July 18, 2013

उपदेश नहीं अनुकरण से सीखते है बच्चे


उपदेश नहीं अनुकरण से सीखते है बच्चे
- अन्नपूर्णा बाजपेई

किसी पेड़ के पत्ते एवं फूलों की सफाई से वह पेड़ हरा-भरा नहीं हो जाता, बल्कि उसकी जड़ों को पोषण मिलने पर ही पेड़ बड़ा होगा, फूलेगा-फलेगा। ऐसे पल्लवित, पुष्पित एवं विकसित वृक्ष के नीचे पथिक कुछ देर विश्राम कर लेता है, उसके फलों से पथिक की भूख मिटती है, ठीक उसी तरह व्यक्ति को समाज का अच्छा नागरिक बनने के लिए अगर बचपन से ही उसके क्रिया-कलाप की सही दिशा निर्धारित की जाए तो समाज को एक अच्छा नागरिक मिलेगा।
बबूल का बीज बोकर आम के पेड़ की आशा नहीं की जा सकती। बच्चे के मन मे रोपा गया बीज समाज हित मे कोई फल देता है तो वह संस्कारी होने का प्रतीक है। मनुष्य का आचरण ही उसके व्यक्तित्तव की व्याख्या करता है। संस्कार उस नींव का नाम है ; जिस पर व्यक्तित्व की इमारत खड़ी होती है। एक  सुसंस्कारित व्यक्ति अपनी अवधारणाओं से और एक व्यक्ति अपने चरित्र से जाना जाता है। संस्कारवान् संतान ही गृहस्थ आश्रम की सफलता का सच्चा लक्षण है। हर माँ बाप चाहते है कि उनकी संतान उनकी अपेक्षा के अनुसार बने, परंतु कई बाहरी परिस्थितियाँ, सांस्कृतिक प्रदूषण, उपभोक्ता संस्कृति जैसे कारण आज की युवा पीढ़ी एवं बच्चों  को  अपनी गिरफ्त मे लिये हुए है। खान-पान, रहन सहन, तौर -तहजीब, चिंतन -मनन सभी क्षेत्रों मे पाश्चात्य संस्कृति एवं सभ्यता हावी होती जा रही है। कुसंस्कारों की बाढ़ में डूबने से पहले ही हमे सचेत होना पड़ेगा।
घर संस्कारों की जन्मस्थली है। इसलिए संस्कारित करने का कार्य हमें घर से ही प्रारम्भ करना होगा। संस्कारों का प्रवाह हमेशा बड़ों से छोटों की ओर होता है। बच्चे उपदेश से नहीं अनुकरण से सीखते हैं। बालक की प्रथम गुरु माँ ही अपने बालक मे आदर, स्नेह, एवं अनुशासन जैसे गुणों का सिंचन अनायास ही कर देती है। परिवार रूपी पाठशाला मे बच्चे अच्छे बुरे का अंतर समझने का प्रयास करता है। जब इस पाठशाला के अध्यापक अर्थात दादा-दादी  तथा माता-पिता संस्कारी होंगे, तभी बच्चों के लिए आदर्श स्थापित कर सकते हैं। आजकल परिवार मे माता-पिता दोनों ही व्यस्त हैं ,दोनों ही नौकरी पेशा हैं ; इसलिए संस्कारों के सिंचन जैसा महत्त्वपूर्ण कार्य उपेक्षित हो रहा है। आज धन को प्राथमिकता दी जा रही है। कदाचित माता-पिता भौतिक सुख के संसाधन जुटा कर बच्चों को खुश रखने की कोशिश कर रहे है, इस भ्रांति मूलक तथ्य को जानना होगा, अच्छे संस्कार बच्चों में छोड़ने का मानस बनाना होगा, इसके पहल माता-पिता को करनी होगी। जो कुछ वह बच्चों से उम्मीद करते है पहले उन्हे कर के दिखाना होगा तब हम बच्चों को कुछ सिखा पाएँगे।
आज की उद्देश्यहीन शिक्षा पद्धति बच्चों का सही मार्ग प्रशस्त नहीं करती। आज की युवा पीढ़ी शीघ्र पैसे कमाने के आसान तरीके अपना कर परिश्रम एवं धैर्य से दूर होती जा रही है। सात्विक प्रवृत्तियों के दमन से नैतिक आचरण का ह्रास होता जा रहा है। मर्यादा और अनुशासन का लोप हो रहा है। व्यक्ति का हृदय संकुचित हो गया है सोचने-समझने की शक्ति का भी नाश हो रहा है। अन्तर्मन की बात सुनने की शक्ति के लिए उपयोगी ज्ञान की उपेक्षा हो रही है, सादगी का भी अभाव होता जा रहा है। आधुनिक संस्कृति अपनी जड़ें जमा रही है तथा कथित हाई सोसाइटी का का चलन बढ़ रहा है । इस चुनौती पूर्ण माहौल मे सुसंस्कारों प्रत्यारोपण कठिन कार्य हो गया है ; परंतु असंभव नही है। आज भी हमारी भारतीय संस्कृति में ।कर्तव्यपरायणता, सहिष्णुता, उदारता आदि मानवीय मूल्य निहित हैं। आवश्यकता है तो बस, थोड़े से समन्वय की। हमारी संस्कृति क्या है? इसे एक छोटे से उदाहरण से हम समझ सकते है-
