March 10, 2017

पर्व संस्कृति:

काहे सताए रंग डार के 
- गोवर्धन यादव
वसंत-पंचमी के बाद से ही गाँवों में फ़ाग-गीत गाए जाने की शुरुआत हो जाती है ।साज सजने लगते हैं और महफ़ीलें जमने लगती हैं। रात्रि की शुरुआत के साथ ढोलक की थाप और झांझ-मंजीरों की झनझनाहट के साथ फ़ाग गाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है। हर दो-चार दिन के अन्तराल के बाद फ़ाग गायी जाती है और जैसे-जैसे होली निकट आती जाती है,लोगों का उत्साह देखते ही बनता है।
 अब न तो वे दिन रहे और न ही वह बात रही। तेजी से बढते शहरीकरण और दूषित राजनीति के चलते आपसी सौहार्द और सहयोग की भावना घटती चली गई और आज स्थिति यह है कि फ़ाग सुनने को कान तरसते हैं।
 फ़ाग की बात जुबान पर आते ही मुझे अपना बचपन याद हो आता है। बैतुल जिले की तहसील मुलताई,जहाँ से पतीत-पावनी सूर्यपुत्री ताप्ती का उद्गम स्थल है, मेरा जन्म हुआ, और जहाँ से मैंने मैट्रिक की परीक्षा पास की, वह पुराना दृश्य आँखों के सामने तैरने लगता है। जमघट जमने लगती है, ढोलक की थाप, झांझ-मंजीरों की झनझनाहट ,टिमकी की टिमिक-टिन, से पूरा माहौल खिल उठता है। फ़िर धीरे से आलाप लेते हुए खेमलाल यादव फ़ाग का कोई मुखड़ा उठाते हैं और उनके स्वर में स्वर मिलने लगते है. दमडूलाल यादव,दशरथ भारती, सेठ सागरमल, फ़कीरचंद यादव, श्यामलाल यादव, सोमवार पुरी गोस्वामी, गेन्दलाल पुरी खूसटसिंह, पलु भारती,लोथ्या भारती, भिक्कुलाल यादव (द्वय )और उनके साथियों का स्वर हवा में तैरने लगता हैं. बीच-बीच में हँसी-ठिठौली का भी दौर चलता रहता है. शाम से शुरु हुए इस फ़ाग की महफ़िल को पता ही नहीं चल पाता कि रात के दो बज चुके हैं। फ़ाग का सिलसिला यहाँ थम सा जाता है, अगले किसी दिन तक के लिए। जिस दिन होलिका-दहन होना होता है, बच्चे-बूढे-जवान मिलकर लकडियाँ जमाते हैं. गाय के गोबर से बनी चाकोलियों की माला लटका दी जाती है. रंग-बिरंगे कागजों की तोरणें टँगने लगती है। लकड़ियों के ढेर के बीच ऊँचे बाँस अथवा बल्ली के सिरे पर बडी सी पताका फ़हरा दी जाती है. बडी गहमा-गहमी का वातावरण होता है इस दिन. बडॆ से सिल पर भाँग पीसी जा रही होती है। कोई दूध औटाने के काम के जुटा होता है. जितने भी लोग वहाँ जुडते हैं, सभी के पास कोई न कोई काम करने का प्रभार होता है। जैसे-जैसे दिन ढलने को होता है,वैसे-वैसे काम करनेकी गति भी बढती जाती है। साझं घिर जाने के साथ ही एक चमकीलाचाँद आसमान पर प्रकट होता है और चारॊं ओर दूधिया रंग अपनी छटाबिखेरने लगता है। अब होलिका- दहन वाले स्थान के पास बडी दरी बिछा दी जाती है और लोगों का जमावड़ा होना शुरू हो जाता है. टिमकी, ढोलक, झांझ, मंजीरें,करताल बजने लगते हैं. फ़ाग गायन शैली सामूहिक गायन के रूप में होता है। फ़ाग गायन की विषय वस्तु द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बृज ग्वालबालों एवं गोपियों के साथ हास-परिहास की शैली प्रचलित है.सबसे पहले श्री गणेश का सुमरन किया जाता है. फ़िर कान्हा और राधा के बीच खेली जाने वाली रंग-गुलाल-पिचकारी के मधुर भावों को पिरोती फ़ाग गायन की शुरुआत होती है-


