स्थापना दिवस मनाया जाता है। उस उत्सव के लिए स्थान- स्थान पर आतिशबाजियाँ, अनार, बम्ब, फुलझड़ियाँ और कई प्रकार के पटाखे आदि के स्टॉल लग जाते हैं। हम भारतीय उसी दिन आने वाली दीपावली के लिए यह सारी सामग्री ख़रीद लेते हैं;क्योंकि, बाद में इनका मिलना इतना आसान नहीं।

 दीपावली से पहले कई बड़े- बड़े मैदानों में भारतीय मेलों का आयोजन हो जाता है। वास्तव में दीपावली से पहले नवरात्रि का उत्सव मनाया जाता है; इसलिए यह मेले और सामूहिक उत्सव नवरात्रि के दिनों से ही आरम्भ हो जाते है। कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है। मंदिरों में नवरात्रि की पूजा और गरबा नृत्य के आयोजन के साथ साथ दीपावली की तैयारी शुरू हो जाती है। फूलों से, रंगों से विभिन्न प्रकार की अल्पना और रंगोली सजाने की प्रतिस्पर्धाएँ आयोजित होती हैं। बच्चों के नृत्य एवं गायन के कार्यक्रम भी आयोजित कि जाते हैं। कुल मिलाकर भारतीय परम्परा और संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का भरसक प्रयास किया जाता है।

 दीपावली के दिन सरकारी अवकाश नहीं होता, इसलिए उस सप्ताह के रविवार या शनिवार को यह उत्सव सामूहिक रूप से मनाया जाता है। भारतीय घरों में तो दीपावली के दिन पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना होती है, स्वादिष्ट भोजन बनता है और घरों को सजाया जाता है। दीपावली के आसपास यहाँ का मौसम बहुत ठंडा हो जाता है। उसके लिए तो सब तैयार रहते है अधिकतर उस रात तेज़ हवाएँ चलती हैं और घरों के बाहर दीपक रखना असम्भव हो जाता है। घरों को बिजली की बल्बों की दीप मालाओं से सुसज्जित किया जाता है और बिजली के ही टिमटिमाते दीपों को घर के बाहर सजाया जाता है; लेकिन हर घर के अंदर मिट्टी के ही दीपक जलते हैं।

हमारे परिवारों में बच्चे न कपड़े पहनते हैं, रात को लक्ष्मी पूजन होता है और उपहारों का आदान-प्रदान होता है। रात को पटाखे आदि चला  जाते हैं। यह सब देखकर मुझे अपना बचपन याद आ जाता है जब हम सब दीपावली को इसी प्रकार से मनाते थे। इस संदर्भ में मैं अमेरिका में रहने वाली युवा पीढ़ी को साधुवाद कहना चाहूँगी कि वे सब अपनी परम्परा को जीवित रखने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

अमेरिका में भारतीय लोग विभिन्न राज्यों में हैं, विभिन्न व्यवसाय में हैं और यहाँ की सरकार के मन में हम भारतीयों के लिए अपार आदर मान है। इसी मान को ध्यान में रखते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में भी दीपावली का उत्सव मनाया जाता है। दीप माल और रँगोली सजती है और कुछ प्रतिनिधि वहाँ राष्ट्रपति के परिवार के साथ भारतीय भोजन आदि के लिए भी आमंत्रित होते हैं। कुछ वर्ष पहले दीपावली के विशेष महत्त्व को पहचानकर अमेरिकी सरकार ने दीपावली के अवसर पर एक विशेष डाक टिकट भी जारी किया था जिसे हर भारतीय ने बड़े गर्व के साथ ख़रीदा और सँजोकर रखा।

मेरे परिवार को अमेरिका में बसे हुए बीस वर्ष से अधिक हो ग हैं। हमारा संयुक्त परिवार है और हर त्योहार पूरी भारतीय परम्पराओं के साथ मनाया जाता है। बच्चों में भी वही उत्साह देखा जाता है, तो मन में विदेश में आ बसने का मलाल कुछ कम हो जाता है। यह कोरोना काल है। इस वर्ष सामूहिक उत्सव नहीं हो रहे और न ही परिवार - मित्र परस्पर दीपावली भोज आदि के कार्यक्रम बना रहे हैं।  फिर भी उत्सव तो उत्सव है और वह भी अँधेरे पर विजय पाने का ज्योतिपर्व। इस वर्ष माँ लक्ष्मी से धन और समृद्धि की प्रार्थना के साथ- साथ विश्व को इस महामारी से मुक्त करने की प्रार्थना की बहुत आवश्यकता है। आशा है माँ लक्ष्मीं आने वाले  समय में सम्पूर्ण चराचर को रोगमुक्त करे। आप सब को दीपोत्सव की बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

Email : shashipadha@gmail.com

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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