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Aug 1, 2026

अनकहीः देश का भविष्य और युवाओं का संघर्ष

 - डॉ.  रत्ना वर्मा

देश की राजधानी का जंतर-मंतर एक ऐसा स्थान जो कभी जन-आकांक्षाओं, सत्याग्रह और लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रतीक हुआ करता था, आज राजनीति की मुख्य प्रयोगशाला बन चुका है। कोई भी मुद्दा हो- चाहे वह किसानों की व्यथा हो, पहलवानों का सम्मान हो या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धाँधली को लेकर छात्रों का आक्रोश- जंतर-मंतर पर लगने वाले झंडे और नारे जल्द ही राजनीतिक दलों के नफा-नुकसान का मंच बन जाते हैं।
किंतु इस पूरी प्रक्रिया में जो सबसे बड़ा सवाल पीछे छूट जाता है, वह यह है कि क्या ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति करना उचित है? या फिर समय आ गया है कि हम यह स्वीकार करें कि समस्या केवल किसी एक नीति या घटना में नहीं, बल्कि हमारे समूचे सिस्टम की बुनियादी जड़ों में है?
अक्सर देखा यह जाता है कि जब किसी आंदोलन में राजनीतिक घुसपैठ होती है, तो  ।मूल समस्या दरकिनार हो जाती है।  फिर चाहे समस्या कोई भी हो या नीतिगत कमियाँ, किसी भी आंदोलनों को जब दलगत चश्मे से देखा जाता है, तो सत्ता पक्ष उसे विरोधियों की साजिश मानकर खारिज करने लगता है और विपक्ष उसे भुनाने में लग जाता है; लेकिन इसमें पिसता कौन है? वे जो अपनी समस्या या अधिकार को लेकर न्याय की उम्मीद में आंदोलन पर बैठ जाते हैं।  आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार हैं; लेकिन जब ये आंदोलन केवल सत्ता की चाबी पाने का माध्यम बन जाएँ, तो यह देश की लोकतांत्रिक चेतना के लिए घातक सिद्ध होता है।
यदि ताजा घटनाक्रम पर,  आएँ तो स्वतंत्रता के 75 से अधिक वर्षों बाद भी क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को एक पारदर्शी, गुणवत्तापूर्ण और न्यायसंगत माहौल दे पाए हैं? कड़वी सच्चाई तो यही है कि आज शिक्षा का क्षेत्र सेवा न रहकर एक अति-लाभकारी व्यवसाय बन चुका है।  
आज कोचिंग संस्थानों, निजी विश्वविद्यालयों और प्रश्न-पत्र लीक करने वाले गिरोहों का एक ऐसा मकड़जाल तैयार हो चुका है, जो युवाओं के सपनों का व्यापार करता है। सालों-साल मेहनत करने वालों के भविष्य के साथ जब पेपर लीक या प्रशासनिक गड़बड़ियों के जरिए खिलवाड़ होता है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं होती- यह एक पूरी पीढ़ी के विश्वास की हत्या होती है।
परिणाम आज के युवा मानसिक तनाव, अवसाद और निराशा के उस दौर से गुजर रहे हैं जहाँ उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय नजर आता है। क्या यह भारत के युवाओं के जीवन के साथ सीधा खिलवाड़ नहीं है? इस पूरे घटनाक्रम पर विचार करते हुए सबसे पीड़ादायक प्रश्न यह उठता है कि हम उनके भविष्य को लेकर आज कहाँ खड़े हैं?
क्या हमारे तंत्र में ऊपर से लेकर नीचे तक सिर्फ ऐसे लोग से भर गए  हैं, जो हर फैसले में केवल अपना निजी या राजनीतिक फायदा देखते हैं? जिस देश ने वसुधैव कुटुंबकम् और त्याग का दर्शन दिया, क्या उस देश में अपनी धरती, अपने लोगों और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सोचने का जज्बा खत्म हो रहा है?
यदि उत्तर हाँ है, तो यह हम पूरी मानव सभ्यता के लिए अत्यंत शर्म की बात होगी। एक समाज के रूप में हमारी सबसे बड़ी असफलता यही होगी कि हम अपनी भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित, निष्पक्ष और प्रेरणादायक माहौल तक न दे सकें।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि बदलाव आ ही नहीं सकता। आवश्यकता सिर्फ पहल करने की है । अब समय आ गया है कि हम समस्याओं पर केवल ऊपरी लीपा - पोती करना बंद करें और एक नए नजरिये से सोचना शुरू करें। हमें व्यवस्था में आमूल- चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। 
शिक्षा में व्यावसायिक माफियागिरी पर नकेल कसने के लिए सख्त कानून और उनका कड़ाई से पालन होना चाहिए। परीक्षाओं में तकनीक का ऐसा पारदर्शी उपयोग हो, जहाँ भ्रष्टाचार की गुंजाइश शून्य हो। धाँधली करने वालों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हो जो उदाहरण बने। और सबसे जरूरी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े मुद्दों को राजनीति से परे रखा जाए। प्रशासनिक अधिकारियों और नीति-निर्माताओं की सीधी जवाबदेही तय हो।  कितना ही अच्छा हो कि ऐसे  मुद्दों पर सभी राजनीतिक दल मिलकर एक राष्ट्रीय सहमति बना पाएँ।  हालाँकि आज के अवसरवादी राजनेताओं  के उद्देश्यहीन प्रलाप के कारण यह सम्भव नहीं है।
इन सबके साथ यदि हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित भविष्य और बेहतर जिंदगी देनी है, तो इसकी शुरुआत केवल सरकार से नहीं, बल्कि समाज और परिवार के स्तर से भी करनी होगी। हमें अपने परिवारों और समुदायों में ऐसे मूल्यों को सींचना होगा जहाँ ईमानदारी, परोपकार और राष्ट्रीय हित को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखा जाए। यही नहीं नागरिकों को भी केवल मूकदर्शक बनने या दलगत राजनीति में बँटने की बजाय एक जागरूक प्रहरी की भूमिका निभानी होगी। 
तो समय आ गया है कि हम सब मिलकर एक ऐसा परिवार, ऐसा समाज और ऐसा समुदाय बनाएँ जहाँ युवाओं के सपनों की कद्र हो। हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें, जिसकी निष्पक्षता, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों का नाम पूरी दुनिया में एक मिसाल की तरह लिया जाए। यही उन शहीदों और राष्ट्र-निर्माताओं को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने हमें एक खुशहाल, आजाद और स्वाभिमानी भारत की नींव सौंपी थी। याद रखिए -जो शिक्षा संस्कार नहीं दे सकती, जो शिक्षा राष्ट्र-प्रेम नहीं सिखा सकती, उस अराजक शिक्षा से  युवा -वर्ग का कोई भला नहीं हो सकता।

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