- डॉ. रत्ना वर्मा
हाल ही में छत्तीसगढ़ की उस महान लोकगायिका का निधन हो गया, जिसने छत्तीसगढ़ की लोकगाथा 'पंडवानी' को सिर्फ देश ही नहीं; बल्कि सात समुद्र पार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाई। राज्य सरकार ने उन्हें ससम्मान अंतिम विदाई दी और उनके नाम से राज्य सम्मान की घोषणा भी की।खबर सुनते ही मन लगभग दो दशक पीछे चला गया। तब ‘उदंती’ की शुरुआत भी नहीं हुई थी, जब मैं भिलाई स्थित उनके घर जाकर उनसे एक लंबी और यादगार बातचीत करने पहुँची थी। पिछले कुछ दिनों से मैं अपनी पुरानी फाइलों और हार्ड डिस्क में उस साक्षात्कार को ढूँढ रही थी। पर शब्द भले ही फाइलों की परत में कहीं गुम हो गए थे; लेकिन जब यादों का पिटारा खुला, तो उस दिन का एक-एक दृश्य और बातचीत की पंक्तियाँ स्मृतियों से निकलकर सामने आ गईं।
चलिए मैं आपको अपनी यादों के पिटारे के साथ ले चलती हूँ- तीजन बाई के उस छोटे से क्वाटर 6 बी में-
भिलाई का वह क्वार्टर और तखत पर बैठी तीजन
बात उस दौर की है जब भारत सरकार से पद्मश्री, और पद्मभूषण पा चुकीं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त तीजन बाई भिलाई स्टील प्लांट के सेक्टर-1, सड़क नं. 18 के क्वार्टर नंबर '6बी' में रहा करती थीं। (बाद में तो उन्हें पद्म विभूषण से भी अंलकृत किया गया।) मिलने के तय वक्त पर जब मैं पहुँची, तो पता चला कि वे खाना खा रही हैं।
मैं उनके छोटे से बैठक खाने में रखी ट्रॉफियों और दीवारों पर टँगी तस्वीरों को देखने लगी। 19 मार्च 1988 को तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन के हाथों पद्मश्री और 3 अप्रैल 2003 को राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के हाथों पद्मभूषण ग्रहण करती उनकी तस्वीरें। लाल साड़ी और छत्तीसगढ़ी पारंपरिक जेवरों में सजी, हाथ में तंबूरा लिये पंडवानी गाती उनकी छवि देखकर मुझे स्टेज पर ‘द्रौपदी चीर हरण’ के प्रसंग में उनका रौद्र रूप की याद आने लगा।
समय की रफ्तार के साथ आगे बढ़ते और कई विवादों को झेलते हुए तीजन बाई अपनी पंडवानी गायिका के साथ उसी बुलंदी के शिखर पर विराजमान और उतनी ही व्यस्त भी रहीं। भारत सरकार ने जब उन्हें पद्मश्री सम्मान से विभूषित किया था, तब तीजन बाई को इसका गुमान तक नहीं था कि वे कितनी बड़ी पदवी राष्ट्रपति के हाथों लेकर लौटी हैं। अपने घर में वे उस दिन भी गनियारी गाँव की वही तीजन थीं, जो कभी अपनी संगी-सहेलियों के बीच खेल-खेल में ही महाभारत की कथा को गाकर सुनाया करती थी। मैं उनके जीवन के उतार -चढ़ाव के बारे में सोचते हुए उनका इंतजार कर रही थी कि तभी वे भोजन के बाद बाहर निकलीं। गीले हाथों को अपनी रोज पहनने वाली साधारण सी साड़ी से पोंछते हुए। बाल खुले थे, शायद तुरंत स्नान करके खाने बैठी थीं। हाथ में कंघी लिए वे मेरी बगल में आकर बैठ गईं और बाल सँवारते हुए इतनी सहजता से बातें करने लगीं, मानो परिवार का कोई सदस्य हाल-चाल पूछने आया हो। वे अपने रोज पहनने वाले पारंपरिक गहने पहने हुए थीं- कानों में झुमका और बारी, बाँह में गुदना, गले में हार, हाथों में ढेर सारी चूड़ियाँ , हाँ माथे पर उनकी पहचान वाली बड़ी- सी गोल बिंदी अभी वे लगा नहीं पाई थीं।चेहरे पर उम्र की लकीरें थीं, लगातार यात्राओं की थकान भी। जब मैंने स्वास्थ्य के बारे में पूछा, तो एक लंबी साँस लेकर बोलीं- “हाँ, कुछ न कुछ चलता रहता है।” तभी उनके सचिव मनहरण सखा ने उन्हें पान पेश किया। पान चबाते हुए वे आराम से बैठ गईं, जैसे कह रही हों- ‘पूछो, क्या पूछना है?’ वैसे तो वे हिन्दी में बातचीत कर रही थीं; पर बीच बीच में छत्तीसगढ़ी में बोलते हुए वे इतनी सहज हो गईं कि न उन्हें और न मुझे समय का भान हुआ।
वह ऐतिहासिक साक्षात्कार: तीजन बाई की ज़ुबानी
प्रश्न: क्या आपने कभी सोचा था कि गाँव (गनियारी) से शुरू हुआ यह सफर दुनिया तक पहुँचेगा?