  (1) 
चली रंग की फ़ुहार, पिचकारियों की मार
 कान्हा तू न रंग डार, काहे सताए रंग डार के
 राधा पडॆ तोरे पैयां गिरधारी न तू मारे भर-भर पिचकारी
 भींगी चुनरी हमार काहे दिया रंग डार
 मैं तो गई तोसे हार,काहे सताये रंग डार के 
   (2)         
 सारी चुनरी भिंगो दी तूने मोरी 
मेरे सर की मटकिया फ़ोडी
कहूँ जा के नंद द्वार तोरो लाला है गँवा
 करे जीना दुश्वार,काहे सताये रंग डार के  
    (3)                                  
सारे बृज मे करे ठिठौली 
लेके फ़िरे सारे ग्वालों की टॊली 
किन्हे गाल मोरे लाल
डाला किस-किस पे गुलाल
मैया ऎसा तेरा लाल,काहे सताये रंग डार के 

फाग गायन का क्राम चलता रहता. स्त्री-पुरुष-बच्चे घरों से निकल आते पूजन करने. फ़िर देर रात होलिका-दहन का कार्यक्रम शुरु होता. बडा बुजुर्ग लकडी-कंडॆ के ढेर में आग लगात्ता और इस तरह होलिका दहन की जाती. पौराणिक मान्यता के अनुसार हिरणाकश्यप द्वारा अपने भक्त पुत्र प्रहलाद को होलिका में जलाने के प्रयास के असफ़ल हो जाने पर तत्कालीन समाज द्वारा मनाए गए आंदोलन से इसे जोडा जाता है. होलिका दहन के बाद लोग अपने-अपने घर की ओर रवाना हो जाते, इस उत्साह के साथ कि अगले दिन जमकर रंग बरसाएँगे।

सुबह से ही सारे मुहल्ले के लोग बाबा खूसट के यहाँ इकट्ठे होते. फ़ाग गाने का क्रम शुरु हो जाता। फ़िर आती रंग डालने की बारी। सुबह से ही लोग टेसू के फ़ूलों का रंग उतारकर पात्रों में जमा कर लेते। इसी रंग से सभी रंग कर सराबोर हो जाते। फ़िर सभी को कुंकुम-रोली लगाई जाती. ठंडाई का दौर भी चल पडता। इस अवसर पर बने पकवानों का भी लुत्फ़ उठाया जाने लगता।
फ़ाग-गायन मंडली हँसी-ठिठौली करती बाबा दमडूलाल के घर जा पहुँचती.वहाँ पहले से ही टॊली के स्वागत-सत्कार की व्यवस्था हो चुकी होती है। एक दिन पहले से ही आँगन को गोबर से लीपकर तैयार कर दिया जाता है। इस दिन बिछायत नहीं की जाती। लोग घेरा बनाकर बैठ जाते। फ़ाग उडती रहती। रंग-गुलाल बरसता रहता। ठंडाई का दौर चलता रहता. पकवानों का रसास्वादन भी चलता रहता। घर का प्रमुख लोगों के सिर-माथे पर तिलक-रोली करता और इस तरह फ़ाग के राग उड़ाती टोली आगे बढ जाती। सबसे मिलते-जुलते, रंग –गुलाल में सराबोर होती टोली के सदस्य, अपने–अपने घरों की ओर निकल पडते हैं।
नहा-धोकर लोग चार बजे के आसपास होलिका-दहन वाले स्थान पर आ जुडते। फ़ाग उडने लगती। फ़िर मंडली गाते-बजाते मेघनाथ-बाबा के दर्शनार्थ के लिए बढ़ जाती। वहाँ उस दिन अच्छा खासा मेला लग जाता. इस तरह सारे गाँव की मंडलियाँ वहाँ जुडने लगती हैं। लोग एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस तरह प्रेम-सौहार्द की भावना से ओतप्रोत यह त्योहार सम्पन होता।
सम्पर्क: 103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा (म.प्र.) ४८०-००१

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही साथी समाज सेवी संस्थाद्वारा संचालित स्कूलसाथी राऊंड टेबल गुरूकुल में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है।
शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से साथी राऊंड टेबल गुरूकुलके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है।
अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर,तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में),क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर,पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर,जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ।
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