पुस्तकः मैं सफ़र में हूँ (साहित्यिक विमर्श), लेखक - रामे
श्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, मूल्य- 400/-₹, पृष्ठ-152, ISBN:978-93-6423-487-0,अयन प्रकाशन-दिल्ली 2026
भूमिका में रचनाकार की संवेदनात्मक अनुभूतियों की झलक होती है, जिसके द्वारा पाठक यह तय करता है कि वह उस साहित्य में प्रवेश करे या नहीं। यह किसी की साहित्यिक प्रतिभा का प्रोत्साहन है, इसके द्वारा लेखक अपनी रचनात्मकता को परखता भी है। इसी के द्वारा कोई पाठक, रचनाकार के दृष्टिकोण से परिचित होकर अपना तादात्म्य स्थापित करता है।
समीक्षा/ आलोचना किसी साहित्य विधा का मूलतः वह विस्तृत अवलोकन है, जो रचना का सूक्ष्मता से आकलन करते हुए उसकी अच्छाइयों से पाठकों को अवगत कराता है एवं कमियों की सलाह देता है।
यह विधा चुनौतीपूर्ण है। इसमें भिन्न समयावधि में कई साहित्यकारों के अंतःकरण को बाँचना होता है। सावधानी ये रखनी होती है कि हमारे शब्द रचना के साथ न्याय करें। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ एक ऐसे वरिष्ठ साहित्यिक व्यक्तित्व हैं, जो एक नियत समय में इतने सारे रचनाकारों के साथ चल पाने में सफल हुए हैं।
भूमिकाओं/समीक्षाओं के पृथक् संग्रह इन दिनों प्रकाशित हो रहे हैं जिनका स्वागत किया जाना चाहिए। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ को किसी विधा विशेष की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। जिसने जब भी मार्गदर्शन लिया, उसे प्रोत्साहन मिला है। आपका इससे पूर्व अलग-अलग विधाओं के अनेक संग्रह/संकलन प्रकाशित हो चुके हैं एवं अनेकों का संपादन भी किया है।
‘मैं सफ़र में हूँ’ में 22 भूमिकाएँ, 06 समीक्षाएँ एवं एक साक्षात्कार तथा एक अभिमत सम्मिलित हैं। आपने एक प्रख्यात साहित्यकार होने के नाते इसके माध्यम से रचनाकर्म में चक्रव्यूह की तरह प्रवेश, परिचय एवं परख को स्पष्टता के साथ रेखांकित किए हैं। विविध विधाओं में एक साथ जीना और उनके साथ न्याय कर पाना भी एक बड़ी बात है।
इसमें साहित्य की विविध विधाओं उसकी शैली और समकालीनता पर आपके विचार मूल्यवान् हैं। इन विधा में शामिल हैं- लघुकथा, कहानी, लोककथा, हाइकु, ललित निबंध, कविता संग्रह, बाल कहानी, व्यंग्य, हास्य-व्यंग्य, हाइकु, रामचरित मानस-धर्म/जीवन बोध ग्रन्थ, यात्रा-संस्मरण, पत्र लेखन, अभिमत एवं शौर्य-गाथा संस्मरण।
इस विमर्श की लेखकीय पंक्ति के अनुसार-
‘....रचना-कर्म स्वतः स्फूर्त होता है; अतः उसका अंतिम लक्ष्य कुछ नहीं होता, मेरा भी कुछ नहीं है।’ (7)
‘....संवेदना शून्य हृदय से केवल बुद्धिबल के आधार पर साहित्य नहीं रचा जा सकता…।’ (11)
‘....कथ्य को सपाटबयानी में प्रस्तुत न करके सांकेतिक रूप से प्रस्तुत करना कठिन है। यह काठिन्य ही उसका सौंदर्य है….। ’ (29)
‘...लेखक को जनमानस की पीड़ा परखनी होगी, उसे वाणी देनी होगी। लेखक का 'व्यक्तिगत' अगर रचना में भी सिर्फ 'व्यक्तिगत' बना रहता है, तो वह कुण्ठा और आरोप से ऊपर नहीं उठ सकता। व्यक्ति का विस्तार समाजगत होना चाहिए, तभी उसकी सार्थकता है। 'व्यक्ति' तक सीमित रहकर कोई अनुभूति रचना का रूप धारण नहीं कर सकती।’(33)
‘....भाव, विचार, कल्पना एवं चिन्तन को मूर्त रूप देने के लिए चित्रकार और कवि को पहले उसे मानस पटल पर जीवन्त करना होता है।…’(36)
‘....सक्षम भाषा होने पर ही दूसरे व्यक्तियों से संवेदना साझी की जा सकती है। यहाँ पर वह व्यक्ति भी विशिष्ट है, जो दूसरों के अनुभव को उसी स्तर पर अनुभव करता है। अच्छा रचनाकार वह है, जो अपने अनुभव-संसार को सामान्यीकृत करके एक बड़े वर्ग तक सम्प्रेषित करता है। सामान्यवर्ग तक अपनी अनुभूति सम्प्रेषित करना भी एक कौशल है।..’(41)
‘.....रचनाकार को समझने के लिए उसके अनुभव-जगत तक पहुँचना आवश्यक है। सीमित अनुभव और संकीर्ण चिंतन से इनकी रचनाओं के केंद्रीय भाव तक पहुँचना कठिन है। …’ (46)
‘.... यह अनुभूतिपरक सम्प्रेषण है। इतनी संयमित शब्दावली में अर्थ का संधान कठिन है। दरिद्र भाषा, सपाट और उथला चिन्तन, उलझी अनुभूतियाँ एवं मृतप्राय कल्पनाएँ किसी भी विधा के लिए संजीवनी नहीं बन सकती। …’ (82)
इस तरह के विधात्मक महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रत्येक साहित्यकार को पढ़ना एवं अपनाना चाहिए जिसे आपने दिया है। आपकी साहित्यिक यात्रा का यह संग्रह पाठकों को एक साथ बहुत सी विधाओं की जानकारी उपलब्ध कराने में सफल है। यह स्पष्ट है कि साहित्यकार होने की अनिवार्य शर्त है, उसमें संवेदनशीलता एवं मानवीयता होनी चाहिए।
आपके इस साहित्यिक यात्रा का सफ़र सुहाना रहे, नवलेखकों को आपका आशीर्वाद/स्नेह प्राप्त होता रहे यही मेरी शुभकामनाएँ हैं।
इस साहित्यिक विमर्श के लिए-हार्दिक बधाई।

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