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Sep 1, 2022

उदंती.com, सितम्बर- 2022

वर्ष- 15, अंक- 1

भाषा की समृद्धि स्वतंत्रता का बीज है।   
 -लोकमान्य तिलक

इस अंक में

अनकहीः  योजनाओं के मकड़जाल में देश - डॉ. रत्ना वर्मा 

हिन्दी दिवसः जब भाषाएँ मरने लगती हैं - डॉ. आशीष अग्रवाल

हिन्दी दिवसः संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनी हिन्दी - प्रमोद भार्गव

आधुनिक बोध कथा-9ः पैसा पैसे को खींचता है - सूरज प्रकाश

आलेखः हम अपनी गलतियों से ही सीखते हैं - सीताराम गुप्ता

जीव-जगत्: कबूतर 4 साल तक रास्ता नहीं भूलते - स्रोत फीचर्स

यात्रा-संस्मरणः गढ़ मुक्तेश्वर- गंगा मैया की आरती का अद्भुत नजारा - अंजू खरबंदा

स्वास्थ्यः टाइप-2 डायबिटीज़ - महामारी से लड़ाई - डॉ. डी. बालसुब्रमण्यम

नवगीतः सारे बन्धन भूल गए - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

कविताः हमें बेखौफ उड़ने दो - डॉ. शिप्रा मिश्रा

चिंतनः जीवन के कुछ पल - साधना मदान

व्यंग्यः आप कौन से अतिथि हैं - राजेंद्र वर्मा

कविताः धरोहर के रूप में - डॉ. लता अग्रवाल

ग़ज़लः रोज बहाने - विज्ञान व्रत

लघुकथाः शबरी के बेर - ज्योति जैन 

लघुकथाएँ: मनीऑर्डर, वह लड़की है, जहरीली घास - खेमकरण सोमन  

किताबेंः स्त्री संघर्ष का जीवंत दस्तावेज़ - भावना सक्सैना

कविताः भूल न पाओगे - डॉ. महिमा श्रीवास्तव

जीवन-शैलीः खुश रहना हो तो प्रकृति के पास जाएँ - समीर उपाध्याय ‘ललित’

जीवन दर्शनः मानव जीवन: एक अनसुलझी पहेली - विजय जोशी

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अनकहीः योजनाओं के मकड़जाल में देश

डॉ. रत्ना वर्मा

समग्र विकास के लिए देश में बहुत सारी योजनाएँ चलाई जाती हैं। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो केंद्र से लेकर राज्य और ब्लॉक स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक चलाई जा रही इन योजनाओं का उद्देश्य देश की जनता की खुशहाली, तरक्की और उनके जीवन स्तर को ऊँचा उठाना तथा क्षेत्र का विकास करना ही होता है। इनमें से कुछ योजनाओं का लाभ सीधे जनता को मिलता है और कुछ किसी क्षेत्र विशेष के विकास के लिए होती हैं, वह भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप में जनता से ही जुड़ी होती है। लेकिन जब हम इन योजनाओं के बनने से लेकर उनसे मिलने वाले फायदे तक की बात करते हैं,  तो अंत तक आते आते पता चलता है कि बहुत सारी योजनाओं ने कागजों में ही दम तोड़ दिया है, अनेक योजनाएँ आरंभ तो होती हैं;  पर भ्रष्टाचार, घोटालों और कमीशनखोरी के जाल में फँसकर आधी अधूरी रह जाती हैं और बहुत सी योजनाएँ बनते- बनते सरकारें बदल जाती हैं। फायदा उठा ले जाते है बीच के लोग और जनता है कि देखती रह जाती है फिर एक नई योजना के इंतजार में।

जब सरकार इन योजनाओं की रूपरेखा बनाती है तो कागजों में इसे देखकर लगता है कि जिनके लिए या जिस भी क्षेत्र के विकास के लिए यह योजना बनाई गई है, उसके पूरी होते ही चारों ओर खुशहाली छा जाएगी, जनता अपनी चुनी हुई सरकार पर गर्व करेगी। परंतु आजादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी हम गर्व के साथ यह नहीं कह पाते कि हमने वे सारी खुशियाँ पा ली हैं, जिनका सपना आजाद भारत ने देखा था।