तीजन बाई: हँसते हुए... मुझे नहीं मालूम था कि मैं गाँव से निकलकर इतनी दूर विदेशों तक हवाई जहाज में यात्रा करूँगी। यह तो सब भगवान की कृपा है।
प्रश्न: कौन-सी बात थी, जिसने आपको 13 वर्ष की उम्र में पंडवानी गाने के लिए प्रेरित किया?
तीजन बाई: मेरे नाना महाभारत की कहानी कहते थे। उन्हें महाभारत की पूरी कथा कंठस्थ थी। द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग सुनकर मुझे पूरी कहानी जानने की इच्छा हुई, तो मैं नाना से लुका के (छिपकर) उनको गाते हुए सुनती थी।
प्रश्न: छिपकर क्यों सुनती थीं?
तीजन बाई: मेहर ना, अपन नाना ल अब्बड़ डर्राववं (मैं अपने नाना से बहुत डरती थी)। उनके कमरे के बाहर दरवाजे के पीछे छुपकर बैठती थी। नाना बीच-बीच में उठकर चोंगी (सुलफी/बीड़ी का पारंपरिक रूप) पिया करते थे। एक दिन वे अचानक बाहर आ गए और मैं दीवार से चिपकी पकड़ी गई। उन्होंने पूछा- ‘कौन है तू?’ मैंने डरते हुए कहा- ‘मेह तीजन आंव’ (मैं तीजन हूँ)। उन्होंने पूछा कि - छुपा-छुपी खेल रही है, दाई ह मारीस हे के ददा ह खिसयाईस हे (माँ ने मारा है या पिता ने डाँटा है)? जब मैंने कहा कि नहीं, तो बोले- फिर क्यों छुपी है? मैंने डरते हुए कहा कि मैं आपकी कहानी छिपकर सुन रही थी। नाना बहुत खुश हुए और बोले- ‘चल अंदर बैठकर सुन।’ फिर वे मुझे रोज कथा सुनाने लगे।
प्रश्न: क्या नाना ही आपके गुरु थे? सार्वजनिक मंच पर पहली बार कब आईं?
तीजन बाई: हाँ, नाना ही गुरु थे। जब सीख गई और घर में पता चला तो, माँ ने खूब मारा और तब मैं भागकर चंदखुरी गाँव आ गई। वहाँ मजदूरी करते हुए शाम को संगी-साथियों को नाना से सुनी सुनाई पंडवानी सुनाती थी। एक दिन गाँव के भूषण दाऊ ने मेरा गाना सुना, तो खुश होकर 10 रुपये दिए। उस ज़माने में 10 रुपये बहुत थे! फिर उन्होंने शाम को चौराहे पर शोलापुरी चादर से स्टेज बनवा दिया। तबला-हारमोनियम और रागी (हुंकार भरने वाला साथी) का इंतज़ाम किया। और इस तरह चंदखुरी गाँव के चौराहे पर मेरा पहला सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ। 18 दिन तक महाभारत कथा चली। उसके बाद तो गाँव-गाँव से बुलावे आने लगे, तब से गावत हव अऊ आज तक गातेच हव (तब से गा रही हूँ और आज तक गा ही रही हूँ)।
प्रश्न: जनता के सामने पहली बार गाते समय डर नहीं लगा?
तीजन बाई: ‘डर काबर लागही’ (डर क्यों लगेगा), हिम्मत अपने आप आती गई। जितनी ज्यादा पब्लिक आती, उतना ही ज्यादा आनंद आता। (बात करते हुए उनका अंदाज बिल्कुल वैसा ही था जैसे महाभारत का कोई प्रसंग सुना रही हों)
प्रश्न: आप पेरिस गईं, पूरे विश्व में घूम आईं। गाँव की याद नहीं आती? खुशी कहाँ ज्यादा मिलती है?
तीजन बाई: अपने गाँव में जो खुशी मिलती है, वह विदेश में कहाँ! विदेश में चार दिन अच्छा लगता है, फिर मन घर की ओर खींचता है। अपनी धरती पर आते ही लगता है कि घर आ गए। हम तो भारत की संस्कृति और परंपरा लेकर बाहर गए थे और वहाँ से वाह-वाही और ताली अपने देश के लिए लेकर आए। वही हमारी असली कमाई है।
प्रश्न: पेरिस यात्रा से लौटने के बाद भिलाई स्टील प्लांट में आपको पानी पिलाने की नौकरी मिली। इतने बड़े कलाकार के लिए यह काम छोटा नहीं लगा?
