- डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन
“क्या आप अपने पौधों को संगीत सुनाते हैं?” यह सवाल पूछा गया था लंदन स्थित क्यू गार्डन्स के मशहूर वनस्पति विज्ञानी जेम्स वोंग से। उनका जवाब था कि कम्पन (ध्वनि तरंगें) ही हैं, जो पौधे की बाह्य त्वचा (एपिडर्मिस) को खोलते हैं। भौतिक विज्ञानी जे. सी. बोस ने भी यही कहा था।
इस सदाबहार सवाल पर नवीन शोध क्या कहते हैं?
दरअसल सवाल इसलिए है कि पौधों के न तो कान होते हैं और न ही मस्तिष्क, तो वे हमारी तरह संगीत का आनंद कैसे लेते हैं? हाल के कई अध्ययनों से अब पता चला है कि पौधे न सिर्फ अपने आसपास के कम्पनों को भाँप सकते हैं, बल्कि इस तरह प्राप्त सूचना के आधार पर अपना व्यवहार बदल भी सकते हैं।
एक अध्ययन में, सरसों कुल के एक पौधे को इल्ली द्वारा पत्ती को कुतरने की आवाज़ सुनाई गई, जिसके परिणामस्वरूप उस पौधे में उन कड़वे विषाक्त रसायनों का स्तर बढ़ गया, जिनका इस्तेमाल पौधा अपनी रक्षा के लिए करता है। हैरानी की बात यह है कि ये पौधे पत्तीखोर कीटों के कम्पन और अन्य तरह के कम्पन (जैसे हवा के कम्पन या कीटों की प्रणय पुकार के कम्पन) के बीच फर्क कर पाते हैं, भले ही उनकी आवृत्ति एक जैसी हो। और वे खतरा समझ आने के बाद ही अपनी रक्षा के लिए कदम उठाते हैं।
कैलिफोर्निया लर्निंग रिसोर्स नेटवर्क के मुताबिक, ध्वनि सुनाने (सोनिक उद्दीपन) से बीज के अंकुरण पर असर पड़ता है। दिलचस्प बात यह है कि विशिष्ट आवृत्ति परास की ध्वनियाँ पानी के अवशोषण और बीज के चयापचय को बढ़ाती हैं। प्राकृतिक ध्वनियाँ, जैसे सुपरिभाषित सुर-ताल में सुकूनदेह धुनें और शास्त्रीय संगीत जीन अभिव्यक्ति और हॉरमोन नियंत्रण को प्रभावित करती हैं। इसके विपरीत, धमाकेदार, पटाखे और बम जैसी कर्कश आवाज़ें बीज के विकास को धीमा कर देती हैं।
पादप ध्वनि विज्ञान
20 सितंबर, 2024 को येल एनवायरनमेंटल रिव्यू में प्रकाशित एक लेख कहता है कि फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए संगीत का इस्तेमाल करना दिलचस्प होने के साथ-साथ भविष्य के लिए भी ज़रूरी है, जिसमें बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न आपूर्ति और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए टिकाऊ कृषि आवश्यक है। 2020 में, नेशनल युनिवर्सिटी ऑफ ताइवान के वनस्पति विज्ञानी यू-निंग लाल और हाउ-चियुन वू ने अल्फाअल्फा और लेट्यूस पौधों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि पर अलग-अलग तरह के संगीत के असर का अध्ययन किया। खास तौर पर, उन्होंने अल्फाअल्फा और लेट्यूस के बीजों के अंकुरण पर ग्रेगोरियन मंत्रोच्चारण, बरोक, शास्त्रीय, जैज़, रॉक संगीत और नैसर्गिक ध्वनियों सहित कई तरह के संगीत के असर जाँचे। पाया गया कि लेट्यूस के पौधे को ग्रेगोरियन मंत्रोच्चार और वाल्ट्ज़ पसंद थे, जबकि अल्फाअल्फा को नैसर्गिक आवाज़ें पसंद थीं।अमेरिका की पिस्टिल्स नर्सरी के अनुसार, ध्वनि चाहे किसी भी प्रकार की हो, संगीत हो या शोर, उसकी आवृत्ति और तरंगदैर्घ्य में बदलाव का असर ग्वारफली के बीजों के अंकुरों के आकार और मात्रा पर पड़ा।
भारत में भी कुछ समूहों ने पौधों के पादप ध्वनि विज्ञान (फाइटो एकूस्टिक्स) का अध्ययन किया है। 2014 में, वी. चिवुकुला और एस. रामस्वामी ने इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल साइंस एंड डेवलपमेंट में गुलाब के पौधे पर संगीत के प्रभाव के बारे में बताया था, और यह भी बताया था कि पौधे को लंबाई में वृद्धि के लिए जैज़ की बजाय वैदिक मंत्रोच्चार पसंद थे। 2015 में, ए. आर. चौधरी और ए. गुप्ता ने गेंदा और चने के पौधों को मद्धिम शास्त्रीय संगीत और ध्यान संगीत सुनाया। उन्होंने पाया कि संगीत सुनाने की तुलना में संगीत की अनुपस्थिति में पौधे ज़्यादा लंबे और मज़बूत बढ़े थे। और 2022 में, बेंगलुरु के अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकॉलॉजी एंड एनवायरनमेंट के के. आर. शिवन्ना ने 2022 में जर्नल ऑफ दी इंडियन बॉटेनिकल सोसाइटी में प्रकाशित एक रिव्यू में साइकोएकूस्टिक्स के इन पहलुओं पर प्रकाश डाला था, और जे. सी. बोस के काम का भी ज़िक्र किया था।
इसलिए दीपावली और होली के दौरान ज़्यादा पटाखे न फोड़ें; पौधों के जीवन में रुकावट आती है। इसकी बजाय अपने बगीचों और खेतों में सुकूनदेह संगीत बजाएँ , पौधे अच्छे से लहलहाएँ गे। (स्रोत फीचर्स) ■


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