हम यह नहीं कहते कि विकास के नाम पर देश में कुछ भी नहीं हुआ है हुआ है,  गुलाम भारत और आजादी के 75 साल के भारत में जमीन- आसमान का अंतर आया है;  लेकिन बात अंतर की नहीं है बात इन 75 वर्षों में देश सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्तर पर जो उपलब्धि दिखाई देनी चाहिए, वह नहीं दिखाई देती। विकास के नाम पर विनाश ही अधिक नजर आता है। हमने विकास के नाम पर अपनी संस्कृति, सभ्यता, जीवन मूल्य और पर्यावरण को इतना अधिक नुकसान पहुँचाया है कि समूची धरती ही खतरे में दिखाई देने लगी है। विकास के नाम पर बनाई गई ऐसी योजनाओं का क्या औचित्य, जो भ्रष्टाचार और कालाबाजारी को बढ़ावा देती हों, जो गरीबी और बेरोजगारी पैदा करती हो?

योजनाकार जमीनी हकीकत से दूर बंद कमरे में बैठकर कागज़ों पर ये योजनाएँ बनाते हैं ; पर जैसे ही इन्हें लागू करने की बात आती है अनेक अड़चनों का अम्बार खड़ा हो जाता है परिणाम योजनाएँ कागजों पर ही दम तोड़ देती हैं। सन् 1951 को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में पहली पंचवर्षीय योजना की शुरूआत की थी। जिसका मुख्य उद्देश्य देश की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना तथा देशवासियों के जीवन स्तर में सुधार लाना है। इस तरह अब तक 13 पंचवर्षीय योजनाएँ भारत में चलाई जा चुकी हैं। कृषि, उद्योग, ग्राम विकास, शिक्षा, घरेलू उद्योग को बढ़ावा देने जैसी अनेक योजनाएँ प्रत्येक पाँच साल के लिए बनाते हैं। प्रत्येक पाँच साल बाद जब नई योजना बनती है, तो पिछली योजना को भुला दिया जाता है। बगैर कोई समीक्षा के उसे बंद भी कर दिया जाता है।

दु:खद स्थिति ये है कि आजादी के बाद से जो भी योजना बनती है, उसमें राजनीतिक दल ऐसी योजनाओं को लागू करना पसंद करते हैं, जो उन्हें वोट दिला सके। इसी प्रकार केंद्र सरकार प्रधानमंत्री योजना का नाम देकर अनेक योजनाएँ शुरू करती है और राज्य सरकार मुख्यमंत्री के नाम से योजना शुरू कर मतदाताओं को अपने- अपने पक्ष में करने का प्रयास करती रहती हैं। सरकार अनेक कल्याणकारी योजनाएँ चलाकर गरीब जनता को अपने पक्ष करके राजनीति के दाँव- पेंच खेलती है। इस राजनीतिक उठापटक में जनता पिसती चली जाती है और इस उम्मीद में कभी इस दल को कभी दूसरे दल को अपना बहुमूल्य वोट देकर भ्रम जाल में फँसी रहती है।

जो भी योजनाएँ बनाई जाएँ, उनको लागू किया जाए  तथा उसकी समीक्षा भी की जाए। किसी भी योजना को सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करके लागू न किया जाए। जिस वर्ग के कल्याण के लिए  योजना बनाई गई है, उस तक योजना  का लाभ पहुँचना चाहिए।

