वीरता शब्द मनोभावों की वह पराकाष्ठा है जिसके आगे दुनिया का हर बल बौना हो जाता है । इस मनोभाव के पैदा होते ही सामने खड़े प्रतिद्वंद्वी की शक्ति, साहस सब कम पड़ जाते हैं, हर वह शक्ति क्षीण हो जाती है जो स्वयं को शक्तिशाली समझती है । इस मनोभाव से आच्छादित व्यक्ति एकाएक इतना बलशाली हो उठता है कि उसके सामने खड़ा पहाड़ भी कम्पित हो उठता है, वह उसके मनोभावों को आँखों में देखकर थर्रा उठता है । आज कृष्णनगरी के एक ऐसे ही योद्धा का वीरगति दिवस है, जिन्होंने अपने साहस और वीरता के बल पर एक अमित वीरगाथा लिखी , जिसे आने वाली पीढ़ियों को जानना चाहिए ।
वर्ष 2016 में सिपाही बबलू सिंह 61 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे और 61 राष्ट्रीय राइफल्स जम्मू और कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में आतंकवाद-विरोधी अभियानों में लगी हुई थी। 29/30 जुलाई 2016 की रात में नौगाम सेक्टर में आतंकवादियों द्वारा सीमा पर कर भारतीय इलाके में घुसने की कोशिश की गई थी। 61 राष्ट्रीय राइफल्स की टुकड़ियाँ पहले से सतर्क थीं । । 30 जुलाई 2016 को लगभग 0030 बजे, नायक बिजेंद्र सिंह और सिपाही विशाल चौधरी एंटी-इंफिल्ट्रेशन ऑब्स्टिकल सिस्टम के साथ गश्त कर रहे थे। आतंकवादियों ने इस गश्ती दल पर फायरिंग की। इस गश्ती दल पर फायरिंग के बाद सिपाही बबलू सिंह और नायक राकेंद्र सिंह को गश्ती दल की सहायता के लिए एम्बुश इलाके में भेजा गया।
इसी बीच एक आतंकवादी आड़ में बड़े पत्थरों के पीछे छिप गया। सिपाही बबलू सिंह उस आतंकवादी को खोजते हुए दूसरे आतंकवादी के सामने आ गए । लगभग 15 मीटर की दूरी से उस आतंकवादी ने उन पर फायर कर दिया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। घायल होने के बावजूद, सिपाही बबलू सिंह ने साहस और वीरता का प्रदर्शन करते हुए जवाबी कार्रवाई की और आतंकवादी को मार गिराया । घाव गहरा होने और तेजी से होते रक्तस्राव के कारण वह वीरगति को प्राप्त हो गए। सिपाही बबलू सिंह ने 29 साल की उम्र में अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया । उनकी असाधारण वीरता और साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत 'सेना मेडल' से सम्मानित किया गया।
सिपाही बबलू सिंह का जन्म कृष्ण नगरी मथुरा की सदर तहसील के फरह ब्लॉक के गांव झंडीपुर में 10 जुलाई 1987 को श्रीमती मुन्नी देवी और श्री मलूक सिंह के यहाँ हुआ था । उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दीन पब्लिक स्कूल से पूरी की और हाई स्कूल की शिक्षा जवाहर इंटर कॉलेज और इंटर की शिक्षा सेठ प्रेम सुखदास भगत इंटर कॉलेज से पूरी की । 18 साल की उम्र में सन 2005 में सेना की जाट रेजिमेंट में भर्ती हो गए । प्रशिक्षण के पश्चात 18 जाट रेजिमेंट में तैनात हुए । लगभग 11 साल की सेवा पूरी करने के पश्चात वह सन 2016 में 61 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात हुए। । सिपाही बबलू सिंह के परिवार में उनके माता पिता के अलावा उनके चार भाई - श्री निर्भय सिंह, श्री हरिओम सिंह और चौधरी सतीश सिंह और एक बहन श्रीमती अंजना सिंह , उनकी पत्नी श्रीमती रविता देवी, बेटी गरिमा चौधरी और बेटे द्रोण चौधरी हैं।सिपाही बबलू सिंह की याद में उनके गांव में एक स्मारक का निर्माण किया गया है, जिसमें उनकी प्रतिमा स्थापित की गयी है । इस स्मारक की सबसे खास बात यह है कि इस स्मारक के ठीक सामने टी – 55 टैंक (वॉर ट्राफी) स्थापित किया गया है । यह स्मारक उत्तर प्रदेश में अपनी तरह का पहला स्मारक है, जिस पर टी – 55 टैंक लगा हुआ है । यह टी – 55 टैंक भाइयों में आपसी प्रेम और समर्पण की भी निशानी है । इस टैंक को अपने भाई के स्मारक पर लगवाने के लिए एडवोकेट सतीश चौधरी ने जो प्रयास किया वह अवर्णनीय और अपने आप में एक इतिहास है । इस टैंक को हासिल करने के लिए सिपाही बबलू सिंह के भाई चौधरी सतीश ने पिछले कई सालों तक मेहनत की, उन्होंने राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक, सम्बंधित नेताओं और अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया, अनगिनत पत्र व्यवहार किया, तब जाकर सन 2023 में यह टी - 55 टैंक उन्हें मिला ।
सम्पर्कः अयोध्या, लखनऊ, मो. 7087815074


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