तीजन बाई: (बेहद गंभीर और सहज होकर) कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। कोई समय था जब हम मजदूरी करते थे न? बड़ा पद मिल जाने पर कोई अपनी मजदूरी के दिनों को तो नहीं भूल सकता- (और वे एक दार्शनिक की तरह बोलने लगीं) ‘कल्याण तभे होही जब पाछू मुड़ के घलो देखबे। जले रोटी के याद जब तक नई आही, तब तक मिठाई में स्वाद नई लागय’ (कल्याण तभी होगा जब पीछे मुड़कर भी देखोगे। जली हुई रोटी की याद जब तक नहीं आएगी, तब तक मिठाई का स्वाद समझ नहीं आएगा) स्टील प्लांट ने मुझे नौकरी दी, यही बड़ी बात है। उन्होंने मुझे विदेश जाने से कभी नहीं रोका, वहीं से मेरे आगे बढ़ने की सीढ़ी बनी।
प्रश्न: इतनी व्यस्तता के बाद घर-परिवार कैसे सँभालती हैं?
तीजन बाई: घर का जीवन वैसा ही है, जैसे गाँव में रहता था। खाना बनाती हूँ, सब्जी बनाती हूँ, लइका मन ल देखथव (बच्चों को देखती हूँ)। रंक को राजा और राजा को रंक बनाना प्रभु का काम है। ‘कोनो दिन मोर स्थिति डाँवा-डोल हो जाही, त लोग हांसही न, कि वो दिन तो हीरोइन बने रहीस, अभी जीरो निकल गे! त ये कहे के नौबत झन आवे’ (कल को स्थिति खराब हुई तो लोग हँसेंगे कि कल तक हीरोइन बनी थी, आज जीरो हो गई। यह नौबत न आए, इसलिए जो है उसी में गुज़ारा कर लो)। यह कहते हुए वे भावुक हो गईं- हम बहुत गरीब घर की लड़की हैं। जब हम फटे-पुराने कपड़े पहनते थे, कई बार ब्लाउज तक नहीं होता था... उन दिनों को याद करती हूँ, तो जी थक जाता है। इसलिए हम बड़े घमंड या चरित्र में नहीं जीते।
मैंने तुरंत प्रसंग बदलना उचित समझा क्योंकि मैं जानती थी तीजन का बचपन कितने मुश्किल दौर से गुजरा है।
प्रश्न: महाभारत का कौन- सा प्रसंग आपको सबसे प्रिय है?
तीजन बाई: मुझे भीमसेन का प्रसंग सबसे ज्यादा पसंद है। भीम का रौद्र रूप और जोशीला अंदाज मुझे अपनी ओर खींचता है।
प्रश्न: आगे कब तक पंडवानी गाने का इरादा है?
तीजन बाई: वह मालिक की मर्जी। जितनी दूरी की उसने ‘ड्यूटी’ दी है, वहीं तक जाना है। मेरी ड्यूटी खलास, तो मैं चुप हो जाऊँगी।
अमर रहेगी वह हुंकार
इतना कहकर तीजन बाई जी उठने लगीं – “अब मुझे ड्यूटी जाना है” मैंने उनसे थोड़ा रुकने का अनुरोध किया और तस्वीर लेने के लिए कैमरा निकाला। उन्हें समय पर पहुँचना था, वे मुस्कुराते हुए कैमरे की ओर बगैर देखे, कंघी लेकर अपने बाल काढ़ने लगीं । इतने में बीएसपी की गाड़ी उन्हें लेने आ पहुँची थी। वे भीतर गईं माथे पर बड़ी सी बिंदी लगाकर कंधे में एक झोला लटकाकर गाड़ी की ओर बढ़ गईं ... मैं भी उनसे विदा लेकर बाहर निकल आई।
छोटी उम्र में ही घर छोड़ देने से लेकर, गाँव, शहर से होते हुए विदेशों तक पहुँचने वाली तीजन बाई को लेकर भले ही कई विवाद खड़े हुए हों, लेकिन तीजन बाई की माटी से जुड़ी सादगी ने कभी इन विवादों को तूल नहीं दिया। वे अंत तक गनियारी गाँव की वही सहज तीजन बनी रहीं, जिसके लिए ‘भीम की गदा’ बना उनका तंबूरा ही सब कुछ था।
आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं और वे अपनी ‘ड्यूटी’ पूरी करके अनंत की यात्रा पर चली गई हैं, तो लगता है कि कागज़ के पन्नों पर दर्ज साक्षात्कार भले ही कहीं खो जाएँ, लेकिन तीजन बाई की वह हुंकार, तंबूरे की तान और उनका ज़मीन से जुड़ा व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगा। तीजन बाई को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि!






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