हिन्दी दिवसः जब भाषाएँ मरने लगती हैं

  - डॉ. आशीष अग्रवाल

विलुप्त होती हुई भाषा का प्रतीक

अमेरिका की एक अश्वेत 90 वर्षीय प्रसिद्ध लेखिका ने एक बार एक छोटी सी कथा सुनाई थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि अमेरिका में रहने वाली एक वृद्धा थी, जो बहुत ही ज्ञानवान् थी, परंतु अब वृद्धावस्था के कारण वह वृद्ध महिला, अपनी दोनों आँखें खो चुकी थी। वह वृद्ध महिला, अपनी बुद्धि और अपने ज्ञान के कारण, पूरे शहर में पहचानी जाती थी, परंतु फिर भी कुछ युवक उसका उपहास उड़ाते रहते थे। एक बार कुछ युवा उसके पास पहुँचे और उनमें से एक बोला - ‘देखो मैडम, मेरे हाथ में एक चिड़िया है, तुम्हें बताना है कि यह जीवित है या मृत है?’ महिला तो कुछ देख नहीं सकती थी, इस कारण वह क्या बोलती और इसीलिए चुप रही। लेकिन कुछ क्षण बाद उस महिला ने अपनी चुप्पी तोड़ी और वह बोली - ‘बेटा, मुझे यह तो नहीं पता कि तुम्हारे हाथ में जो चिड़िया है, वह जीवित है या मृत है, परंतु मैं यह अवश्य बता सकती हूँ कि इस चिड़िया का जीना या मरना तुम्हारे ही हाथ में है।’ उन युवाओं को उस वृद्ध महिला की ये बातें समझ में नहीं आईं और वे खिल्ली उड़ाते हुए वहाँ से चले गए। वहीं बराबर में कुछ और अमेरिकी विद्वान् लोग बैठे थे। वे इस गूढ़ रहस्य को समझ गए और उन्होंने बताया कि उस अंधी वृद्ध महिला के कहने का अर्थ यह था कि यह जो चिड़िया है, यह अमेरिका की विलुप्त होती हुई भाषा का प्रतीक है और यह जो युवा हैं, वे इस चिड़िया (भाषा) की रक्षा करने वाले या फिर उसकी हत्या करने वाले हो सकते हैं।’

भाषाओं को खत्म करने की एक मुहिम

जिस किसी भी देश में भाषाओं को जबरदस्ती थोपा गया है, वहाँ यह भी देखा गया है कि यदा-कदा उस भाषा को बोलने वालों ने अपना विरोध दर्ज कराया है और उस विरोध को दबाने/ खत्म करने के लिए सरकारों ने बर्बरता भी की है। जब आप जबरदस्ती किसी को अपनी मातृभाषा को भुलाकर, विदेशी भाषा को अपनाने का जोर डालेंगे, तो कुछ ना कुछ प्रतिकार (रिएक्शन) तो होगा ही, फिर आप (सरकार) उसी प्रतिकार को, हिंसा का नाम देकर, उसे दबाने के लिए और अधिक हिंसक हो जाएँगे। क्या यह उचित है? इस सब के पीछे अमेरिका जैसे बड़े देश में प्रचलित सैकड़ों भाषाओं को खत्म करने की एक मुहिम की ओर इशारा किया गया है। और केवल अमरीका ही क्यों, भारत जैसे सैकड़ों देशों में, पुरानी और लोकप्रिय भाषाओं की हत्या की जाती रही है, और शायद एक ही भाषा को बढ़ावा दिया जाता रहा है। जब किसी लोकप्रिय क्षेत्रीय भाषा का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तो उसके साथ-साथ क्या समाप्त हो जाता है, कभी आपने सोचा है? मैं आपको बताता हूं -

उसके साथ समाप्त होती है आत्मीयता।

उसके साथ समाप्त होता है आपसी संवाद का साधन।

उसके साथ समाप्त होता है एक साथ जुड़ा रहने का कारण।

उसके साथ समाप्त होती है अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता।

उसके साथ समाप्त होती है अपने सुख और दुख को व्यक्त करने की सहजता।

उसके साथ समाप्त होते हैं उस भाषा के गीत, गाने, दोहे, कहावतें और व्याकरण।

बड़ी रूखी और उदासीन- सी लगती है विदेशी भाषा

और बस, फिर हम किसी एक भाषा में (जो हमारे ऊपर थोपी गई है) आपसी वार्तालाप करने लगते हैं। ये आपसी बातचीत, कई बार, बड़ी रूखी और उदासीन सी लगती है। इसमें अपनी भाषा की वह मिठास नहीं पाई जाती, इसलिए हमारा वार्तालाप भी अधूरा रह जाता है। अपनी भाषा के द्वारा, भावनात्मक एकता को प्रकट करना बड़ा सरल होता है। थोपी गई भाषा को हम पूरी तरीके से समझ भी नहीं पाते और इस कारण वार्तालाप के दौरान कुछ बातें बिना समझे और सुने ही हो जाती हैं। शायद यह, प्रगति की एक कीमत है जो हमें चुकानी पड़ती है। शायद हम अपने आप को प्रगतिशील कहलाना पसंद करते हैं और इसलिए अपनी क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय भाषाओं को छोड़कर, उन भाषाओं में लिखना, पढ़ना, बोलना प्रारंभ कर देते हैं, जो हमारे ऊपर शासन करने वालों ने, (शायद एक षडयंत्र के अंतर्गत), थोप दी थीं। यह बेहद ही दुखद बात है। भाषा बहुत ही संवेदनशील होती है, सही से बोली जाए, तो अमृत का काम करती है और गलत बोली जाये तो तीरों का काम करती है।