हमे भूख लगती है तो हम भोजन करते हैं- यह है प्रकृति। दूसरों का छीन कर खाते है तो- यह है विकृति। हम भोजन कर रहे हैं कोई भूखा व्यक्ति आता है, हम उसे पहले खिलाते हैं, फिर खुद खाते हैं- यह है संस्कृति। प्रकृति में विकार आ जाने पर संस्कारों की आवश्यकता पड़ती है। संस्कार और संस्कृति एक ही धागे की दो गाँठें है। संस्कार के बीज बचपन मे डाले जाते है; जो किशोरावस्था और इससे आगे फसल के रूप मे दिखाई देते है। संस्कृति की रक्षा युवावस्था मे की जाती है जो कि उचित संस्कार सिंचन से ही संभव है। जो व्यवहार अनुकरणीय और प्रेरक होता है ,वही आचार-विचार परंपरा बन कर संस्कृति कहलाती है।
यदि सरल भाषा मे समझने का प्रयत्न करें तो व्यक्ति अनुशासित और सुंदर जीवन प्रणाली के विकास और दैनिक जीवन चर्या में उसके समावेश कि प्रक्रिया को ही संस्कार कहा जा सकता है। दैनिक जीवन मे नियमितता लाना, व्यवहार में सद्गुणों का समावेश करना एवं धैर्यपूर्वक हर स्थिति मे यथोचित धर्मयुक्त आचरण करना संस्कारित जीवन का द्योतक है। दुर्गुणों को हटा कर सद्गुणों का आह्वान करने का नाम संस्कार है।  शुभ संस्कार, शुभ प्रकृति, शुभ रुचियाँ अच्छे कर्मों का फल हैं। जिस प्रकार पौष्टिक एवं स्वास्थ्य वर्धक भोजन से अच्छी सेहत बनती है ठीक उसी प्रकार अच्छे कर्मों के फल से अच्छे संस्कार बनते हैं। हम अन्य लोगों से जिस व्यवहार की अपेक्षा रखते है वैसा ही व्यवहार उनके प्रति करें यह धर्म है।
सुसंस्कारों के लिए  आवश्यक है- सुसंगति, अच्छी पाठ्य सामाग्री, ससाहित्य (अच्छा साहित्य), उचित मार्गदर्शन एवं सहयोग। बच्चों के मन की कोमल सुंदर एवं अछूती भावनाओं की अभिव्ययक्ति कला द्वारा ही होती है। संगीत, कला, चित्रकला, मूर्ति कला, जिसमे भी बच्चे रुचि हो ,उस कला  मे अभिभावक को सहयोगी बनना चाहिए इससे  भी संस्कारों की समृद्धि होती है।
 माता-पिता के द्वारा ध्यान देने योग्य बातें :-
1- बड़ों का आचरण ऐसा हो जिससे कोई गलत प्रभाव बच्चों पर न पड़े या वे ये न कहने पाएँ कि वे बड़े हैं वे भी ऐसा करते हैं तो मै   क्यो नहीं।
 2- दैनिक जीवन नियमित एवं मर्यादित हो।
 3- व्यवहार मे सदगुणों का समावेश हो, सिर्फ भौतिक सुख सुविधा नहीं बल्कि बच्चों को चाहिए प्रेम, स्नेह, विश्वास, सकारात्मक भावना, संरक्षात्मक वातावरण।
4- बच्चों से अधिक अपेक्षा  न करें, बल्कि उन्हे प्रोत्साहन देते रहे।
5- बच्चों के साथ पारिवारिक चर्चाएँ करें, परंतु  नकारात्मक चर्चाएँ न करें इससे बच्चों के मन पर गलत असर पड़ता है, वे अपने मन मे गलत धारणा बना लेते है। 
6-पारिवारिक कार्यक्रमों मे भारतीय पद्धति को प्रोत्साहन दें, जन्मदिन, शादी विवाह इत्यादि। इन कार्यक्रमों के दौरान आप अपने बच्चों को सभी का यथोचित मान सम्मान और सेवा का संस्कार सिखा सकते हैं। 
7-घर के बड़े बुजुर्ग दादा-दादी, नाना-नानी अपनी कहानियों, कहावतों और खुद के संस्मरणों के माध्यम से बड़ी-बड़ी बातें तथा सफलता के कई सूत्र सिखा देते है जो किसी किताब मे नहीं होते।
 इस प्रकार हर माता-पिता को ऐसा संकल्प लेना होगा कि उनके किसी आचरण का कुप्रभाव बच्चों पर न पड़े। बल्कि ऐसे संस्कारों का आदान करें जो उच्च कोटि के हों। भावी पीढ़ी को मनसा वाचा कर्मणा सशक्त बनाने हेतु उनमे शक्ति-भक्ति और युक्ति का संगम करना है। प्रत्येक व्यक्ति अपना आँगन स्वच्छ रखना सीख ले तब दूसरों को भी प्रेरणा दे तो समूचे समाज मे बदलाव संभव हो सकेगा।

