July 18, 2013

स्वामी विवेकानंद

पूर्णता का मार्ग

 धर्म और विशेषकर हिन्दू धर्म के बारे में अज्ञान, अंधविश्वास तथा विकृत धारणाओं का निराकरण करना- स्वामी विवेकानंद के समक्ष यह कितना कठिन काम था! अत: उनके मन में यदाकदा निराशा का झोंका आ जाना स्वाभाविक ही था। एक ऐसी ही मन:स्थिति में स्वामी जी ने डेट्राएट से 15 मार्च 1894 ई. को शिकागो की हेल-बहनों के नाम एक पत्र में लिखा-
परंतु जब से मैं यहाँ आया हूँ, पता नहीं क्यों, मन बड़ा उदास रहता है- कारण मुझे मालूम नहीं। मैं व्याख्यान देते-देते और इस प्रकार के निरर्थक वाद से थक गया हूँ। सैकड़ों प्रकार के मानवीय पशुओं से मिलते-मिलते मेरा मन अशांत हो गया है। मैं तुम लोगों को अपनी रुचि की बात बतलाता हूँ कि मैं लिख नहीं सकता, मैं बोल नहीं सकता, परंतु मैं गंभीर विचार कर सकता हूँ और जब जोश में होता हूँ तो वाणी से स्फुलिंग निकाल सकता हूँ। परंतु यह होना चाहिए कुछ चुने हुए, केवल थोड़े से चुने हुए लोगों के सामने ही।
वे यदि चाहें तो मेरे विचारों को ले जाकर प्रसारित कर दें  परंतु मैं यह नहीं कर सकता। यह तो श्रम का समुचित विभाजन है, एक ही आदमी सोचने में और अपने विचारों के प्रसार करनें में सफल नहीं हो सकता। मनुष्य को चिंतन के लिए मुक्त होना चाहिए, विशेषत: जबकि विचार आध्यात्मिक हो। मैं चाहता हूँ, वह यहाँ नहीं है और मैं इस तूफानी वातावरण को और अधिक काल तक सहन करने में असमर्थ हूँ।
कुछ शुद्ध सत्कप्रकृति के दर्पण इन शांतिपूर्ण शीतल, सुंदर, गहन, मर्मभेदी, स्वाधीन, खोजपूर्ण विचारों को परावर्तिक कर, पुन: तब तक ग्रहण करते रहेंगे जब तक कि उन सभी के स्वरों के बीच सामंजस्य नहीं स्थापित हो जाता। फिर दूसरे लोग इसे यथासंभव बाह्य जगत में प्रसारित करने का प्रयास करेंगे।
पूर्णता का मार्ग यह है कि स्वयं पूर्ण बनने का प्रयत्न करना तथा कुछ थोड़े से नर नारियों को पूर्ण बनाने का प्रयत्न करना। भला करने से मेरा यह तात्पर्य है कि कुछ असधारण योग्यता के लोगों का विकास करूँ कि भैंस के आगे बीन बजाकर समय, स्वास्थ्य और शक्ति का अपव्यय करूँ। अब और व्याख्यान देने की मुझे परवाह नहीं। किसी व्यक्ति अथवा किसी श्रोता मंडली की सनक के अनुसार मुझे परिचालित कराने का यह प्रयास बड़ा ही विरक्तिकर है।      

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लेखकों से अनुरोध...

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माटी समाज सेवी संस्था का अभिनव प्रयास
एक बच्चे की जिम्मेदारी आप भी लें...
माटी समाज सेवी संस्था, समाज के विभिन्न जागरुकता अभियान के क्षेत्र में काम करती रही है। पिछले वर्षों में संस्था ने समाज से जुड़े विभिन्न विषयों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य,पर्यावरण, प्रदूषण आदि क्षेत्रों में काम करते हुए जागरुकता लाने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में गत कई वर्षों से यह संस्था बस्तर के जरुरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन एकत्रित करने का अभिनव प्रयास कर रही है।
बस्तर कोण्डागाँव जिले के कुम्हारपारा ग्राम में बरसों से कारीगर आदिवासियों के बीच काम रही “साथी समाज सेवी संस्था” द्वारा संचालित स्कूल “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” में ऐसे आदिवासी बच्चों को शिक्षा दी जाती है जिनके माता-पिता उन्हें पढ़ाने में असमर्थ होते हैं। प्रति वर्ष एक बच्चे की शिक्षा में लगभग चार हजार रुपए तक खर्च आता है। शिक्षा सबको मिले इस विचार से सहमत अनेक लोग पिछले कई सालों से माटी संस्था के माध्यम से “साथी राऊंड टेबल गुरूकुल” के बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेते आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों से माटी समाज सेवी संस्था उक्त स्कूल के लगभग 15 से 20 बच्चों के लिए शिक्षा शुल्क एकत्रित कर रही है। अनुदान देने वालों में शामिल हैं- प्रियंका-गगन सयाल, लंदन मैनचेस्टर, डॉ. प्रतिमा-अशोक चंद्राकर रायपुर, तरुण खिचरिया, दुर्ग (पत्नी श्रीमती कुमुदिनी खिचरिया की स्मृति में), श्री राजेश चंद्रवंशी (पिता श्री अनुज चंद्रवंशी की स्मृति में), क्षितिज चंद्रवंशी (पिता श्री राकेश चंद्रवंशी की स्मृति में)। अरुणा-नरेन्द्र तिवारी रायपुर, पी. एस. राठौर- अहमदाबाद। इस मुहिम में नए युवा सदस्य जुड़ें हैं- आयुश चंद्रवंशी रायपुर, जिन्होंने अपने पहले वेतन से एक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी उठायी है, जो स्वागतेय पहल है। इस प्रयास में यदि आप भी शामिल होना चाहते हैं तो आपका तहे दिल से स्वागत है। आपके इस अल्प सहयोग से एक बच्चा शिक्षित होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल तो होगा ही साथ ही देश के विकास में भागीदार भी बनेगा। तो आइए देश को शिक्षित बनाने में एक कदम हम भी बढ़ाएँ। सम्पर्क- माटी समाज सेवी संस्था, पंडरी, रायपुर (छग) 492 004, मोबा.94255 24044, Email- drvermar@gmail.com

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