अपनी कर्ण प्रिय भाषा को मरने ना दें

अपनी प्रिय भाषा को खोने का दर्द सबसे अधिक वृद्ध लोगों को होता है, जिनका पूरा जीवन उस भाषा के सहारे ही कटा है और जब अगली पीढ़ी को उस भाषा के साथ, घटिया और नए-नए प्रयोग करते हुए देखते हैं, या उस भाषा को इस्तेमाल करने से बचते हुए देखते हैं, तो उनके मन को बहुत ठेस पहुँचती है। हमारे देश की सबसे अधिक बोले जाने वाली हिन्दी भाषा के साथ भी वर्षों तक ऐसा ही अन्याय हुआ है। अब पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी भाषा ने, अपनी, लगभग खोई हुई पहचान को, दोबारा से प्राप्त करना प्रारंभ कर दिया है।  हम सभी हिन्दी- भाषी प्रदेशों के लोगों का यह कर्तव्य है कि हम अपनी इस कर्णप्रिय (कानों को अच्छी लगने वाली) भाषा को मरने ना दें। वृद्ध लोगों ने तो अपने प्रयास कर लिए, अब युवाओं के हाथों में  वह चिड़िया है (हिन्दी जैसी अनेक भाषाएँ हैं), जिनका जीना और मरना, युवाओं के हाथों में है। 14 सितंबर 1949

को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इस निर्णय के बाद, हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए, साल 1953 से पूरे भारत में 14 सितंबर को हर वर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। हिन्दी भारत की राजभाषा अवश्य बनी, परन्तु राष्ट्रीय भाषा बनते- बनते रह गई। हमारा प्रयास होना चाहिए कि अपनी मातृ भाषा हिन्दी को, राष्ट्रभाषा का दर्जा मिले।

जब तलक जिंदा कलम है, हम तुम्हें मरने न देंगे

प्रसिद्ध कवि श्री गोपाल दास नीरज ने लिखा था-

 जब तलक जिंदा कलम है, हम तुम्हें मरने न देंगे।

 खो दिया हमने तुम्हें तो, पास अपने क्या रहेगा।

कौन फिर बारूद से, सन्देश चन्दन का कहेगा।

  मृत्यु तो नूतन जनम है, हम तुम्हें मरने न देंगे।’

कितनी सुन्दर कविता है ये। क्या मैंने ठीक कहा? अगर हाँ, तो आइए अपनी प्रिय हिन्दी भाषा को मरने ना दें। हिन्दी, विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। भारत और अन्य देशों (जैसे फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम, नेपाल, पाकिस्तान, कैनेडा और संयुक्त अरब अमीरात) में भी, बड़ी संख्या में लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। हिन्दी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। देवनागरी लिपि में 11 स्वर और 33 व्यंजन हैं। इसे बाईं  से दाईं ओर लिखा जाता है। आइए अपनी प्रिय मातृभाषा हिन्दी में काम करना (लिखना एवं पढ़ना) प्रारम्भ करें, कम से कम अपने हस्ताक्षर तो आप हिन्दी भाषा में कर ही सकते हैं।

