March 10, 2017

साहित्य में होली:

कान्हा तू न रंग डार... 
- यशवंत कोठारी
बात होली की हो और कविता, शेरो-शायरी की चर्चा न हो, यह कैसे संभव हैं ? होली का अपना अंदाज है, और कवियों ने उसे अपने रंग में ढाला है।
जाने माने शायर नजीर अकबराबादी कहते हैं :
जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की।
और ढफ के शोर खड़कते हों, तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों, तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हों, तब देख बहारें होली की
कपड़ों पर रंग के छींटों से खुशरंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों, और हाथों में
पिचकारी हो, तब देख बहारें होली की।
लेकिन बहादुरशाह जफर अपना अलग ही तराना गाते हैं, वे कहते हैं:
क्यूँ मों पे मारी रंग की पिचकारी
देखो कुँवरजी दूँगी गारी।
भाज सकूँ मैं कैसे मोंसो भाजयों नहीं जात
थाड़े, अब देखूँ मैं, कौन जो दिन रात।
सबको मुँह से देत है गारी, हरी सहाई आज
जब मैं आज निज पहलू तो किसके होती लाज।
बहुत दिनन मैं हाथ लगे हो कैसे जाने दूँ
आज है भगवा तोसों कान्हा फटा पकड़ के लूँ।
शोख रंग ऐसी ढीठ लंगर से खेले कौन होरी।
और कबीर  की फक्कड़ होली का ये रंग तो सबको लुभाता ही है:
इक इक सखियाँ खेल घर पहुँची,
इक इक कुल अरुझानी,
इक इक नाम बिना बहकानी, हो रही ऐंचातानी,
प्रिय को रूप कहाँ लाग वरनों, रूपहिं माहिं समानी,
जो रँग रँगे सकल छवि छाके, तन मन सबहि भुलानी,
यों मत जाने यहि रे फाग है, यह कुछ अकथ कहानी,
कहैं कबीर सुनो भाई साधे, यह गति बिरले जानी।
वास्तव में बसन्त और होली नये जीवन चक्र का प्रस्थान करने का समय है और ऐसी स्थिति में निराला कहते हैं:
युवक-जनों की है जान, खून की होली जो खेली।
पाया है आँखों का मान, खून की होली जो खेली।
रँग गए जैसे पलाश, कुसुम किशंक के सुहाए
पाए कोकनद-पाण, खून की होली जो खेली।
निकलें हैं कोंपल लाल, वनों में फागुन छाया
आग के फाग की तान, खून की होली जो खेली।
खुल गई गीतों की रात, किरन उतरी है प्रात की।
हाथ कुसुम-वरदान, खून की होली जो खेली।
आई भुवेश बहार, आम लीची की मंजरी
कटहल की अरधान, खून की होली जो खेली।
विकट हुए कचनार, हार पड़े अमलतास के
पाटल-होंठों मुस्कान, खून की होली जो खेली।
होली का यह आनंद मुगलों ने भी खूब लिया। मीर तकी मीर गाते हैं :
आओ साकी बहार फिर आई,
होली में कितनी शादियाँ लागी।
आयें बस्ता हुआ है सारा शहर,
कागजी गुल से गुलिस्तां है दहर।
कुमकुमे घर गुलाल जो मारे,
महविशाँ लाला रुख हुए सारे।
खान भर भर अबीर लाते हैं,
गुल की पत्ती मिला उड़ाते हैं।
जश्ने नीरोज हिन्द होली है,
रागो-रेग और बोली ठोली है।

उर्दू में होली का विशद एवं रोचक वर्णन करने वाले शायरों की कमी नहीं हैं। उत्तरी भारत के प्रसिद्ध शायर फाइज देहलवी ने अपनी कविता में रंग, अबीर, पिचकारी, नारियों की ठिठोली आदि का विशद वर्णन किया है:
नाचती गा गा के होरी दम-ब-दम
जूँ सभा इंदर की दरबारे हरम
जूँ जड़ी हरसू है पिचकारी की धार
नाचती है नारियाँ बिजली के सार
नजीर अकबराबादी के अनुसार यह त्यौहार आम आदमी का त्योहार है:
कोई तो रंग छिड़कता है कोई गाता है
जो खाली रहता है वह देखने को जाता है
जो ऐश चाहो वो मिलता है यार होली में

उर्दू काव्य ने कालांतर में होली शब्द को उपमा के रूप में ग्रहण किया। इसका प्रमाण है शमीम करहानी का यह शेर:
दिलो जलो कि पाक होली आ गई
जिंदगी परचम नया लहरा गई
सातवें दशक में भारत ने कई उतार-चढ़ाव देखे-चीनी और पाकिस्तानी आक्रमण, शांतिप्रिय महापुरुषों का मृत्यु शोक। उर्दू के जाँबाज कवियों ने होली को इस संदर्भ में भी प्रस्तुत किया।
हसरत रिसापुरी की यह नज़्म आपसी भाईचारे अमन चैन की अपील करती है-
मुँह पर लाल गुलाल लगाओ
नैनन को नेत्रों से मिलाओ
बैर भूलकर प्रेम बढ़ाओ
है होली, खेलो होली।
सबको आत्मज्ञान सिखलाओ
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