- परमजीत कौर ‘रीत’
1.
सीमा पर तैनात वे, सजग रहें दिन रैन ।
प्रहरी रक्षक देश के, छीनें अरि का चैन ।।
छीनें अरि का चैन, चनें नाकों चबवाते ।
हिमगिरि रेगिस्थान, धूल ही उसे चटाते ।
नहीं दिखाते पीठ, संकटों से घबराकर ।
'रीत' नमन हर बार, डटे हैं जो सीमा पर ।।
2
धीरे-धीरे धीर धर, बनता है विश्वास ।
अनजाने अपने बनें, रिश्ते जुड़ते पास ।।
रिश्ते जुड़ते पास, खजाना बढ़ता जाता ।
शुभचिंतक यदि साथ,दु:ख फिर नहीं सताता ।
कहती ‘रीत’ यथार्थ, मित्र यदि सच्चे हीरे ।
बन जाये अनमोल, मुद्रिका जीवन धीरे ।।
3.
धरती से बस वृक्ष तक, जिसका है आवास ।
एक मयूरी कब कहे, सारा नभ हो पास ।।
सारा नभ हो पास, नहीं की इच्छा मन में ।
छोटी भले उड़ान, बड़ी खुशियाँ जीवन में ।
पंखों से ले रंग, सँवारा आँगन करती ।
मुट्ठी- सा आकाश, और थोड़ी ले धरती ।।
4
करना है संघर्ष बस, कहती करतल रेख ।
चिंता से कब बदलते, किस्मत के आलेख ।।
किस्मत के आलेख, नहीं जब वश में अपने ।
मिला लेखनी कर्म, रंग भरने को सपने ।
कहती ‘रीत’ यथार्थ, जगत वैतरणी तरना ।
जीवन का संघर्ष, सभी को पड़ता करना ।।
5.
संघर्षों की धुंध से, फ़ीकी पड़े न आब ।
बैठ शूल की नोक पर, कहता यही गुलाब ।।
क़हता यही गुलाब, इत्र से रोज़ महककर ।
भले धूप या छाँव, सभी से मिलो चहककर ।
कहती ‘रीत’ यथार्थ, कथा लाखों वर्षों की ।
जिजीविषा से हार, हुई नित संघर्षों की ।।


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