 सम्पर्कः बी-120, साकेत, मेरठ

हिन्दी दिवसः संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनी हिन्दी

- प्रमोद भार्गव

आखिरकार दीर्घकालिक प्रयासों के बाद भारत की राजभाषा हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बन गई है। भारत की ओर से लाए गए हिन्दी के प्रस्ताव को महासभा ने मंजूरी दे दी। इसके साथ बांग्ला और उर्दू को भी इस श्रेणी में लिया गया है। अब संयुक्त राष्ट्र में सभी कामकाज और जरूरी संदेश व समाचार इन तीनों भाषाओं में उपलब्ध होंगे। इन भाषाओं के अलावा मंदारिन, अंग्रेजी, अरबी, रूसी, फ्रेंच और स्पेनिश पहले से ही संघ की आधिकारिक भाषाएँ हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि राजदूत टीएस तिरूमती ने बताया कि हिन्दी को 2018 से ही एक परियोजना के अंतर्गत संघ में बढ़ावा देने के लिए शुरूआत कर दी गई थी। इसी समय से हिन्दी में संयुक्त राष्ट्र ने हिन्दी में ट्विटर खाता और न्यूज पॉर्टल शुरू कर दिया था। इस पर प्रत्येक सप्ताह हिन्दी श्रव्य समाचार (ऑडियो बुलेटिन) सेवा शुरू कर दी गई थी। हिन्दी की सेवाएँ संयुक्त राष्ट्र के मंच से प्रसारित होना इसलिए आवश्यक थीं, जिससे संयुक्त राष्ट्र के महत्त्व को दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी भाषा जानने वाले लोगों को जानकारी हो सके। इसे सुविधाजनक बनाना इसलिए जरूरी था, जिससे संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अंतरराष्ट्रीय कानून, सुरक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति, मानव अधिकार और विश्व शांति से जुड़े मुद्दों को लोग जान सके। इस संस्था की स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को पचास देशों के एक अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर के साथ हुई थी। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के 193 देश सदस्य हैं।  हिन्दी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र को भारत सरकार ने आठ लाख डॉलर की मदद भी की थी।  

यह वह समय है, जब हिन्दी के पक्ष में अनेक अनुकूलताएँ हैं। केंद्र की सत्ता में वह भारतीय जनता पार्टी है, जिसके दृष्टि-पत्र में हिन्दी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का मुद्दा हमेशा रहा है। इसी दल के नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। मोदी दक्षेस नेताओं से हिन्दी में द्विपक्षीय वार्ताएँ करके और संयुक्त राष्ट्र संघ समेत दुनिया के अनेक देशों में हिन्दी में दिए उद्बोधन में तालियाँ बटोरकर दुनिया को जता चुके थे, विश्व में हिन्दी को बोलने और समझने वालों की संख्या करोड़ों में है। मोदी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने जिस भाषा में वोट माँगे, उसी भाषा को देश -विदेश में संवाद की भाषा बनाए हुए हैं। अतएव योग- दिवस को संयुक्त राष्ट्र में मान्यता मिल जाने के बाद जनता की यह उम्मीद बढ़ गई थी कि अब जल्दी ही हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिल जाएगी। 

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार संयुक्त राष्ट्र की 4 अक्टूबर 1977 को संपन्न हुई बैठक में हिन्दी में भाषण देने का श्रेय जाता है। तब वे विदेश मंत्री थे। इसके बाद वे सितंबर 2002 में संयुक्त राष्ट्र की सभा में हिन्दी में बोले थे। लेकिन ये भाषण मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे हुए अनुवाद थे। चंद्रशेखर भी प्रधानमंत्री रहते हुए मालदीव में आयोजित हुए दक्षेस-सम्मेलन में हिन्दी में बोले थे। उनका यह भाषण मूलतः हिन्दी में होने के साथ मौलिक भी था। पीवी नरसिंह राव कई देशी-विदेशी भाषाओं के ज्ञाता थे, लेकिन विदेशी धरती पर हिन्दी में बोलने का साहस नहीं दिखा पाए थे। मनमोहन सिंह भी हिन्दी जानने के बावजूद परदेश में कभी हिन्दी नहीं बोले। मोदी ही हैं, जो प्रधानमंत्री बनने के बाद से लेकर अब तक पूरी ठसक के साथ अलिखित भाषण देकर हिन्दी का गौरव बढ़ा रहे हैं। गोया, हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के संकल्प का मुद्दा उनमें अन्य नेताओं की तुलना में कहीं ज्यादा रहा है।

