March 10, 2017

त उपवास से टल जाता है बुढ़ापा

व्रत उपवास से टल जाता है बुढ़ापा 
पहले किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि यदि जंतुओं का कैलोरी उपभोग अत्यंत कम कर दिया जाए तो वे देर से बूढ़े होते हैं। यह बात कृमियों से लेकर चूहों तक में देखी गई है। इन निष्कर्षों के आधार पर विचार बना कि शायद मनुष्यों में भी ऐसा ही होगा। वैसे, कई लोगों का विचार था कि मनुष्य का कैलोरी उपभोग 25-50 प्रतिशत तक घटाकर यदि उम्र बढ़ भी जाए तो वह बढ़ी हुई उम्र किस काम की।
अब एक अध्ययन से बीच का रास्ता निकला है जो व्रत-उपवास करने जैसा आसान है। विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय और नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एजिंग के शोधकर्ताओं ने नेचर कम्यूनिकेशन्स में बताया है कि लगातार कैलोरी उपभोग में कमी रीसस बंदरों में काफी स्वास्थ्य सम्बंधी लाभ प्रदान करती है। रीसस बंदरों का बुढ़ाने का पैटर्न लगभग इंसानों जैसा ही है।
शोधकर्ताओं ने एक बंदर का विवरण दिया है जिसे 16 वर्ष की उम्र में 30 प्रतिशत कम कैलोरी पर रखने की शुरुआत की गई थी। 16 साल बंदरों के लिए अधेड़ावस्था होती है। आज वह 43 साल का है जो मनुष्य की उम्र के लिहाज से 130 वर्ष है और उसकी प्रजाति के लिए उम्र का रिकॉर्ड है।
इसके बाद किए गए एक अन्य अध्ययन में सदर्न कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के जरा-वैज्ञानिक वाल्टर लोंगो ने रिपोर्ट किया है कि बुढ़ापे को टालने के लिए आजीवन भूखा मरने की ज़रूरत नहीं है। तीन महीनों तक महीने में मात्र पांच दिन के लिए उपवास करना पर्याप्त है। इसे कुछ माह बाद फिर से दोहराना लाभदायक रहेगा। गौरतलब है कि ऐसे उपवास तो भारतीय लोग करते ही रहते हैं अंतर सिर्फ इतना है कि आजकल के उपवास में सामान्य से ज़्यादा ही खाया जाता है।
वैसे कई शोधकर्ताओं का मत है कि मात्र कैलोरी से परहेज़ करने पर इतना ध्यान देने से कुछ हासिल नहीं होगा। हमारे जीवन में इतने अन्य कारण हैं कि भूखा रहकर कुछ खास फायदा नहीं होगा। (स्रोत फीचर्स)

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एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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