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Feb 1, 2026

कुंडलिया छंदः प्रहरी रक्षक देश के

 - परमजीत कौर ‘रीत’

1.

सीमा पर तैनात वे, सजग रहें दिन रैन ।

प्रहरी रक्षक देश के, छीनें अरि का चैन ।।

छीनें अरि का चैन, चनें नाकों चबवाते ।

हिमगिरि रेगिस्थान, धूल ही उसे चटाते ।

नहीं दिखाते पीठ, संकटों से घबराकर ।

'रीत' नमन हर बार, डटे हैं जो सीमा पर ।।

2

धीरे-धीरे धीर धर, बनता है विश्वास ।

अनजाने अपने बनें, रिश्ते जुड़ते पास ।।

रिश्ते जुड़ते पास, खजाना बढ़ता जाता ।

शुभचिंतक यदि साथ,दु:ख फिर नहीं सताता ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, मित्र यदि सच्चे हीरे ।

बन जाये अनमोल, मुद्रिका जीवन धीरे ।।

3.

धरती से बस वृक्ष तक, जिसका है आवास ।

एक मयूरी कब कहे, सारा नभ हो पास ।।

सारा नभ हो पास, नहीं की इच्छा मन में ।

छोटी भले उड़ान, बड़ी खुशियाँ जीवन में ।

पंखों से ले रंग, सँवारा आँगन करती ।

मुट्ठी- सा आकाश, और थोड़ी ले धरती ।।

4

करना है संघर्ष बस, कहती करतल रेख ।

चिंता से कब बदलते, किस्मत के आलेख ।।

किस्मत के आलेख, नहीं जब वश में अपने ।

मिला लेखनी कर्म, रंग भरने को सपने ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, जगत वैतरणी तरना ।

जीवन का संघर्ष, सभी को पड़ता करना ।।

5.

संघर्षों की धुंध से, फ़ीकी पड़े न आब ।

बैठ शूल की नोक पर, कहता यही गुलाब ।।

क़हता यही गुलाब, इत्र से रोज़ महककर ।

भले धूप या छाँव, सभी से मिलो चहककर ।

कहती ‘रीत’ यथार्थ, कथा लाखों वर्षों की ।

जिजीविषा से हार, हुई नित संघर्षों की ।।


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