भारत एकमात्र ऐसा देश है, जिसकी पाँच भाषाएँ विश्व की 16 प्रमुख भाषाओं की सूची में शामिल हैं। 160 देशों के लोग भारतीय भाषाएँ बोलते हैं। विश्व के 93 देश ऐसे हैं, जिनमें हिन्दी जीवन के बहुआयामों से जुड़ी होने के साथ, विद्यालय और विश्व विद्यालय स्तर पर पढ़ाई जाती है। चीनी भाषा मंदारिन बोलने वालों की संख्या हिन्दी बोलने वालों से ज्यादा जरूर है, किंतु अपनी चित्रात्मक जटिलता के कारण, इसे बोलने वालों का क्षेत्र चीन तक ही सीमित है। शासकों की भाषा रही अंग्रेजी का शासकीय व तकनीक क्षेत्रों में प्रयोग तो अधिक है, किंतु उसके बोलने वाले हिन्दी भाषियों से कम हैं। 1945 में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएँ 4 थीं, अंग्रेजी, रशियन, फ्रांसीसी और चीनी। ये भाषाएँ अपनी विलक्षणता या ज्यादा बोली जाने के वनिस्पत,
संयुक्त राष्ट्र की भाषाएँ इसलिए बन पाई थीं, क्योंकि ये विजेता महाशक्तियों की भाषाएँ थीं। बाद में इनमें अरबी और स्पेनिश शामिल कर ली गई। विश्व-पटल पर हिन्दी बोलने वालों की संख्या दूसरे स्थान पर होने के बावजूद इसे संयुक्त राष्ट्र में अब जाकर शामिल किया गया है। यही नहीं भारतीय और अनिवासी भारतीयों को जोड़ दिया जाए तो हिन्दी पहले स्थान पर आकर खड़ी हो जाती है। भाषायी आँकड़ों की दृष्टि से जो सर्वाधिक प्रमाणित जानकारियाँ सामने आई हैं, उनके आधार पर संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाओं की तुलना में हिन्दी बोलने वालों की स्थिति निम्न है, मंदारिन 80 करोड़, हिन्दी 55 करोड़, स्पेनिश 40 करोड़, अंग्रेजी 40 करोड़, अरबी 20 करोड़, रूसी 17 करोड़ और फ्रेंच 9 करोड़ लोग बोलते हैं। जाहिर है, हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की अग्रिम पंक्ति में खड़ी होने का वैध अधिकार रखती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 43.63 प्रतिशत आबादी हिन्दी बोलती हैं। यदि इसमें भोजपुरी, ब्रज, अवधि, बघेली, बुंदेली और हिन्दी से मिलती भाषाएँ भी इसमें जोड़ दी जाएँ तो इस संख्या में 13.9 करोड़ लोग और जुड़ जाएँगे और यह प्रतिशत बढ़कर 54.63 हो जाएगा।

अब चूँकि हिन्दी संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बन गई है, इसलिए भारत को सुरक्षा परिषद की सदस्यता मिलने की उम्मीद भी बढ़ गई है। इसके अलावा जो अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं, उनमें भी हिन्दी के माध्यम से संवाद व हस्तक्षेप करने का अधिकार भारत को मिल जाएगा। ये संगठन हैं अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी, अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी, अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन और संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल-आपात निधि (यूनिसेफ)। इन विश्व मंचों पर हमारे प्रतिनिधि यदि देश की भाषा में बातचीत करेंगे तो देश का आत्मगौरव तो बढ़ेगा ही, भारत के लोगों का यह भ्रम भी टूटेगा कि हिन्दी में अंतरराष्ट्रीय संवाद कायम करने की सामर्थ्य नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र दुनिया के प्रमुख देशों के मातृ- भाषियों के आँकड़े जुटाने का काम आधिकारिक रूप से पहले ही कर चुका था। केंद्रीय हिन्दी निदेशालय दिल्ली द्वारा इस संबंध में विशेष प्रामाणिक रिपोर्ट तैयार कराई गई थी, जो 25 मई 1999 को संयुक्त राष्ट्र भेजी गई थी। 1991 की जनगणना के आधार पर भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रंथ 1997 में प्रकाशित हुआ था। संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक भाषाओं की तकनीकी समिति द्वारा भारत सरकार को भेजे पत्र के साथ एक प्रश्नावली संलग्न करके हिन्दी की स्थिति के नवीनतम आँकड़े माँगे गए थे। निदेशालय द्वारा अनेक स्तर पर तथ्यात्मक आँकड़े इकट्ठा करने की पहल की गई। इन अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर चीनी भाषा मंदारिन के बाद हिन्दी का प्रयोग करने वाले की संख्या दूसरे स्थान पर थी। केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा संयुक्त राष्ट्र को भेजी गई रिपोर्ट में  विश्व-ग्रंथों के आँकड़ों को आधार बनाया गया था। इस परिप्रेक्ष्य में एनकार्टा एनसाइक्लोपीडिया के मुताबिक मातृ भाषा बोलने वाले लोगों की संख्या बताई गई थी, मंदारिन 83.60 करोड़, हिन्दी 33.30 करोड़, स्पेनिश 33.20 करोड़, अंग्रेजी 32.20 करोड़, अरबी 18.60 करोड़, रूसी 17 करोड़ और फ्रेंच 7.20 करोड़। गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड के अनुसार अंग्रेजी भाषियों की संख्या 33.70 करोड़ है, जबकि हिन्दी भाषियों की संख्या 33.72 करोड़ है। हालांकि गिनीज बुक ने हिन्दी भाषियों की संख्या 1991 की जनगणना के आधार पर ही बताई थी। विश्व भाषायी पत्रक स्रोत ग्रंथ ‘लैंग्वेज एंड स्पीक कम्युनिटीज‘ के अनुसार तो दुनिया में 96.60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते व समझते हैं। यानी हिन्दी का स्थान मंदारिन से भी ऊपर है।

