July 18, 2013

आपके पत्र/ मेल बॉक्स



एक पाती... 
उदंती के जून,  2013  अंक में आपका संपादकीय निदान खोजना ही होगा…’ के लिए साधुवाद! आपने फैलती नक्सली हिंसा की भर्त्सना करते हुए जिस गहराई से इस समस्या के मूल कारणों की तरफ देश, शासन और प्रशासन का ध्यान खींचा है, वह काबिले गौर है और स्पष्ट रूप से यह सुझाव देता है कि नक्सल प्रभाव को रोकने के लिए हमें तत्काल ऐसे सभी उपाय करने होंगे ;जिनसे आदिवासियों को शोषण से निजात मिल सके।  इस सन्दर्भ में मैं यहाँ आपके इस अंक में छपी डॉ. श्याम सखा  श्याम  की इन पँक्तियों को दोहराना चाहता हूँ कि- ‘आज नहीं तो कल होगा, हर मुश्किल का हल होगा’  यूँ सदैव की भाँति उदंती के जून अंक में प्रकाशित सभी रचनाएँ सामायिक और प्रभावी हैं। सभी लेखकों को बधाई! आपकी इस  अनकही से प्रभावित होकर मैंने  नक्सलवादियों के नाम एक पत्र लिखा  हैं जो इस प्रकार से है-
जरूरी नहीं है कि हम सही हों, जरूरी नहीं कि तुम सही हो,
या फिर मेरी या फिर तुम्हारी हाँ में हाँ  मिलानी वाली भीड़;
तो फिर क्या करें ?
क्या इस असहमति के चलते, बन्दूक और बमों का सहारा लें?
निर्दोष लोगों का खून बहायें, आतंकवाद को अपनाएँ;
लोगों को अपनी बात मनवाने के लिए, उनके खून से नहाएँ,
और फिर किसी एक दिन सरकारी गोली के निशाने पर आएँ, ;
अथवा पकड़े जाने पर  कहीं फाँसी के फंदे पर झूल जाएँ ?
जरा सोचो, क्या यह जरूरी है? जान खुदा की अमानत है।
न दूसरों की जान लें, न अपनी जान दें, और वो भी सिर्फ इसलिए,
किसी ने तुम्हें बरगलाया है, अपने जाल में फँसाया है;
अपने स्वार्थ साधने के लिए कठपुतली बनाया है!
मुद्दा इतना बड़ा नहीं कि यूँ कीमती जान को गँवाया जाए,
आओ, संवाद के रास्ते इस गुत्थी को सुलझाया जाए!
                                     -सुभाष लखेड़ा, नई दिल्ली          
                              subhash.surendra@gmail.com
जुझारूपन का भाव
आपका जून अंक विश्व पर्यावरण दिवस पर केंद्रित हैं। हमने वरुण देवता का सम्मान करना छोड़ दिया, वरुण देवता रुष्ट हैं, कुपित तो होंगे ही। हमें पुन: प्राकृतिक शक्तियों का सम्मान करना सीखना होगा। 
 चिंतन में विनोद साव के लेख पर मेरी राय है- भारत में नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त हो चुका है। चीनी माओवाद ने उसकी हत्या कर दी है। बस्तर की भौगोलिक दुर्गमता और छत्तीसगढ़ के लोगों में जुझारूपन के अभाव ने आन्ध्र के उग्रवादियों को आमंत्रित किया है। हमारी राज्य सरकारें चीनी आतंकवाद को रोक पाने में असफल रही हैं। चीन छत्तीसगढ़ में है .... चीन भारत की सीमाओं पर है और और उसका सशक्त प्रतिरोध करने वाला कहीं कोई नहीं है। किंतु हम केवल सरकारों को ही पूरी तरह दोषी नहीं ठहरा सकते। समाज की निष्क्रियता भी इसके लिए,  कम जि़म्मेदार नहीं है।
                                                                   -कौशलेन्द्र
                                                    kaushalblog@gmail.com

साहित्य और समाज का व्यापक फलक
पिछले अंक में प्रकाशित ग़ज़ल जंगल का न होना, फिर बादल का न होना, बादल न होने पर जल का न होना, परस्पर नाखून और मांस कि तरह जुड़ा है, जिसे श्याम जी ने बहुत सहजता से व्यक्त किया है। घर की कलह रिश्तों को दलदल बना देती है, यह आज के पारिवारिक विघटन का कटु सत्य है। कम से कम शब्दों में जीवन और जगत का सत्य पेश कर दिया है। विनोद साव जी का नक्सली अन्दोलन पर प्रस्तुत विश्लेषण तार्किक है। भैरव प्रसाद की कहानी ' एक पाँव का जूता '  बहुत मार्मिक है। पाठक को द्रवित किए बिना नहीं रहती। क्या इस तरह की कालजयी रचना से हमारे राजनेता कुछ सीखेंगे? अँधियारे रास्ते और उजला सवेरा- भावना सक्सैना जी का आलेख शोषण के इतिहास को परत-दर-परत खोलने में सक्षम है। अपने साढ़े तीन साल के प्रवास में उन्होंने भारतीयों की 140 साल पहली पीड़ा को पाठकों के समक्ष रखा। अनुपम मिश्र का आलेख और डॉ रत्ना जी का सम्पादकीय हमें वर्तमान की अपरिहार्य चिन्ता से रूबरू कराते हैं। छोटी-पत्रिका में साहित्य और समाज के व्यापक फलक को प्रस्तुत किया गया है। अनिता ललित के हाइकु गागर में सागर की तरह हैं साथ ही अभिव्यक्ति की ताज़गी को भी सँजोए हैं।
                                                         -रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु
                                                        rdkamboj@gmail.com

अर्थपूर्ण हाइकु
इस अंक में प्रकाशित अनिता ललित की हाइकु लगाओं पौधे बहुत सुंदर, बहुत खूबसूरत, बहुत अर्थपूर्ण, बहुत सार्थक और बहुत मार्मिक है। बधाई।
                                                                  -अशोक सालुजा

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