- डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल
एक राज्य में एक बहुत ही कुशल बाँसुरी वादक रहता था। उसके पास दो शिष्य थे— आर्यन और कबीर।
एक दिन गुरुजी ने दोनों को अलग-अलग काम सौंपे। उन्होंने आर्यन को राजमहल के एक भव्य कमरे में भेजा, जहाँ सोने का एक पिंजरा था। उस पिंजरे में एक दुर्लभ पक्षी था। आर्यन का काम था उस पक्षी को समय पर सबसे उत्तम फल खिलाना, रेशम के बिछौने पर सुलाना और उसे जंगली जानवरों से बचाकर सुरक्षित रखना।
दूसरी ओर, गुरुजी ने कबीर को अपने साथ एक ऊँचे और पथरीले पहाड़ पर चलने को कहा। वहाँ पहुँचकर गुरुजी ने एक जंगली पक्षी की ओर इशारा किया, जो तेज़ हवाओं के बीच एक पेड़ की टहनी पर बैठा था।
एक महीने बाद, गुरुजी ने दोनों शिष्यों को बुलाया और पूछा, "तुमने क्या सीखा?"
आर्यन ने गर्व से कहा: "गुरुजी, राजमहल का वह पक्षी सबसे सुखी है। उसे न भोजन की चिंता है, न शिकारियों का डर। वह दिन भर बस आराम करता है। उसे वह सब प्राप्त है, जो एक जीवन को सुरक्षित बनाने के लिए चाहिए।"
गुरुजी मुस्कुराए और फिर कबीर की ओर देखा।
कबीर धीमे स्वर में बोला: "गुरुजी, मैंने उस पहाड़ी पक्षी को देखा। उसे भोजन के लिए मीलों उड़ना पड़ता है। कभी बारिश में भीगता है, तो कभी बाज से अपनी जान बचाता है। लेकिन, जब वह सूरज ढलते समय अपनी पूरी ताकत से चहकता है, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गूँज होती है। वहीं जब मैं आर्यन के साथ उस महल वाले पक्षी को देखने गया, तो वह सोने के पिंजरे में बैठा सिर्फ फड़फड़ा रहा था। उसके पास सब कुछ था, पर उसकी आँखों में चमक नहीं थी।"
गुरुजी ने दोनों को पास बिठाया और कहा: "जीवन में दो तरह की शांति होती है। एक वह, जो 'दबाव और सुरक्षा' से आती है- जैसे महल का वह पक्षी। वहाँ तुम्हारी ज़रूरतें तो पूरी होंगी, लेकिन तुम्हारी आत्मा मर जाएगी।
दूसरी शांति वह है, जो 'चुनौतियों और स्वतंत्रता' से आती है। पहाड़ का वह पक्षी जोखिम उठाता है, लेकिन वह अपनी पूरी क्षमता से आकाश को नापता है। असली खुशी सुरक्षा में नहीं, बल्कि स्वयं को खोजने के संघर्ष में है।"
शिष्यों को समझ आ गया कि केवल पेट भरना और सुरक्षित रहना 'जीना' नहीं है। असल में खुश वही है, जिसके पास अपनी उड़ान के लिए खुला आसमान है। ■
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