इन तथ्यपरक आंकड़ों से प्रमाणित होता है कि संख्याबल की दृष्टि से मंदारिन को छोड़ अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी की स्थिति हमेशा मजबूत रही है। हिन्दी के साथ एक और विलक्षणता जुड़ी हुई है, हिन्दी जितने राष्ट्रों की जनता द्वारा बोली व समझी जाती है, संयुक्त राष्ट्र की पहली चार भाषाएँ उतनी नहीं बोली जाती हैं। हिन्दी भारत के अलावा नेपाल, मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, ग्याना, त्रिनिनाद, टुबैगो, सिंगापुर, भूटान, इंडोनेशिया, बाली, सुमात्रा, बांग्लादेश और पाकिस्तान में खूब बोली व समझी जाती है। भारत की राजभाषा हिन्दी है तथा पाकिस्तान की उर्दू, इन दोनों भाषाओं के बोलने में एकरूपता है। दोनों देशों के लोग लगभग 60 देशों में आजीविका के लिए निवासरत हैं। इनकी संपर्क भाषा हिन्दी मिश्रित उर्दू अथवा उर्दू मिश्रित हिन्दी है। हिन्दी फिल्मों और दूरदर्शन कार्यक्रमों के जरिए भी हिन्दी का प्रचार-प्रसार निरंतर हो रहा है। विदेशों में रहने वाले ढाई करोड़ हिन्दी भाषी हिन्दी फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और समाचारों से जुड़े रहने की निरंतरता बनाए हुए हैं। ये कार्यक्रम अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मन, जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा, हालैंड, अक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, थाइलैंड आदि देशों में रहने वाले भारतीय खूब देखते हैं।

भाषा से जुड़े वैश्विक ग्रंथों में दर्ज आंकड़ों के अनुसार तो हिन्दी को सन् 2000 के आसपास ही संयुक्त राष्ट्र की भाषा बना देना चाहिए था। लेकिन विश्व-पटल पर भाषाएँ भी राजनीति की शिकार है। जो देश अपनी बात मनवाने के लिए लड़ाई को तत्पर रहे हैं, उन सभी देशों ने अपनी-अपनी मातृभाषा को संयुक्त राष्ट्र में बिठाने का गौरव हासिल कर लिया। लेकिन अब वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी संपर्क भाषा के रूप में भी प्रयोग होने और विज्ञापन की सशक्त भाषा के रूप में उभर गई है। भारत समेत अन्य एशियाई देश हिन्दी को अंग्रेजी के विकल्प के रूप में अपनाने लगे हैं। कई योरोपीय देशों में एशियाई लोगों के लिए हिन्दी संपर्क भाषा के रूप में भी प्रयोग होने लग गई है। अतएव हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाना आवश्यक हो गया था।

सम्पर्कः शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी म.प्र., मो. 09425488224