पुस्तक : मेरे भगत सिंह : लेखक- पंकज चतुर्वेदी, संस्करण:प्रथम 2026, पृष्ठ:324, मूल्य: रु 350 , प्रकाशकः पेंगुएन स्वदेश, पेंगुएन रैंडम हाउस, इण्डिया,प्रा . लि . चौथी मंज़िल,कैपिटल टॉवर,-1एमजी रोड गुरुग्राम, हरियाणा-122002
भगत सिंह एक क्रांतिकारी होने के साथ-साथ उच्चकोटि के दूरदर्शी विचारक भी हैं। यह बात और है कि उनके जीवन काल में उनके विचार, उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की भाँति प्रचार न पा सके । यदि जिंदगी ने उन्हें मौका दिया होता तो, आजादी की लड़ाई की भाँति स्वतंत्र भारत में भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती। उन्हें महज़ 'असेंबली बम कांड' या 'सांडर्स वध' के अभियुक्त के रूप में देखना उनके विशाल व्यक्तित्व को संकुचित करने जैसा है। वे एक ऐसे नायक थे, जिनसे अंग्रेज सरकार इस कदर भयभीत थी कि उनकी शहादत के बाद भी जन- आक्रोश के डर से उनके पार्थिव शरीर को रात के अँधेरे में जला दिया गया। जो क्रांतिकारी जीते जी साम्राज्यवाद के लिए चुनौती बना रहा, उसका शव भी फिरंगियों के मन में भय पैदा कर रहा था।
भगत सिंह केवल सशस्त्र क्रांति के पक्षधर नहीं थे, बल्कि एक प्रखर वैचारिक योद्धा भी थे। उनका लक्ष्य केवल देश को आजाद कराना मात्र नहीं था, बल्कि उससे भी कहीं आगे, स्वतंत्र भारत की तस्वीर कैसी होनी चाहिए, इसका पूरा खाका उनके दिमाग में स्पष्ट था। वे एक ऐसे समाजवादी गणराज्य का स्वप्न देखते थे, जहाँ शोषण का कोई स्थान न हो और प्रत्येक नागरिक की हिस्सेदारी समान हो। यही कारण था कि उन्होंने अपने संगठन का नाम बदलकर 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) रखा। उनके भीतर अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रबल चेतना और शक्ति आरंभ से ही थी, उनकी सबसे प्रिय पुस्तक कार्लाइल की लिखी 'क्राई फॉर जस्टिस' थी। वे विवाह को क्रांति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा तथा क्रांति को ही धर्म मानने वाले थे ।
‘मेरे भगत सिंह’ पुस्तक के लेखक पंकज चतुर्वेदी, जो मूल रूप से पत्रकार हैं, ‘जवाहर लाल हाजिर हों’ के साथ- साथ आपने कई चर्चित पुस्तकें लिखी हैं और कई प्रतिष्ठित सम्मानों से आपको सम्मानित किया गया है।
‘मेरे भगत सिंह’ पुस्तक का शीर्षक जितनी आत्मीयता से भरा हुआ है, लेखक ने उतने ही मनोयोग से इस पुस्तक की रचना की है। यह पुस्तक भगत सिंह के संपूर्ण व्यक्तित्व और विचारों को प्रामाणिक ढंग से हमारे सामने रखती है, क्योंकि इसमें भगत सिंह से सीधे जुड़े लोगों के विचार और उनके संस्मरणों को आधार बनाया गया है। यह पुस्तक चार खंडों में विभाजित है तथा प्रत्येक खंड अपने आप में विशिष्ट है क्योंकि प्रत्येक खंड भगत सिंह के विचारों व व्यक्तित्व के उन पहलुओं को उजागर करता है, जो बहुत कम लोगों तक सीमित थे। यह कृति केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि भगत सिंह के मानवीय और वैचारिक पक्षों का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
पूत के पाँव पालने में, कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी,राजनेता,मीडिया और विमर्श- इन चार खंडों में भगत सिंह के छोटे -से जीवनकाल के वृहत् अध्यायों को समेटने का सफल प्रयास किया गया है।
प्रथम खंड में भगत सिंह के निकटस्थ जनों के संस्मरण है, जो पाठक को भगत सिंह से आत्मीय जुड़ाव की अनुभूति कराते हैं तथा भगत सिंह के व्यक्तित्व व विचारों के उन पक्षों को अनावृत करते हैं, जो भगत सिंह को एक क्रांतिकारी की चर्चित भूमिका से अलग वैचारिक योद्धा तथा एक ऐसे नौजवान के रूप में हमारे सामने लाते हैं ,जो कि जीवन के उल्लास से पूर्ण है, दिल खोलकर हँसता है, रोता है, दिल्लगी करता है, वाकपटु है, उदार है और प्रेम के भावों से परिपूर्ण है; परंतु कर्तव्य पथ का पथिक है। ये संस्मरण लाहौर नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल छबीलदास की पुत्री सुश्री मनोरमा दीवान के हैं, जहाँ भगत सिंह ने 1923 में प्रवेश लिया। लाहौर स्थित द्वारिकादास पुस्तकालय में लाइब्रेरियन राजाराम शास्त्री, प्रो. जगमोहन सिंह द्वारा भगत सिंह की पूजनीय माँ श्रीमती विद्यावती जी का 1975 में लिये गए साक्षात्कार के रूप में तथा उनके छोटे भाई कुलतार सिंह की बेटी सुश्री वीरेन्द्र सिंधु के माध्यम से प्रस्तुत हुए हैं। बेहद सहज- सरल भाषा में ये पर्त दर पर्त खुलते हुए पाठक के सामने एक ऐसे भगत सिंह को खड़ा करते हैं, जो जाँबाज तो है ही, संवेदनाओं व भावनाओं से भरा हुआ भी है। हमेशा हँसते रहने वाले भगत सिंह अपनी माँ से कहा करते थे, ‘बेबे तुम परेशान न हुआ करो। तुम्हारे लिए एक अनोखी दुल्हन ब्याहकर लाऊँगा’, भगत सिंह का आशय हिंदुस्तानी की आजादी से था। राजाराम शास्त्री के अनुसार अदालत में भगत सिंह को हँसते देखकर मजिस्ट्रेट के टोकने पर भगत सिंह, सिंह की तरह गरजते हुए कहते हैं, “मजिस्ट्रेट महोदय,इस समय आपको मेरा हँसना अच्छा नहीं लगता; पर उस दिन आप क्या करेंगे, जिस दिन मैं फाँसी के तख्त पर भी हँसूँगा और इंकलाब जिंदाबाद चिल्लाऊँगा?”
