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May 1, 2026

कविताः खामोशी

  - अनिता मण्डा

न डोर टूटती है

न पतंग उड़ती है

 

शौक था फूलों का ख़ुशबुओं का

हाथ जख़्मी हैं 

दिल के घावों से चू रहा है ख़ून

 

सन्नाटों से भरे अँधेरे जंगलों में 

बिनाई ढूँढती रही जुगनू

 

ख़ामोशी की चादर 

रात के काले आसमान सी तनी 

आँखें देर तक खोजती रही 

तारों के फूल

 

बहुत कुछ कहना था

मन में छटपटाता रहा

अँधेरे कुँओं के भीतर टकराते 

चमगादड़ों-सा

एक लफ्ज़ भी 

होठों की सीमा न लाँघ पाया

 

दरिया से बाहर जाने की बेचैनी में

लहरें सिर पटकती रहीं किनारों पर

साँसें उथली होतीं

फिर चल पड़तीं

 

वक़्त के कबूतर का गला

बिल्ली के नुकीले दाँतों में फँसा है

 

कितने ही उम्मीदों के पेड़ बोएँ

हवा का ज़हर कम ही नहीं हो रहा

कितने ही दुआओं के फूल खिलें

बारूद है कि सुलगता ही जाता है

 

कोई जादू का पानी नहीं 

कि आग बुझा दूँ

कोई जादू का मंत्र भी तो नहीं  

कि बाँच दो 

सो जाएँ सारी बेचैनियाँ

 

आँधियों के बीच 

यूँ ही जलाए रखना है मुझे

अपना दीप

ख़ामोशी से।

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