संपर्क: प्रभाञ्ज्लि,-278 विराट नगर , जी टी रोड , अहिरवा कानपुर - 7 .

1 Comment:

palash said...

bhabhi aapne jo kaha, usko hamne aapko apne jeevan mein utarte huy bhi dekha hai, ye aapke apne anubhaw hai.
aapse bahut kuch seekhne ko milta hai.
very inspiring articel
thanks bhabhi
Namastey Ratna ji
thanks to you , for appriciating such a valuable post..

एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें

अभिनव प्रयास- माटी समाज सेवी संस्था, जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है। बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से आदिवासियों के बीच काम रही 'साथी समाज सेवी संस्था' द्वारा संचालित स्कूल 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। इस स्कूल में पढऩे वाले बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत कारीगरी की नि:शुल्क शिक्षा भी दी जाती है। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपये तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक जागरुक सदस्य पिछले कई सालों से माटी समाज सेवी संस्था के माध्यम से 'साथी राऊंड टेबल गुरूकुल' के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। प्रसन्नता की बात है कि नये साल से एक और सदस्य हमारे परिवार में शामिल हो गए हैं- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' नई दिल्ली, नोएडा से। पिछले कई वर्षों से अनुदान देने वाले अन्य सदस्यों के नाम हैं- प्रियंका-गगन सयाल, मेनचेस्टर (यू.के.), डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, सुमन-शिवकुमार परगनिहा, रायपुर, अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, डॉ. रत्ना वर्मा रायपुर, राजेश चंद्रवंशी, रायपुर (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी, बैंगलोर (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, रायपुर (छ. ग.) 492 004, मोबा. 94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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