खंड दो ‘कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी’ के अंतर्गत क्रांतिकारी शिव वर्मा की भगत सिंह के साथ पहली मुलाकात से लेकर शहादत के कुछ समय पूर्व हुई मुलाकात का विवरण तथा उनसे कहे गए शब्दों को पढ़कर मन भावुकता और गर्व से भर उठता है कि जानें किस मिट्टी के बने थे ये लोग, जिनके मन में शहादत की होड़ लगी हुई थी। ‘सांडर्स वध’ के बाद भगत सिंह की पत्नी का स्वांग रचकर उन्हें लाहौर से सुरक्षित निकालने वाली दुर्गा भाभी का योगदान और चंद्रशेखर आजाद का संदेश लेकर गांधी जी से उनकी वह ऐतिहासिक मुलाकात, जिसमें उन्होंने क्रांतिकारियों की फाँसी रुकवाने का प्रयास किया, इस खंड का मुख्य आकर्षण है।
अजय कुमार घोष, बटुकेश्वर दत्त, भगवान दास माहौर, विजय कुमार सिन्हा और यशपाल जैसे क्रांतिकारी साथियों की दृष्टि से भगत सिंह का चित्रण इस पुस्तक को एक ऐतिहासिक दस्तावेज की श्रेणी में खड़ा करते हैं।
तीसरा खंड ‘राजनेता’ शीर्षक से है जिसमें सुभाष चन्द्र बोस द्वारा महात्मा गाँधी से आग्रह करना, शहादत के बाद महात्मा गाँधी, मोहम्मद अली जिन्ना, ई.एम.एस. नंबूदरीपाद, महामना आदि के विचार यह सिद्ध करते हैं कि भगत सिंह आजादी की लड़ाई में कितना महत्त्वपूर्ण थे तथा उनकी शहादत से स्वाधीनता आंदोलन को गति मिली है। यह खंड भगत सिंह तथा साथियों की फाँसी के संबंध में महात्मा गाँधी पर उठने वाले प्रश्न चिह्नों के काफी हद तक उत्तर तलाशते हुए महात्मा गाँधी की भूमिका को रेखांकित भी करती है।
अंतिम खंड ‘मीडिया और विमर्श’ में भगत सिंह की शहादत के पश्चात् ब्रिटिश और भारतीय मीडिया की टिप्पणियाँ हैं, जो ये बताती हैं कि किस तरह पूरी दुनिया में भगत सिंह की शहादत से क्रिया- प्रतिक्रिया हुई। भारत में शोक की लहर दौड़ गई, जनाक्रोश की आँच ब्रिटिश संसद तक पहुँची।
यह पुस्तक इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है ; क्योंकि ये केवल शहादत तक ही सीमित नहीं है ; बल्कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद तत्कालीन नेताओं ने फाँसी की सजा रुकवाने के लिए क्या प्रयास किए, इसका ब्यौरा भी प्रस्तुत करती है।
वास्तव में उपर्युक्त चारों खंडों में विभिन्न लोगों के जो विचार, संस्मरण अब तक बिखरे हुए रूप में हमें प्राप्त होते थे, इस पुस्तक में उन सभी को लेखक ने एक शोधार्थी की भाँति एकत्र करके पुस्तक का रूप प्रदान किया है तथा मूल कथ्य के प्रति पूर्ण सतर्कता एवं सावधानी बरती है।
इस पुस्तक में अनेक दुर्लभ चित्र हैं, जिन्हें देखकर रोमांच हो उठता है तथा पुस्तक और भी प्रामाणिक बन जाती हैं। भगत सिंह के जीवन संघर्ष, उनके विचारों की गहराई, सोच की ऊँचाई और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता का चित्रण अत्यंत प्रभावशाली ढंग से करने के कारण यह पुस्तक सार्वकालिक प्रासंगिक व पठनीय है।

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